Devendra Satyarthi Hindi Story

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मंदिर वाली गली हिंदी कहानी, Mandir Waali Gali Hindi Kahani
राय साहिब का घर मंदिर वाली गली में नहीं बल्कि गंगा के किनारे था। वो घर गंगा के किनारे न होता तो मुझे कमरे की खिड़कियों से गंगा के दर्शन कैसे होते। अब आप पूछेंगे ये कब की बात है। आराम से बैठ कर सुनिए। बहुत ख़ुशहाली का ज़माना था। एक पैसे में तीन सौदे आ जाते थे। आठ दिन, नौ मेले वाली बात समझिए। एक रुपये के पंद्रह सेर बासमती आजाती थी। दो रुपये का सोलह सेर दूध। रुपये की छः मन लकड़ी। रुपये का एक मन कोयला। छः आने गज़ लठ्ठा। सात पैसे गज़ बढ़िया मलमल और यक़ीन कीजिए दस रुपये में बहुत बढ़िया रेशमी साड़ी मिल जाती थी। चुनांचे राय साहिब बोले मज़े से रहिए। जब तक आपका दिल भर न जाये।

घर के सामने एक पीपल का दरख़्त खड़ा था जिसने सैंकड़ों बाहें फैला रखी थीं। मुझे हमेशा यही महसूस होता था कि गंगा ने इस पीपल से वही बात कह रखी थी जो राय साहिब ने अपने मेहमान से। राय साहिब की ज़बानी पता चला कि उसे उनके पड़दादा ने यहां लगाया था। वाक़ई ये पीपल बहुत बूढ़ा था और इसके तने पर इसकी उम्र का हिसाब लिखा हुआ था। राय साहिब की उम्र उस वक़्त तीस-पैंतीस के बीच में होगी। ज़रा सी बात पर वो दाँत निकाल कर हंस पड़ते और ज़ोर देकर कहते, “आदमी का मन भी तो हर वक़्त पीपल के पत्ते की तरह डोलता रहता है।” कभी वो ये शिकायत करते, “मूसलाधार बरखा से तो पीपल की खाल उतरने लगती।” कभी कहते, “यही तो संसार की लीला है। रात-भर की शबनम को सूरज की पहली किरनें आकर पी जाती हैं।”

मैं अक्सर मंदिर वाली गली में घूमने निकल जाता, और वापस आकर कभी राय साहिब से उसकी तारीफ़ करता तो वो कहते, “वहां क्या रखा है? आने-जाने वालों के धक्के तो हमें नापसंद हैं और वो भी भांत-भांत के पंछी मिलते हैं। भांत भांत के चेहरे भांत-भांत के लिबास।” “अब दूर दूर के यात्री अपना लिबास कहाँ छोड़ आएं, राय साहिब?” मैं संजीदा हो कर जवाब देता, “और उन बेचारों के चेहरे मुहरे जैसे हैं वैसे ही तो रहेंगे।” वो खिलखिला कर हंस पड़ते। किसी ने भानुमती का कुम्बा देखना हो तो मंदिर वाली गली का एक चक्कर लगा आए। वहां जगह-जगह के लोगों को एक साथ घूमते देखकर मुझे तो ये शक होने लगता है कि ये एक ही देस के लोग हैं।

“ये तो ठीक है राय साहिब!” मैं बहस में उलझ जाता, “बंगाली, महाराष्ट्री , गुजराती और मद्रासी अलग अलग हैं तो अलग अलग ही तो नज़र आएँगे। अपना अपना रूप और रंग-ढंग घर में छोड़कर तो तीर्थ यात्रा पर आने से रहे।” राय साहिब के साथ बातें करने से ज़्यादा लुत्फ़ मुझे मंदिर वाली गली के छः सात चक्कर लगाने में आता था। मेरा तो यक़ीन था कि बनारस की रौनक़ मंदिर वाली गली से है। उसमें मेरा ज़हन माज़ी की भूल भुलैया में घूमने लगता और मेरे ज़हन की पुरानी संस्कृत कहावत गुदगुदाने लगती, “जिसे कहीं भी ठोड़ ठिकाना न हो उस के लिए काशी ही आख़िरी ठिकाना है।”

मंदिर वाली गली में पूजा के सामान और औरतों के सिंगार में काम आने वाली चीज़ों की दूकानें ही ज़्यादा थीं। सवेरे से चावल का दाना भी मुँह में नहीं गया। बाबू ! कहने वाले भिकारी क़दम क़दम पर यात्रियों का ध्यान खींचते थे। वहां हर क़िस्म के यात्री चलते फिरते नज़र आते और हर उम्र के भिकारी रसीली आँखें और ख़ूबसूरत होंट और थोड़ी पर तिल रूप की ये झलक यात्रियों और भिकारियों में यकसाँ तादाद में तलाश की जा सकती थी। “एक पैसा बाबू!” कह कर भीक मांगने वाली जानती थी कि एक पैसा में तीन सौदे आजाते हैं और भिकारन का ये तजुर्बा भी जैसे मंदिर वाली गली का एक अहम तजुर्बा हो। गप्पें हाँकने में यात्री और भिकारी बराबर थे। पूजा के फूल और हाथी दांत की कंघियाँ बेचने वाले दूकानदार गाहक से एक दो पैसे ज़्यादा वसूल करने के ढंग सोचते रहते। यूं मालूम होता कि मंदिर वाली गली की आँखों में तशक्कुर भी है और लापरवाई भी।

यात्रियों के किसी कुन्बे की कोई नौजवान लड़की अपनी दो चोटियों में से एक को आगे ले आती या जिस्म सुकेड़ कर चलती या अंगड़ाई के अंदाज़ में महराब सी बना डालती, तो ये मंज़र देखकर मुझे महसूस होता कि मंदिर वाली गली की आप-बीती में ये तफ़सील भी बड़े ख़ूबसूरत अंदाज़ में दर्ज हो गई। इसी तरह कोई भिकारन निचला होंट दाँतों तले दबा कर किसी भागवान यात्री औरत का सिंगार देखती रह जाती और फिर अपनी मैली कुचैली साड़ी के बावजूद सीना तान कर किसी दुकान के आईने में अपना रूप देखकर मुस्करा उठती तो ये बात भी मंदिर वाली गली की दास्तान में कलमबंद होजाती।

ये सब बातें मैं राय साहिब को सुनाता और वो कहते, “चौखटा मंदिर वाली गली का है और तस्वीर आपके मन की। हम क्या बोल सकते हैं? ये तो कैमरे की आँख ने नहीं, आपके दिमाग़ की आँख ने देखा।” राय साहिब की बहुत जायदाद थी। स्याह पत्थर के खरल में वो हाज़मे की गोलियां बनाने की दवा बड़ा शौक़ से बैठे घोंटते रहे। इस दवा का नुस्ख़ा उनके पड़दादा छोड़ गए थे और ताकीद कर गए थे कि इनकी तरफ़ से हाज़मे की गोलियां मंदिर वाली गली में यात्रियों को मुफ़्त तक़सीम की जाया करें। इनके पड़दादा ने ये वसीयत भी कर रखी थी कि खरल में दवा घोंटने का काम नौकरों से हरगिज़ न कराया जाये। उसमें शुध गंगा जल पड़ता था और गंगा घाट की काई भी एक ख़ास मिक़दार में डालते थे।

ये काम करते वक़्त राय साहिब स्याह पत्थर के उस खरल की कहानी सुनाने लगते। उसे उनके पड़दादा जगननाथपुरी से लाए थे। जिस कारीगर ने ये खरल बनाया था, उसने चारधाम की यात्रा कर रखी थी और राय साहिब के पड़दादा से उसकी पहली मुलाक़ात बनारस की इस मंदिर वाली गली में ही हुई थी। शादीशुदा ज़िंदगी के सात बरस गुज़ारने के बाद राय साहिब के एक बेटा हुआ। उसका नाम उन्होंने रूपम रखा।पंजों के बल चलने वाला रूपम मेरे साथ ख़ूब हिल मिल गया। वो मुझे दूर से ही पहचान लेता। वाक़ई रूपम बहुत हँसमुख था। मैं उसे उठा लेता और उसके हाथ मेरी ऐनक की तरफ़ उठ जाते। राय साहिब कहते, “बेटा! उन की ऐनक टूट गई तो पैसे हमें ही भरने पड़ेंगे।”

मुझे महसूस होता कि पीपल के दरख़्त ने राय साहिब का ये मज़ाक़ भी उसी तरह नोट कर लिया जैसे मंदिर वाली गली यात्रियों, दूकानदारों और भिकारियों की दास्तान क़लमबंद करती रहती थी। राय साहिब हंसकर कहते, “रूपम को भी उसी तरह अपने हाथ से स्याह पत्थर के इस खरल में हाज़मा की गोलियों की ये दवा घोटनी पड़ा करेगी। बड़ों की रीत को वो छोड़ थोड़ी देगा।” और वो हाथ उठा कर पीपल की तरफ़ देखते हुए जैसे दिल ही दिल में किसी मंत्र का जाप करने लगते। जैसे पीपल से कह रहे हों, “तुम तो तब भी होगे पीपल देवता, जब हम नहीं होंगे, देखना हमारे रूपम को समझाते रहना कि ख़ानदान की रीत को छोड़े नहीं।”

कभी कभी दवा घोंटते हुए राय साहिब ये बोल अलापते, एक मास में गरहन जो दुई  तो ही अन्न महंगू हुई मैं हंसकर कहता, “आपको क्या परवा है, राय साहिब! भले ही एक महीने में दो गरहन लगने से अन्न महंगा हो जाए। आपके बुज़ुर्ग जो जायदाद छोड़ गए उस पर चार रोज़ की महंगाई भला क्या असर करेगी?” “बात तो सारी दुनिया की है। अपनी ढाई ईंट की अलग मस्जिद का क़िस्सा थोड़ी ही है।” राय साहिब की आँखें चमक उठतीं और वो दोनों बाज़ू खरल से उठा कर पीपल की तरफ़ देखने लगते, जैसे उसे भी अपने जज़्बात में शरीक करना चाहते हों।

कभी वो सोना उगलने वाली ज़मीन का क़िस्सा ले बैठते तो कभी केसर-कस्तूरी का बखान करने लगते, जिनकी सुगंध उन्हें बेहद अच्छी लगती थी। ज़मीन पर आलती पालती मार कर बैठना ही उन्हें ज़्यादा पसंद था। धूप में चमकता हुआ गंगा जल उनके तख़य्युल को हिमाला की तरफ़ मोड़ देता जहां से गंगा निकलती थी, वो गंगा की तारीफ़ करते, जो बनारस पर खासतौर पर मेहरबान थी। गंगा के पक्के सीढ़ीयों वाले घाट न जाने कितने पुराने थे, क्या मजाल गंगा उनहीं बहाकर लेजाए। हालाँकि वो चाहती तो उसके लिए ये कोई मुश्किल काम न था। गंगा को गु़स्सा आजाता तो वो सारे बनारस को ज़िंदा निगल सकती थी।

“ये सब गंगा मय्या की दया दृष्टि है कि वो हमें कुछ नहीं कहती।” राय साहिब खरल में दवा घोंटते हुए पुराना बोल सुनाते: रांड, सांड, सीढ़ी, सन्यासी उनसे बचे तो सो दे काशी फिर राय साहिब की नज़र मेरी तरफ़ से हट कर जैसे पीपल के पत्ते गिनने लगतीं। मैं कहता, “न पीपल के पत्ते गिने जा सकते हैं राय साहिब, न गंगा की लहरें!” माँ का दूध पीते वक़्त रूपम का मुँह सीपी सा बन जाता है। राय साहिब मौज़ू बदल कर कहते, “देखिए रूपम इतना लाडला कैसे न हो। जब वो सात बरस के इंतिज़ार के बाद पैदा हुआ मैं अक्सर अपनी श्रीमती से कहता हूँ, देखो भई। रूपम को जल्द अपना दूध छुड़ाने का जतन न करना!” और फिर तो वो गोया माँ के दूध पर व्याख्यान शुरू कर देते और न जाने किस किस शास्त्र से हवाले ढूंढ कर लाते।

रूपम की जन्मपत्री की बात छिड़ने पर राय साहिब कहते, “सब ठीक ठाक रहा। उस समय, न आंधी आई, न गरहन लगा। समय आने पर वो दुनिया में अपना लोहा मनवा के रहेगा।” कहते-कहते वो एक दम जज़्बाती होजाते। “बड़ा होने पर रूपम को मैं एक ही नसीहत करूँगा कि जिस हांडी में खाए उसी में छेद न करे।” मैं कहता, “चलती का नाम गाड़ी है, राय साहिब!” राय साहिब बैठे-बैठे किसी राग का अलाप शुरू कर देते और फिर बताते राग कोई भी बुरा नहीं होता, हर राग की अपनी खूबियां हैं। गाने वाले का कमाल इसमें है कि वो फ़िज़ा पैदा कर दे।

अब ये मेरा कमाल था कि मैं जब चाहता बात का रुख मंदिर वाली गली की तरफ़ मोड़कर मंदिर की फ़िज़ा पैदा कर देता। कभी मैं कहता, “एक बात है राय साहिब, मंदिर वाली गली में जब मैं किसी को टांगें अकड़ा चलते देखता हूँ तो मेरा दिमाग़ उस शख़्स के बारे में ये फ़ैसला किए बिना नहीं रहता कि वो बेसोच और सख़्त शख़्सियत का मालिक है।” कभी मैं कहता, “राय साहिब, मंदिर वाली गली के मुताले से मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि जब वहां कोई औरत एड़ी पर ज़ोर देकर पांव घसीट कर चलती है तो समझ लीजिए कि उसे तग़य्युर बिल्कुल नापसंद है और मौक़ों से लाभ उठाने की बात सोचते हुए उसे हमेशा एक झिजक सी रहती है।”

राय साहिब कहते, “अब ये बात तो और जगह भी सच होगी, एक मंदिर वाली गली में ही तो नहीं।” मैं अपनी ही धुन में कहता, “मंदिर वाली गली में चक्कर काटते हुए मेरे मुताले में ये बात भी आई है राय साहिब, किसी की लड़खड़ाती चाल साफ़ पता देती है कि उस बेचारे में क़ुव्वत-ए-इरादी की एक दम कमी है।” मैं बार-बार रट लगाता, “मंदिर वाली गली ने ही मुझे सिखाया कि एक खुली हुई मुस्कुराहट के पीछे क़ुव्वत और ख़ुलूस का हाथ रहता है,और राय साहिब, मंदिर वाली गली में पूजा या सिंघार का सामान ख़रीदने वालों के बीच जब भी मैंने किसी मान न मान मैं तेरा मेहमान क़िस्म के शख़्स को दूसरों की गुफ़्तगु में बेकार की दख़ल अंदाज़ी करने का आदी पाया तो मैं इसी नतीजे पर पहुंचा कि उस शख़्स को अपने ऊपर बिल्कुल भरोसा नहीं है।”

राय साहिब शोहरत के भूके थे न दौलत के। बड़ी तेज़ी से बात करते थे और अपने नज़रिए पर डटे रहते। गंगा की अज़मत के वो क़ाइल थे और बनारस की तारीख़ में सबसे ज़्यादा गंगा का हाथ देखते थे, गंगा की तारीफ़ में राय साहिब श्लोक पर श्लोक सुनाने लगते, जैसे कोई दर्ज़ी दुपट्टे पर गोटे की मग़ज़ी लगा रहा हो। राय साहिब के घर मेहमान बने मुझे तीन हफ़्ते से ऊपर हो गए थे। मेरे लिए ये बात कुछ कम अहमियत नहीं रखती थी कि मैं राय साहिब का मेहमान हूँ क्योंकि हर ऐरा ग़ैरा नथ्थू-ख़ैरा तो उनका मेहमान नहीं हो सकता था, वाक़ई राय साहिब की मेहमान नवाज़ी के क़दम ज़िंदगी के ख़ुलूस में गड़े हुए थे।

एक रोज़ जब मुझे राय साहिब के यहां रहते हुए सवा महीना हो गया था, राय साहिब सवेरे सवेरे मेरे कमरे में आए। मैंने देखा, उनका रंग उड़ा हुआ था। “क्या बात है राय साहिब!” मैंने पूछा। राय साहिब ने आज पहली बार मेरी आँखों में आँखें डाल कर कहा, “बात ऐसी है कि बोलना भी मुश्किल हो रहा है।फिर भी बताना तो होगा।” “नहीं नहीं, कोई बात नहीं। आप यहीं रहिए। अपने मेहमान से भला मैं ये बात कह सकता हूँ?”

