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बेगू हिंदी कहानी, सआदत हसन मंटो की कहानी बेगू
तसल्लियां और दिलासे बेकार हैं। लोहे और सोने के ये मुरक्कब में छटांकों फांक चुका हूँ। कौन सी दवा है जो मेरे हलक़ से नहीं उतारी गई। मैं आपके अख़लाक़ का ममनून हूँ मगर डाक्टर साहब मेरी मौत यक़ीनी है। आप कैसे कह रहे हैं कि मैं दिक़ का मरीज़ नहीं। क्या मैं हर रोज़ ख़ून नहीं थूकता?

आप यही कहेंगे कि मेरे गले और दाँतों की ख़राबी का नतीजा है मगर मैं सब कुछ जानता हूँ। मेरे दोनों फेफड़े ख़ाना-ए-ज़ंबूर की तरह मुशब्बक हो चुके हैं। आपके इंजेक्शन मुझे दुबारा ज़िंदगी नहीं बख़्श सकते। देखिए, मैं इस वक़्त आपसे बातें कर रहा हूँ। मगर सीने पर एक वज़नी इंजन दौड़ता हुआ महसूस कर रहा हूँ। मालूम होता है कि मैं एक तारीक गढ़े में उतर रहा हूँ… क़ब्र भी तो एक तारीक गढ़ा है।

आप मेरी तरफ़ इस तरह न देखिए डाक्टर साहब, मुझे इस चीज़ का कामिल एहसास है कि आप अपने हस्पताल में किसी मरीज़ का मरना पसंद नहीं करते मगर जो चीज़ अटल है वो होके रहेगी। आप ऐसा कीजिए कि मुझे यहां से रुख़सत कर दीजिए। मेरी टांगों में तीन-चार मील चलने की क़ुव्वत अभी बाक़ी है। किसी क़रीब के गांव में चला जाऊंगा और… मगर मैं तो रो रहा हूँ। नहीं नहीं। डाक्टर साहब यक़ीन कीजिए। मैं मौत से ख़ाइफ़ नहीं। ये मेरे जज़्बात हैं, जो आँसूओं की शक्ल में बाहर निकल रहे हैं।

आह! आप क्या जानें। इस मदक़ूक़ के सीने से क्या कुछ बाहर निकलने को मचल रहा है। मैं अपने अंजाम से बाख़बर हूँ। आज से पाँच बरस पहले भी मैं इस वहशतनाक अंजाम से बाख़बर था। जानता था और अच्छी तरह जानता था कि कुछ अर्सा के बाद मेरी ज़िंदगी की दौड़ ख़त्म हो जाएगी।

मैंने उस गेंद को जिसे आप ज़िंदगी के नाम से पुकारते हैं, ख़ुद अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार कर काटा है। इसमें किसी का कोई क़ुसूर नहीं। वाक़िया ये है कि मैं इस खेल में लज़्ज़त महसूस कर रहा हूँ। लज़्ज़त… हाँ लज़्ज़त… मैंने अपनी ज़िंदगी की कई रातें हुस्न-फ़रोश औरतों के तारीक अड्डों पर गुज़ारी हैं। शराब के नशे में चूर मैंने किस बेदर्दी से ख़ुद को इस हालत में पहुंचाया।

मुझे याद है, उन ही अड्डों की स्याह पेशा औरत… क्या नाम था उसका? हाँ गुलज़ार, मुझे इस बुरी तरह अपनी जवानी को कीचड़ में लत-पत करते देख कर मुझसे हमदर्दी करने लग गई थी। बेवक़ूफ़ औरत, उसको क्या बताता कि मैं इस कीचड़ में किस का अक्स देखने की कोशिश कर रहा था। मुझे गुलज़ार और उसकी दीगर हमपेशा औरतों से नफ़रत थी और अब भी है लेकिन क्या आप मरीज़ों को ज़हर नहीं खिलाते अगर उससे अच्छे नताइज की उम्मीद हो।

मेरे दर्द की दवा ही तारीक ज़िंदगी थी। मैंने बड़ी कोशिश और मुसीबतों के बाद इस अंजाम को बुलाया है जिस की कुछ रुएदाद आपने मेरे सिरहाने एक तख़्ती पर लिख कर लटका रखी है। मैंने उसके इंतिज़ार में एक एक घड़ी किस बेताबी से काटी है, आह! कुछ न पूछिए! लेकिन अब मुझे दिली तस्कीन हासिल हो चुकी है। मेरी ज़िंदगी का मक़सद पूरा हो गया। मैं दिक़ और सिल का मरीज़ हूँ। इस मर्ज़ ने मुझे खोखला कर दिया है… आप हक़ीक़त का इज़हार क्यों नहीं कर देते।

बख़ुदा इससे मुझे और तस्कीन हासिल होगी। मेरा आख़िरी सांस आराम से निकलेगा… हाँ डाक्टर साहब ये तो बताईए, क्या आख़िरी लम्हात वाक़ई तकलीफ़देह होते हैं? मैं चाहता हूँ मेरी जान आराम से निकले। आज मैं वाक़ई बच्चों की सी बातें कर रहा हूँ। आप अपने दिल में यक़ीनन मुस्कुराते होंगे कि मैं आज मा’मूल से बहुत ज़्यादा बातूनी हो गया हूँ… दीया जब बुझने के क़रीब होता है तो उसकी रोशनी तेज़ हो जाया करती है। क्या मैं झूट कह रहा हूँ?

आप तो बोलते ही नहीं और मैं हूँ कि बोले जा रहा हूँ। हाँ, हाँ, बैठिए। मेरा जी चाहता है, आज किसी से बातें किए जाऊं। आप न आते तो ख़ुदा मालूम मेरी क्या हालत होती। आपका सफ़ेद सूट आँखों को किस क़दर भला मालूम हो रहा है। कफ़न भी इसी तरह साफ़ सुथरा होता है फिर आप मेरी तरफ़ इस तरह क्यों देख रहे हैं। आपको क्या मालूम कि मैं मरने के लिए किस क़दर बेताब हूँ।

अगर मरने वालों को कफ़न ख़ुद पहनना हो तो आप देखते मैं उसको कितनी जल्दी अपने गिर्द लपेट लेता। मैं कुछ अर्सा और ज़िंदा रह कर क्या करूंगा? जब कि वो मर चुकी है। मेरा ज़िंदा रहना फ़ुज़ूल है। मैंने इस मौत को बहुत मुश्किलों के बाद अपनी तरफ़ आमादा किया है और अब मैं इस मौक़ा को हाथ से जाने नहीं दे सकता। वो मर चुकी है और अब मैं भी मर रहा हूँ। मैंने अपनी संगदिली… वो मुझे संगदिल के नाम से पुकारा करती थी, की क़ीमत अदा करदी है और ख़ुदा गवाह है कि उसका कोई भी सिक्का खोटा नहीं। मैं पाँच साल तक उनको परखता रहा हूँ, मेरी उम्र इस वक़्त पच्चीस बरस की है। आज से ठीक सात बरस पहले मेरी उससे मुलाक़ात हुई थी। आह, इन सात बरसों की रुएदाद कितनी हैरतअफ़ज़ा है अगर कोई शख़्स उसकी तफ़सील काग़ज़ों पर फैला दे तो इंसानी दिलों की दास्तानों में कैसा दिलचस्प इज़ाफ़ा हो। दुनिया एक ऐसे दिल की धड़कन से आश्ना होगी जिसने अपनी ग़लती की क़ीमत ख़ून की उन थूकों में अदा की है जिन्हें आप हर रोज़ जलाते रहते हैं कि उन के जरासीम दूसरों तक न पहुंचें।

