Raksha-Bandhan

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रक्षा बंधन 2022 तिथि और समय, Raksha Bandhan 2022 Date And Time, 

भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास के पर्व रक्षाबंधन को हर साल सावन महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि (Sawan Purnima 2022 Date) को मनाया जाता है. राखी के इस पावन त्योहार के साथ ही सावन मास की समाप्ति होती है और भाद्रपद मास का आगमन होता है. लेकिन इस साल 2022 में रक्षाबंधन की तारीख को लेकर दुविधा की स्थिति बनी हुई है. इस साल पूर्णिमा तिथि 11 अगस्त को शुरू हो रही है और इसका समापन 12 अगस्त को होगा. लेकिन भद्रा के साए की वजह से 11 अगस्त को राखी का पर्व मनाना शुभ नहीं माना जा रहा है. यही वजह है कि कुछ लोग 12 अगस्त को भी रक्षा बंधन (Raksha Bandhan 2022 Date, Time in India) मनाएंगे.
ज्योतिषियों का मानना है कि लंबे समय बाद राखी बांधने का योग दो दिन है. ज्योतिषाचार्यो के मुताबिक इस साल 2022 में 11 और 12 अगस्त को राखी का त्यौहार मनाया जाएगा. ज्योतिषाचार्यो के मुताबिक 11 अगस्त को सुबह 9:35 बजे भद्रा लगेगा. जो रात 8.25 बजे तक रहेगा. भद्रा में राखी नहीं बांधी जा सकती है. ऐसे में 11 अगस्त की रात्रि 8:26 बजे भद्रा समाप्त होने के बाद राखी बांधी जा सकती है. लेकिन ज्योतिष शास्त्रियों का मानना है कि हिंदू धर्म में शुभ काम सूर्यास्त के बाद नहीं किए जाते हैं, ऐसे में अगर 11 अगस्त की रात को रखी बांधना ज्यादा जरूरी न हो तो बहनें 12 अगस्त की सुबह ही अपने भाईयों की कलाई पर राखी बांधे. बता दें कि पूर्णिमा की उदया तिथि 12 अगस्त को सुबह 07:25 तक रहेगी अत: 12 अगस्त को सुबह 7.25 बजे तक राखी बांधना ज्यादा शुभ है. लेकिन उदया तिथि का दिन होने की वजह से 12 अगस्त को दिन के समय (सूर्यास्त से पहले) कभी भी राखी बांधी जा सकती है.

रक्षाबंधन का शुभ मुहूर्त, Raksha Bandhan Muhurat 2022 

रक्षा बंधन तिथि – 11 अगस्त 2022 गुरुवार और 12 अगस्त 2022 शुक्रवार
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ – 11 अगस्त, गुरुवार को सुबह 10:38 मिनट से
पूर्णिमा तिथि समापन – 12 अगस्त 2022, शुक्रवार, सुबह 07:06 मिनट
रक्षाबंधन 2022 में भद्रा काल प्रारंभ– 11 अगस्त 2022, गुरुवार को सुबह 10:38 से
रक्षाबंधन 2022 में भद्रा काल समापन– 11 अगस्त 2022, रात 8:51 पर
11 अगस्त को रक्षा बंधन 2022 का शुभ मुहूर्त –  रात 8:51 से रात 09:12 तक
12 अगस्त को रक्षा बंधन 2022 का शुभ मुहूर्त – 12 अगस्त को पूर्णिमा तिथि सुबह 07:18 तक रहेगी, इसलिए 12 अगस्त को सुबह 07:18 तक राखी बांधने का अत्यंत शुभ समय है. लेकिन उदया तिथि का दिन होने की वजह से 12 अगस्त को दिन के समय कभी भी राखी बांधी जा सकती है.

भद्राकाल में क्यों नहीं बांधे राखी

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, भद्राकाल में राखी बांधना अशुभ होता है. दरअसल शास्त्रों में राहुकाल और भद्रा के समय शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं. पौराण‍िक मान्‍यताओं के अनुसार भद्रा में राखी न बंधवाने की पीछ कारण है कि लंकापति रावण ने अपनी बहन से भद्रा में राखी बंधवाई और एक साल के अंदर उसका विनाश हो गया. इसलिए इस समय को छोड़कर ही बहनें अपने भाई के कलाई पर राखी बांधती हैं. वहीं यह भी कहा जाता है कि भद्रा शनि महाराज की बहन है. उन्हें ब्रह्माजी जी ने शाप दिया था कि जो भी व्यक्ति भद्रा में शुभ काम करेगा, उसका परिणाम अशुभ ही होगा. इसके अलावा राहुकाल में भी राखी नहीं बांधी जाती है.

राखी की थाली में क्या रखें? राखी बांधने की विधि

राखी की थाली में रोली, चंदन, अक्षत, दही, मिठाई व रक्षासूत्र रखें. राखी की थाली सबसे पहले भगवान को समर्पित करें. भगवान का आशीर्वाद लेने के बाद अपने भाई को राखी बांधे. राखी बांधने के लिए भाई को पूर्व दिशा की तरफ मुख करके बिठाएं. राखी बांधवाते समय भाई अपने सिर पर एक रुमाल अवश्य रखें.
अब बहन अपने भाई के माथे पर रोला व अक्षत से टीका करें, फिर दीया जलाकर भाई की आरती उतारें और फिर भाई की कलाई पर राखी बांधे. अब भाई-बहन एक दूसरे का मुंह मीठा करें. अगर बहन बड़ी है तो भाई उसके चरण स्पर्श करे और अगर बहन छोटी है तो वो भाई के पैर छुकर उनका आशीर्वाद ले. अंत में भाई अपनी बहन को कुछ न कुछ उपहार स्वरूप अवश्य दे.
राखी बांधने का मंत्र-
शास्त्रों के मुताबिक बहन को भाई के कलाई पर राखी बांधते वक्त इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिए.
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:
तेन त्वामनुबध्नाभि रक्षे मा चल मा चल.

राशि अनुसार भाई की कलाई पर किस कलर की राखी बांधना होगा शुभ, जानिए?

भाई की राशि के अनुसार राखी का कलर चुनने पर भाई के जीवन में खुशहाली आती है. इसलिए आइए जानते हैं किस राशि के भाई की कलाई पर किस रंग की राखी बांधना होगा शुभ-
मेष राशि- मेष राशि का स्वामी मंगल होने के कारण इस राशि के व्यक्तियों को लाल रंग की राखी बांधना शुभ होगा. ऐसा करने से इस राशि के व्यक्ति के जीवन में ऊर्जा का संचार बना रहेगा.
वृष राशि- इस राशि का स्वामी शुक्र होने के कारण इस राशि के व्यक्ति को नीले रंग की राखी बांधना शुभ रहेगा.
मिथुन राशि- इस राशि का स्वामी बुध होने के कारण इस राशि के व्यक्ति को हरे रंग की राखी पहनना शुभ रहेगा। ऐसा करने से उसे सुख, समृद्धि के साथ लंबी आयु भी प्राप्त होगी.
कर्क राशि- इस राशि का स्वामी चंद्रमा होने की वजह से इन लोगों को सफेद रंग की राखी पहनना शुभ रहेगा। ऐसा करने से उनके जीवन में खुशहाली आएगी.
सिंह राशि- इस राशि का स्वामी सूर्य होने से इस राशि के लोगों को पीले-लाल रंग की राखी पहनना शुभ रहेगा.