“मैं समझ गया राय साहिब! मुझे यहां रहते सवा महीना हो गया। ये बहुत है। अब वाक़ई मुझे चला जाना चाहिए।” राय साहिब मेरे सामने खड़े खड़े कबूतर की तरह फड़फड़ाये। उनकी आँखों में बेहद हमदर्दी थी लेकिन उनके चेहरे पर बेबसी के आसार साफ़ दिखाई दे रहे थे। मुझे याद आया कि इससे पहले दिन-दोपहर के वक़्त जब मैं रूपम से खेल रहा था। रूपम की माँ ने नौकरानी को भेज कर रूपम को मंगवा भेजा था।

मैंने साफ़ साफ़ कह दिया, “रूपम के माता जी को मेरे यहां रहने से कष्ट होता है तो मुझे वाक़ई यहां से चला जाना चाहिए।” “नहीं नहीं, हम आपको नहीं जाने देंगे। ये मेरा धर्म नहीं कि मेहमान चला जाये, अपना काम पूरा किए बिना। वैसे अगर आप कुछ दिन के लिए हमारे मंदिर वाली गली के मकान में चले जाते तो ठीक था।” “मेरा तो कोई ख़ास काम नहीं। मंदिर वाली गली को भी बहुत देख लिया। अब वाक़ई मुझे यहां से चले ही जाना चाहिए।” हम आपके रहने का इंतिज़ाम कल से मंदिर वाली गली में कर देते हैं, कल से आप मान जाईए। वहां भी हमारा अपना मकान है और उसकी तीसरी मंज़िल पर एक कमरा आपके लिए ख़ाली कराया जा चुका है।”

“नहीं मैं वहां जाकर नहीं रहूँगा। आप यक़ीन कीजिए। मेरी तबीयत तो बनारस से भर गई है, अब तो मैं एक दिन भी नहीं रुक सकता।” “नहीं आपको रुकना पड़ेगा।” राय साहिब बार-बार होंटों पर ज़बान फेर कर उनकी ख़ुशकी को चाटने लगते। वो बोले, “आप चले गए तो हमें गंगा मय्या का श्राप लगेगा।” “गंगा मय्या के श्राप की तो इसमें कोई बात नहीं राय साहिब! ये तो हमारी आपकी बात है।” राय साहिब हंसकर बोले, “माफ़ कीजीए! शायद आप मुझे दब्बू टाइप का पतिदेव समझ रहे होंगे। जिसे अंग्रेज़ी मुहावरे में मुर्ग़ी ज़दा ख़ाविंद कहते हैं।” “मुझे ये बात ज़रा भी बुरी नहीं लगी। राय साहिब ! मेरे ऊपर आपका एहसान है। ये और बात है कि हर चीज़ इतनी सस्ती है कि एक पैसे के तीन सौदे आजाते हैं।”

“हाँ तो आराम से बैठ कर सुनिए। पूरे पच्चीस बरस बाद मुझे दुबारा बनारस जाने का मौक़ा मिला और अब बहुत महंगाई का ज़माना था। कहाँ एक रुपये की पंद्रह सेर बासमती और कहाँ सवा रुपये सेर। कहाँ दो रुपये मन गेहूँ और कहाँ सोलह रुपये मन। रुपये की पाँच सेर चीनी की बजाय पंद्रह आने सेर। रुपये का सोलह सेर दूध की बजाय बारह आने सेर। कहाँ रुपये की छः मन लड़ी, कहाँ साढे़ तीन रुपये मन। कहाँ रुपये का एक मन कोयला, कहाँ आठ रुपये मन, कहाँ छः आने गज़ लठ, कहाँ डेढ़ रुपये गज़। कहाँ सात पैसे गज़ बढ़िया मलमल, कहाँ दो रुपय गज़। कहाँ दस पंद्रह रुपये की बढ़िया रेशमें साड़ी, कहाँ सौ सवा सौ रुपये की। ये महंगाई जैसे आज़ादी का सबसे बड़ा तोहफ़ा था। आज मैं एक अदबी बुलावे पर बनारस गया था। पहला घर मुझे याद था। जहां मैं पच्चीस बरस पहले ठहरा था।

मैं पूछता पाछता वहां पहुंचा तो देखा कि वहां न वो घर है न वो पीपल का पेड़। पूछने पर पता चला कि वो घर और पीपल तो बहुत बरस पहले गंगा में बह गए। मेरे दिल-ओ-दिमाग़ में सनसनी सी दौड़ गई। राय साहिब अब दूसरी जगह चले गए थे। उनके पुराने पड़ोसी से उनका पता चलते देर न लगी। मैं वहां पहुंचा तो राय साहिब बहुत तपाक से मिले। पता चला कि रूपम का ब्याह हुए साढे़ तीन बरस होने को आए। अब तो रूपम का दो बरस का बेटा है। “देखिए हम पोते वाले हो गए।” राय साहिब हंसकर बोले। राय साहिब मुझे खाना खिलाए बग़ैर न माने। उन के चेहरे पर इन्सानियत का जौहर साफ़ दिखाई दे रहा था।

पुराने घर की बात चली तो राय साहिब ने ठंडी सांस भर कर कहा उसे तो गंगा मय्या ले गई और हमारे पड़दादा का लगाया हुआ पीपल भी गंगा में बह गया। मैं उठने लगा तो राय साहिब बोले, “अब तो पच्चीस बरस पुरानी याद ऐसे है जैसे किसी खन्डर की दीवार, जिसका पूरे का पूरा पलस्तर झड़ गया हो।” “मुझे तो आपकी मेहमान नवाज़ी में अभी तक नए पन की ख़ुशबू आरही है, राय साहिब!” “अरे भई छोड़ो। मौसम की तरह हालात भी बदलते रहते हैं।” राय साहिब ने तुर्श आवाज़ में कहा। मैंने कहा, “याद है न राय साहिब। उन दिनों एक पैसे के तीन सौदे आजाते थे।”

जब मैं चला तो राय साहिब ने रूपम का पता लिखवा दिया जो उन दिनों मंदिर वाली गली में रहता था। “लीजिए रूपम के नाम चिट्ठी लिख कर सारा हाल बता दूं उसे। नहीं तो वो कैसे जानेगा कि वो आपकी गोद में खेल चुका है।” राय साहिब ने संजीदगी से कहा, “देखिए! मैंने चौदह सतरों में सारी बात लिख डाली।” मैं मंदिर वाली गली में पहुंचा तो यूं महसूस हुआ कि महंगाई के बावजूद कुछ भी नहीं बदला और वो संस्कृत कहावत फिर से मेरे ज़हन को गुदगुदाने लगी, “जिसे कहीं भी ठिकाना न मिले उसे काशी ही आख़िर ठोरे!” रूपम राय साहिब की चिट्ठी पढ़ कर अपनी बीवी को बुला लाया और माँ की गोद से निकल कर नन्हा शिवम झट मेरे पास चला आया।

“रूपम बोला आप तो मंदिर वाली गली के पुराने प्रेमी हैं ना। देखिए ! यही वो कमरा है, जहां पच्चीस बरस पहले पिता जी आपको ठहराना चाहते थे। पिता जी ने लिखा है कि आपको ग़लतफ़हमी हो गई थी कि माताजी आपको हमारे गंगा घाट वाले घर में रखकर ख़ुश नहीं हैं। उन्होंने तो आपका मंदिर वाली गली के साथ गहरा प्रेम देखकर ही ये चाहा था कि आप कुछ दिन इस गली में आकर भी रह जाएं।” “छोड़ो वो पुरानी बात है।” मैंने मुस्कराकर बात टाल दी, “इस से भी कहीं ज़्यादा याद रखने वाली बात ये है कि तब मुझे नन्हा रूपम मिला था अब नन्हा शिवम।” शिवम के हाथ में विश्वनाथ मंदिर का लकड़ी का छोटा सा मॉडल था जिसे वो हवा में उछाल रहा था।

घर की बालकोनी में खड़े खड़े मैं ज़रा पीछे हट गया। मुझे डर था कि कहीं शिवम अपना लकड़ी का खिलौना नीचे मंदिर वाली गली में न गिरा दे। नन्हे शिवम की माँ ने जल्दी जल्दी अपने सुसर का ख़त पढ़ा और सर पर बनारसी साड़ी ठीक करते हुए वो बोली, “अब देखिए! हम आपको यहां से जल्दी जाने नहीं देंगे जो ग़लतफ़हमी आपको रूपम के माता जी के बारे में हुई वो शिवम के माता जी के बारे में तो नहीं हो सकती।”

मंदिर वाली गली में ऐसे ही उत्तर , दक्खिन और पूरब , पच्छिम का संगम हो रहा था जैसे मंदिर वाली गली भी किसी गंगा मय्या की तरह पुकार रही हो, “आओ यात्री! मेरी नई पुरानी लहरों में उतरो!”

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शाह मुहम्मद के तकिए का एक हिस्सा काट कर अस्तबल बना लिया गया था। ये सब कुछ जबरन हुआ। आख़िर रमज़ान की छाती भी तो चौड़ी थी और इस देव-हैकल जवान को देखकर सबके हौसले जवाब दे जाते थे। फिर जबर का ये क़िस्सा और भी तवील हो गया। कबूतरों के दड़बे से लेकर मज़ार तक लीद बिखरी रहती थी। लीद बिखेरे रमज़ान का घोड़ा और उठाए मुसल्ली। जिस किसी की नाक में बदबू आती वो लीद उठा देता। रमज़ान को तो घोड़े से सरोकार था। अलबत्ता घोड़े के थान को वो शीशे की तरह चमका कर रखता था।

कमेटी में शायद किसी की शुनवाई न हो सकती थी। रमज़ान अपने ताँगे पर दारोगा को दरिया की सैर मुफ़्त करा लाता था। दारोगा कहता, हमारे राज में रमज़ान को सब छुट्टी है।” रमज़ान समझता, दारोगा का राज अटल है। उसकी आँखों में अस्तबल फिर जाता। तसव्वुर में घोड़े का थान और भी चमक उठता। मुहब्बत के एक नए अंदाज़ से वो घोड़े की तरफ़ देखता और सोचता कि दारोगा को शायद ये हरकत अच्छी न लगे। वर्ना वो ताँगे से उतर कर घोड़े की आँखों में झाँकता और उसका सर अपने सीने से लगा लेता।

घोड़े का नाम था ईदू। आदमी के खलनडरे बच्चे की तरह उसे कुलेलें करते देखकर रमज़ान को यक़ीन हो गया था कि बड़ा हो कर ये इबलक़ बछेरा एक ख़ूबसूरत और होशयार घोड़ा निकलेगा और जब वो ईद के दिन उसे ख़रीद लाया था तो देर तक वो उसके दाँतों का मुलाहिज़ा करता रहा था। आख़िर वो चार पुश्त से कोचवान था और घोड़ों के मुता’ल्लिक़ उसकी वाकफ़ियत गोया मुसल्लिमा थी। ईदू को नहलाते वक़्त रमज़ान के हाथ उसकी काली मख़मली पुशत पर फिसलते चले जाते। उसके सफ़ेद हाथ पैर वो मल-मल कर धोता और फिर उसका मुँह खोल कर देखता कि दूध के दाँत अभी कितने बाक़ी हैं। और ईदू अपनी थूथनी रमज़ान के सीने पर थपथपाने लगता। जैसे कह रहा हो, “अभी से मुझे ताँगे में जोतने की बात मत सोचो! रमज़ान मियां। अभी तो खेलने मचलने के दिन हैं मेरे। पाँच साल की उ’म्र से पहले मुझे अपने ताँगे में न जोतना। फिर देखना, मेरे फेफड़े कितने मज़बूत होजाते हैं और मैं कितना भागता हूँ।” रमज़ान कहता, “अब नहाओगे भी आराम से या यूँही मुफ़्त की शरारत किए जाओगे ईदू बेटा?” मगर ईदू न मानता और रमज़ान अपनी मुश्की दुल्हन को पुकारकर कहता, “अरी अब इधर आ देख, समझा दे इसे ज़रा। पर तूने ही तो इसे सर चढ़ा रखा है, इस की पीठ पर हाथ फेर फेर कर।”

मुश्की दुल्हन क़रीब आ कर कहती, “तुम हट जाओ, मैं ख़ुद नहलाऊँगी। अपने बेटे को, तुम्हें तो मज़ा आता है इस बेचारे की शिकायतें करने में।” और रमज़ान कहता, “ले सँभाल अपने बेटे को।”

अपने मुख़्तलिफ़ बेढंगे तरीक़ों से ईदू अपनी मुहब्बत का इज़हार करने की अहलियत रखता था। पछाड़ी को वो अ’जीब अंदाज़ से उछालता था और रमज़ान को देखकर हिनहिनाने लगता था। और रमज़ान कहता, “बस ठहर जा बेटा! अभी आया। तेरे लिए बहुत अच्छा मसाला मंगवाया है। खायेगा तो ख़ुश हो जायेगा।” लेकिन ईदू इतनी आसानी से मानने वाला न था, लगातार हिनहिनाये जाता। जैसे कह रहा हो, “दूर मत जाओ, रमज़ान मियां। मसाला तो फिर भी आ सकता है। बस मैं तुम्हें देखता रहूं, तुम्हारी बातें सुनता रहूं।” रमज़ान कहता, “अरे बेटा! बेसब्र नहीं हुआ करते। ज़रा सी देर में लौट आऊँगा बस।” ईदू हिनहिनाना छोड़ देता। मगर आज़ुर्दा सा होजाता और फिर यूं मा’लूम होता कि वो अभी चटख़ कर कह देगा, “अच्छा हो आओ बाहर देर मत लगाना।” और ईदू की ख़ूबसूरत थूथनी ज़मीन की तरफ़ झुक जाती।