आप मेरी बकवास सुनते सुनते क्या तंग तो नहीं आगए? ख़ुदा मालूम क्या क्या कुछ बकता रहा हूं। तकल्लुफ़ से काम न लीजिए, आप वाक़ई कुछ नहीं समझ सकते, मैं ख़ुद नहीं समझ सका। सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि बटोत से वापस आकर मेरे दिल-ओ-दिमाग़ का हर जोड़ हिल गया था। अब या’नी आज जब कि मेरे जुनून का दौरा ख़त्म हो चुका है और मौत को चंद क़दम के फ़ासले पर देख रहा हूँ। मुझे यूं महसूस होता कि वो वज़न जो मेरी छाती को दाबे हुए था हल्का हो गया है और मैं फिर ज़िंदा हो रहा हूँ।

मौत में ज़िंदगी… कैसी दिलचस्प चीज़ है! आज मेरे ज़ेहन से धुंद के तमाम बादल उठ गए हैं। मैं हर चीज़ को रोशनी में देख रहा हूँ। सात बरस पहले के तमाम वाक़ियात इस वक़्त मेरी नज़रों के सामने हैं। देखिए… मैं लाहौर से गर्मियां गुज़ारने के लिए कश्मीर की तैयारियां कर रहा हूँ। सूट सिलवाए जा रहे हैं। बूट डिब्बों में बंद किए जा रहे हैं। होल्डाल और ट्रंक कपड़ों से पुर किए जा रहे हैं। मैं रात की गाड़ी से जम्मू रवाना होता हूँ। शमीम मेरे साथ है। गाड़ी के डिब्बे में बैठ कर हम अ’र्सा तक बातें करते रहते हैं।

गाड़ी चलती है। शमीम चला जाता है। मैं सो जाता हूँ। दिमाग़ हर क़िस्म के फ़िक्र से आज़ाद है। सुबह जम्मू की स्टेशन पर जागता हूँ। कश्मीर की हसीन वादी की होने वाली सैर के ख़यालात में मगन लारी पर सवार होता हूँ। बटोत से एक मील के फ़ासले पर लारी का पहिया पंक्चर हो जाता है। शाम का वक़्त है इसलिए रात बटोत के होटल में काटनी पड़ती है। उस होटल का कमरा मुझे बेहद ग़लीज़ मालूम होता है मगर क्या मालूम था कि मुझे वहां पूरे दो महीने रहना पड़ेगा।

सुबह सवेरे उठता हूँ तो मालूम होता है कि लारी के इंजन का एक पुर्ज़ा भी ख़राब हो गया है। इस लिए मजबूरन एक दिन और बटोत में ठहरना पड़ेगा। ये सुन कर मेरी तबीयत किस क़दर अफ़सुर्दा हो गई थी! इस अफ़सुर्दगी को दूर करने के लिए मैं… मैं उस रोज़ शाम को सैर के लिए निकलता हूँ। चीड़ के दरख़्तों का तनफ़्फ़ुस, जंगली परिन्दों की नग़्मा सराइयाँ सेब के लदे हुए दरख़्तों का हुस्न और ग़ुरूब होते हुए सूरज का दिलकश समां, लारी वाले की बेएहतियाती और रंग में भंग डालने वाली तक़दीर की गुस्ताख़ी का रंज अफ़ज़ा ख़याल मह्व कर देता है।

मैं नेचर के मसर्रत अफ़ज़ा मनाज़िर से लुत्फ़अंदोज़ होता सड़क के एक मोड़ पर पहुंचता हूँ… दफ़अ’तन मेरी निगाहें उससे दो-चार होती हैं। बेगू मुझसे बीस क़दम के फ़ासले पर अपनी भैंस के साथ खड़ी है… जिस दास्तान का अंजाम इस वक़्त आपके पेश-ए-नज़र है, उसका आग़ाज़ यहीं से होता है।

वो जवान थी। उसकी जवानी पर बटोत की फ़िज़ा पूरी शिद्दत के साथ जल्वागर थी। सब्ज़ लिबास में मल्बूस वो सड़क के दरमियान मकई का एक दराज़ क़द बूटा मालूम हो रही थी चेहरे के ताँबे ऐसे ताबां रंग पर उसकी आँखों की चमक ने एक अ’जीब कैफ़ियत पैदा करदी थी जो चश्मे के पानी की तरफ़ साफ़ और शफ़्फ़ाफ़ थीं… मैं उसको कितना अ’र्सा देखता रहा, ये मुझे मालूम नहीं। लेकिन इतना याद है कि मैंने दफ़अ’तन अपना सीना मोसीक़ी से लबरेज़ पाया और फिर मैं मुस्कुरा दिया।

उसकी बहकी हुई निगाहों की तवज्जो भैंस से हट कर मेरे तबस्सुम से टकराई। मैं घबरा गया। उसने एक तेज़ तजस्सुस से मेरी तरफ़ देखा, जैसे वो किसी भूले हुए ख़्वाब को याद कर रही है। फिर उस ने अपनी छड़ी को दाँतों में दबा कर कुछ सोचा और मुस्कुरा दी। उसका सीना चश्मे के पानी की तरह धड़क रहा था। मेरा दिल भी मेरे पहलू में अंगड़ाइयां ले रहा था और ये पहली मुलाक़ात किस क़दर लज़ीज़ थी। उसका ज़ायक़ा अभी तक मेरे जिस्म की हर रग में मौजूद है।

वो चली गई… मैं उसको आँखों से ओझल होते देखता रहा। वो इस अंदाज़ से चल रही थी जैसे कुछ याद कर रही है। कुछ याद करती है मगर फिर भूल जाती है। उसने जाते हुए पाँच-छः मर्तबा मेरी तरफ़ मुड़ कर देखा लेकिन फ़ौरन सर फेर लिया। जब वो अपने घर में दाख़िल हो गई जो सड़क के नीचे मकई के छोटे से खेत के साथ बना हुआ था।

मैं अपनी तरफ़ मुतवज्जो हुआ, मैं उसकी मोहब्बत में गिरफ़्तार हो चुका था। इस एहसास ने मुझे सख़्त मुतहय्यर किया। मेरी उम्र उस वक़्त अठारह साल की थी। कॉलेज में अपने हमजमाअ’त तलबा की ज़बानी मैं मोहब्बत के मुतअ’ल्लिक़ बहुत कुछ सुन चुका था। इश्क़िया दास्तानें भी अक्सर मेरे ज़ेर मुताला रही थीं। मगर मोहब्बत के हक़ीक़ी मा’नी मेरी नज़रों से पोशीदा थे। उसके जाने के बाद जब मैंने एक नाक़ाबिल-ए-बयान तल्ख़ी अपने दिल की धड़कनों में हल होती हुई महसूस की तो मैंने ख़याल किया, शायद इसी का नाम मोहब्बत है… ये मोहब्बत ही थी… औरत से मोहब्बत करने का पहला मक़सद ये होता है कि वो मर्द की हो जाये या’नी वो उससे शादी करले और आराम से अपनी बक़ाया ज़िंदगी गुज़ार दे।