कन्या राशि- इस राशि का स्वामी बुध होने की वजह से इस राशि के भाइयों की बहनें हरे रंग की राखी बांधे. ऐसा करने से उनके सभी ग्रह दोष दूर होते हैं.
तुला राशि- इस राशि का स्वामी शुक्र ग्रह है. इस राशि के भाइयों की कलाई पर नीली या फिर सफेद रंग की राखी पहनना शुभ रहेगा.
धनु राशि- इस राशि का स्वामी बृहस्पति होने की वजह से उन्हें सुनहरे पीले रंग की राखी बांधना शुभ रहेगा.
मकर राशि- इस राशि के स्वामी ग्रह शनिदेव होने की वजह से बहनें अपने भाई को नीले रंग की राखी पहनाएं। ऐसा करने से भाई-बहन का प्यार बना रहेगा.
कुंभ राशि- इस राशि के स्वामी ग्रह शनिदेव होने की वजह से बहनें अपने भाइयों को हरे रंग की रूद्राक्ष वाली राखी पहनाएं.
मीन राशि- इस राशि के जातकों की बहनों को अपने भाइयों के लिए सुनहरे हरे रंग या फिर पीले रंग की राखी खरीदनी चाहिए.

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Pitru-Paksha-2021

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श्राद्ध पक्ष को पितृपक्ष (Pitru Paksha 2021) और महालय के नाम से भी जाना जाता है. ऐसी मान्यता है कि श्राद्ध पक्ष के दौरान हमारे पूर्वज पृथ्वी पर सूक्ष्म रूप में आते हैं और उनके नाम से किये जाने वाले तर्पण को स्वीकार करते हैं. इससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और घर में सुख-शांति बनी रहती है. पितृ पक्ष का आरंभ आश्विन मास महीने की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से होता है जो आश्विन अमावस्या तिथि को समाप्त होता है. इस साल पितृपक्ष 20 सितंबर 2021 से शुरू हो रहे हैं. अंतिम श्राद्ध यानी अमावस्या श्राद्ध 06 अक्टूबर को होगा. पितृपक्ष के 15 दिनों में पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है. इन दिनों में लोग अपने पूर्वजों के लिए शांति की कामना करते हैं. आइए जानते हैं कि किस दिन कौन सी तिथि का श्राद्ध होगा, श्राद्ध पूजा की सामग्री, श्राद्ध विधि, पितृपक्ष का महत्व आदि के बारे में विस्तार से-

पितृपक्ष 2021 की श्राद्ध तालिका
20 सितंबर 2021 – पूर्णिमा श्राद्ध
21 सितंबर 2021 – प्रतिपदा श्राद्ध
22 सितंबर 2021 – द्वितीया श्राद्ध
23 सितंबर 2021 – तृतीया श्राद्ध
24 सितंबर 2021 – चतुर्थी श्राद्ध
25 सितंबर 2021 – पंचमी श्राद्ध
27 सितंबर 2021 – षष्ठी श्राद्ध
28 सितंबर 2021 – सप्तमी श्राद्ध
29 सितंबर 2021 – अष्टमी श्राद्ध
30 सितंबर 2021 – नवमी श्राद्ध
1 अक्टूबर 2021 – दशमी श्राद्ध
2 अक्टूबर 2021 – एकादशी श्राद्ध
3 अक्टूबर 2021 – द्वादशी श्राद्ध
4 अक्टूबर 2021 – त्रयोदशी श्राद्ध
5 अक्टूबर 2021 – चतुर्दशी श्राद्ध (घात चतुर्दशी)
6 अक्टूबर 2021 – अमावस्या श्राद्ध और पितृ विसर्जन
नोट- इस साल 26 सितंबर को पितृ पक्ष की कोई तिथि नहीं है….

पितृपक्ष के मुख्य दिन
चौथ भरणी या भरणी पंचमी- गतवर्ष जिनकी मृत्यु हुई है उनका श्राद्ध इस तिथि पर होता है.
मातृनवमी- अपने पति के जीवन काल में मरने वाली स्त्री का श्राद्ध इस तिथि पर किया जाता है.
घात चतुर्दशी- युद्ध में या किसी तरह मारे गए व्यक्तियों का श्राद्ध इस तिथि पर किया जाता है.
मातामह- नाना का श्राद्ध आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को होता है.
महालया (पितृ विसर्जनी अमावस्या) – आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या को पितृ विसर्जनी अमावस्या या महालया कहते हैं. जो व्यक्ति पितृ पक्ष के 15 दिनों तक श्राद्ध और तर्पण नहीं करते हैं, वे इस दिन अपने पितरों के श्राद्ध तर्पण कर सकते हैं. इसके अतिरिक्त जिन पितरों की तिथि ज्ञात नहीं, वे भी श्राद्ध-तर्पण अमावस्या को ही करते हैं. इस दिन सभी पितरों का विसर्जन होता है.
.
कौन कर सकता है श्राद्ध
श्राद्ध का पहला अधिकार बड़े पुत्र का है. बड़ा बेटा जीवित न हो तो उससे छोटा पुत्र श्राद्ध करता है.
बड़ा बेटा शादी के बाद पत्नी संग मिलकर श्राद्ध तर्पण करता है.
जिसका पुत्र न हो तो उसके भाई-भतीजे श्राद्ध कर्म कर सकते हैं.
अगर केवल पुत्री है तो उसका पुत्र श्राद्ध करता है.

श्राद्ध पूजा की सामग्री-
रोली, सिंदूर, छोटी सुपारी , रक्षा सूत्र, चावल, जनेऊ, कपूर, हल्दी, देसी घी, माचिस, शहद, काला तिल, तुलसी पत्ता , पान का पत्ता, जौ, हवन सामग्री, गुड़ , मिट्टी का दीया , रुई बत्ती, अगरबत्ती, दही, जौ का आटा, गंगाजल, खजूर, केला, सफेद फूल, उड़द, गाय का दूध, घी, खीर, स्वांक के चावल, मूंग, गन्ना।
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श्राद्ध विधि
किसी सुयोग्य विद्वान ब्राह्मण के जरिए ही श्राद्ध कर्म (पिंड दान, तर्पण) करवाना चाहिए। आर्थिक कारण या अन्य कारणों से यदि ऐसा संभव न हो तो आप खुद पूर्ण श्रद्धा भाव से अपने सामर्थ्य अनुसार उपलब्ध अन्न, साग-पात-फल और जो संभव हो सके उतनी दक्षिणा किसी ब्राह्मण को आदर भाव से देकर श्राद्ध कर सकते हैं. श्राद्ध पूजा दोपहर के समय शुरू करनी चाहिए. यदि संभव हो तो गंगा नदी के किनारे पर श्राद्ध कर्म करवाना चाहिए। यदि यह संभव न हो तो घर पर भी इसे किया जा सकता है। जो भी श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है उसकी बुद्धि, पुष्टि, स्मरणशक्ति, धारणाशक्ति, पुत्र-पौत्रादि एवं ऐश्वर्य की वृद्धि होती. वह पर्व का पूर्ण फल भोगता है. यहां जानिए श्राद्ध की विधि-
1. सुबह उठकर स्नान कर देव स्थान व पितृ स्थान को गाय के गोबर लिपकर व गंगाजल से पवित्र करें.
2. महिलाएं शुद्ध होकर पितरों के लिए भोजन बनाएं.
3. श्राद्ध का अधिकारी श्रेष्ठ ब्राह्मण (या कुल के अधिकारी जैसे दामाद, भतीजा आदि) को न्यौता देकर बुलाएं.
4. ब्राह्मण से पितरों की पूजा एवं तर्पण आदि कराएं.
5. पितरों के निमित्त अग्नि में गाय का दूध, दही, घी एवं खीर अर्पित करें.