गुज़श्ता साल से रमज़ान रंडवे की ज़िंदगी गुज़ार रहा था। बीवी बेचारी गोटे के दुपट्टे तक के लिए तरसती रही थी। ज़माने के गर्म-ओ-सर्द ने रमज़ान को बहुत सताया था। साईं जी का उधार अलग बढ़ गया था। कहाँ से ले देता गोटे का दुपट्टा अपनी मुश्की दुल्हन को? ले देकर अब वो ईदू ही से जी बहला लेता था। इस समझदार, हमदर्द ईदू की बजाय उसके पास वही पहला मरियल घोड़ा होता तो उसकी ज़िंदगी एक ख़ामोश गर्म दोपहर बनी रहती।

अस्तबल में बैठे-बैठे अक्सर रमज़ान की आँखें मिच जातीं, जैसे वो कोई ख़्वाब देख रहा हो। उस वक़्त उसे महसूस होता कि ईदू की आँखें भी मिच गई हैं और वो दोनों बैकववक़्त मुश्की दुल्हन को देख रहे हैं। ईदू के गले में बाहें डाल कर वो पूछता, “सच्च सच्च बताओ ईदू बेटा तुम्हें मुश्की दुल्हन तो याद आती होगी, जो हर रोज़ सुबह तुम्हें निहारी खिलाया करती थी।”

सात साल के लंबे अर्से में मुश्की दुल्हन के कोई बच्चा न हुआ। बाँझ ही वो ज़मीन के नीचे क़ब्र में जा सोई। किसी-किसी रात रमज़ान को यूं महसूस होता कि उसकी गर्दन पर किसी बच्चे की ग़ैर मरई उंगलियां रेंग रही हैं, जैसे क़ब्र में मुश्की दुल्हन की कोख हरी हो गई हो और अल्लाह की रहमत से उसका बच्चा अपने बाप के अस्तबल में आन पहुंचा हो और वो सोचता कि ये सब ईदू की दुआ’ओं का नतीजा है। आगे बढ़कर उसके ख़्वाब में और भी दिलचस्प मंज़र पेश-ए-नज़र होता। वो देखता कि उसका बच्चा अकेला नहीं है। शहर भर के बच्चे किल बिल करते उसकी तरफ़ देख-देखकर मुस्कुरा रहे हैं और ईदू हिनहिना रहा है, जैसे कह रहा हो, “रमज़ान मियां देखो तो ये नज़ारा और बताओ कि इन सब में ख़ूबसूरत बछेरा कौन सा है?”

ये सब ख़्वाब उसके सोए हुए सागर की लहरों को जगा देते थे। लोग समझते थे कि रमज़ान पहलवान है और कुछ झूट भी न था। मगर ये भी तो सच था कि बीवी की मौत के बाद उसकी रूह ने एक थरथर कंपकंपी का रूप धार लिया था जिस तरह ये परिंदा जंगल में बैठा यूँही काँपता रहता है। इस की रूह भी मुश्की दुल्हन की याद में लरज़ती रहती थी।

“आठ सेर तो गेहूँ का आटा है, ईदू बेटा!” रमज़ान अपनी तंगदस्ती की कहानी छेड़ देता, जैसे हैवान का बेटा इन्सान के ग़म को ठीक-ठीक समझने की सलाहियत रखता हो। एक दिन तो साढे़ पाँच सेर तक हो गया था आटा, ईदू बेटा! ये तो सरकार को रहम आगया कि आठ सेर रुपये का भाव ठहरा दिया। और ईदू अपनी ख़ूबसूरत थूथनी ऊपर उठाकर रमज़ान की तरफ़ देखता, जैसे कह रहा हो, “घबराओ मत, रमज़ान मियां, आटा फिर आजाएगा अपने पहले भाव पर रुपये का पंद्रह सेर।” लेकिन रमज़ान सर झुकाकर बैठ जाता। उसे यूं महसूस होता कि कोई मकड़ी उसके दिमाग़ में अपना जाला तन रही है। ईदू हिनहिनाता, जैसे कह रहा हो, “वाह! रमज़ान मियां ख़ूब पहलवान हो तुम भी।

अरे मियां हौसला रखो, ये तकलीफ़ें हमेशा तो नहीं रहतीं।” रमज़ान का सर ऊपर उठ जाता। ईदू अपनी पछाड़ी उछालता और रमज़ान की तरफ़ देखने लगता। जैसे कह रहा हो, “मुझे नहारी भी तो नहीं मिलती रही रमज़ान मियां, लेकिन कुछ परवा नहीं। मैं तुम्हारे लिए सौ-सौ मील भागुंगा, ख़ून पसीना एक कर दूंगा।”और ईदू बहुत भागता और ख़ून पसीना एक कर देता। लेकिन रमज़ान की आमदनी जिसे वो हवाई रिज़्क़ समझता आया था, इन दिनों बहुत गिर गई थी। ताँगे का साज़ बहुत पुराना था। नए रबर टायरों की अब कोई उम्मीद न थी। उनकी क़ीमत बहुत बढ़ गई थी। ज़माना बदल गया था, जैसे रात ही रात में मौसम बदल जाये और साईं जी की क़िस्तों की फ़िक्र उस के दिमाग़ को छलनी किये देती थी।

ईदू का कुमलाया हुआ चेहरा देखकर रमज़ान अपने को मुजरिम गर्दानने लगता। कहाँ वो उसे रोज़ाना डेढ़ मन हरा चारा और चार सेर दाना खिलाया करता था। लेकिन अब तो उनकी क़ीमतें बहुत बढ़ गई थीं। पंद्रह आने का हरा चारा आता था और आठ आने का दाना और रमज़ान उसे पूरी ख़ुराक तो दूर रही आधी ख़ुराक भी न दे पाता था। उसे अपने आपसे नफ़रत होने लगी और अब उसे यूं महसूस होता कि उसके दिमाग़ में ईदू की आख़िरी लीद दाख़िल हो रही है और उसके पेशाब की धार भी ज़रूर उसी के दिमाग़ पर गिरेगी। बेग़ैरतआदमी। भूके घोड़े से काम लिये जाता है, जिसे वो अपना ज़रख़रीद ग़ुलाम समझता है।

भूक बहुत सताती, तो रमज़ान को अपने पेट में एक आतशगीर लावा पैदा होता महसूस होता और वो सोचता कि ईदू के पेट में भी लावा भड़क उठेगा, वो ताँगे को रोक लेता, लेकिन ये कोई ईलाज थोड़ी था और ग़ज़ब ख़ुदा का, फ़ाक़ाज़दा लोगों की तरफ़ देखते हुए भी उसे ये महसूस होता कि ये लोग उसे घूर रहे हैं और कह रहे हैं, “कम्बख़्त! ख़ुद तो मरेगा ही भूक से पुर ग़रीब घोड़े को भी क्यों मारता है अपने साथ। इसे बेच क्यों नहीं देता?”

लेकिन ईदू को बेचने का ख़्याल रमज़ान को सिरे से नामंज़ूर था। वो बहुत उदास रहता। ग़ुस्ल तो ग़ुस्ल कई कई दिन वो मुँह तक न धोता। हत्ता कि उसे महसूस होने लगा कि उसके मैले जिस्म की निचली तहों में भी दुनिया भर की ग़लाज़त भरती जाती है। उसकी ख़ाकी क़मीस और साफे पर कीचड़ का रंग चढ़ गया था शायद उसकी रूह पर भी।

भूक और ग़लाज़त में खोए हुए से रमज़ान ने महसूस किया कि जंग की ख़बरें एक मक़नातीसी क़ुव्वत रखती हैं, जिसके सामने उसके रग-ओ-रेशे लौह-ए-चून के ज़र्रों की तरह खड़े होजाते हैं “जानते हो जर्मन वाला क्या कहता है ईदू ?” उसने पूछा। ईदू ख़ामोश रहा और रमज़ान बोला, “जर्मन वाला कहता है कि रूस वाला उसका सिक्का माने।” थोड़ी देर बाद ईदू ने सर हिलाया और थूथनी घुमा कर रमज़ान की आँखों में तकने लगा। जैसे कह रहा हो, “ये कोई नई ख़बर नहीं है रमज़ान मियां, शहर के चौथे दरवाज़े के बाहर रेडियो के हलक़ से मैं भी जंग की गर्मा-गरम ख़बरें सुन लेता हूँ।”

जंग की तबाह कारियों की ख़बरें सुनते हुए रमज़ान को अपनी तकलीफ़ें बे-हक़ीक़त और हेच नज़र आने लगतीं। अस्तबल में बैठ कर हुक्के का कश लगाते हुए वो सोचता कि जर्मनी एक बहुत बड़ा ताँगा है जिस पर सवार हो कर हिटलर रूस में से गुज़रना चाहता है। लेकिन जब एक दिन किसी सवारी की ज़बानी उसे पता चला कि रूसी किसान, मज़दूर, दो हज़ार मील लंबी दीवार बनाकर हिटलर का रास्ता रोके खड़े हैं और हिटलर सारा ज़ोर लगाकर भी अब इस इन्सानी दीवार को तोड़ कर आगे नहीं बढ़ सकता तो उसे बहुत ख़ुशी हुई और अस्तबल में पहुंच कर वो हुंकार उठा! “रूस की सड़क पर हिटलर के ताँगे के नए रबर टायर भी काम न देंगे,” और ईदू हिनहिनाया, जैसे कह रहा हो, “मेरे लिए तुम्हारी कोई भी ख़बर नई नहीं हो सकती रमज़ान मियां!”

रमज़ान सोचता कि हिटलर की हार हो जाएगी तो ये जंग ख़त्म हो जाएगी। ये राय उसने सवारीयों की बातें सुन-सुन कर बनाई थी। जंग ने हर चीज़ के दाम चढ़ा दिये थे। सैंकड़ों हज़ारों मील दूर लड़ी जाने वाली जंग के भयानक पंजे अभी से ग़रीबों के मुँह से रोटी छीन रहे थे। उसे ईदू की धुंदली-धुंदली आँखों में ग़म और ख़ौफ़ गले मिलते दिखाई देते, जैसे वो जंग में मरने वालों की चीख़ पुकार सुन रहा हो…एक लहज़ा ब लहज़ा बढ़ती हुई पुकार, जैसे एक अ’जीब लेकिन शदीद डर उसकी रूह को अपनी आहनी मुट्ठी में दबा रहा हो।

ख़ारपुश्त के कांटों की तरह लटकते हुए सर के लंबे बालों में शायद रमज़ान ने कभी उंगलियों से भी कंघी न की थी। उसकी छाती का माप भी अब घट चला था। लेकिन मुसल्ली को ये हस्ब-ए-मा’मूल इंच ब इंच पूरी नज़र आती थी पूरी चालीस इंच। रमज़ान अब उसे कभी-कभार दरिया की तरफ़ मुफ्त घुमा लाता और कबूतरों के दड़बे के क़रीब से लीद उठाते वक़्त मुसल्ली के अंदाज़ में रक़्स की सी कैफ़ियत दिखाई दे जाती और कभी मुसल्ली ईदू की पीठ पर हाथ फेर देता तो वो उसकी तरफ़ थूथनी घुमा कर हिनहिनाता, जैसे कह रहा हो, “मैं तुम्हें जानता हूँ, मुसल्ले।”

एक दिन रमज़ान रात को ग्यारह बजे अस्तबल में वापस आया। मुसल्ली ने बताया कि ईदू के लिए हरी घास का कठ्ठा लेने की कोशिश करता रहा, पर कोई घसियारन उधार पर रज़ामंद न हुई। ईदू ने दो-चार मर्तबा अपने मालिक के दाएं बाज़ू पर थूथनी थपथपाई, जैसे कह रहा हो, “कुछ परवा नहीं रमज़ान मियां! में बग़ैर कुछ खाए ही रात काट लूँगा।” रमज़ान पसीना-पसीना हो रहा था। तकिए के क़रीब ही वो एक दुकान के सामने ताँगा रोक कर तीन तंवरी रोटियाँ ख़रीद कर ताँगे पर बैठा-बैठा निगल गया था। लेकिन ईदू जो भूके पेट नई आबादी तक सालिम सवारी लेकर गया था और भूके पेट ही वहां से लौटा था, अब रात-भर भूका रहेगा। रात बहुत जा चुकी थी। इस वक़्त तो दाना भी न मिल सकता था। रमज़ान सोचने लगा कि आधी रात के बाद फ़रिश्ता आएगा और पूछेगा, “तुम्हें कोई शिकायत तो नहीं है, ज़मीन पर चलने वालो, अपने मालिक से?”