शादी के बाद ये मोहब्बत करवट बदलती है। फिर मर्द अपनी महबूबा के काँधों पर एक घर ता’मीर करता है। मैंने जब बेगू से अपने दिल को वाबस्ता होते महसूस किया तो फ़ितरी तौर पर मेरे दिल में उस रफीक़ा-ए-हयात का ख़याल पैदा हुआ जिसके मुतअ’ल्लिक़ मैं अपने कमरे की चार दीवारी में कई ख़्वाब देख चुका था। इस ख़याल के आते ही मेरे दिल से ये सदा उठी, “देखो सईद, ये लड़की ही तुम्हारे ख़्वाबों की परी है।” चुनांचे मैं तमाम वाक़ए’ पर ग़ौर करता हुआ होटल वापस आया और एक माह के लिए होटल का वो कमरा किराए पर उठा लिया जो मुझे बेहद ग़लीज़ महसूस हुआ था। मुझे अच्छी तरह याद है कि होटल का मालिक मेरे इस इरादे को सुन कर बहुत मुतहय्यर हुआ था।

इसलिए कि मैं सुबह उसकी ग़लाज़त पसंदी पर एक तवील लेक्चर दे चुका था। दास्तान कितनी तवील होती जा रही है। मगर मुझे मालूम है कि आप इसे ग़ौर से सुन रहे हैं… हाँ, हाँ आप सिगरेट सुलगा सकते हैं। मेरे गले में आज खांसी के आसार महसूस नहीं होते। आपकी डिबिया देख कर मेरे ज़ेहन में एक और वाक़िया की याद ताज़ा हो गई है।

बेगू भी सिगरेट पिया करती थी। मैंने कई बार उसे गोल्ड फ्लेक की डिबियां ला कर दी थीं। वो बड़े शौक़ से उनको मुँह में दबा कर धुएं के बादल उड़ाया करती थीं। धूवां! मैं उस नीले नीले धुएं को अब भी देख रहा हूँ जो उसके गीले होंटों पर रक़्स किया करता था… हाँ, तो दूसरे रोज़ मैं शाम को उसी वक़्त उधर सैर को गया, जहां मुझे वो सड़क पर मिली थी।

देर तक सड़क के एक किनारे पत्थरों की दीवार पर बैठा रहा मगर वो नज़र न आई… उठा और टहलता टहलता आगे निकल गया। सड़क के दाएं हाथ ढलवान थी, जिस पर चीड़ के दरख़्त उगे हुए थे। बाएं हाथ बड़े बड़े पत्थरों के कटे फटे सर उभर रहे थे। उन पर जमी हुई मिट्टी के ढेलों में घास उगी हुई थी। हवा ठंडी और तेज़ थी। चीड़ के तागा नुमा पत्तों की सरसराहट कानों को बहुत भली मालूम होती थी। जब मोड़ मुड़ा तो दफ़अ’तन मेरी निगाहें सामने उठीं। मुझसे सौ क़दम के फ़ासले पर वो अपनी भैंस को एक संगीन हौज़ से पानी पिला रही थी।

मैं क़रीब पहुंचा मगर उसको नज़र भर के देखने की जुर्रत न कर सका और आगे निकल गया और जब वापस मुड़ा तो वो घर जा चुकी थी। अब हर रोज़ उस तरफ़ सैर को जाना मेरा मा’मूल हो गया मगर बीस रोज़ तक मैं उससे मुलाक़ात न कर सका। मैंने कई बार बावली पर पानी पीते वक़्त उस से हमकलाम होने का इरादा किया, मगर ज़बान गुंग हो गई, कुछ बोल न सका।

क़रीबन हर रोज़ मैं उसको देखता, मगर रात को जब मैं तसव्वुर में उसकी शक्ल देखना चाहता तो एक धुंद सी छा जाती। ये अ’जीब बात है कि मैं उसकी शक्ल को इसके बावजूद कि उसे हर रोज़ देखता था भूल जाता था। बीस दिनों के बाद एक रोज़ चार बजे के क़रीब जब कि मैं एक बावली के ऊपर चीड़ के साये में लेटा था।

वो ख़ुर्द साल लड़के को लेकर ऊपर चढ़ी। उसको अपनी तरफ़ आता देख कर मैं सख़्त घबरा गया। दिल में यही आया कि वहां से भाग जाऊं लेकिन इसकी सकत भी न रही। वो मेरी तरफ़ देखे बग़ैर आगे निकल गई। चूँकि उसके क़दम तेज़ थे, इसलिए लड़का पीछे रह गया। मैं उठ कर बैठ गया। उसकी पीठ मेरी तरफ़ थी। दफ़अ’तन लड़के ने एक चीख़ मारी और चश्म-ए-ज़दन में चीड़ के ख़ुश्क पत्तों पर से फिसल कर नीचे आ रहा।

मैं फ़ौरन उठा और भाग कर उसे अपने बाज़ूओं में थाम लिया। चीख़ सुन कर वो मुड़ी और दौड़ने के लिए बढ़े हुए क़दम रोक कर आहिस्ता आहिस्ता मेरी तरफ़ आई। अपनी जवान आँखों से मुझे देखा और लड़के से ये कहा, “ख़ुदा जाने तुम क्यों गिर गिर पड़ते हो?”
मैंने गुफ़्तगु शुरू करने का एक मौक़ा पा कर उससे कहा, “बच्चा है इसकी उंगली पकड़ लीजिए। इन पत्तों ने ख़ुद मुझे कई बार औंधे मुँह गिरा दिया है।”
ये सुनकर वो खिलखिला कर हंस पड़ी, “आपके हैट ने तो ख़ूब लुढ़कनियां खाई होंगी।”
“आप हंसती क्यों हैं? किसी को गिरते देख कर आपकी तबीयत इतनी शाद क्यों होती है और जो किसी रोज़ आप गिर पड़ीं तो… वो घड़ा जो हर रोज़ शाम के वक़्त आप घर ले जाती है किस बुरी तरह ज़मीन पर गिर कर टुकड़े टुकड़े हो जाएगा।”

“मैं नहीं गिर सकती…” ये कहते हुए उसने दफ़अ’तन नीचे बावली की तरफ़ देखा। उसकी भैंस नाले पर बंधे हुए पुल की तरफ़ ख़रामां ख़रामां जा रही थी। ये देख कर उसने अपने हलक़ से एक अ’जीब क़िस्म की आवाज़ निकाली। उसकी गूंज अभी तक मेरे कानों में महफ़ूज़ है। किस क़दर जवान थी ये आवाज़। उसने बढ़ कर लड़के को कांधे पर उठा लिया और भैंस को “ए छल्लां, ए छल्लां” के नाम से पुकारती हुई चशम-ए-ज़दन में नीचे उतर गई।