6 . इसके बाद जो भोग लगाया जा रहा है उसमें से गाय, कुत्ते, कौवे व अतिथि के लिए भोजन से चार ग्रास निकालें. व इन्हें भोजन डालते समय अपने पितरों का स्मरण करना चाहिए. मन ही मन उनसे श्राद्ध ग्रहण करने का निवेदन करना चाहिए।
7. ब्राह्मण स्वस्तिवाचन तथा वैदिक पाठ करें एवं गृहस्थ एवं पितर के प्रति शुभकामनाएं व्यक्त करें.
8. ब्राह्मण को आदरपूर्वक भोजन कराएं, मुखशुद्धि, वस्त्र, दक्षिणा आदि से सम्मान करें.
9 . यदि किसी परिस्थिति में यह भी संभव न हो तो 7-8 मुट्ठी तिल, जल सहित किसी योग्य ब्राह्मण को दान कर देने चाहिए. इससे भी श्राद्ध का पुण्य प्राप्त होता है.
10. हिन्दू धर्म में गाय को विशेष महत्व दिया गया है. किसी गाय को भरपेट घास खिलाने से भी पितृ प्रसन्न होते हैं.
11. यदि उपरोक्त में से कुछ भी संभव न हो तो किसी एकांत स्थान पर मध्याह्न समय में सूर्य की ओर दोनों हाथ उठाकर अपने पूर्वजों और सूर्य देव से प्रार्थना करनी चाहिए. प्रार्थना में कहना चाहिए कि- हे प्रभु मैंने अपने हाथ आपके समक्ष फैला दिए हैं, मैं अपने पितरों की मुक्ति के लिए आपसे प्रार्थना करता हूं, मेरे पितर मेरी श्रद्धा भक्ति से संतुष्ट हो. ऐसा करने से व्यक्ति को पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है.
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श्राद्ध में कौओं का महत्त्व
कौए को पितरों का रूप माना जाता है. मान्यता है कि श्राद्ध ग्रहण करने के लिए हमारे पितर कौए का रूप धारण कर नियत तिथि पर दोपहर के समय हमारे घर आते हैं. अगर उन्हें श्राद्ध नहीं मिलता तो वह रुष्ट हो जाते हैं. इस कारण श्राद्ध का प्रथम अंश कौओं को दिया जाता है.

पितृपक्ष का महत्व
देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी होता है. देवकार्य से भी ज्यादा पितृकार्य का महत्व होता है. पितृ हमारे वंश को बढ़ाते है, पितृ पूजन करने से परिवार में सुख-शांति, धन-धान्य, यश, वैभव, लक्ष्मी हमेशा बनी रहती है. संतान का सुख भी पितृ ही प्रदान करते हैं. शास्त्रों में पितृ को पितृदेव कहा जाता है. पितृ पूजन प्रत्येक घर के शुभ कार्य में प्रथम किया जाता है. जो कि नांदी श्राद्ध के रूप में किया जाता है. भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन (क्वांर) की अमावस्या तक के समय को शास्त्रों में पितृपक्ष बताया है. इन 15 -16 दिनों में जो पुत्र अपने पिता, माता अथवा अपने वंश के पितरों का पूजन (तर्पण, पितृयज्ञ, धूप, श्राद्ध) करता है. वह अवश्य ही उनका आशीर्वाद प्राप्त करता है. माना जाता है कि इन दिनों में जिनको पितृदोष है वह अवश्य त्रि-पिंडी श्राद्ध अथवा नारायण बली का पूजन किसी तीर्थस्थल पर कराएं. काक भोजन कराएं, तो उनके पितृ सद्गति को प्राप्त हो, बैकुंठ में स्थान पाते हैं. अपने पिता-पितामह, माता, मातामही, पितामही, माता के पिता, मातृ पक्ष, पत्नी के पिता, अपने भाई, बहन, सखा, गुरु, गुरुमाता का श्राद्ध मंत्रों का उच्चारण कर विधिवत संपन्न करें. ब्राह्मण का जोड़ा यानी पति-पत्नी को भोजन कराएं. पितृ अवश्य आपको आशीर्वाद प्रदान करेंगे.

श्राद्ध के दौरान क्या करें क्या नहीं
1. ब्राह्मणों को यथाशक्ति भोजन कराएं.
2. जनेऊधारी हैं तो पिंडदान के दौरान उसे बाएं की जगह दाएं कंधे पर रखें.
3. पिंडदान सदैव चढ़ते सूर्य के समय में करें. सुबह या अंधेरे में पिंडदान नहीं किया जाता.
4. पिंडदान कांसे या तांबे या चांदी के बर्तन, प्लेट या पत्तल में करें.
5. श्राद्ध के समय मुख दक्षिण दिशा की ओर हो.
6. श्राद्ध के दौरान घर में कलह नहीं होनी चाहिए.

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बड़ा इतवार कब है, Bada Itavaar Kab Hai
1- भाद्रपद शुक्ला षष्ठी
2- विक्रम संवत् 2078
3- रविवार सितंबर 12, 2021
4- माह – भाद्रपद
5- पक्ष – शुक्ला
6- तिथि – षष्ठी
7- दिन – रविवार
8- महीना – सितंबर
9- ऋतु – शरद
आज बड़ा इतवार या बड़ा रविवार का दिन है, आज के दिन भगवान सूर्य की उपासना व पूजा विधा है। भाद्र मास के शुक्ल पक्ष में बड़ा इतवार पर रविवार को सूर्य देव के भक्त प्रात: काल स्नान-ध्यान कर व्रत का अनुष्ठान करते हैं। भगवान सूर्य को अ‌र्घ्य देकर जल अर्पण कर हवन-पूजन होती है।
हिन्दू धर्म के परम्परा अनुसार देवी-देवताओं की आराधना के लिए आज के पर्व व त्यौहार का विशेष महत्व है। अपनी किरणों से जगत में उजियारा कर रश्मियों से चैतन्यता, शक्ति व ऊर्जा का संचार करने वाले भगवान सूर्य की पूजा का अत्यन्त महात्म्य है। वृहद रविवार को श्रद्धालुओं द्वारा व्रत अनुष्ठान की परम्परा सदियों से चली आ रही है। इस मौके भगवान का ध्यान कर मंत्र जाप व हवन-पूजन किया जाता है। इस मौके पर नदियों में डुबकियां लगाकर पुरोहितों को दान देने कर परंपरा है। जिसकी तैयारियां उत्साह से की जा रही है। आचार्य गौरीशंकर शास्त्री के अनुसार शनिवार को आज दिन व रात-बराबर समय के होंगे। जिसका खगोल शास्त्र में व्यापक वर्णन है।