और ईदू कह देगा, “आसमान पर रहने वालो, हमें शिकायत क्यों होती?” फ़रिश्ता ईदू के क़रीब आकर कहेगा, “तुम्हारे मालिक के लिए अब मैं दुआ’ करता हूँ। तुम भी दुआ’ में शामिल हो जाओ मेरे साथ।”

और ईदू मेरे लिए दुआ’ में शामिल हो जायेगा। क्योंकि सिर्फ फ़रिश्ते की दुआ’ ख़ुदा की बारगाह में क़बूल नहीं होती। हर रात को फ़रिश्ता आता है और घोड़े से यही सवाल करता है। मालिक की मा’मूली बदसुलूकियों की तो कोई भी घोड़ा शिकायत नहीं करता। लेकिन ईदू कितना नेक घोड़ा है कि भूके पेट चौदह मील का सफ़र करने के बाद भी उसे खाने को कुछ नहीं मिला और फ़रिश्ते के सामने मेरे ख़िलाफ़ एक भी लफ़्ज़ मुँह पर ना लाएगा। हालाँकि वो कह सकता है कि वो भूका खड़ा है और उसके मालिक ने उसके देखते-देखते तीन तंवरी रोटियाँ खालीं।

रमज़ान को नींद न आती थी। दिन भर के मुशाहिदे और तजुर्बे अलग-अलग शक्लें धार कर उसके सामने फिरने लगे। अँधियारे में ईदू का मुँह साफ़-साफ़ नज़र न आसकता था, खाट से उठ कर वो उस के क़रीब गया। वो बदस्तूर खड़ा था। उसकी थूथनी पर हाथ फेरते हुए वो बोला, “अब सो भी जाओ ईदू बेटा! फ़रिश्ता आये तो ये मत कह देना कि तुम भूके हो।”

ईदू ने थूथनी न हिलाई, न वो हिनहिनाया ही। ईदू ऊँघ रहा है, ये सोच कर रमज़ान फिर अपनी खाट पर आगया। वो ख़ुशपोश नौजवान, जो दस आने से शुरू करके बड़ी मुश्किल से बारह आने में सालिम ताँगा लेकर नई आबादी गया था, रमज़ान की आँखों में फिरने लगा। वो उससे बहुत जल्द मानूस हो गया था। रमज़ान ने उसे बताया था कि वो एक रंडुवा है। फिर उसने मुश्की दुल्हन के लिए गोटे का दुपट्टा न ले सकने, ईदू की ईद के दिन ख़रीदने और दारोगा की बेगार काटने का सब हाल उसे तफ्सील से कह सुनाया था और ख़ुशपोश नौजवान ने हमदर्दी जताते हुए कहा था, “काश, तुम रूस में पैदा हुए होते, कोचवान।” ये सुन कर कि रूस में सब ताँगे सोवियत सरकार के हैं, ताँगे ही क्यों, रेलें और मोटरें भी, उसे बहुत ख़ुशी हुई थी। नौजवान ने सर हिलाते हुए कहा था, “सब चीज़ें रूस में लोगों के लिए हैं। सब मिल कर अपने-अपने हिस्से का काम, खेत में हो या कारख़ाने में सरअंजाम देते हैं। सबको भूक लगती है, कोई भूका नहीं रहता। सबको सोवियत के होटलों से खाने को मिल जाता है।” और रमज़ान ने सोचा, रूस में सच-मुच बहुत मज़ा होता होगा। फिर उसकी पलकें बोझल होने लगीं, दिमाग़ की बत्तियां टिमटिमाने लगीं। वो नींद के धारे में बह गया, बहता गया…

उसने देखा कि आसमान से रोटियाँ बरस रही हैं। वो बहुत ख़ुश हुआ। सदियां गुज़रीं कि हज़रत मूसा की क़ौम के लिए मन-ओ-सल्वा उतरा करता था आसमान से। अब ये रोटियाँ बरस रही हैं। ये नए ज़माने का मन-ओ-सल्वा है। सब ग़रीबों के लिए अच्छी ख़ैरात है ख़ुदा की, अब कोई भूका तो नहीं रहेगा। वो रोटियों की तरफ़ लपका। पता चला कि ये रोटियाँ नहीं हैं बल्कि गोल-गोल चौड़ी-चौड़ी पाथियाँ हैं रोटियों की शक्ल के उपले! तौबा, तौबा , अल्लाह मियां भी ख़ूब मज़ाक़ करने लगे हैं ज़मीन वालों के साथ…

उसकी आँख खुल गई। अल्लाह की ला’नत इन रोटी नुमा पाथियों पर। वो फ़ौरन उठ कर बैठ गया। ईदू उसका मुँह ग़ौर से तक रहा था। जैसे कह रहा हो, “मुझे रात-भर नींद नहीं आई रमज़ान मियां, तुमने भी रतजगा किया होता तो एक अ’जब तमाशा देखा होता। मैं तो हैरान रह गया। आसमान से रोटियाँ बरसने लगीं। यहां वहां रोटियाँ ही रोटियाँ नज़र आती थीं। मगर पेशतर इसके कि तुम जाग उठते और मुझे खोल देने पर रज़ामंद होजाते, रोटियाँ जाने किधर गुम हो गईं।” रमज़ान ने सोचा कि शायद इन्सान की तरह हैवान को भी ख़्वाब आते हैं।

मुसल्ली कुछ हरी घास और दाना ले आया तो ईदू हिनहिनाने लगा। सूरज की किरनें छन-छन कर उस के स्याह मख़्मली बुत पर पड़ रही थीं। मुसल्ली ने क़रीब आकर दाने वाला बठ्ठ्ल ईदू की खोली में रख दिया। ईदू फिर हिनहिनाया, जैसे कह रहा हो, “जब भी कोई ख़मीरी गुलगुला कह कर तुम्हारा मज़ाक़ करता है, मैं चाहता हूँ उसे काट खाऊं, मुसल्ली और वो शख़्स रमज़ान ही क्यों न हो… सवा गज़ छाती वाला छः फुट ऊँचा देव-हैकल रमज़ान, मुसल्ली बोला, “जीता रह ईदू ! अल्लाह रसूल की अमान।” अपनी जेब में हाथ डालते हुए रमज़ान ने मुसल्ली को अपने पास बुलाया। रमज़ान बहुत मुतमइन नज़र आता था.

एक दिन, दो दिन, पाँच दिन, बड़ी मुश्किल से रमज़ान ने आठ रुपये बारह आने जोड़े थे कि दस रुपये की क़िस्त की अदायगी का वक़्त आन पहुंचा। साईं जी आ धमके और इधर-उधर की गुफ़्तगु की मंज़िलें तय करने के बाद असली तान दस रुपये पर टूटी। पहले तो रमज़ान के जी में आया, कि साईं जी से कह दे कि उसके पास सिर्फ पाँच रुपये हैं जो वो बखु़शी दे सकता है। बाक़ी के पाँच रुपये चंद रोज़ ठहर कर अदा करेगा। और हत्त-उल-वुसा कोशिश करने पर भी अदा न कर सका तो अगली क़िस्त दस की बजाय पंद्रह की हो जायेगी। लेकिन पेशतर इसके कि वो ऐसी कोई बात शुरू करता साईं जी कह उठे, “तुम्हारी क़िस्तों का तो कुछ झगड़ा नहीं है, रमज़ान मियां, लेकिन तुम तो सेयाने हो। वक़्त पर हर क़िस्त अदा कर दी जाये तो ज़्यादा आसानी देने वाले ही को रहती है।”

रमज़ान ने ईदू की तरफ़ देखा, जैसे उसकी राय मांग रहा हो। बेज़बान ईदू की आँखों में रमज़ान ने उस के जज़्बात पढ़ लेने की विद्या सीख ली थी। उसकी सिफ़ारिश यही मा’लूम होती थी कि जेब की सब नक़दी, पैसा-पैसा साईं जी के सामने ढेरी कर दी जाये और रमज़ान ने यही किया।

साईं जी ने रक़म गिन डाली। उनके चेहरे पर एक वहशियाना हंसी फूट निकली। “बात कैसे बनेगी, रमज़ान मियां, दस रुपये की ज़रूरत है और सवा रुपये की कमी रह गई है।” रमज़ान का दिमाग़ सोचने से रुक गया था। वो चौंक पड़ा। “सवा रुपये की कमी रह गई है। पैसा-पैसा तो ढेरी कर दिया साईं जी। अब क्या कहते हो?” “यही कि सवा रुपये की कमी रह गई है।”

रमज़ान को ऐसा मा’लूम हुआ जैसे कोई उसके दिमाग़ में दाख़िल हो कर उसकी सबसे अहम बाल कमानी से नोच रहा हो, जैसे उसके दिल में सुराख़ किया जा रहा हो, ताकि उसका सब ख़ून निकाल लिया जाये। उसने ईदू की तरफ़ देखा। उसकी सिफ़ारिश यही मालूम होती थी कि कल शाम का वा’दा कर लिया जाये और उसने यही वा’दा कर लिया।

साईं जी के चेहरे पर ज़िंदगी की लहर दौड़ गई और वो कबूतरों के दड़बे के क़रीब पड़ी हुई लीद की तरफ़ देखते हुए बाहर निकल गये। ईदू हिनहिना रहा था। उसकी हिनहिनाहट में उसकी सारी ख़ुद्दारी की चमक मौजूद थी। वो रमज़ान की तंग-दस्ती से वाक़िफ़ था। लेकिन शायद वो हमेशा एक ख़ुद्दार कोचवान के ताँगे में जुतने की ख़्वाहिश रखता था। रमज़ान का सर झुक गया था, जैसे सदियों की घनी ढेर क़िस्तों ने अपना सारा बोझ उसकी गर्दन पर डाल दिया हो।

नमनाक आँखों से रमज़ान ने ईदू की तरफ़ देखा। ईदू ने अपनी थूथनी रमज़ान के कंधे पर रख दी और फिर धीरे-धीरे उसे सहलाने लगा जैसे कह रहा हो, “सवा रुपया भी कुछ चीज़ होती है रमज़ान मियां? क्यों घबराते हो?” और रमज़ान ने सर उठाकर ईदू की आँखों में उसके जज़्बात पढ़ लिये। “अच्छा ये सवा रुपया अब तुम्हारे ज़िम्मे रहा, ईदू बेटा!” अगले रोज़ रमज़ान शाम को अस्तबल में पहुंचा, तो उसकी जेब में सिर्फ़ एक रुपया था। उसकी हालत कम-ओ-बेश एक हारे हुए जुवारी की सी थी जिसकी तक़दीर को साँप सूंघ गया हो।

ताँगे से खोल कर ईदू को उसके थान पर बाँधा गया तो वो पछाड़ी उछाल उछाल कर थान की ज़मीन सूँघने लगा, जैसे वो मिट्टी खाने पर तैयार हो गया हो। एक पिटे हुए गधे की तरह उसके जिस्म का बंद बंद दुख रहा था। वो चाहता था कि रमज़ान उसके जिस्म पर मालिश करके उसकी तकान दूर कर दे। लेकिन रमज़ान की अपनी तकान भी तो आज कुछ कम न थी। वो नमनाक आँखों से रमज़ान को तकने लगा, जैसे कह रहा हो, “तैयार होजाओ, रमज़ान मियां, साईं जी आते ही होंगे।”

रमज़ान ने फ़ैसला किया कि साईं जी को कुछ न दे। यूँही टाल मटोल कर दे। वो खाट डाल कर बैठ गया और मुसल्ली हुक्का ताज़ा करके छोड़ गया था। ईदू बहुत उदास था उसकी बेकार रहने वाली, ज़ंगआलूद आँतें बाहर आया चाहती थीं। इबलक़ के बेटे को इन्सान से कई गुना ज़्यादा भूक लगती है। बेचारा ईदू । उस की थूथनी पर पसीने की बूँदें फूट आईं। धीरे-धीरे उसने अपने पेट को अंदर पिचकाना शुरू किया। भूक तो बढ़ रही थी, बढ़ती आरही थी और उसकी आंत आंत में बर्मा घुमाकर छेद कर रही थी।

रमज़ान भी उदास था। साईं जी लाख बुलाया करें, वो उनसे बोलेगा ही नहीं आज, घुन्नी साध लेना कुछ मुश्किल थोड़ी है। मत मारी गई है साईं जी की। बहुत दिक़ करते हैं। कोई किसी के रुपये रख तो नहीं लेता। कुछ भी तो सब्र नहीं है, उसने अपने ज़ेह्न में झांक कर देखा, वहां धुंदली सपेदियाँ पैदा हो रही थीं ज़हर की सपेदियाँ। आज साईं जी बच कर न जायेंगे। ज़रा सी बस उनकी ज़बान दराज़ी की देर होगी और ये पहलवानों का सरदार कोचवान उन्हें ठीक कर देगा। आज वो अपने ईदू के सामने अपनी जवाँमर्दी का सबूत देगा।

और साईं जी आगये। वो चुप-चुप से नज़र आते थे। वो रमज़ान की खाट पर बैठ गये। रमज़ान के ज़ेह्न की ज़हरीली सपेदियाँ जाने किधर दबी रहीं। उसने सोचा कि कोई नर्म सी बात कह कर टाल मटोल कर दे लेकिन उसके होंट न हिले, जैसे गोल कुनडली मारे यूं ख़ामोश बैठा रहेगा हमेशा हमेशा। “क़िस्तों का मतलब यही होता है रमज़ान।” साईं जी बोले कि “रक़म आसानी से उतर जाये।” रमज़ान ने बेदिली से सर हिलाकर कहा, “हाँ, साईं जी।” “या’नी एक क़िस्त का थोड़ा सा बक़ाया भी दूसरी क़िस्त में शामिल न होना चाहिए। और साफ़ बात तो ये है कि इसमें ज़्यादा फ़ायदा मक़रूज़ ही का मंज़ूर होता है।”

“हाँ साईं जी!” रमज़ान ने ईदू की तरफ़ आँख घुमाते हुए जवाब दिया और ईदू हिनहिनाया जैसे वो अपने मालिक के साथ किसी तरह की नाइंसाफ़ी पसंद न करता हो और इस बात से जल रहा हो कि रमज़ान ने आख़िर शराफ़त का पल्लू क्यों पकड़ रखा है इतनी मज़बूती से? क्यों नहीं धत्ता बता देता, इस कम्बख़्त साईं जी को? “तुम्हारी ईमानदारी, तुम्हारी दानाई और सबसे बड़ी बात है तुम्हारी शराफ़त।” साईं जी ने पैंतरा बदल कर कहा। “उनमें तो मुझे कभी कोई शक नहीं गुज़रा?” “आप मालिक जो हुए।” रमज़ान ने नर्म हो कर कहा। “लेकिन क़िस्त की अदायगी तो ज़रूरी है वक़्त पर , रमज़ान मियां!” साईं जी ने रमज़ान के कंधों पर हाथ टेक कर कहा। “और ये बात मैं अपनी ही ग़रज़ से थोड़ी कहता हूँ। जल्दी इस बोझ से छुटकारा पाने का बस यही एक तरीक़ा हो सकता है।”

“आज तक तो किसी ने मुझ पर ठीकरा नहीं फोड़ा, साईं जी!” “यही तो मेरा भी ख़्याल है।” साईं जी ने उसकी आँखों में तकते हुए कहा और उसकी खाट से उठ खड़े हो गये। जेब से रुपया निकाल कर रमज़ान ने साईं जी के सामने फेंक दिया। “और चवन्नी।” साईं जी ने रुपया उठा कर कहा। रमज़ान ने ईदू की तरफ़ देखा। वो थूथनी हिला रहा था, जैसे कह रहा हो। रुपया तो तुम दे ही बैठे रमज़ान मियां, अब कल चवन्नी भी मारना साईं जी के माथे से। और रमज़ान ने कल का वा’दा कर लिया। साईं जी जा चुके थे, रमज़ान ने महसूस किया कि उसे चारों तरफ़ से नाउम्मीदी ने घेर रखा है। सदियों की बेशुमार क़िस्तों में आख़िर एक रुपये की अदायगी से कितना फ़र्क़ पड़ सकता है? वो बहुत उदास था, जैसे उसका दिल बुझ जाएगा… टिमटिमा कर अस्तबल के चिराग़की तरह।