भैंस को वापस मोड़ कर उसने मेरी तरफ़ देखा और घर को चल दी… उस मुलाक़ात के बाद उससे हमकलाम होने की झिझक दूर हो गई। हर रोज़ शाम के वक़्त बावली पर या चीड़ के दरख़्तों तले मैं उससे कोई न कोई बात शुरू कर देता। शुरू शुरू में हमारी गुफ़्तुगू का मौज़ू भैंस था।

फिर मैंने उससे उसका नाम दरयाफ़्त किया और उसने मेरा। इसके बाद गुफ़्तुगू का रुख़ असल मतलब की तरफ़ आ गया। एक रोज़ दोपहर के वक़्त जब वो नाले में एक बड़े से पत्थर पर बैठी अपने कपड़े धो रही थी, मैं उसके पास बैठ गया। मुझे किसी ख़ास बात का इज़हार करने पर तैयार देख कर उसने जंगली बिल्ली की तरह मेरी तरफ़ घूर कर देखा और ज़ोर ज़ोर से अपनी शलवार को पत्थर पर झटकते हुए कहा, “आप कश्मीर कब जा रहे हैं। यहां बटोत में क्या धरा है जो आप यहां ठहरे हुए हैं।”

ये सुन कर मैंने मुस्तफ़सिराना निगाहों से उसकी तरफ़ देखा। गोया मैं उसके सवाल का जवाब ख़ुद उसकी ज़बान से चाहता हूँ। उसने निगाहें नीची कर लीं और मुस्कुराते हुए कहा, “आप सैर करने के लिए आए हैं। मैंने सुना है कश्मीर में बहुत से बाग़ हैं। आप वहां क्यों नहीं चले जाते?”

मौक़ा अच्छा था, चुनांचे मैंने दिल के तमाम दरवाज़े खोल दिए। वो मेरे जज़्बात के बहते हुए धारे का शोर ख़ामोशी से सुनती रही। मेरी आवाज़ नाले के पानी की गुनगुनाहट में जो नन्हे नन्हे संगरेज़ों से खेलता हुआ बह रहा था डूब डूब कर उभर रही थी। हमारे सुरों के ऊपर अखरोट के घने दरख़्त में चिड़ियां चहचहा रही थीं। हवा इस क़दर तर-ओ-ताज़ा और लतीफ़ थी कि उसका हर झोंका बदन पर एक ख़ुशगवार कपकपी तारी कर देता था।

मैं उससे पूरा एक घंटा गुफ़्तुगू करता रहा। उससे साफ़ लफ़्ज़ों में कह दिया कि मैं तुमसे मोहब्बत करता हूँ और शादी का ख़्वाहिशमंद हूँ। ये सुन कर वह बिल्कुल मुतहय्यर न हुई लेकिन उसकी निगाहें जो दूर पहाड़ियों की स्याही और आसमान की नीलाहट को आपस में मिलता हुआ देख रही थीं इस बात की मज़हर थीं कि वो किसी गहरे ख़याल में मुस्तग़रक़ है। कुछ अ’र्सा ख़ामोश रहने के बाद उसने मेरे इसरार पर सिर्फ़ इतना जवाब दिया।

“अच्छा आप कश्मीर न जाएं।”
ये जवाब इख़्तिसार के बावजूद हौसला अफ़ज़ा था… इस मुलाक़ात के बाद हम दोनों बेतकल्लुफ़ हो गए। अब पहला सा हिजाब न रहा। हम घंटों एक दूसरे के साथ बातें करते रहते। एक रोज़ मैंने उस से निशानी के तौर पर कुछ मांगा तो उसने बड़े भोले अंदाज़ में अपने सर के क्लिप उतार कर मेरी हथेली पर रख दिए और मुस्कुरा कर कहा, “मेरे पास यही कुछ है।”

ये क्लिप मेरे पास अभी तक महफ़ूज़ हैं। ख़ैर कुछ दिनों की तूल तवील गुफ़्तगुओं के बाद मैंने उस की ज़बान से कहलवा लिया कि वो मुझसे शादी करने पर रज़ामंद है। मुझे अच्छी तरह याद है कि जब उस रोज़ शाम को उसने अपने घड़े को सर पर सँभालते हुए अपनी रजामंदी का इज़हार इन अलफ़ाज़ में किया था कि “हाँ मैं चाहती हूँ।” तो मेरी मसर्रत की कोई इंतेहा न रही थी।

मुझे ये भी याद है कि होटल को वापस आते हुए मैं कुछ गाया भी था। उस पुरमसर्रत शाम के चौथे रोज़ जब कि मैं आने वाली साअ’त-ए-सईद के ख़्वाब देख रहा था, यकायक उस मकान की तमाम दीवारें गिर पड़ीं जिनको मैंने बड़े प्यार से उस्तवार किया था। बिस्तर में पड़ा था कि सुबह स्यालकोट के एक साहब जो बग़रज़ तबदीली-ए-आब-ओ-हवा बटोत में क़्याम पज़ीर थे और एक हद तक बेगू से मेरी मोहब्बत को जानते थे, मेरी चारपाई पर बैठ गए और निहायत ही मुफ़क्किराना लहजा में कहने लगे,

“वज़ीर बेगम से आपकी मुलाक़ातों का ज़िक्र आज बटोत के हर बच्चे की ज़बान पर है। मैं वज़ीर बेगम के कैरेक्टर से एक हद तक वाक़िफ़ था। इसलिए कि स्यालकोट में इस लड़की के मुतअ’ल्लिक़ बहुत कुछ सुन चुका हूँ। मगर यहां बटोत में इसकी तसदीक़ हो गई है। एक हफ़्ता पहले यहां का क़साई इसके मुतअ’ल्लिक़ एक तवील हिकायत सुना रहा था। परसों पान वाला आपसे हमदर्दी का इज़हार कर रहा था कि आप इस्मत बाख़्ता लड़की के दाम में फंस गए हैं। कल शाम को एक और साहब कह रहे थे कि आप टूटी हुई हंडिया ख़रीद रहे हैं। मैंने ये भी सुना है कि बा’ज़ लोग उससे आपकी गुफ़्तगु पसंद नहीं करते। इसलिए कि जब से आप बटोत में आए हैं वो उनकी नज़रों से ओझल हो गई है। मैंने आपसे हक़ीक़त का इज़हार कर दिया है। अब आप बेहतर सोच सकते हैं।”

इस्मत बाख़्ता लड़की, टूटी हुई हंडिया, लोग उससे मेरी गुफ़्तुगू को पसंद नहीं करते, मुझे अपनी समाअ’त पर यक़ीन न आता था। बेगू और… इसका ख़याल ही नहीं किया जा सकता था। मगर जब दूसरे रोज़ मुझे होटल वाले ने निहायत ही राज़दाराना लहजे में चंद बातें कहीं तो मेरी आँखों के सामने तारीक धुन्द सी छा गई।