बड़े इतवार की पूजा विधि, बड़े रविवार की पूजा विधि
1 – सुबह सूर्योदय से पहले ही उठकर स्नान करें। अगर संभव हो तो घर पर पानी में गंगाजल डालकर नहाएं।
2 – फिर आप भगवान सूर्य को जल चढ़ाएं। इसके लिए तांबे के लोटे में जल भरें और चावल, फूल डालकर सूर्य को अर्घ्य दें।
3 – सूर्य देव को जल चढ़ाते समय सूर्य के वरूण रूप को प्रणाम करते हुए ऊं रवये नम: मंत्र का जाप करें। इस जाप के साथ शक्ति, बुद्धि, स्वास्थ्य और सम्मान की कामना करना चाहिए।
4 – भगवान सूर्य देव को जल चढ़ाने के बाद धूप, दीप से सूर्यदेव का पूजन करें। सूर्य से संबंधित चीजें जैसे तांबे का बर्तन, पीले या लाल कपड़े, गेहूं, गुड़, लाल चंदन का दान करें।
5 – अपनी क्षमता और श्रद्धानुसार इन में से किसी भी चीज का दान किया जा सकता है। इस दिन सूर्यदेव की पूजा के बाद एक समय फलाहार करें।

भगवान सूर्य देव को प्रसन्न करने के उपाय
1 – सुबह – सुबह सूर्योदय के समय लाल फूल, और कुंकुम से सूर्यदेव की पूजा करें। लाल वस्त्र भी अर्पित करें।
2 – किसी अच्छे ज्योतिषी से सलाह लेकर माणिक रत्न तांबे की अंगूठी में अपनी अनामिका अंगुली में धारण करें।
3 – जरूरतमंदों को अपनी सामर्थ के अनुसार गेहूं का दान करें। इससे भी सूर्य के दोष कम होते हैं।
4 – लाल चंदन की माला से सूर्य देव के मन्त्र ऊं घृणि सूर्याय नम: मंत्र का जाप करें। यह जाप कम से कम 5 बार करें।
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गणेश विसर्जन 2021
देशभर में लोग बड़ी धूम-धाम से गणेश चतुर्थी का पर्व मनाते हैं. भक्त नाचते गाते और ढोल-नगाड़ों के साथ अपनी श्रद्धा अनुसार घर में गणपति की स्थापना करते हैं. इसमें कोई डेढ़ दिन, तो कोई तीन और कोई 5 दिन के लिए गणपति को विराजमान करता है. गणेश महाराज को घर में ज्यादा से ज्यादा 10 दिन के लिए ही विराजमान कर सकते हैं. यानी कि गणेश चतुर्थी पर भगवान गणपति की स्थापना के 10 दिन बाद अनंत चतुर्दशी पर प्रतिमा का विसर्जन भी उसी धूम-धाम से किया जाता है. इस दिन भी पिछले 10 दिनों की तरह पूजा, आरती और भोग लगाया जाता है. इसके बाद विसर्जन के समय फिर से पूजा की जाती है. इसे उत्तर पूजा भी कहा जाता है. फिर आरती कर विसर्जन मंत्र के साथ प्राण-प्रतिष्ठित मिट्टी की गणेश प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है. इस दिन हर जगह गणपति बप्पा मोरया (Ganpati Bappa Morya) के जयकारे सुनाई देते हैं. कहते हैं कि बप्पा का विसर्जन ये कहते हुए किया जाता है कि बप्पा अगले साल फिर आना.
जिस तरह घर पर गणपति की स्थापना करने के लिए शुभ मुहूर्त देखा जाता है उसी प्रकार बप्पा के विसर्जन के लिए भी शुभ मुहूर्त का इंतजार करना चाहिए. धार्मिक मान्यता है कि अगर शुभ मुहूर्त में ही बप्पा का विसर्जन किया जाए, तो शुभ होता है. पंचांग के अनुसार गणेश चतुर्थी का पर्व इस साल 2021 में 10 सितंबर 2021, शुक्रवार को भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाएगा और 19 सितंबर 2021, रविवार को भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को गणेश महोत्सव का समापन होगा. आइए बताते हैं गणेश विसर्जन 2021 का शुभ मुहूर्त-

गणेश विसर्जन शुभ मुहूर्त (Ganesh Visarjan Shubh Muhurat)
गणेश विसर्जन के लिए शुभ चौघड़िया मुहूर्त
प्रातः काल (चर, लाभ, अमृत) – 07:39 ए एम से 12:14 पी एम तक
दोपहर (शुभ)- 01:46 पी एम से 03:18 पी एम बजे तक
शाम (शुभ, अमृत, चर)- 06:21 पी एम से 10:46 पी एम बजे तक
रात (लाभ)- 01:43 ए एम से 03:11 ए एम बजे तक (20 सितंबर)
उषाकाल मुहूर्त (शुभ) – 04:40 ए एम से 06:08 ए एम तक (20 सितंबर)
चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ – 19 सितंबर, 2021 को 05:59 ए एम बजे
चतुर्दशी तिथि समाप्त – 20 सितम्बर, 2021 को 05:28 ए एम बजे
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विसर्जन का अर्थ
विसर्जन शब्द संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है पानी में विलीन होना, ये सम्मान सूचक प्रक्रिया है इसलिए घर में पूजा के लिए प्रयोग की गई मूर्तियों को विसर्जित करके उन्हें सम्मान दिया जाता है.

गणेश विसर्जन विधि , गणपति विसर्जन के नियम
1. सबसे पहले प्रतिदिन की जाने वाली आरती-पूजन-अर्चन करें.
2. विशेष प्रसाद का भोग लगाएं.
3. अब श्री गणेश के पवित्र मंत्रों से उनका स्वस्तिवाचन करें.
4. एक स्वच्छ पाटा लें. उसे गंगाजल या गौमूत्र से पवित्र करें. घर की स्त्री उस पर स्वास्तिक बनाएं. उस पर अक्षत रखें. इस पर एक पीला, गुलाबी या लाल सुसज्जित वस्त्र बिछाएं.
5. इस पर गुलाब की पंखुरियां बिखेरें. साथ में पाटे के चारों कोनों पर चार सुपारी रखें.
6. अब श्री गणेश को उनके जयघोष के साथ स्थापना वाले स्थान से उठाएं और इस पाटे पर विराजित करें. पाटे पर विराजित करने के उपरांत उनके साथ फल, फूल, वस्त्र, दक्षिणा, 5 मोदक रखें.
7. एक छोटी लकड़ी लें. उस पर चावल, गेहूं और पंच मेवा और दूर्वा की पोटली बनाकर बांधें. यथाशक्ति दक्षिणा (सिक्के) रखें. मान्यता है कि मार्ग में उन्हें किसी भी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े. इसलिए जैसे पुराने समय में घर से निकलते समय जो भी यात्रा के लिए तैयारी की जाती थी वैसी श्री गणेश के बिदा के समय की जानी चाहिए.

8. नदी, तालाब या पोखर के किनारे विसर्जन से पूर्व कपूर की आरती पुन: संपन्न करें. श्री गणेश से खुशी-खुशी बिदाई की कामना करें और उनसे धन, सुख, शांति, समृद्धि के साथ मनचाहे आशीर्वाद मांगें. 10 दिन जाने-अनजाने में हुई गलती के लिए क्षमा प्रार्थना भी करें.
9. श्री गणेश प्रतिमा को फेंकें नहीं उन्हें पूरे आदर और सम्मान के साथ वस्त्र और समस्त सामग्री के साथ धीरे-धीरे बहाएं.
10. श्री गणेश इको फ्रेंडली हैं तो पुण्य अधिक मिलेगा क्योंकि वे पूरी तरह से पानी में गलकर विलीन हो जाएंगे. आधे अधूरे और टूट-फूट के साथ रूकेंगे नहीं.
11. अगर विसर्जन घर में ही कर रहे हैं तो गमले को सजाएं, पूजन करें. अंदर स्वास्तिक बनाएं और थोड़ी शुद्ध मिट्टी डालकर मंगल मंत्रोच्चार के साथ गणेश प्रतिमा को बैठाएं. अब गंगा जल डालकर उनका अभिषेक करें. फिर सादा स्वच्छ शुद्ध जल लेकर गमले को पूरा भर दें.
12. श्री गणेश प्रतिमा गलने लगेगी तब उनमें फूलों के बीज डाल दें.
13. ध्यान रखें कि प्रसाद गमले में न रखें.
13. श्री गणेश को भावविह्वल होकर प्रणाम करें. गमला घर की किसी स्वच्छ जगह पर रखें.