ईदू अपने थान पर भूका बंधा था। रमज़ान उसके सामने शर्मिंदा नहीं होना चाहता था। बग़ैर बिस्तर बिछाए ही वो खाट पर गिर पड़ा। उसने करवट भी न बदली। पीठ तो तख़्ता हो गई थी। कोई और वक़्त होता तो वो ईदू ही की तरह हिनहिनाने लगता। वो थका-हारा निढाल पड़ा रहा। वो चाहता था कि सो जाये। तने हुए पेट पर तो नींद दौड़ी चली आती है। जाने आज वो किधर ग़ायब हो गई थी। फिर मुसल्ली आन पहुंचा। कहीं से वो दो रोटियां और अचार की फांक ले आया था। “रमज़ान, ओ मियां रमज़ान!” दिल में गुदगुदी सी महसूस करते हुए वो बोला, “देख तेरे लिए रोटियाँ लाया हूँ। तो भूका क्यों रहे आख़िर। तेरे क़रीब ही मैं सो जाऊं एक पेट से ज़्यादा खाकर। ना बाबा ये तो न होगा मुझसे, आख़िर मैं इस क़ुतुब आज़म के मज़ार का मुजाविर हूँ और मैं अल्लाह और उसके क़ुतुब से डरता हूँ।”

रमज़ान का ख़्याल फ़ौरन मन-ओ-सल्वा की तरफ़ दौड़ गया। मुसल्ली रोटियां रखकर चला गया था। रमज़ान ने सोचा, आख़िर भेज ही दिया न मेरे अल्लाह ने और मुझे किसी का दरवाज़ा खटखटाने की नौबत नहीं आई। उस वक़्त ईदू के हिनहिनाने की आवाज़ रमज़ान के कानों में आई। आज ईदू किस तरह रमज़ान की आख़िरी चवन्नी के लिए दरिया तक चला गया था। इस वक़्त रमज़ान ने मन-ओ-सल्वा का एक टुकड़ा मुँह में डाल लिया था। लेकिन झट से उसने लुक़्मे को हथेली पर उगाल कर दूर कुँवें की मुंडेर पर फेंक दिया और बोला, “जब तक तेरे लिए दाना, तेरे लिए मन-ओ-सल्वा नाज़िल नहीं होता, में खाना नहीं खाऊंगा, ईदू बेटा!” और रमज़ान ने काग़ज़ को लपेट कर एक तरफ़ रख दिया और ज़बरदस्ती अपनी पलकों के किवाड़ बंद करने लगा।

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विदाई हिंदी स्टोरी, बेटी की विदाई
शादी के बाद विदाई का समय था, नेहा अपनी माँ से मिलने के बाद अपने पिता से लिपट कर रो रही थीं। वहाँ मौजूद सब लोगों की आंखें नम थीं। नेहा ने घूँघट निकाला हुआ था, वह अपनी छोटी बहन के साथ सजाई गयी गाड़ी के नज़दीक आ गयी थी। दूल्हा अविनाश अपने खास मित्र विकास के साथ बातें कर रहा था। विकास -‘यार अविनाश. सबसे पहले घर पहुंचते ही होटल अमृतबाग चलकर बढ़िया खाना खाएंगे.

यहाँ तेरी ससुराल में खाने का मज़ा नहीं आया।’ तभी पास में खड़ा अविनाश का छोटा भाई राकेश बोला -‘हा यार..पनीर कुछ ठीक नहीं था.और रस मलाई में रस ही नहीं था।’ और वह ही ही ही कर जोर जोर से हंसने लगा। अविनाश भी पीछे नही रहा -‘अरे हम लोग अमृतबाग चलेंगे, जो खाना है खा लेना… मुझे भी यहाँ खाने में मज़ा नहीं आया..रोटियां भी गर्म नहीं थी.।’ अपने पति के मुँह से यह शब्द सुनते ही नेहा जो घूँघट में गाड़ी में बैठने ही जा रही थी, वापस मुड़ी, गाड़ी की फाटक को जोर से बन्द किया… घूँघट हटा कर अपने पापा के पास पहुंची.।

अपने पापा का हाथ अपने हाथ में लिया..’मैं ससुराल नहीं जा रही पिताजी… मुझे यह शादी मंजूर नहीं।’
यह शब्द उसने इतनी जोर से कहे कि सब लोग हक्के बक्के रह गए…
सब नज़दीक आ गए। नेहा के ससुराल वालों पर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा…
मामला क्या था यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था। तभी नेहा के ससुर राधेश्यामजी ने आगे बढ़कर नेहा से पूछा — ‘लेकिन बात क्या है बहू ?
शादी हो गयी है ,विदाई का समय है अचानक क्या हुआ कि तुम शादी को नामंजूर कर रही हो ?

अविनाश की तो मानो दुनिया लूटने जा रही थी, वह भी नेहा के पास आ गया, अविनाश के दोस्त भी।
सब लोग जानना चाहते थे कि आखिर एन वक़्त पर क्या हुआ कि दुल्हन ससुराल जाने से मना कर रही है।
नेहा ने अपने पिता दयाशंकरजी का हाथ पकड़ रखा था…
नेहा ने अपने ससुर से कहा -‘बाबूजी मेरे माता पिता ने अपने सपनों को मारकर हम बहनों को पढ़ाया लिखाया व काबिल बनाया है।
आप जानते है एक बाप के लिए बेटी क्या मायने रखती है ?
आप व आपका बेटा नहीं जान सकते क्योंकि आपके कोई बेटी नहीं है।

‘ नेहा रोती हुई बोले जा रही थी- ‘आप जानते है मेरी शादी के लिए व शादी में बारातियों की आवाभगत में कोई कमी न रह जाये इसलिए मेरे पिताजी पिछले एक साल से रात को 2-3 बजे तक जागकर मेरी माँ के साथ योजना बनाते थे…

खाने में क्या बनेगा , रसोइया कौन होगा , पिछले एक साल में मेरी माँ ने नई साड़ी नही खरीदी क्योकि मेरी शादी में कमी न रह जाये.
दुनिया को दिखाने के लिए अपनी बहन की साड़ी पहन कर मेरी माँ खड़ी है.
मेरे पिता की इस डेढ़ सौ रुपये की नई शर्ट के पीछे बनियान में सौ छेद है.
मेरे माता पिता ने कितने सपनों को मारा होगा…न अच्छा खाया न अच्छा पीया.
बस एक ही ख्वाहिश थी कि मेरी शादी में कोई कमी न रह जाये…

आपके पुत्र को रोटी ठंडी लगी!
उनके दोस्तों को पनीर में गड़बड़ लगी
व मेरे देवर को रस मलाई में रस नहीं मिला.
इनका खिलखिलाकर हँसना मेरे पिता के अभिमान को ठेस पहुंचाने के समान है।
नेहा हांफ रही थी।’ नेहा के पिता ने रोते हुए कहा -‘लेकिन बेटी इतनी छोटी सी बात।’ नेहा ने उनकी बात बीच मे काटी -‘यह छोटी सी बात नहीं है पिताजी.

मेरे पति को मेरे पिता की इज्जत नहीं… रोटी क्या आपने बनाई! रस मलाई … पनीर यह सब केटर्स का काम है.
आपने दिल खोलकर व हैसियत से बढ़कर खर्च किया है, कुछ कमी रही तो वह केटर्स की तरफ से…
आप तो अपने दिल का टुकड़ा अपनी गुड़िया रानी को विदा कर रहे है ? आप कितनी रात रोयेंगे क्या मुझे पता नहीं…
माँ कभी मेरे बिना घर से बाहर नही निकली. कल से वह बाज़ार अकेली जाएगी. जा पाएगी?
जो लोग पत्नी या बहू लेने आये है वह खाने में कमियां निकाल रहे…
मुझमे कोई कमी आपने नहीं रखी, यह बात इनकी समझ में नही आई ?’

दयाशंकर जी ने नेहा के सर पर हाथ फिराया – ‘अरे पगली.. बात का बतंगड़ बना रही है…
मुझे तुझ पर गर्व है कि तू मेरी बेटी है लेकिन बेटा इन्हें माफ कर दे.
तुझे मेरी कसम, शांत हो जा।’
तभी अविनाश ने आकर दयाशंकर जी के हाथ पकड़ लिए -‘मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी…मुझसे गलती हो गयी…मैं …मैं।’
उसका गला बैठ गया था..रो पड़ा था वह।
तभी राधेश्यामजी ने आगे बढ़कर नेहा के सर पर हाथ रखा -‘मैं तो बहू लेने आया था लेकिन ईश्वर बहुत कृपालु है उसने मुझे बेटी दे दी… व बेटी की अहमियत भी समझा दी… मुझे ईश्वर ने बेटी नहीं दी शायद इसलिए कि तेरे जैसी बेटी मेरी नसीब में थी…

अब बेटी इन नालायकों को माफ कर दें… मैं हाथ जोड़ता हूँ तेरे सामने… मेरी बेटी नेहा मुझे लौटा दे।’
और दयाशंकर जी ने सचमुच हाथ जोड़ दिए थे व नेहा के सामने सर झुका दिया। नेहा ने अपने ससुर के हाथ पकड़ लिए…’बाबूजी।’
राधेश्यामजी ने कहा – ‘बाबूजी नहीं..पिताजी।’
नेहा भी भावुक होकर राधेश्याम जी से लिपट गयी थी। दयाशंकर जी ऐसी बेटी पाकर गौरव की अनुभूति कर रहे थे।

नेहा अब राजी खुशी अपने ससुराल रवाना हो गयी थीं… पीछे छोड़ गयी थी आंसुओं से भीगी अपने माँ पिताजी की आंखें, अपने पिता का वह आँगन जिस पर कल तक वह चहकती थी.. आज से इस आँगन की चिड़िया उड़ गई थी किसी दूर प्रदेश में.. और किसी पेड़ पर अपना घरौंदा बनाएगी।

यह कहानी लिखते वक्त मैं उस मूर्ख व्यक्ति के बारे में सोच रहा था जिसने बेटी को सर्वप्रथम ‘पराया धन’ की संज्ञा दी होगी।
बेटी माँ बाप का अभिमान व अनमोल धन होता है, पराया धन नहीं।
कभी हम शादी में जाये तो ध्यान रखें कि पनीर की सब्ज़ी बनाने में एक पिता ने कितना कुछ खोया होगा व कितना खोएगा…
अपना आँगन उजाड़ कर दूसरे के आंगन को महकाना कोई छोटी बात नहीं। खाने में कमियां न निकाले… ।
बेटी की शादी में बनने वाले पनीर, रोटी या रसमलाई पकने में उतना समय लगता है जितनी लड़की की उम्र होती है।

यह भोजन सिर्फ भोजन नहीं, पिता के अरमान व जीवन का सपना होता है।
बेटी की शादी में बनने वाले पकवानों में स्वाद कही सपनों के कुचलने के बाद आता है व उन्हें पकने में सालों लगते है, बेटी की शादी में खाने की कद्र करें।

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किस्सा गरीक बादशाह और हकीम दूबाँ का हिंदी कहानी
फारस देश में एक रूमा नामक नगर था। उस नगर के बादशाह का नाम गरीक था। उस बादशाह को कुष्ठ रोग हो गया। इससे वह बड़े कष्ट में रहता था। राज्य के वैद्य-हकीमों ने भाँति-भाँति से उसका रोग दूर करने के उपाय किए किंतु उसे स्वास्थ्य लाभ नहीं हुआ। संयोगवश उस नगर में दूबाँ नामक एक हकीम का आगमन हुआ। वह चिकित्सा शास्त्र में अद्वितीय था, जड़ी-बूटियों की पहचान उससे अधिक किसी को भी नहीं थी। इसके अतिरिक्त वह प्रत्येक देश की भाषा तथा यूनानी, अरबी, फारसी इत्यादि अच्छी तरह जानता था।

जब उसे मालूम हुआ कि वहाँ के बादशाह को ऐसा भयंकर कुष्ठ रोग है जो किसी हकीम के इलाज से ठीक नहीं हुआ है, तो उसने नगर में अपने आगमन की सूचना उसके पास भिजवाई और उससे भेंट करने के लिए स्वयं ही प्रार्थना की। बादशाह ने अनुमति दे दी तो वह उसके सामने पहुँचा और विधिपूर्वक दंडवत प्रणाम करके कहा, ‘मैने सुना है कि नगर के सभी हकीम आप का इलाज कर चुके और कोई लाभ न हुआ। यदि आप आज्ञा करें तो मैं खाने या लगाने की दवा दिए बगैर ही आपका रोग दूर कर दूँ।’ बादशाह ने कहा, ‘मैं दवाओं से ऊब चुका हूँ। अगर तुम बगैर दवा के मुझे अच्छा करोगे तो मैं तुम्हें बहुत पारितोषिक दूँगा।’ दूबाँ ने कहा, ‘भगवान की दया से मैं आप को बगैर दवा के ठीक कर दूँगा। मैं कल ही से चिकित्सा आरंभ कर दूँगा।’

हकीम दूबाँ बादशाह से विदा होकर अपने निवास स्थान पर आया। उसी दिन उसने कोढ़ की दवाओं से निर्मित एक गेंद और उसी प्रकार एक लंबा बल्ला बनवाया और दूसरे दिन बादशाह को यह चीजें देकर कहा कि आप घुड़सवारी की गेंदबाजी (पोलो) खेलें और इस गेंद-बल्ले का प्रयोग करें। बादशाह उसके कहने के अनुसार खेल के मैदान में गया। हकीम ने कहा, ‘यह औषधियों का बना गेंद-बल्ला है। आप को जब पसीना आएगा तो येऔषधियाँ आप के शरीर में प्रवेश करने लगेंगी। जब आपको काफी पसीना आ जाए और औषधियाँ भली प्रकार आप के शरीर में प्रविष्ट हो जाएँ तो आप गर्म पानी से स्नान करें। फिर आपके शरीर में मेरे दिए हुए कई गुणकारी औषधियों के तेलों की मालिश होगी। मालिश के बाद आप सो जाएँ। मुझे विश्वास है कि दूसरे दिन उठकर आप स्वयं को नीरोग पाएँगे।’

बादशाह यह सुनकर घोड़े पर बैठा और अपने दरबारियों के साथ चौगान (पोलो) खेलने लगा वह एक तरफ से उनकी ओर बल्ले से गेंद फेंकता था और वे दूसरी ओर से उसकी तरफ गेंद फेंकते थे। कई घंटे तक इसी प्रकार खेल होता रहा। गर्मी के कारण बादशाह के सारे शरीर से पसीना टपकने लगा और हकीम की दी हुई गेंद और बल्ले की औषधियाँ उसके शरीर में प्रविष्ट हो गईं। इसके बाद बादशाह ने गर्म पानी से अच्छी तरह मल-मल कर स्नान किया। इसके बाद तेलों की मालिश और दूसरी सारी बातें जो वैद्य ने बताई थीं की गईं। सोने के बाद दूसरे दिन बादशाह उठा तो उसने अपने शरीर को ऐसा नीरोग पाया जैसे उसे कभी कुष्ठ हुआ ही नहीं था।