“बाबू जी, आप बटोत में सैर के लिए आए हैं मगर देखता हूँ कि आप यहां की एक हुस्न-फ़रोश लड़की की मोहब्बत में गिरफ़्तार हैं। उसका ख़याल अपने दिल से निकाल दीजिए। मेरा उस लड़की के घर आना-जाना है, मुझे ये भी मालूम हुआ है कि आपने उसको कुछ कपड़े भी ख़रीद दिए हैं। आपने यक़ीनन और भी कई रुपये ख़र्च किए होंगे, माफ़ कीजिए मगर ये सरासर हिमाक़त है। मैं आपसे ये बातें हरगिज़ न करता क्योंकि यहां बीसियों ऐ’शपसंद मुसाफ़िर आते हैं मगर आपका दिल उन स्याहियों से पाक नज़र आता है। आप बटोत से चले जाएं, इस क़ुमाश की लड़की से गुफ़्तुगू करना अपनी इ’ज़्ज़त ख़तरे में डालना है।”

ज़ाहिर है कि इन बातों ने मुझे बेहद अफ़सुरदा बना दिया था वो मुझसे सिगरेट, मिठाई और इसी क़िस्म की दूसरी मामूली चीज़ें तलब किया करती थी और मैं बड़े शौक़ और मोहब्बत से उसकी ये ख़्वाहिश पूरी किया करता था। उसमें एक ख़ास लुत्फ़ था। मगर अब होटल वाले की बात ने मेरे ज़ेहन में मुहीब ख़यालात का एक तलातुम बरपा कर दिया। गुज़श्ता मुलाक़ातों के जितने नुक़ूश मेरे दिल-ओ-दिमाग़ में महफ़ूज़ थे और जिन्हें मैं हर रोज़ बड़े प्यार से अपने तसव्वुर में ला कर एक ख़ास क़िस्म की मिठास महसूस किया करता था, दफ़अ’तन तारीक शक्ल इख़्तियार कर गए।

मुझे उसके नाम ही से उ’फ़ूनत आने लगी। मैंने अपने जज़्बात पर क़ाबू पाने की बहुत कोशिश की मगर बेसूद। मेरा दिल जो एक कॉलेज के तालिब-ए-इल्म के सीने में धड़कता था, अपने ख़्वाबों की ये बुरी और भयानक ता’बीर देख कर चिल्ला उठा। उसकी बातें जो कुछ अ’र्सा पहले बहुत भली मालूम होती थीं रियाकारी में डूबी हुई मालूम होने लगीं। मैंने गुज़श्ता वाक़ियात, बेगू की नक़्ल-ओ-हरकत, उस की जुंबिश और अपने गिर्द-ओ-पेश के माहौल को पेश-ए-नज़र रख कर अ’मीक़ मुताला’ किया तो तमाम चीज़ें रोशन हो गईं। उसका हर शाम को एक मरीज़ के हाँ दूध लेकर जाना और वहां एक अ’र्सा तक बैठी रहना, बावली पर हर कस-ओ-नाकस से बेबाकाना गुफ़्तुगू, दुपट्टे के बग़ैर एक पत्थर से दूसरे पर उछल कूद, अपनी हमउम्र लड़कियों से कहीं ज़्यादा शोख़ और आज़ाद रवी… “वो यक़ीनन इस्मत बाख़्ता लड़की है।” मैंने ये राय मुरत्तिब तो करली मगर आँसूओं से मेरी आँखें गीली हो गईं। ख़ूब रोया मगर दिल का बोझ हल्का न हुआ।

मैं चाहता था कि एक बार आख़िरी बार उससे मिलूं और उसके मुँह पर अपने तमाम ग़ुस्से को थूक दूँ। यही सूरत थी जिससे मुझे कुछ सुकून हासिल हो सकता था। चुनांचे में शाम को बावली की तरफ़ गया। वो पगडंडी पर अनार की झाड़ियों के पीछे बैठी मेरा इंतिज़ार कर रही थी। उसको देख कर मेरा दिल किसी क़दर कुढ़ा, मेरा हलक़ उस रोज़ की तल्ख़ी कभी फ़रामोश नहीं कर सकता। उसके क़रीब पहुंचा और पास ही एक पत्थर पर बैठ गया। छल्लां, उसकी भैंस और उसका बछड़ा चंद गज़ों के फ़ासले पर बैठे जुगाली कर रहे थे। मैंने गुफ़्तुगू का आग़ाज़ करना चाहा मगर कुछ न कह सका।

ग़ुस्से और अफ़सुर्दगी ने मेरी ज़बान पर क़ुफ़्ल लगा दिया, मुझे ख़ामोश देख कर उसकी आँखों की चमक मांद पड़ गई, जैसे चश्मे के पानी में किसी ने अपने मिट्टी भरे हाथ धो दिए हैं। फिर वो मुस्कुराई, ये मुस्कुराहट मुझे किसी क़दर मस्नूई और फीकी मालूम हुई। मैंने सर झुका लिया और संगरेज़ों से खेलना शुरू कर दिया था। शायद मेरा रंग ज़र्द पड़ गया था। उसने ग़ौर से मेरी तरफ़ देखा और कहा, “आप बीमार हैं?”

उसका ये कहना था कि मैं बरस पड़ा, “हाँ, बीमार हूँ, और ये बीमारी तुम्हारी दी हुई है, तुम्हीं ने ये रोग लगाया है बेगू! मैं तुम्हारे चाल चलन की सब कहानी सुन चुका हूँ और तुम्हारे सारे हालात से बाख़बर हूँ।”
मेरी चुभती हुई बातें सुन कर और बदले हुए तेवर देख कर वो भौंचक्का सी रह गई और कहने लगी, “अच्छा, तो मैं अच्छी लड़की नहीं हूँ। आपको मेरे चाल चलन के मुतअ’ल्लिक़ सब कुछ मालूम हो चुका है। मेरी समझ में नहीं आता कि ये आप कैसी बहकी बहकी बातें कर रहे हैं।”

मैं चिल्लाया, “गोया तुमको मालूम ही नहीं। ज़रा अपने गिरेबान में मुँह डाल कर देखो तो अपनी स्यहकारियों का सारा नक़्शा तुम्हारी आँखों तले घूम जाएगा।” मैं तैश में आ गया, “कितनी भोली बनती हो, जैसे कुछ जानती ही नहीं। परों पर पानी पड़ने ही नहीं देतीं। मैं क्या कह रहा हूँ भला तुम क्या समझो, जाओ जाओ बेगू, तुमने मुझे सख़्त दुख पहुंचाया है।” ये कहते कहते मेरी आँखों में आँसू डबडबा आए।

वो भी सख़्त मुज़्तरिब हो गई और जल कर बोल उठी,“ आख़िर मैं भी तो सुनूं कि आपने मेरे बारे में क्या क्या सुना है। पर आप तो रो रहे हैं।”
“हाँ। रो रहा हूँ। इसलिए कि तुम्हारे अफ़्आ’ल ही इतने स्याह हैं कि उनपर मातम किया जाये। तुम पाकबाज़ों की क़दर क्या जानो। अपना जिस्म बेचने वाली लड़की मोहब्बत क्या जाने। तुम…तुम सिर्फ़ इतना जानती हो कि कोई मर्द आए और तुम्हें अपनी छाती से भींच कर चूमना चाटना शुरू कर दे और जब सैर हो जाये तो अपनी राह ले। क्या यही तुम्हारी ज़िंदगी है।”