विसर्जन मंत्र
विसर्जन स्थान पर मौजूद परिवार के सदस्य और अन्य लोग हाथ में फूल और अक्षत लें. फिर यह विसर्जन मन्त्र बोलकर गणेश जी को चढ़ाएं और प्रणाम करें.
ॐ गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ, स्वस्थाने परमेश्वर
यत्र ब्रह्मादयो देवाः, तत्र गच्छ हुताशन ..
ॐ श्री गणेशाय नमः, ॐ श्री गणेशाय नमः, ॐ श्री गणेशाय नमः.
.
जल में विसर्जन का महत्व
जल को पंच तत्वों में से एक माना गया है. इसमें घुलकर प्राण प्रतिष्ठित गणेश मूर्ति पंच तत्वों में सामहित होकर अपने मूल स्वरूप में मिल जाती है. जल में विसर्जन होने से भगवान गणेश का साकार रूप निराकार हो जाता है. जल में मूर्ति विसर्जन से यह माना जाता है कि जल में घुलकर परमात्मा अपने मूल स्वरूप से मिल गए. यह परमात्मा के एकाकार होने का प्रतीक भी है. सभी देवी-देवताओं का विसर्जन जल में ही होता है. भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है संसार में जितनी मूर्तियों में देवी-देवता और प्राणी शामिल हैं, उन सभी में मैं ही हूं और अंत में सभी को मुझमें ही मिलना है.

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गणेश चतुर्थी 2021, गणेश चतुर्थी क्यों मनाते हैं?
हिंदू धर्म में गणेश चतुर्थी का विशेष महत्व है. भाद्रपस मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाते हैं. इस साल 2021 में गणेश चतुर्थी का पर्व 10 सितंबर से शुरू हो रहा है. इस दिन भगवान गणेश विराजेंगे और 19 सितंबर यानी अनंत चतुर्दशी के दिन उन्हें विदा किया जाएगा. पौराणिक मान्यता है कि भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी की तिथि पर कैलाश पर्वत से माता पार्वती के साथ गणेश जी का आगमन हुआ था. इसी कारण इस दिन को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है. स्कंद पुराण, नारद पुराण और ब्रह्म वैवर्त पुराण में गणेश जी का वर्णन मिलता है. भगवान गणेश बुद्धि के दाता है. इसके साथ ही उन्हें विघ्नहर्ता भी कहा गया है, जिसका अर्थ होता है. संकटों को हरने यानि दूर करने वाला. इस पर्व को विनायक चतुर्थी और विनायक चविटी के नाम से भी जाना जाता है. आइए जानते हैं कैसे मनाएं गणेश चतुर्थी, गणेश चतुर्थी 2021 पूजन का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा (Ganesh Chaturthi Vrat Katha) आरती के बारें में-

गणेश चतुर्थी 2021 कब है?
पंचांग के अनुसार गणेश चतुर्थी का पर्व 10 सितंबर 2021, शुक्रवार को भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाएगा. इस दिन चित्रा नक्षत्र रहेगा और ब्रह्म योग रहेगा. पंचांग के अनुसार 19 सितंबर 2021, रविवार को भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी की तिथि को गणेश महोत्सव का समापन होगा.
गणेश चतुर्थी 2021 पूजन का शुभ मुहूर्त-
इस बार गणपति पूजन का शुभ मुहूर्त दिन में 12 बजकर 17 मिनट पर अभिजीत मुहूर्त में शुरू होगा और रात 10 बजे तक पूजन का शुभ समय रहेगा.
गणेश चतुर्थी 2021
गणेश चतुर्थी- 10 सितंबर, 2021
मध्याह्न गणेश पूजा मुहूर्त- प्रातः 11:03 से दोपहर 01:32 बजे तक
चतुर्थी तिथि शुरू- 10 सितंबर 2021, को दोपहर 12:18 बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त- 10 सितंबर 2021, को रात 09:57 बजे
गणेश महोत्सव आरंभ- 10 सितंबर, 2021
गणेश महोत्सव समापन- 19 सितंबर, 2021
गणेश विसर्जन- 19 सितंबर 2021, रविवार

भद्रा का साया
इस वर्ष गणेश चतुर्थी के दिन भद्रा का साया भी लग रहा है. गणेश चतुर्थी के दिन 11 बजकर 09 मिनट से रात 10 बजकर 59 मिनट तक पाताल निवासिनी भद्रा रहेगी. शास्त्रों के अनुसार पाताल निवासिनी भद्रा का होना शुभ फलदायी होता है. इससे समय धरती पर भद्रा का अशुभ प्रभाव नहीं पड़ता है. दूसरी बात यह भी है कि गणपतिजी स्वयं सभी विघ्नों का नाश करने वाले विघ्नहर्ता हैं इसलिए गणेश चतुर्थी पर लगने वाले भद्रा से लाभ ही मिलेगा.
बन रहा रवियोग
वहीं गणेश चतुर्थी पर इस बार रवियोग में पूजन होगा. लंबे समय बाद इस बार चतुर्थी पर चित्रा-स्वाति नक्षत्र के साथ रवि योग का संयोग बन रहा है. चित्रा नक्षत्र शाम 4.59 बजे तक रहेगा और इसके बाद स्वाति नक्षत्र लगेगा. वहीं 9 सितंबर दोपहर 2 बजकर 30 मिनट से अगले दिन 10 सितंबर 12 बजकर 57 मिनट तक रवियोग रहेगा, जो कि उन्नति को दर्शा रहा है. इस शुभ योग में कोई भी नया काम और गणपति पूजा मंगलकारी होगी.
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गणेश चतुर्थी के दिन किस रंग के वस्त्र पहनें
भगवान गणेश की कृपा से सुख-शांति और सौभाग्य की प्राप्ति होती है. मान्यता है कि गणेश चतुर्थी के दिन व्यक्ति को काले और नीले रंग के वस्त्र धारण नहीं पहनने चाहिए. इस दिन लाल या पीले रंग के वस्त्र पहनना शुभ होता है.