बादशाह को इस चामत्कारिक चिकित्सा से बड़ा आश्चर्य हुआ। वह हँसी-खुशी उत्तमोत्तम वस्त्रालंकार पहन कर दरबार में आ बैठा। दरबारी लोग मौजूद थे ही। कुछ ही देर में हकीम दूबाँ भी आया। उसने देखा कि बादशाह का अंग-अंग कुंदन की तरह दमक रहा है। अपनी चिकित्सा की सफलता पर उसने प्रभु को धन्यवाद दिया और समीप आकर दरबार की रीति के अनुसार सिंहासन को चुंबन दिया। बादशाह ने हकीम को बुलाकर अपने बगल में बिठाया और दरबार के लोगों के सन्मुख हकीम की अत्यधिक प्रशंसा की।

बादशाह ने अपनी कृपा की उस पर और भी वृष्टि की। उसे अपने ही साथ भोजन कराया। संध्याकालीन दरबार समाप्त होने पर जब मुसाहिब और दरबारी विदा हो गए तो उसने एक बहुत ही कीमती खिलअत (पारितोषक राजवस्त्र) और साठ हजार रुपए इनाम में दिए। इसके बाद भी वह दिन-प्रतिदिन हकीम की प्रतिष्ठा बढ़ाता जाता था। वह सोचता था कि हकीम ने जितना उपकार मुझ पर किया है उसे देखते हुए मैंने इसके साथ कुछ भी नहीं किया। इसीलिए वह प्रतिदिन कुछ न कुछ इनाम-इकराम उसे देने लगा।

बादशाह का मंत्री हकीम की इस प्रतिष्ठा और उस पर बादशाह की ऐसी अनुकंपा देखकर जल उठा। वह कई दिन तक सोचता रहा कि हकीम को बादशाह की निगाहों से कैसे गिराऊँ। एक दिन एकांत में उसने बादशाह से निवेदन किया कि मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ, अगर आप अप्रसन्न न हों। बादशाह ने अनुमति दे दी तो मंत्री ने कहा, ‘आप उस हकीम को इतनी मान-प्रतिष्ठा दे रहे हैं यह बात ठीक नहीं है। दरबार के लोग और मुसाहिब भी इस बात को गलत समझते हैं कि एक विदेशी को, जिसके बारे में यहाँ किसी को कुछ पता नहीं है, इतना मान-सम्मान देना और विश्वासपात्र बनाना अनुचित है। वास्तविकता यह है कि हकीम दूबाँ महाधूर्त है। वह आपके शत्रुओं का भेजा हुआ है जो चाहते हैं वह छल क द्वारा आपको मार डाले।’

बादशाह ने जवाब दिया, ‘मंत्री, तुम्हें हो क्या गया है जो ऐसी निर्मूल बातें कर रहे हो और हकीम को दोषी ठहरा रहे हो?’ मंत्री ने कहा, ‘सरकार मैं बगैर सोचे-समझे यह बात नहीं कह रहा हूँ। मैंने अच्छी तरह पता लगा लिया है कि यह मनुष्य विश्वसनीय नहीं है। आपको उचित है कि आप हकीम की ओर से सावधान हो जाएँ। मैं फिर जोर देकर निवेदन करता हूँ कि दूबाँ अपने देश से वही इरादा ले कर आया है अर्थात वह छल से आप की हत्या करना चाहता है।’

बादशाह ने कहा, ‘मंत्री, हकीम दूबाँ हरगिज ऐसा आदमी नहीं है जैसा तुम कहते हो। तुमने स्वयं ही देखा है कि मेरा रोग किसी और हकीम से ठीक न हो सका और दूबाँ ने उसे एक दिन में ही ठीक कर दिया। ऐसी चिकित्सा को चमत्कार के अलावा क्या कहा जा सकता है? अगर वह मुझे मारना चाहता तो ऐसे कठिन रोग से मुझे छुटकारा क्यों दिलाता? उसके बारे में ऐसे विचार रखना बड़ी नीचता है। मैं अब उसका वेतन तीन हजार रुपए मासिक कर रहा हूँ। विद्वानों का कहना है कि सत्पुरुष वही होते हैं जो अपने साथ किए गए किंचित्मात्र उपकार को आजीवन न भूलें। उसने तो मेरा इतना उपकार किया है कि अगर मैं उसे थोड़ा इनाम और मान-सम्मान दे दिया तो तुम उससे जलने क्यों लगे। तुम यह न समझो कि तुम्हारी निंदा के कारण मैं उसका उपकार करना छोड़ दूँगा। इस समय मुझे वह कहानी याद आ रही है जिसमें बादशाह सिंदबाद के वजीर ने शहजादे को प्राणदंड देने से रोका था।’ मंत्री ने कहा, ‘वह कहानी क्या है? मैं भी उसे सुनना चाहता हूँ।’

बादशाह गरीक ने कहा, बादशाह सिंदबाद की सास किसी कारण सिंदबाद के बेटे से नाराज थी। उसने छलपूर्वक शहजादे पर ऐसा भयंकर अभियोग लगाया कि बादशाह ने शहजादे को प्राण-दंड देने का आदेश दे दिया। सिंदबाद के वजीर ने उससे निवेदन किया कि महाराज, इस आदेश को जल्दी में न दें। जल्दी का काम शैतान का होता है। सभी धर्मशास्त्रों ने अच्छी तरह समझे बूझे-बगैर किसी काम को करने से मना किया है। कहीं ऐसा न हो कि आप का उस भले आदमी जैसा हाल हो जिसने जल्दबाजी में अपने विश्वासपात्र तोते को मार दिया और बाद में हमेशा पछताता रहा। बादशाह के कहने से वजीर ने भद्र पुरुष और उसके तोते की कहानी इस तरह सुनाई।

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किस्सा भद्र पुरुष और उसके तोते का हिंदी कहानी
पूर्वकाल में किसी गाँव में एक बड़ा भला मानस रहता था। उसकी पत्नी अतीव सुंदरी थी और भला मानस उससे बहुत प्रेम करता था। अगर कभी घड़ी भर के लिए भी वह उसकी आँखों से ओझल होती थी तो वह बेचैन हो जाता था। एक बार वह आदमी किसी आवश्यक कार्य से एक अन्य नगर को गया। वहाँ के बाजार में भाँति-भाँति के और चित्र-विचित्र पक्षी बिक रहे थे। वहाँ एक बोलता हुआ तोता भी था। तोते की विशेषता यह थी कि उस से जो भी पूछा जाए उसका उत्तर बिल्कुल मनुष्य की भाँति देता था। इसके अलावा उसमें यह भी विशेषता थी कि किसी मनुष्य की अनुपस्थिति में उसके घर पर जो-जो घटनाएँ घटी होती थीं उन्हें भी वह उस मनुष्य के पूछने पर बता देता था।

कुछ दिनों बाद उस भद्र पुरुष का विदेश जाना हुआ। जाते समय उसने तोते को अपनी पत्नी के सुपुर्द कर दिया कि इसकी अच्छी तरह देख-रेख करना। वह परदेश चला गया और काफी समय बाद लौटा। लौटने पर उसने अकेले में तोते से पूछा कि यहाँ मेरी अनुपस्थिति में क्या-क्या हुआ। उसकी अनुपस्थिति में उसकी पत्नी ने खूब मनमानी की थी और शील के बंधन तोड़ दिए थे। तोते ने अपने स्वामी से सारा हाल कह सुनाया। स्वामी ने अपनी पत्नी को खूब डाँटा-फटकारा कि तू मेरे पीठ पीछे क्या-क्या हरकतें करती है और कैसे-कैसे गुल खिलाती है।

पत्नी-पति से तो कुछ न बोली क्योंकि बातें सच्ची थीं। लेकिन यह सोचने लगी कि यह बातें उसके पति को किसने बताई। पहले उसने सोचा कि शायद किसी सेविका ने यह काम किया है। उसने एक एक सेविका को बुलाकर डाँट फटकार कर पूछा किंतु सभी ने कसमें खा-खाकर कहा कि हमने तुम्हारे पति से कुछ नहीं कहा है। स्त्री को उनकी बातों का विश्वास हो गया और उसने समझ लिया कि यह कार्रवाई तोते ने की है। उसने तोते से कुछ न कहा क्योंकि तोता इस बात को भी अपने स्वामी को बता देता। किंतु वह इस फिक्र में रहने लगी कि किसी प्रकार तोते को अपने स्वामी के सन्मुख झूठा सिद्ध करें और अपने प्रति उसके अविश्वास और संदेह को दूर करें।

कुछ दिन बाद उसका पति एक दिन के लिए फिर गाँव से बाहर गया। स्त्री ने अपनी सेविकाओं को आज्ञा दी कि रात में एक सेविका सारी रात तोते के पिंजरे के नीचे चक्की पीसे, दूसरी उस पर इस तरह पानी डालती रहे जैसे वर्षा हो रही है और तीसरी सेविका पिंजरे के पीछे की ओर दिया जला कर खुद दर्पण लेकर तोते के सामने खड़ी हो जाए और दर्पण पर पड़ने वाले प्रकाश को तोते की आँखों के सामने रह-रह कर डालती रहे। सेविकाएँ रात भर ऐसा करती रहीं और भोर होने के पहले ही उन्होंने पिंजरा ढक दिया।

दूसरे दिन वह भद्र पुरुष लौटा तो उसने एकांत में तोते से पूछा कि कल रात को क्या-क्या हुआ था। तोते ने कहा, ‘हे स्वामी, रात को मुझे बड़ा कष्ट रहा; रात भर बादल गरजते रहे, बिजली चमकती रही और वर्षा होती रही।’ चूँकि विगत रात को बादल और वर्षा का नाम भी नहीं था इसलिए आदमी ने सोचा कि यह तोता बगैर सिर-पैर की बातें करता है और मेरी पत्नी के बारे में भी इसने जो कुछ कहा वह भी बिल्कुल बकवास थी। उसे तोते पर अत्यंत क्रोध आया और उसने तोते को पिंजरे से निकाला और धरती पर पटक कर मार डाला। वह अपनी पत्नी पर फिर विश्वास करने लगा लेकिन यह विश्वास अधिक दिनों तक नहीं रहा। कुछ महीनों के अंदर ही उसके पड़ोसियों ने उसके उसकी पत्नी के दुष्कृत्यों के बारे में ऐसी-ऐसी बातें कहीं जो उस तोते की बातों जैसी थीं। इससे उस भद्र पुरुष को बहुत पछतावा हुआ कि बेकार में ही ऐसे विश्वासपात्र तोते को जल्दी में मार डाला।

मछुवारे ने इतनी कहानी कहकर गागर में बंद दैत्य से कहा कि बादशाह गरीक ने तोते की कथा कहने के बाद अपने मंत्री कहा, ‘तुम दुश्मनी के कारण चाहते हो कि मैं दूबाँ हकीम को जिसने मेरा इतना उपकार किया है और तुम्हारे साथ भी कोई बुराई नहीं की है निरपराध ही मरवा डालूँ। मैं तोते के स्वामी जैसा मूर्ख नहीं हूँ जो बगैर सोचे-समझे ऐसी बात जल्दबाजी में करूँ।’

मंत्री ने निवेदन किया, ‘महाराज, तोता अगर निर्दोष मारा भी गया तो कौन सी बड़ी बात हो गई। न स्त्री का दुष्कृत्य कोई बड़ी बात है। किंतु जो बात मैं आप से कह रहा हूँ वह बड़ी बात है और इस पर ध्यान देना जरूरी है। फिर आप के बहुमूल्य जीवन के लिए एक निरपराध व्यक्ति मारा भी जाय तो इस में खेद की क्या बात है। उसका इतना अपराध है ही कि सभी लोग उसे शत्रु का भेदिया कहते हैं। मुझे उससे न ईर्ष्या है न शत्रुता। मैं जो कुछ कहता हूँ आप ही के भले के लिए कहता हूँ। मुझे इससे कुछ लेना-देना नहीं कि वह अच्छा है या बुरा, मैं तो केवल आप की दीर्घायु चाहता हँ। अगर मेरी बात असत्य निकले तो आप मुझे वैसा ही दंड दें जैसा एक राजा ने अपने अमात्य को दिया था। उस अमात्य को अंतत: राजाज्ञा से मरना ही पड़ा था।’ बादशाह ने पूछा किस राजा ने अमात्य को प्राण-दंड दिया और किस बात पर दिया। मंत्री ने यह कहानी कही।

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कॉल गर्ल की कहानी, Call Girl Ki Kahani
Dirty Story Hindi Confessions of a Call Girl ये कहानी है एक विवाहिता के हाईप्रोफाइल कॉल गर्ल बनने तक के सफर की। एक ऐसी महिला की भावनाओं की, जो परिस्थितियों के कारण एक ऐसे अंधे कुएं में धंसती चली गई, जहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है। जानें इस महिला की पूरी कहानी, खुद उसी की जुबानी – Dirty Kahani – डर्टी कहानी

पता नहीं, मैं आपको अपनी कहानी क्यों सुनाना चाहती हूं। मुझे लगता है कि शायद मैं अपने दिल में दबे इस डीप डर्टी और डार्क सीक्रेट को किसी से कन्फैस और शेयर करना चाहती थी, क्योंकि मेरे दिल में दबा यह राज मुझे हर दिन अंदर ही अंदर मार रहा है। Dirty Hindi Stories

मैं एक 26 वर्षीय शादीशुदा भारतीय महिला हूं। मेरी शादी छह साल पहले मेरी ही पसंद से हुई थी, आप इसे लव मैरिज कह सकते हैं। मेरी शादी के पहले पांच साल तो अपने पति के साथ कुछ इस तरह से निकल गए कि मुझे लगा कि मैं हवा में उड़ रही हूं, मुझे क्या पता था कि कुछ ही दिनों के बाद मेरी राह कांटों से भरी बनने वाली है। मेरी शादी तो मेरी पसंद से हुई थी, जिसके लिए मेरे माता-पिता तैयार नहीं थे, लेकिन बाद में उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया था और फिर हमारी शादी अरेंज भी की गई थी। हमारी शादी को सिर्फ एक ही साल हुआ था कि मुझे मेरे पति के एक दोस्त से पता लगा कि उसने दूसरी लड़कियों से डेटिंग करना, डांस बार और रेड लाइट एरियाज़ में जाना शुरू कर दिया था। Dirty Story Hindi

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इस बारे में ज्यादा जानने की कोशिश करने पर यह सारी बातें सच निकलीं तो मेरा दिल टूट गया। दुनिया मेरे लिए एकदम बोझिल हो गई। इस बारे में जब मैंने पति से बात की तो उन्होंने सब स्वीकार कर लिया। गलती कौन नहीं करता और दूसरा चांस मिलना चाहिए, यह सोचकर मैंने अपने पति को माफ कर दिया और जिंदगी पहले की ही तरह चलने लगी। लेकिन शादी के दो साल के बाद दिसंबर 2013 में मैंने उसे एक शॉपिंग मॉल में फिर एक लड़की के साथ देखा, जो उसकी दूसरी पत्नी थी। उसने किसी और से शादी कर ली थी, बिना कुछ सोचे…। Dirty Story Hindi