मैं ग़ुस्से की शिद्दत से दीवाना हो गया था। जब उसने मेरी ज़बान से इस क़िस्म के सख़्त कलमात सुने तो उसने ऐसा ज़ाहिर किया जैसे उसकी नज़र में ये सब गुफ़्तुगू एक मुअ’म्मा है। उस वक़्त तैश की हालत में मैंने उसकी हैरत को नुमाइशी ख़याल किया और एक क़हक़हा लगाते हुए कहा, “जाओ! मेरी नज़रों से दूर हो जाओ, तुम नापाक हो।”

ये सुन कर उस ने डरी हुई आवाज़ में सिर्फ़ इतना कहा, “आपको क्या हो गया है?”
“मुझे क्या हो गया… क्या हो गया है।” मैं फिर बरस पड़ा, “अपनी ज़िंदगी की स्याहकारियों पर नज़र दौड़ाओ… तुम्हें सब कुछ मालूम हो जाएगा। तुम मेरी बात इसलिए नहीं समझती हो कि मैं तुमसे शादी करने का ख़्वाहिशमंद था। इसलिए कि मेरे सीने में शहवानी ख़यालात नहीं, इसलिए कि मैं तुम से सिर्फ़ मोहब्बत करता हूँ। जाओ मुझे तुमसे सख़्त नफ़रत है।”

जब मैं बोल चुका तो उसने थूक निगल कर अपने हलक़ को साफ़ किया और थरथराई हुई आवाज़ में कहा, “शायद आप ये ख़याल करते होंगे कि मैं जानबूझ कर अंजान बन रही हूँ। मगर सच जानिए मुझे कुछ मालूम नहीं आप क्या कह रहे हैं। मुझे याद है कि एक शाम आप सड़क पर से गुज़र रहे थे, आपने मेरी तरफ़ देखा था और मुस्कुरा दिए थे। यहां बीसियों लोग हम लड़कियों को देखते हैं और मुस्कुरा कर चले जाते हैं। फिर आप मुतवातिर बावली की तरफ़ आते रहे। मुझे मालूम था आप मेरे लिए आते हैं मगर इसी क़िस्म के कई वाक़ए’ मेरे साथ गुज़र चुके हैं। एक रोज़ आपने मेरे साथ बातें कीं और इस के बाद हम दोनों एक दूसरे से मिलने लगे। आपने शादी के लिए कहा, मैं मान गई। मगर इससे पहले इस क़िस्म की कई दरख़्वास्तें सुन चुकी हूँ। जो मर्द भी मुझसे मिलता है दूसरे तीसरे रोज़ मेरे कान में कहता है, “बेगू देख में तेरी मोहब्बत में गिरफ़्तार हूँ। रात दिन तू ही मेरे दिल-ओ-दिमाग़ में बसी रहती है। आपने भी मुझसे यही कहा। अब बताईए मोहब्बत क्या चीज़ है। मुझे क्या मालूम कि आपने दिल में क्या छुपा रखा है। यहां आप जैसे कई लोग हैं जो मुझसे यही कहते हैं, “बेगू तुम्हारी आँखें कितनी ख़ूबसूरत हैं। जी चाहता है कि सदक़े हो जाऊं। तुम्हारे होंट किस क़दर प्यारे हैं, जी चाहता है इनको चूम जाऊं।”

वो मुझे चूमते रहे हैं क्या ये मोहब्बत नहीं है? कई बार मेरे दिल में ख़याल आया है कि मोहब्बत कुछ और ही चीज़ है मगर मैं पढ़ी-लिखी नहीं, इसलिए मुझे क्या मालूम हो सकता है। मैंने क़ायदा पढ़ना शुरू किया मगर छोड़ दिया। अगर मैं पढ़ूं तो फिर छल्लां और उसके बछड़े का पेट कौन भरे। आप अख़बार पढ़ लेते हैं इसलिए आपकी बातें बड़ी होती हैं। मैं कुछ नहीं समझ सकती, छोड़िए इस क़िस्से को। आईए कुछ और बातें करें। मुझे आपसे मिल कर बड़ी ख़ुशी होती है। मेरी माँ कह रही थीं कि बेगू तू हैट वाले बाबू के पीछे दीवानी हो गई है।”

मेरी नज़रों के सामने से वो तारीक पर्दा उठने लगा था जो इस अंजाम का बाइ’स था। मगर दफ़अ’तन मेरे जोश और ग़ुस्से ने फिर उसे गिरा दिया। बेगू की गुफ़्तुगू बेहद सादा और मासूमियत से पुर थी मगर मुझे उसका हर लफ़्ज़ बनावट में लिपटा नज़र आया। मैं एक लम्हा भी उसकी अहमियत पर ग़ौर न किया।

“बेगू, मैं बच्चा नहीं हूँ कि तुम मुझे चिकनी चुपड़ी बातों से बेवक़ूफ़ बनालोगी।” मैंने ग़ुस्से में उससे कहा, “ये फ़रेब किसी और को देना। कहते हैं कि झूट के पांव नहीं होते। तुमने अभी अभी अपनी ज़बान से इस बात का ए’तराफ़ किया है, अब मैं क्या कहूं।”
“नहीं, नहीं कहिए!” उसने कहा।
“कई लोग तुम्हारे मुँह को चूमते रहे हैं। तुम्हें शर्म आनी चाहिए!”
“हाय आप तो समझते ही नहीं। अब मैं क्या झूट बोलती हूँ। मैं ख़ुद थोड़ा ही उनके पास जाती हूँ और मुँह बढ़ा कर चूमने को कहती हूँ। अगर आप उस रोज़ मेरे बालों को चूमना चाहते जबकि आप इन की तारीफ़ कर रहे थे, तो क्या मैं इनकार कर देती? मैं किस तरह इनकार कर सकती हूँ, मुझे छल्लां बहुत प्यारी लगती है और मैं हर रोज़ उसको चूमती हूँ। इसमें क्या हर्ज है। मैं चाहती हूँ कि लोग मेरे बालों, मेरे होंटों और मेरे गालों की तारीफ़ करें, इससे मुझे बड़ी ख़ुशी होती है ख़बर नहीं क्यों?