गणेश चतुर्थी पूजा विधि, Ganesh Chaturthi Puja Vidhi
गणेश चतुर्थी के दिन प्रातरू काल स्नान-ध्यान करके गणपति के व्रत का संकल्प लें. इसके बाद दोपहर के समय गणपति की मूर्ति या फिर उनका चित्र लाल कपड़े के ऊपर रखें. फिर गंगाजल छिड़कने के बाद भगवान गणेश का आह्वान करें. भगवान गणेश को पुष्प, सिंदूर, जनेऊ और दूर्वा (घास) चढ़ाए. इसके बाद गणपति को मोदक लड्डू चढ़ाएं, मंत्रोच्चार से उनका पूजन करें. गणेश जी की कथा पढ़ें या सुनें, गणेश चालीसा का पाठ करें और अंत में आरती करें.
गणेश मंत्र
– ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो बुदि्ध प्रचोदयात..
– ॐ नमो गणपतये कुबेर येकद्रिको फट् स्वाहा..
– ॐ ग्लौम गौरी पुत्र, वक्रतुंड, गणपति गुरू गणेश..ग्लौम गणपति, ऋदि्ध पति, सिदि्ध पति. मेरे कर दूर क्लेश..
– ॐ श्रीं गं सौभ्याय गणपतये वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा..
भगवान गणेश को लगाएं भोग-
गणेश जी को पूजन करते समय दूब, घास, गन्ना और बूंदी के लड्डू अर्पित करने चाहिए. मान्यता है कि ऐसा करने से भगवान गणेश प्रसन्न होते हैं और अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं. कहते हैं कि गणपति जी को तुलसी के पत्ते नहीं चढ़ाने चाहिए. मान्यता है कि तुलसी ने भगवान गणेश को लम्बोदर और गजमुख कहकर शादी का प्रस्ताव दिया था, इससे नाराज होकर गणपति ने उन्हें श्राप दे दिया था.
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गणेश चतुर्थी के दिन न करें चंद्रमा के दर्शन-
मान्यता है कि गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन नहीं करने चाहिए. अगर भूलवश चंद्रमा के दर्शन कर भी लें, तो जमीन से एक पत्थर का टुकड़ा उठाकर पीछे की ओर फेंक दें और इस मंत्र का 28, 54 या 108 बार जाप करने लेना चाहिए.
चन्द्र दर्शन दोष निवारण मन्त्र:
सिंहःप्रसेनमवधीत् , सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव, ह्येष स्यमन्तकः।।

गणेश चतुर्थी कैसे मनाते हैं
गणेश चतुर्थी का त्यौहार मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है. इस दिन श्रद्धालु शुभ मुहूर्त में अपने-अपने घरों में गणपति प्रतिमा को स्थापित किया जाता है. इस दिन घर की साफ-सफाई पहले ही कर ली जाती है. घर पर गणपति स्थापित (Ganpati Sthapna) करने के बाद उनकी विधि पूर्वक पूजा की जाती है. गणेश चतुर्थी के दिन व्रत रखने की भी मान्यता है. कहते हैं इस दिन रखे गए व्रत से गणपित जी प्रसन्न होकर आपके सारे दुख हर लेते हैं और विघ्न दूर कर घर में सुख-समृद्धि देते हैं. इस दिन व्रत कथा के श्रवण से ही लाभ मिलता है. कुछ लोग इस त्योहार को सिर्फ दो दिन के लिए मनाते हैं तो कुछ लोग पूरे 10 दिन के लिए घर में गणपति पूजन का आयोजन करते हैं और अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति बप्पा को बड़ी धूम-धाम से विदाई देकर विसर्जन करते हैं और कामना करते हैं कि सब कुछ मंगलमय हो और अगले वर्ष फिर से हम आपकी पूजा कर पाएं.
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गणेश चतुर्थी का महत्‍व
पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र गणेश का जन्‍म जिस दिन हुआ था, उस दिन भाद्र मास के शुक्‍ल पक्ष की चतुर्थी थी. इसलिए इस दिन को गणेश चतुर्थी और विनायक चतुर्थी नाम दिया गया. उनके पूजन से घर में सुख समृद्धि और वृद्धि आती है. शिवपुराण में भाद्रमास के कृष्‍णपक्ष की चतुर्थी को गणेश का जन्‍मदिन बताया गया है. जबकि जबकि गणेशपुराण के मत से यह गणेशावतार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुआ था.

गणेश जी की मूर्ति घर में कहां स्थापित करें
गणेश जी की मूर्ति घर के उत्तरी पूर्वी कोने में रखना सबसे शुभ माना जाता है. ये दिशा पूजा-पाठ के लिए सबसे उत्तम मानी जाती है. इसके अलावा आप गणेश जी की प्रतिमा को घर के पूर्व या फिर पश्चिम दिशा में भी रख सकते हैं.
1. गणेश जी की प्रतिमा रखने समय इस बात का ध्यान रखें कि भगवान के दोनों पैर जमीन को स्पर्श कर रहे हों. मान्यता है इससे सफलता मिलने के आसार रहते हैं. गणेश जी की प्रतिमा को दक्षिण दिशा में न रखें.
2. घर में बैठे हुए गणेश जी की प्रतिमा रखना उत्तम माना जाता है. मान्यता है इससे घर में सुख-समृद्धि आती है. घर में गणेश जी की ऐसी ही प्रतिमा लगाएं जिसमें उनकी सूंड बायीं तरफ झुकी हुई हो और पूजा घर में सिर्फ एक ही गणेश जी की प्रतिमा होनी चाहिए.
3. घर में गाय के गोबर से बनी गणेश जी की प्रतिमा रखना काफी शुभ माना जाता है. इसके अलावा घर में क्रिस्टल के गणेश जी रखने से वास्तु दोष खत्म हो जाता है. हल्दी से बने गणेश रखने से भाग्य चमकता है.
4. ध्यान रखें कि जब भी गणेश जी मूर्ति लें तो उसमें उनका वाहन चूहा और मोदक लड्डू जरूर बना हो. क्योंकि इसके बिना गणेश जी की प्रतिमा अधूरी मानी जाती है.
5. अगर आपके घर के आस-पास पीपल, आम या नीम का पेड़ हो तो गणेश जी प्रतिमा आप वहां भी स्थापित कर सकते हैं. मान्यता है इससे घर में सकारात्मकता आती है.
6. कभी भी गणेश जी की प्रतिमा ऐसी जगह न रखें जहां अंधकार रहता हो या उसके आस-पास गंदगी रहती हो. सीढ़ियों के नीचे भी गणेश जी की प्रतिमा नहीं रखनी चाहिए.

गणेश चतुर्थी व्रत कथा, Ganesh Chaturthi Vrat Katha
धार्मिक दृष्टि से कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से एक पौराणिक कथा ये भी है. पुराणों के अनुसार एक बार सभी देवता संकट में घिर गए और उसके निवारण के लिए वे भगवान शिव के पास पहुंचे. उस समय भगवान शिव और माता पार्वती अपने दोनों पुत्र कार्तिकेय और गणेश के साथ मौजूद थे. देवताओं की समस्या सुनकर भगवान शिव ने दोनों पुत्र से प्रश्न किया कि देवताओं की समस्याओं का निवारण तुम में से कौन कर सकता है. ऐसे में दोनों ने एक ही स्वर में खुद को इसके योग्य बताया.
दोनों के मुख से एक साथ हां सुनकर भगवान शिव भी असमंजस में पड़ गए कि किसे ये कार्य सौंपा जाए. और इसे सुलाझाने के लिए उन्होंने कहा कि तुम दोनों में से सबसे पहले जो इस पूरी पृथ्वी का चक्कर लगा कर आएगा, वही देवताओं की मदद करने जाएगा. शिव की बात सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठ कर पृथ्वी का चक्कर लगाने के लिए निकल गए. लेकिन गणेश सोचने लगे कि मोषक पर बैठकर वह कैसे जल्दी पृथ्वी की परिक्रमा कर पाएंगे. बहुत सोच-विचार के बाद उन्हें एक उपाय सूझा. गणेश अपने स्थान से उठे और अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती की सात बार परिक्रमा करके बैठ गए और कार्तिकेय के आने का इंतजार करने लगे.
गणेश को ऐसा करता देख सब अचंभित थे कि आखिर वो ऐसा करके आराम से क्यों बैठ गए हैं. भगवान शिव ने गणेश से परिक्रमा न करने का कारण पूछा, तो उन्होंने कहा कि माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक है. उनके इस जवाब से सभी दंग रह गए. गणेश का ऐसा उत्तर पाकर भगवान शिव भी प्रसन्न हो गए और उन्हें देवता की मदद करने का कार्य सौंपा. साथ ही कहा, कि हर चतुर्थी के दिन जो तुम्हारी पूजन और उपासना करेगा उसके सभी कष्टों का निवारण होगा. इस व्रत को करने वाले के जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होगा. कहते हैं कि गणेश चतुर्थी के दिन व्रत कथा पढ़ने और सुनने से सभी कष्टों का नाश होता है, और जीवन भर किसी कष्ट का सामना नहीं करना पड़ता.