उसने कहा कि वो अब मुझे प्यार नहीं करता और मेरे साथ अब और जिंदगी नहीं बिता सकता। मैं समझ नहीं पा रही थी, कि क्या करूं… इसी प्यार और शादी के लिए मैंने सिर्फ 21 साल की उम्र में ग्रेजुएशन करके अपने पैरेन्ट्स, भाई, बहन और दोस्तों को छोड़ दिया था। मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था कि क्या यही था वह प्यार.. जिससे शादी करने के लिए मैंने अपना सबकुछ कुर्बान कर दिया। मेरे पैरेंट्स ने मेरी वजह से उसे एक्सेप्ट किया था, लेकिन फिर भी खुश नहीं थे…।

उसी दिन मैंने अपना सामान उठाया और नौकरी तलाशने के लिए दिल्ली आ गई। उस वक्त की मेरी स्थिति शायद ही कोई समझ सके। मैं किसी से इस बारे में बात नहीं कर सकती थी, क्योंकि मेरे मन में गिल्ट था कि उस वक्त मैंने किसी की बात नहीं सुनी, नहीं मानी थी, इसलिए मुझे अपनी गलती की सजा तो भुगतनी ही थी। तब मेरे पास न पैसा था और न ही कोई ऐसा जो मेरी बात को समझ सके। फिर भी मैं दिल्ली में रह रही एक दोस्त के घर तब तक के लिए आ गई थी, जब तक मुझे कोई नौकरी और सेलरी न मिल जाए। वहां रहकर कई कंपनियों में मैंने इंटरव्यू भी दिये। Dirty Story Hindi

ऐसे ही एक वीकेंड पर जब मैं इंटरनेट सर्च कर रही थी तो मैंने एक कंपनी का एड देखा जो मेरे जैसी लंबी लड़कियों की तलाश कर रही थी। उन्हें अपने एक मॉडलिंग प्रोजेक्ट के लिए दिल्ली में ही मॉडल की तलाश  थी। इनका पेमेंट ऑप्शन भी काफी आकर्षक था। वो प्रोजेक्ट के शूट से पहले ही 20 हजार एडवांस दे रहे थे और करीब 2-3 घंटों के शूट के बाद 20 हजार रुपये और मिलने थे। जब मैंने उनसे इस बारे में पता करने के लिए कॉल किया तो उन्होंने मेरे फोटो भेजने के लिए कहा। और मैंने फौरन ही अपने कुछ कैजुअल शॉट्स उन्हें भेज दिये।

अगले दिन सुबह ही उस एजेंसी से एक आदमी का कॉल आ गया। उसने मुझे  दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल में मिलने के लिए बुलाया। जब मैं वहां पहुंची तो मुझे पता लगा कि वहां मेरे लिए एक स्वीट बुक किया गया था। मुझे ब्रांडेड कपड़ों, महंगे मेकअप प्रोडक्ट्स और खूबसूरत शूज़ से भरा एक बैग और मेरा एडवांस थमा दिया गया और मेरे रूम में जाकर तैयार होने को कहा गया। Dirty Kahani

जब मैं रूम में पहुंची तो वहां एक और लड़की मेरा इंतजार कर रही थी। उसने अपना परिचय मुझे दिया और मैं तैयार होने वॉशरूम में चली गई। करीब दस मिनट के बाद वह आदमी वहां आया जो मुझे बाहर मिला था। उसने मुझे बताया कि मुझे दो लोगों से इसी रूम में मिलना है, जो दस मिनट में वहां पहुंच जाएंगे। जब मैंने इसका मतलब पूछा तो वो बिना कुछ कहे वहां से चला गया। Dirty Story Hindi

कुछ ही देर में वहां करीब 50 साल का एक आदमी और एक ब्रिटिश युवा आए। उनके साथ आए एजेंट ने मुझसे कहा, “प्लीज, अच्छे से सर्विस देना बेटा”। इसके बाद वहां पहले से मौजूद लड़की ने मुझे सबकुछ समझा दिया। अब मुझे समझ आ गया था कि मुझे उन्हें बेड पर सैटिस्फाय करना है और इसीलिए मुझे इतना पैसा एडवांस में दिया गया है। Dirty Story in Hindi

ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए था, मुझे पता है कि आप सब कहेंगे कि मुझे वहां से तुरंत निकल जाना चाहिए था क्योंकि यह काम अच्छा नहीं है। लेकिन मेरा डार्क सीक्रेट तो यही है कि मैंने ऐसा नहीं किया। मैंने उस दिन उनको अच्छी तरह खुश किया। मुझे नहीं पता कि मैं चाहते हुए भी उस दिन वहां से क्यों नहीं निकल गई। मैं अगले तीन दिन तक उसी होटल में रही और हर दिन एक से ज्यादा लोगों के साथ सोई भी। …और यह इसी तरह चलता रहा…। इसके लिए मुझे हाई प्रोफाइल और इलीट क्लाइंट्स से अच्छे पैसे मिलते रहे। यह सब 2014 में शुरू हुआ था और अब तक चल रहा है। Dirty Story Hindi

सोचती हूं कि मैंने उस दिन वहां से क्यों नहीं चली गई….। क्या मैं बहुत सारी ईजी मनी पाना चाहती थी, नहीं… मैं नहीं जानती कि मेरे साथ सबकुछ कैसे घटता चला गया। मैंने कभी नहीं सोचा था कि ऐसा कभी मेरी जिंदगी में भी हो सकता है, लगता था कि ऐसा सिर्फ फिल्मों में ही होता है। ऐसा भी नहीं है कि मैं 50 साल के आदमी के साथ सेक्स की भूखी थी। क्या मैं इसे एन्जॉय कर रही थी? सच क्या है, इसका जवाब तो मैं खुद भी नहीं जानती। यह सब लिखते हुए मेरी आंखों से लगातार आंसू बह रहे हैं. Dirty Hindi Stories

अब मेरे बारे में आप भी बहुत कुछ जानना चाहते होंगे। जैसे -क्या अब मैं यह काम छोड़ना चाहती हूं- मैं खुद नहीं जानती। क्या मेरे दोस्त हैं – नहीं, कोई दोस्त नहीं है। क्या मैं अपने पति के पास जाना चाहती हूं – नहीं। क्या मेरे पैरेन्ट्स इसके बारे में  जानते हैं – नहीं, उन्हें लगता है कि मैं दिल्ली में कोई नौकरी कर रही हूं। क्या मैं दोबारा शादी करना चाहती हूं – नहीं, कभी नहीं। क्या मेरा डिवोर्स हो गया? नहीं, मेरा पति अपनी दूसरी पत्नी के साथ ही रहता है। मैं किसके साथ रहती हूं – मैं दिल्ली में अकेली रहती हूं और मेरे पैरेन्ट्स देश के किसी दूसरे शहर में रहते हैं। मेरे भविष्य का क्या होगा – मैं इस बारे में नहीं सोचती। क्या मैं ड्रग्स या एल्कोहॉल लेने लगी हूं – नहीं, अब तक नहीं लिया और कभी नहीं लूंगी। Dirty Story in Hindi

हां मेरी जिंदगी की एक ऐसी बात है जिससे मुझे कुछ शांति मिलती है, और वह है बालमजदूरी को खत्म करने की मेरी कोशिश। देश के अनाथ बच्चों को हेल्दी लाइफ और शिक्षा उपलब्ध कराना। मैं ये नहीं कह रही हूं कि इससे मैं अपने किये का पश्चाताप कर सकती हूं लेकिन क्राई को हर महीने दिया जाने वाला मेरा डोनेशन मुझे खुद को ही शांति और संतुष्टि देता है। Dirty Story Hindi

मुझे लगता है कि यह सब मेरी डेस्टिनी में ही लिखा था। मैं अपने निर्णय या अपने काम के बारे में कोई सफाई नहीं देना चाहती। मेरा निर्णय गलत था, लेकिन मेरे पास कोई ऑप्शन नहीं था।

आज मैं एक हाईप्रोफाइल कॉल गर्ल हूं और यही मेरा डार्क और डर्टी सीक्रेट है।

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जन्म के पूर्व बच्चे के मन में कई शंकायें थी. उनके समाधान के लिए वह भगवान के पास गया और कहने लगा, “ईश्वर! आप मुझे धरती पर भेज रहे हैं. लेकिन देखिये ना, मैं कितना छोटा हूँ. अपने आप तो मैं अपना ध्यान भी नहीं रख सकता. अब आप ही बताइए कि मैं वहाँ कैसे रहूँगा?”

भगवान मुस्कुराये, फिर बोले, “तुम नहीं जानते कि धरती पर बहुत सारे फ़रिश्ते हैं. उन्हीं में से एक का चुनाव मैंने तुम्हारे लिए किया है. उसे तुम्हारा इंतजार है. वही तुम्हारा ध्यान रखेगा.”
“लेकिन यहाँ स्वर्ग में मैं बस गुनगुनाता और मुस्कुराता रहता हूँ. इसी तरह मैं खुश रहता हूँ. वहाँ मैं कैसे खुश रहूँगा?” बच्चे ने पूछा.
“वह फ़रिश्ता तुम्हें देख कर मुस्कुरायेगा, तुम्हारे लिए गुनगुनायेगा. इस तरह तुम उसका प्रेम महसूस करोगे और बहुत खुश रहोगे.”
“लेकिन मुझे तो वहाँ की भाषा भी नहीं आती. जब लोग मुझसे कुछ कहेंगे, तो मैं समझूंगा कैसे?” बच्चे ने पूछा.
“यह तो बहुत ही आसान है. फ़रिश्ता तुमसे मधुर वाणी में प्यारे शब्द कहेगा और बहुत ही धैर्य से वह तुम्हें बोलना सिखाएगा.”

“लेकिन जब मुझे आपसे बात करनी होगी, तो मैं कैसे कर पाऊँगा?”
भगवान मुस्कुराये और बोले, “वह तुम्हें प्रार्थना करना सिखाएगा. इस तरह तुम मुझसे बात कर पाओगे”
“मैंने सुना है कि धरती पर बहुत से बुरे लोग रहते है. मुझे उनसे कौन बचाएगा?” बच्चे ने आशंका जताई.
“इसकी चिंता मत करो. वह फ़रिश्ता तुम्हारी रक्षा करेगा, चाहे इसमें उसे अपनी जान की बाजी ही क्यों न लगानी पड़े.”
“इन सबके बाद भी मैं हमेशा दुखी रहूंगा क्योंकि मैं आपको देख नहीं पाऊँगा.” बच्चा उदास हो गया.

भगवान ने बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “तुम्हारा फ़रिश्ता तुमसे हमेशा मेरे बारे में बातें करेगा और तुम्हें सिखायेगा कि किस तरह तुम मेरे पास लौटकर आओगे. हालाँकि मैं हर समय तुम्हारे पास ही रहूँगा.”
उस क्षण स्वर्ग में शांति छा गई. किंतु धरती से आवाजें आने लगी. बच्चे ने जल्दी से पूछा, “लगता है मेरे वहाँ जाने का समय निकट हैं. ये बता दीजिये कि उस फ़रिश्ते का नाम क्या है?”
भगवान बोले, “तुम्हें उस फ़रिश्ते का नाम जानने की कोई आवश्यकता नहीं. तुम उसे ‘माँ’ कहना.”

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हिंदी कहानी - माँ का प्यार

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माँ की कहानी, मां का प्यार कहानी, Mom Kahani, Maa Par Kahani
माँ रसोई में काम कर रही थी. तभी उसका १० वर्ष का बेटा उसके पास आया और बिना कुछ कहे एक काग़ज़ का टुकड़ा आगे बढ़ा दिया. माँ के हाथ गीले थे. पहले उसने अपने हाथ पोंछे, फिर उस काग़ज़ को लेकर पढ़ने लगी. उस पर लिखा था :

लॉन की घास काटने के – २० रुपये
इस सप्ताह अपना कमरा साफ़ करने के – १० रुपये
आपके काम से दुकान जाने के – १० रुपये
छोटे भाई का ध्यान रखने के – ५ रुपये
कचरा बाहर फेंकने के – ५ रुपये
पूरा हिसाब – कुल ५० रुपये.

बेटे ने उस सप्ताह जितने काम किये थे. उसका हिसाब उसने उस कागज़ पर लिख दिया था. पूरा हिसाब पढ़ने के बाद माँ ने नज़र उठाकर अपने बेटे को देखा और कुछ सोचने लगी. फिर उसी काग़ज़ को पलटकर पीछे कुछ लिखने बैठ गई. लिखने के बाद उसने वह काग़ज़ अपने बेटे को दे दिया. उस पर लिखा हुआ था :

नौ महीने जो मैंने तुम्हें अपनी कोख में रखा, उसकी कीमत – कुछ नहीं.
तुम जब छोटे थे और जब-जब भी तुम बीमार पड़े, तब सारी-सारी रात जागकर तुम्हारी सेवा करने की कीमत – कुछ नहीं.
वे सारे मुश्किल समय जो तुम्हारे कारण मुझे मिले, उसकी कीमत – कुछ नहीं
तुम्हारे खिलौने, कपड़े, किताबें, खाने-पीने की चीज़ें और यहाँ तक कि तुम्हारी नाक साफ़ करने की कीमत – कुछ नहीं.
इन सबमें जब तुम मेरा प्यार शामिल करोंगे. तो उसकी कीमत तो लगाईं ही नहीं जा सकती.
बेटे ने जब अपनी माँ की लिखी हुई बातें पढ़ी, तो उसकी आँखों में आँसू आ गए. उसने अपनी माँ की आँखों में देखा और बोला, I Love You Mummy , फिर उसने पेन लिया और बड़े अक्षरों में उस कागज़ पर लिखा : PAID IN FULL

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Hindi Story दशरथ मांझी – द माउंटेन मैन

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दशरथ मांझी द माउंटेन मैन, माउंटेन मैन दशरथ मांझी
दशरथ मांझी उर्फ़ माउंटेन मैन को आज हर कोई जानता है, कुछ समय पहले आई फिल्म मांझी के द्वारा हर कोई इनके जीवन को करीब से जान पाया है| बिहार के छोटे से गाँव गहलौर का रहने वाला दशरथ ने इतना आश्चर्यजनक कार्य किया है, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था| इन्होंने अपने छोटे से गाँव से शहर तक का रास्ता बनाने के लिए 360 फीट लम्बे, 30 फीट चौड़े व 25 फीट ऊँचे पहाड़ को तोड़ डाला व रास्ता बना दिया|