मैं सुबह सवेरे उठती हूँ और छल्लां को लेकर घास चराने के लिए बाहर चली जाती हूँ, दोपहर को रोटी खा कर फिर घर से निकल आती हूँ। शाम को पानी भरती हूँ। हर रोज़ मेरा यही काम है, मुझे याद है कि आपने मुझसे कई मर्तबा कहा था कि मैं पानी भरने न आया करूं, भैंस न चराया करूं। शायद आप इसी वजह से नाराज़ हो रहे हैं। मगर ये तो बताईए कि मैं घर पर रहूं तो फिर आप मुलाक़ात क्योंकर कर सकेंगे? मैंने सुना है कि पंजाब में लड़कियां घर से बाहर नहीं निकलतीं मगर हम पहाड़ी लोग हैं हमारा यही काम है।”

“तुम्हारा यही काम है कि हर रहगुज़र से लिपटना शुरू कर दो। तुम पहाड़ी लोगों के चलन मुझसे छुपे हुए नहीं, ये तक़रीर किसी और को सुनाना। घर पर रहो या बाहर रहो। अब मुझे इससे कोई सरोकार नहीं। इन पहाड़ियों में रह कर जो सबक़ तुमने सीखा है वो मुझे पढ़ाने की कोशिश न करो”

“आप बहुत तेज़ होते जा रहे हैं बहुत चल निकले हैं।” उसने क़दरे बिगड़ कर कहा, “मालूम होता है लोगों ने आपके बहुत कान भरे हैं। मुझे भी तो पता लगे कि वो कौन “मरन जोगे” हैं जो मेरे मुतअ’ल्लिक़ आपको ऐसी बातें सुनाते रहे हैं। आप ख़्वाह मख़्वाह इतने गर्म होते जा रहे हैं। ये सच है कि मैं मर्दों के साथ बातें करती हूँ और उनसे मिलती हूँ मगर…” ये कहते हुए उसके गाल सुर्ख़ हो गए। मगर मैंने उसकी तरफ़ ध्यान न दिया।

एक लम्हा ख़ामोश रहने के बाद वो फिर बोली, “आप कहते हैं कि मैं बुरी लड़की हूँ, ये ग़लत है। मैं पगली हूँ, सचमुच पगली हूँ। कल आपके चले जाने के बाद में पत्थर पर बैठ कर देर तक रोती रही। जाने क्यों? ऐसा कई दफ़ा हुआ है कि मैं घंटों रोया करती हूँ। आप हंसेंगे मगर इस वक़्त भी मेरा जी चाहता है कि यहां से उठ भागूं और इस पहाड़ी की चोटी पर भागती हुई चढ़ जाऊं और फिर कूदती फांदती नीचे उतर जाऊं। मेरे दिल में हर वक़्त एक बेचैनी सी रहती है। भैंस चराती हूँ, पानी भरती हूँ, लकड़ियां काटती हूँ लेकिन ये सब काम में ऊपरे दिल से करती हूँ। मेरा जी किसी को ढूंढता है। मालूम नहीं किसको… मैं दीवानी हूँ।”

बेगू की ये अ’जीब-ओ-ग़रीब बातें जो दर-हक़ीक़त उसकी ज़िंदगी का एक निहायत उलझा हुआ बाब थीं और जिसे बग़ौर मुताला करने के बाद सब राज़ हल हो सकते थे, उस वक़्त मुझे किसी मुजरिम का ग़ैरमरबूत बयान मालूम हुईं। बेगू और मेरे दरमियान इस क़दर तारीक और मोटा पर्दा हाइल हो गया था कि हक़ीक़त की नक़ाबकुशाई बहुत मुश्किल थी।

“तुम दीवानी हो।” मैंने उससे कहा, “क्या मर्दों के साथ बैठ कर झाड़ियों के पीछे पहरों बातें करते रहना भी इस दीवानगी ही की एक शाख़ है? बेगू, तुम पगली हो मगर अपने काम में आठों गांठ होशियार!”
“मैं बातें करती हूँ, उनसे मिलती हूँ, मैंने इससे कब इनकार किया है। अभी अभी मैंने आपसे अपने दिल की सच्ची बात कही तो आपने मज़ाक़ उड़ाना शुरू कर दिया। अब अगर मैं कुछ और कहूं तो इससे क्या फ़ायदा होगा। आप कभी मानेंगे ही नहीं।”

“नहीं, नहीं, कहो, क्या कहती हो, तुम्हारा नया फ़ल्सफ़ा भी सुन लूं।”
“सुनिए फिर।” ये कह कर उसने थकी हुई हिरनी की तरह मेरी तरफ़ देखा और आह भर कर बोली, “ये बातें जो मैं आज आपको सुनाने लगी हूँ मेरी ज़बान से पहले कभी नहीं निकलीं। मैं ये आपको भी न सुनाती, मगर मजबूरी है। आप अ’जीब-ओ-ग़रीब आदमी हैं। मैं बहुत से लोगों से मिलती रही हूँ। मगर आप बिल्कुल निराले हैं। शायद यही वजह है कि मुझे आप से…”

वो हिचकिचाई… “हाँ आपसे प्यार हो गया है। आपने कभी मुझसे ग़ैर बात नहीं कही। हालाँकि मैं जिससे मिलती रही हूँ वो मुझसे कुछ और ही कहता था। मेरी अम्मां जानती है कि मैं घर में हर वक़्त आपही की बातें करती रहती हूँ, मेरा मुँह थकता ही नहीं। आपने नहीं कहा पर मैंने गाहकों के पास दूध ले जाना छोड़ दिया। लोगों से बातें करना छोड़ दीं। पानी भरने के लिए भी ज़्यादा छोटी बहन ही को भेजती रही हूँ। आपके आने से पहले में लोगों से मिलती रही हूँ। अब मैं आपको क्या बताऊं कि मैं उनसे क्यों मिलती थी… मुझे कोई मर्द भी बुलाता तो मैं उससे बातें करने लगती थी।

इसलिए… नहीं, नहीं मैं नहीं बताऊंगी… मेरा दिल जो चाहता था वो उन लोगों के पास नहीं था। मैं बुरी नहीं, अल्लाह की क़सम, बेगुनाह हूँ, ख़ुदा मालूम लोग मुझे बुरा क्यों कहते हैं। आप भी मुझे बुरा कहते हैं जिस तरह आपने आज मेरे मुँह पर इतनी गालियां दी हैं अगर आपके बजाय कोई और होता तो मैं उसका मुँह नोच लेती मगर आप… अब मैं क्या कहूं, मैं बहुत बदल गई हूँ। आप बहुत अच्छे आदमी हैं। मैं ख़याल करती थी कि आप मुझे कुछ सिखाएंगे, मुझे अच्छी अच्छी बातें सुनाएंगे। लेकिन आप मुझसे ख़्वाह मख़्वाह लड़ रहे हैं। आपको क्या मालूम कि मैं आपकी कितनी इ’ज़्ज़त करती हूँ। मैंने आपके सामने कभी गाली नहीं दी। हालाँकि हमारे घर सारा दिन गाली गलौच होती रहती है।”

मेरी समझ में कुछ न आया कि वो क्या कह रही है? डाक्टर साहब! इस पहाड़ी लड़की की गुफ़्तुगू किस क़दर सादा थी। मगर अफ़सोस है कि उस वक़्त मेरे कानों में रूई ठुँसी हुई थी। उसके हर लफ़्ज़ से मुझे इस्मत फ़रोशी की बू आ रही थी। मैं कुछ न समझ सका।
“बेगू! तुम हज़ार क़स्में खाओ। मगर मुझे यक़ीन नहीं आता। अब जो तुम्हारे जी में आए करो। मैं कल बटोत छोड़ कर जा रहा हूँ। मैंने तुमसे मोहब्बत की, मगर तुमने उस की क़दर न की। तुमने मेरे दिल को बहुत दुख दिया है… ख़ैर अब जाता हूँ, मुझे और कुछ नहीं कहना।”
मुझे जाता देख कर वो सख़्त मुज़्तरिब हो गई और मेरा बाज़ू पकड़ कर और फिर उसे फ़ौरन डरते हुए छोड़ कर थर्राई हुई आवाज़ में सिर्फ़ इस क़दर कहा, “आप जा रहे हैं?”
मैंने जवाब दिया, “हाँ, जा रहा हूँ ताकि तुम्हारे चाहने वालों के लिए मैदान साफ़ हो जाये।”