पूजा के वक्त कीजिए ये आरती
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ॥
एक दंत दयावंत, चार भुजाधारी
माथे पे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ॥
अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया .
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ॥
हार चढ़ै, फूल चढ़ै और चढ़ै मेवा .
लड्डुअन को भोग लगे, संत करे सेवा ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ॥
दीनन की लाज राखो, शंभु सुतवारी .
कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ॥

गणेश चतुर्थी व्रत उद्यापन विधि, Ganesh Chaturthi Vrat Udyapn Vidhi
1. गणेश चतुर्थी के दिन सुबह प्रात: काल जल्दी उठकर स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण करें.
2. इसके बाद एक चौकी पर गणेश की जी की स्थापना करें और साथ ही कलश की भी स्थापना करें .
3. कलश को स्थापित करने के बाद सफेद तिल और गुड़ का तिलकूट बनाएं.इसके बाद उस कलश पर स्वास्तिक बनाएं और उसके ऊपर तिलकूट में एक सिक्का रखकर स्थापित करें.
4.इसके बाद उस कलश पर रोली से 13 बिंदी लगाएं और भगवान गणेश की विधिवत पूजा करें.
5. उन्हें दूर्वा चढ़ाएं, रोली से उनका तिलक करें, उन्हें फल और फूल आदि भी अर्पित करें.
6. इसके बाद गणेश चतुर्थी की कथा पढ़ें या सुनें और भगवान गणेश की धूप व दीप से आरती करें.
7. भगवान गणेश की आरती करने के बाद आप उन्हें मोदक और लड्डूओं का भोग लगाएं.
8. इसके बाद पूरा दिन व्रत रखें और शाम के समय अपने व्रत का पारण करें.
9. अपने व्रत का पारण तिलकूट से ही करें और कलश पर स्थापित तिलकूट को किसी पंडित को पैसों सहित दान में दे दें.
10. इसके बाद रात्रि जागरण अवश्य करें. क्योंकि ऐसा करने से आपको अपने सभी व्रतों का पूर्णफल प्राप्त होगा.

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हरतालिका तीज कब है 2021
हिंदू धर्म में भाद्रपद मास में कई व्रत-त्योहार आते हैं. जिनमें से एक हरतालिका तीज भी है. हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज व्रत रखा जाता है. इस साल यह व्रत 9 सितंबर गुरुवार को रखा जाएगा. मान्यता है कि इस व्रत को महिलाएं अखंड सौभाग्य और सुखी दांपत्य जीवन के लिए रखती हैं. इस व्रत को सभी व्रतों में सबसे कठिन माना जाता है क्योंकि यह व्रत निर्जला रखा जाता है. इस व्रत में महिलाएं माता गौरी से सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद मांगती हैं. कुंवारी कन्याएं हरतालिका तीज व्रत को सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए रखती हैं. हरतालिका तीज व्रत के लिए मायके से महिलाओं के श्रृंगार का समान, मिठाई, फल और कपड़े भेजे जाते हैं. जानिए हरतालिका तीज व्रत तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि, कथा, महत्व, व्रत पारण विधि और हरतालिका तीज व्रत अद्यापन विधि के बारे में-

हरतालिका तीज व्रत तिथि
पंचांग के अनुसार, भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 8 सितंबर दिन बुधवार को तड़के 3 बजकर 59 पर लगेगी. जो कि अगले दिन यानी 9 सितंबर गुरुवार की रात्रि 2 बजकर 14 मिनट तक रहेगी. उसके बाद चतुर्थी तिथि लग जाएगी. ऐसे में यह व्रत उदया तिथि में 09 सितंबर को रखा जाएगा.
हरतालिका तीज पूजा मुहूर्त
तृतीया तिथि प्रारंभ – 8 सितंबर दिन बुधवार को तड़के 3 बजकर 59 से
तृतीया तिथि समाप्त – 9 सितंबर गुरुवार की रात्रि 2 बजकर 14 मिनट तक
प्रातःकाल पूजा का मुहूर्त – सुबह 06 बजकर 03 मिनट से सुबह 08 बजकर 33 मिनट तक हरतालिका तीज की पूजा का शुभ मुहूर्त है. पूजा के लिए आपको कुल समय 02 घंटे30 मिनट का समय मिलेगा.
प्रदोष काल पूजा मुहूर्त – 9 सितंबर गुरुवार को शाम को 06 बजकर 33 मिनट से रात 08 बजकर 51 मिनट तक तक पूजा का शुभ मुहूर्त है.
हरतालिका तीज पर सबसे शुभ रवियोग – पंचांग की गणना के अनुसार, इस साल हरतालिका तीज पर सबसे शुभ रवियोग चित्रा नक्षत्र के कारण बन रहा है. यह योग 9 सितंबर दोपहर 2 बजे से 2 बजकर 30 मिनट से अगले दिन 10 सितंबर 12 बजकर 57 मिनट तक रहेगा.

हरतालिका तीज 2021 पूजन सामग्री, Hartalika Teej 2021 Puja Samagri
1. भगवान शिव और पार्वती की मूर्तियों को रखने के लिए धातु की थाली,
2. एक चौकी,
3. चौकी को ढकने के लिए साफ कपड़ा (पीला/नारंगी या लाल),
4. भगवान शिव और पार्वती की मूर्ति बनाने के लिए प्राकृतिक मिट्टी या रेत,
5. एक पूरा नारियल,
6. जल के साथ एक कलश,
7. कलश के लिए आम या पान के पत्ते,
8. घी,
9. दीपक,
10. अगरबत्ती और धूप,
11. दीया जलाने के लिए तेल,
12. कपास की बत्ती,
13. कपूर,
14. सुपारी 2 टुकड़े,
15. केला,
16. दक्षिणा,
17. लाल गुड़हल के फूल,
18. गणेशजी के लिए दूर्वा घास,
19. भगवान शिव के लिए विल्वा या बेल के पत्ते, केले का पत्ता, धतूरा फल और फूल, सफेद मुकुट फूल, शमी पत्ते, चंदन, जनेउ, फल,
20. माता पार्वती के लिए मेहंदी, काजल, सिंदूर, बिंदी, कुमकुम, चूड़ियां, बिछिया, कंघी, आभूषण, कपड़े और अन्य सामान,
21. पंचामृत के लिए घी, दही, चीनी, दूध, मधु.