जन्म से लेकर जवानी तक का सफ़र
दशरथ का जब जन्म हुआ, तब देश अंग्रेजो का गुलाम था, पूरे देश के साथ साथ इस गावं के भी बत्तर हालात थे| 1947 में देश तो आजाद हो जाता है, लेकिन इसके बाद धनि लोगों की गिरफ्त में चला जाता है| हर तरफ अमीर जमीदार अपना हक जमाये रहते हैं और बिना पढ़े लिखे गरीबो को परेशान करते हैं। दशरथ का परिवार भी बहुत गरीब था, एक एक वक्त की रोटी के लिए उसके पिता बहुत मेहनत करते थे।दशरथ का बाल विवाह भी हुआ था। आजादी मिलने के बाद भी गहलौर गाँव में ना बिजली थी, ना पानी और ना ही पक्की सड़क। उस गाँव के लोगों को पानी के लिए दूर जाना होता था, यहाँ तक की अस्पताल के लिए भी पहाड़ चढ़ कर शहर जाना होता था, जिसमें बहुत समय भी लगता था।दशरथ के पिता ने गाँव के जमीदार से पैसे लिए थे, जिसे वह लौटा नहीं पाये थे। बदले में वह अपने बेटे को उस जमीदार का बधुआ मजदूर बनने को बोलता है। किसी की गुलामी दशरथ को पसंद नहीं थी, इसलिए वह यह गाँव छोड़कर भाग जाता है। अपने गाँव से दूर वह धनवाद में कोयले की खदान में काम करने लगता है। 7 साल तक वहां रहने के बाद उसे अपने परिवार की याद सताने लगती है और फिर वह गाँव लौट आता है।

1955 के लगभग जब वह गाँव लौटता है, तब भी वहां कुछ नहीं बदलता है। वहां अभी भी, गरीबी, जमीदारी, होती है, वहां ना सड़क, ना बिजली जैसी सुविधा पहुँच पाती है। दशरथ के इस गाँव में छुआ छूत जैसी कुप्रथा भी रहती है। दशरथ की माँ अब तक गुजर चुकी होती है, अपने पिता के साथ वह जीवन बसर करने लगता है। तभी उसे एक लड़की पसंद आती है, ये वही लड़की होती है जिससे उसकी बचपन में शादी होती है। मगर अब लड़की का पिता उसकी बचपन की शादी को नहीं मानता है, क्यूंकि उसके हिसाब से दशरथ कुछ काम धाम नहीं करता है। अपने प्यार की खातिर वह फगुनिया को भगा के ले आता है। दोनों एक अच्छे पति पत्नी की तरह जीवन बिताने लगते है। दशरथ को एक बेटा भी होता है।1960 में दशरथ की पत्नी एक बार फिर गर्भवती होती है, इस समय दशरथ को पहाड़ के उस पार कुछ काम मिल जाता है। फगुनिया रोज उसे खाना देने जाती है, एक दिन अचानक उसका पैर फिसल जाता है और वह गिर जाती है। दशरथ के गावं में कोई अस्पताल ना होने के कारण वह बड़ी मुश्किल से पहाड़ चढ़ के उसे शहर ले जाता है। जहाँ वह एक लड़की को जन्म देती है लेकिन खुद मर जाती है।दशरथ इस बात से बहुत आहात होता है और फगुनिया से वादा करता है कि वह इस पहाड़ को तोड़ रास्ता जरुर बनाएगा। 1960 से शुरू हुआ दशरथ का यह प्रण एक हथोड़ी के सहारे था।

दशरथ मांझी – द माउंटेन मैन कहानी- रोज सुबह उठकर दशरथ अपना हथोड़ा उठाये पहाड़ तोड़ने निकल जाता था। वह ऐसे काम करता जैसे उसे इसके पैसे मिलते हो। सब उसे पागल सनकी कहते, लेकिन वह किसी की ना सुनता। इसी वजह से सब उसे पहाड़तोडू कहने लगे थे।दशरथ के पिता उसे बहुत समझाते थे कि ऐसा करने से उसके बच्चों का पेट कैसे भरेगा, लेकिन वह नहीं सुनता था। किसी तरह कुछ पैसा कमाकर बच्चों का पेट भी भर देता था।ऐसा करते करते कई साल बीत गए और गाँव में सुखा पड़ जाता है, सब गाँव छोड़ कर जाने लगते है, लेकिन दशरथ नहीं जाता, वह अपने पिता और बच्चों को भेज देता है। इस सूखे की मार में दशरथ को गन्दा पानी व पत्तियां खा कर गुजारा करना पड़ता है। समय के साथ सूखे के दिन बीत जाते है और सब गाँव वाले लौट आते है। अब भी सब दशरथ को पहाड़ तोड़ता देख आशचर्य चकित हो जाते है।

आपातकाल का समय
में इंदिरा गाँधी द्वारा लगाई गई इमरजेंसी में पूरा देश प्रभावित हुआ था। सब जगह हाहाकार मचा था। अपनी एक रैली में इंदिरा गाँधी बिहार पहुँचती है, जहाँ दशरथ भी जाता है। भाषण के दौरान स्टेज टूट जाता है जिसे दशरथ और कुछ लोग मिलकर संभाल लेते है, जिससे इंदिरा गाँधी अपना भाषण पूरा कर पाती है, इसके बाद दशरथ उनके साथ एक फोटो खिंचवाता है। जब यह बात वहां के जमीदार को पता चलती है, तो वह उसे अपनी मीठी बात में फंसाता है कि वह उसकी मदद करेगा सरकार से सड़क के लिए पैसे मांगने में, अनपढ़ दशरत उसकी बातों में आकर अगूंठा लगा देता है। लेकिन जब दशरत को इस बात का पता चलता है कि जमीदार ने उससे 25 लाख का चुना लगाया है, तो वह इसकी शिकायत प्रधानमंत्री से करने की ठान लेता है।

बिहार से दिल्ली
दशरथ के पास 20 रूपए भी नहीं होते है ट्रेन के, जिस वजह से टीटी उसे ट्रेन से उतार देता है। लेकिन यह बात दशरत को रोक नहीं पाती और वह पैदल ही निकल पड़ता है।दिल्ली में उस समय इमरजेंसी के चलते बहुत दंगे हो रहे होते है, दशरत जब पुलिस को अपनी इंदिरा गाँधी के साथ फोटो दिखाता है, तब उसे फाड़ कर वे उसे भगा देते है और प्रधान मंत्री से मिलने नहीं देते है।

बिहार लौट आना
थक हार कर दशरत अपने घर लौट आता है, उसकी सारी उम्मीद टूट चुकी होती है, वह अब काफी बुढा भी हो गया होता है, उसकी हिम्मत जवाब देने लगती है। लेकिन कुछ लोग दशरथ का साथ देने के लिए आगे आते है और पहाड़ तोड़ने में मदद करते है। ये बात जब जमीदार को पता चलती है, तो वह उन सबको मार डालने की धमकी देता है और कुछ को गिरफ्तार करा देता है। लेकिन एक पत्रकार दशरथ के लिए मसीहा बन कर आता है और वह उसके लिए खड़े होता है। वह सभी गाँव वालों के साथ मिल कर दशरथ के लिए पुलिस स्टेशन के सामने विरोध करता है। दशरत को छोड़ दिया जाता है।360 फीट लम्बे, 30 फीट चौड़े व 25 फीट ऊँचे पहाड़ को दशरथ तोड़ने में सफल हो जाता है। 55 km लम्बे रास्ते को वह 15 km के रास्ते में बदल देता है। दशरत मांझी की बदौलत ही सरकार उस जगह पर ध्यान देती है और कार्य शुरू होता है।1982 में दशरत की मेहनत रंग लाती है और पहाड़ टूट कर रास्ता बन जाता है।2006 में दशरथ का नाम पद्म श्री के लिए दिया गया था।

2007 म्रत्यु-17 अगस्त 2007 को दशरत की गाल ब्लाडर में कैंसर होने की वजह से दिल्ली में म्रत्यु हो जाती है।मरने से पहले दशरत अपने जिंदगी पर फिल्म बनाने की अनुमति देकर जाता है। वह चाहता था उसकी यह कहानी से दुसरे भी प्रभावित होयें। बिहार सरकार ने इसके मरने पर राज्य शोक घोषित किया था।2011 में उस सड़क को दशरथ मांझी पथ नाम दिया गया। ऐसे लोगों से हमें ज़िन्दगी में कभी हार ना मानने की शिक्षा मिलती है। दशरथ मांझी को हम सबका सलाम है।

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Hindi love story Rani Karmavati of Chittor

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चित्तौड़ की रानी कर्मवती की कहानी, Chittor Ki Rani Karmavati Ki Kahani
सभी राजपूत रियासतों को एक झंडे के नीचे लाने वाले महाराणा सांगा के निधन के बाद चितौड़ की गद्दी पर महाराणा रतन सिंह बैठे। राणा रतन सिंह के निधन के बाद उनके भाई विक्रमादित्य चितौड़ के महाराणा बने। विक्रमादित्य ने अपनी सेना में सात हजार पहलवान भर्ती किये।

इन्हें जानवरों की लड़ाई, कुश्ती, आखेट और आमोद प्रमोद ही प्रिय था। इन्हीं कारणों व इनके व्यवहार से मेवाड़ के सामंत खुश नहीं थे। और वे इन्हें छोड़कर बादशाह बहादुरशाह के पास व अन्यत्र चले गए। बहादुरशाह का भाई सिकन्दर सुल्तान बागी होकर राणा सांगा के समय चितौड़ की शरण में रहा था। उसने बहादुरशाह के खिलाफ संघर्ष हेतु चितौड़ के सेठ कर्माशाह से एक लाख रूपये की सहायता भी ली थी। जब बहादुरशाह ने रायसेन दुर्ग को घेरा तब चितौड़ की सेना ने उसकी सहायता की। इसी से नाराज होकर बहादुरशाह ने मुहम्मद असीरी, खुदाबखां को सेना सहित भेजकर 1532 ई। में चितौड़ पर आक्रमण किया व तीन दिन बाद ही खुद सेना सहित चितौड़ आ धमका।

चूँकि मेवाड़ का तत्कालीन शासक विक्रमादित्य अयोग्य शासक था। मेवाड़ के लगभग सभी सामंत उससे रूठे थे अत: जब मेवाड़ की राजमाता कर्मवती जिसे कर्णावती के नाम से जाना जाता है को समाचार मिलते सेठ पद्मशाह के हाथों दिल्ली के बादशाह हुमायूं को भाई मानते हुए राखी भेजी और मुसीबत में सहायता का अनुरोध किया। हुमायूं ने राजमाता को बहिन माना और उपहार आदि भेंट स्वरूप भेजे व सहायता के लिए रवाना होकर ग्वालियर तक पहुंचा। तभी उसे बहादुरशाह का संदेश मिला कि वह काफिरों के खिलाफ जेहाद कर रहा है। तब हुमायूं आगे नहीं बढ़ा और एक माह ग्वालियर में रुक कर आगरा चला गया।

विक्रमादित्य ने बहादुरशाह से संधि करने के प्रयास किये पर विफल रहा। बहादुरशाह ने सुदृढ़ मोर्चाबंदी कर चितौड़ पर तोपों से हमला किया। उसके पास असंख्य सैनिकों वाली सेना भी थी। जिसका विक्रमादित्य की सेना मुकाबला नहीं कर सकती थी, अत: राजमाता कर्मवती ने सुल्तान के पास दूत भेजकर संधि की वार्ता आरम्भ की और कुछ शर्तों के साथ संधि हो गई। परन्तु थोड़े दिन बाद बहादुरशाह ने संधि को ठुकराते हुए फिर चितौड़ की और कूच किया।

राजमाता कर्मवती को समाचार मिलते ही, उसने सभी नाराज सामंतो को चितौड़ की रक्षार्थ पत्र भेजा – यह आपकी मातृभूमि, मैं आपको सौंपती हूँ, चाहे तो इसे रखो अन्यथा दुश्मन को सौंप दो। इस पत्र से मेवाड़ में सनसनी फ़ैल गई। सभी सामंत मातृभूमि की रक्षार्थ चितौड़ में जमा हो गये। रावत बाघसिंह, रावत सत्ता, रावत नर्बत, रावत दूदा चुंडावत, हाड़ा अर्जुन, भैरूदास सोलंकी, सज्जा झाला, सिंहा झाला, सोनगरा माला आदि प्रमुख सामंतों ने मंत्रणा कर महाराणा विक्रमादित्य के छोटे भाई उदयसिंह जो उस वक्त शिशु थे को पन्ना धाय की देखरेख में बूंदी भेज दिया गया।

बहादुरशाह जनवरी 1535 ई। में चितौड़ पहुंचा और किला घेर लिया। उस वक्त अपने बागी सरदार मुहम्मद जमा के बहादुरशाह की शरण में आने से नाराज हुमायूं ने गुजरात पर आक्रमण कर दिया। बहादुरशाह ने चितौड़ से घेरा उठाकर गुजरात बचाने हेतु प्रस्थान की सोची तभी उसके एक सरदार ने उसे बताया कि जब तक हम चितौड़ में काफिरों के खिलाफ जेहाद कर रहे है हुमायूं आगे नहीं बढेगा। हुआ भी ऐसा ही। हुमायूं सारंगपुर रुक गया और चितौड़ युद्ध के परिणामों की प्रतीक्षा करने लगा।

आखिर मार्च 1535 इ। में बहादुरसेना के तोपखाने के भयंकर आक्रमण से चितौड़ की दीवारें ढहने लगी। भयंकर युद्ध हुआ। चितौड़ के प्रमुख सामंत योद्धाओं के साथ महाराणा सांगा की राठौड़ रानी जवाहरबाई ने पुरुष वेष में आश्वारूढ़ होकर युद्ध संचालन किया। आखिर हार सामने देख राजपूतों Rajput warrior ने अपनी चिर-परिचित परम्परा जौहर और शाका करने का निर्णय लिया। 13 हजार क्षत्राणीयों ने गौमुख में स्नान कर, मुख में तुलसी लेकर पूजा पाठ के बाद विजय स्तंभ के सामने बारूद के ढेर पर बैठकर जौहर व्रत रूपी अग्निस्नान किया।

जौहर व्रत की प्रज्वलित लपटों के सम्मुख राजपूतों ने केसरिया वस्त्र धारण कर, पगड़ी में तुलसी टांग, गले में सालिगराम का गुटका टांग, कसुम्बा पान कर, कर किले का दरवाजा खोल दुश्मन सेना पर टूट पड़े और अपने खून का आखिरी कतरा बहने तक युद्ध करते रहे। इस तरह चितौड़ का यह दूसरा जौहर-शाका सम्पन्न हुआ। कहा जाता है इस युद्ध में इतना रक्तपात हुआ था कि रक्त का एक नाला बरसाती नाले की तरह किले से बह निकला था।

इस तरह रानी कर्मवती ने अपने अयोग्य पुत्र के शासन व उस काल चितौड़ बनबीर जैसे षड्यंत्रकारियों के षड्यंत्र के बीच अपनी सूझ-बूझ, रणनीति और बहादुरी से चितौड़ के स्वाभिमान, स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। ज्ञात हो इसी रानी के शिशु राजकुमार उदयसिंह के प्राण बचाने हेतु पन्ना धाय ने अपने पुत्र का बलिदान दे दिया था।

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