हरितालिका तीज 2021 पूजा विधि, Hartalika Teej 2021 Puja Vidhi
1. सुबह जल्दी उठें और स्नानादि कर स्वच्छ वस्त्र पहनें.
2. अब बालू रेत से भगवान गणेश, शिव जी और माता पार्वती की प्रतिमा बनाएं.
3. एक चौकी पर अक्षत (चावल) से अष्टदल कमल की आकृति बनाएं.
4. एक कलश में जल भरकर उसमें सुपारी, अक्षत, सिक्के डालें.
5. उस कलश की स्थापना अष्टदल कमल की आकृति पर करें.
6. कलश के ऊपर आम के पत्ते लगाकर नारियल रखें.
7. चौकी पर पान के पत्तों पर चावल रखें.
8. माता पार्वती, गणेश जी, और भगवान शिव को तिलक लगाएं.
9. घी का दीपक, धूप जलाएं.
10. उसके बाद भगवान शिव को उनके प्रिय बेलपत्र धतूरा भांग शमी के पत्ते आदि अर्पित करें.
11. माता पार्वती को फूल माला चढ़ाएं गणेश जी को दूर्वा अर्पित करें.
12. भगवान गणेश, माता पार्वती को पीले चावल और शिव जी को सफेद चावल अर्पित करें
13. पार्वती जी को शृंगार का सामान भी अवश्य अर्पित करें.
14. भगवान शिव औऱ गणेश जी को जनेऊ अर्पित करें. और देवताओं को कलावा (मौली) चढ़ाएं.
15. तीनों देवताओं को वस्त्र अर्पित करने के बाद हरितालिका तीज व्रत कथा सुनें या पढ़ें.
16. इसके बाद श्रीगणेश की आरती करें और भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करें.
17. पूरी पूजा विधिवत् कर लेने के बाद अंत में मिष्ठान आदि का भोग लगाएं.

कैसे रखा जाता है हरतालिका तीज का व्रत
हरतालिका व्रत काफी कठिन व्रत माना जाता है. इस दिन महिलाएं सारा दिन बिना कुछ भी ग्रहण किये हुए निर्जला व्रत रखती है. इस दिन व्रत करने वाली स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ही उठ जाती हैं और नहा धोकर नए वस्त्र पहनती हैं व पूरा सोलह श्रृंगार करती हैं. पूजन के लिए केले के पत्तों से मंडप बनाकर गौरी−शंकर की प्रतिमा स्थापित की जाती है. माता पार्वती, गणेश जी, और भगवान शिव की विधिवत् पूजा करती हैं. इसके साथ पार्वती जी को सुहाग का सारा सामान चढ़ाया जाता है. इस व्रत में आठों पहर पूजन करने का विधान है. रात में भजन, कीर्तन करते हुए जागरण कर तीन बार आरती की जाती है और शिव पार्वती विवाह की कथा सुनी जाती है. अगले दिन पूजा करने के बाद व्रत का पारण किया जाता है. अगले दिन सुबह पूजा के बाद किसी सुहागिन स्त्री को श्रृंगार का सामान, वस्त्र, खाने की चीजें, फल, मिठाई आदि का दान करना शुभ माना जाता है.
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हरतालिका तीज व्रत पारण विधि
हरतालिका तीज के दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती है, इस व्रत में दिन भर अन्न और जल ग्रहण नहीं किया जाता है. हरतालिका तीज के व्रत में रात्रि जागरण का विशेष महत्व है. इस व्रत में आठों पहर पूजन करने का विधान है, रात्रि के समय शिव-पार्वती के मंत्रों का जाप या भजन करना चाहिए. व्रत का पारण महिलाएं अगले दिन सुबह माता पार्वती की पूजा कर तथा माता को भोग लगाने के बाद जल पीकर करती हैं.

हरतालिका तीज व्रत का महत्व
हरतालिका तीज के दिन माता पार्वती और भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा की जाती है. हरतालिका तीज व्रत करने से पति को लंबी आयु प्राप्त होती है. मान्यता है कि इस व्रत को करने से कुंवारी कन्याओं को सुयोग्य वर की भी प्राप्ति होती है. संतान सुख भी इस व्रत के प्रभाव से मिलता है.माना जाता है कि हरतालिका तीज के दिन भगवान शिव और माता पार्वती का पुनर्मिलन हुआ था. माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था. इस तप को देखकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और माता पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया. तभी से मनचाहे पति की इच्छा और लंबी आयु के लिए हरतालिका तीज का व्रत रखा जाता है. इस व्रत पर सुहागिन स्त्रियां नए वस्त्र पहनकर, मेंहदी लगाकर, सोलह श्रृंगार कर भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा करती हैं.
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हरतालिका तीज की कथा
कथा इस प्रकार है कि पिता के यज्ञ में अपने पति शिव का अपमान देवी सती सह न सकीं. उन्‍होंने खुद को यज्ञ की अग्नि में भस्‍म कर दिया. अगले जन्‍म में उन्‍होंने राजा हिमाचल के यहां जन्‍म लिया और पूर्व जन्‍म की स्‍मृति शेष रहने के कारण इस जन्‍म में भी उन्‍होंने भगवान शंकर को ही पति के रूप में प्राप्‍त करने के लिए तपस्‍या की. देवी पार्वती ने तो मन ही मन भगवान शिव को अपना पति मान लिया था और वह सदैव भगवान शिव की तपस्‍या में लीन रहतीं. पुत्री की यह हालत देखकर राजा हिमाचल को चिंता होने लगी. इस संबंध में उन्‍होंने नारदजी से चर्चा की तो उनके कहने पर उन्‍होंने अपनी पुत्री उमा का विवाह भगवान विष्‍णु से कराने का निश्‍चय किया. पार्वतीजी विष्‍णुजी से विवाह नहीं करना चाहती थीं. पार्वतीजी के मन की बात जानकर उनकी सखियां उन्‍हें लेकर घने जंगल में चली गईं. इस तरह सखियों द्वारा उनका हरण कर लेने की वजह से इस व्रत का नाम हरतालिका व्रत पड़ा. पार्वतीजी तब तक शिवजी की तपस्‍या करती रहीं जब तक उन्‍हें भगवान शिव पति के रूप में प्राप्‍त नहीं हुए. तभी से पार्वतीजी के प्रति सच्‍ची श्रृद्धा के साथ यह व्रत किया जाता है.

हरतालिका व्रत उद्यापन विधि
शास्त्रों की मान्यता के अनुसार कम से कम 13 सालों तक हरितालिका तीज का व्रत रखने बाद ही इसका उद्यापन करना चाहिए. यदि आप इस व्रत को छोड़ना चाहती हैं तो इसे किसी और को सौंप सकती हैं या विधिवत पूजा कर इसका उद्यापन कर सकती हैं. इस व्रत का उद्यापन हरतालिका तीज के दिन ही करना होता है. व्रत का उद्यापन किसी योग्य पंडित के द्वारा करवाया जा सकता है. अगर खुद से इस व्रत का उद्यापन करना चाहती हैं तो इसके लिए कुछ आवश्यक सामग्री की आवश्यकता होगी. व्रत उद्यापन के लिए पूजन सामग्री में पांच सफेद कपड़े, सुहाग की सामग्री, फल, फूल, मिठाई, पंचामृत, जूते, सोने या चांदी की कोई वस्तु, अक्षत (अरवा चावल), पान सुपारी, गुलाल आदि. पूजा करने के बाद इन सामग्रियों को किसी ब्राह्मण दंपत्ति को दान कर दें और उन्हें भोजन कराएं. इस तरह से आप हरतालिका व्रत का उद्यापन कर सकती हैं.

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