“आप न जाईए, अल्लाह की क़सम मेरा कोई चाहने वाला नहीं।” ये कहते हुए उसकी आँखें नमनाक हो गईं, “न जाईए, न जाईए न…” आख़िरी अलफ़ाज़ उसकी गुलूगीर आवाज़ में दब गए। उसका रोना मेरे दिल पर कुछ असर न कर सका। मैं चल पड़ा। मगर उसने मुझे बाज़ू से पकड़ लिया और रोती हुई आवाज़ में कहा, “आप ख़फ़ा क्यों हो गए हैं। मैं आइन्दा किसी आदमी से बात न करूंगी। अगर आपने मुझे किसी मर्द के साथ देखा तो आप इस छड़ी से जितना चाहिए पीट लीजिएगा। आईए घर चलें। मैं आपके लिए हुक़्क़ा ताज़ा करके लाऊंगी।”

मैं ख़ामोश रहा और उस का हाथ छोड़कर फिर चल पड़ा। उस वक़्त बेगू से एक मिनट की गुफ़्तगू करना भी मुझे गिरां गुज़र रहा था। मैं चाहता था कि वो लड़की मेरी नज़रों से हमेशा के लिए ओझल हो जाये। मैंने बमुश्किल दो गज़ का फ़ासला तय किया होगा कि वो मेरे सामने आ खड़ी हुई। उसके बाल परेशान थे, आँखों के डोरे सुर्ख़ और उभरे हुए थे, सीना आहिस्ता आहिस्ता धड़क रहा था।

उसने पूछा, “क्या आप वाक़ई जा रहे हैं? ”
मैंने तेज़ी से जवाब दिया, “तो और क्या झूट बक रहा हूँ।”
“जाईए।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों से अश्क रवां थे और गाल आँसूओं की वजह से मैले हो रहे थे मगर उसकी आँखों में एक अ’जीब क़िस्म की चमक नाच रही थी।
“जाईए।” ये कह कर वो उलटे पांव मुड़ी। उसका क़द पहले से लंबा हो गया था।

मैंने नीचे उतरना शुरू कर दिया। थोड़ी दूर जा कर मैंने झाड़ियों के पीछे से रोने की आवाज़ सुनी। वो रो रही थी। वो थर्राई हुई आवाज़ अभी तक मेरे कानों में आरही है। ये है मेरी दास्तान डाक्टर साहब, मैंने उस पहाड़ी लड़की की मोहब्बत को ठुकरा दिया। इस ग़लती का एहसास मुझे पूरे दो साल बाद हुआ जब मेरे एक दोस्त ने मुझे ये बताया कि बेगू ने मेरे जाने के बाद अपने शबाब को दोनों हाथों से लुटाना शुरू कर दिया और दिक़ के मरीज़ों से मिलने की वजह से वो ख़ुद उसका शिकार हो गई।

फिर बाद अज़ां मुझे मालूम हुआ कि इस मर्ज़ ने बिल आख़िर उसे क़ब्र की गोद में सुला दिया… उस की मौत का बाइ’स मेरे सिवा और कौन हो सकता है। वो ज़िंदगी की शाहराह पर अपना रास्ता तलाश करती थी मगर मैं उसको भूल भुलैय्यों में छोड़कर भाग आया जिसका नतीजा ये हुआ कि वो भटक गई, मैं मुजरिम था। चुनांचे मैंने अपने लिए वही मौत तजवीज़ की जिससे वो दो-चार हुई। वो वज़न जो मैं पाँच साल अपनी छाती पर उठाए फिरता रहा हूँ, ख़ुदा का शुक्र है कि अब हल्का हो गया है।

मैं मरीज़ की दास्तान ख़ामोशी से सुनता रहा। वो बोल चुका तो फिर भी ख़ामोश रहा। मैं नहीं चाहता था कि उसके जज़्बात पर रायज़नी करूं। चुनांचे वहां से उठ कर चला गया। मुझे कई मरीज़ों की दास्तानें सुनने का इत्तफ़ाक़ हुआ है मगर ये निहायत अ’जीब-ओ-ग़रीब और पुरअसर दास्तान थी। गो मरीज़ बीमारी की वजह से हड्डियों का ढांचा रह गया था, मगर हैरत है कि उसने अपने तवील बयान को किस तरह जारी रखा।

सुबह के वक़्त मैं उसका टेम्प्रेचर देखने के लिए आया, मगर वो मर चुका था। सफ़ेद चादर ओढ़े वो बड़े सुकून से सो रहा था।
जब उसको ग़ुस्ल देने लगे तो हस्पताल के एक नौकर ने मुझे बुलाया और कहा, “डाक्टर साहब इस की मुट्ठी में कुछ है।” मैंने उसकी बंद मुट्ठी को आधा खोल कर देखा, लोहे के दो क्लिप थे। उसकी बेगू की यादगार!
“इनको निकालना नहीं, ये इसके साथ ही दफ़न होंगे।” मैंने ग़ुस्ल देने वालों से कहा और दिल में ग़म की एक अ’जीब-ओ-ग़रीब कैफ़ियत लिए दफ़्तर चला गया।

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ये उस ज़माने का ज़िक्र है जब इस जंग का नाम-ओ-निशान भी नहीं था। ग़ालिबन आठ नौ बरस पहले की बात है जब ज़िंदगी में हंगामे बड़े सलीक़े से आते थे। आज कल की तरह नहीं कि बेहंगम तरीक़े पर पै-दर-पै हादिसे बरपा हो रहे हैं, किसी ठोस वजह के बग़ैर। उस वक़्त मैं चालीस रुपया माहवार पर एक फ़िल्म कंपनी में मुलाज़िम था और मेरी ज़िंदगी बड़े हमवार तरीक़े पर उफ़्तां-ओ-ख़ेज़ां गुज़र रही थी। या’नी सुबह दस बजे स्टूडियो गए। नियाज़ मोहम्मद विलेन की बिल्लियों को दो पैसे का दूध पिलाया। चालू फ़िल्म के लिए चालू क़िस्म के मकालमे लिखे। बंगाली ऐक्ट्रस से जो उस ज़माने में बुलबुल-ए-बंगाल कहलाती थी, थोड़ी देर मज़ाक़ किया और दादा गोरे की जो इस अह्द का सबसे बड़ा फ़िल्म डायरेक्टर था, थोड़ी सी ख़ुशामद की और घर चले आए।

जैसा कि मैं अ’र्ज़ कर चुका हूँ, ज़िंदगी बड़े हमवार तरीक़े पर उफ़्तां-ओ-ख़ेज़ां गुज़र रही थी स्टूडियो का मालिक “हुरमुज़ जी फ्रॉम जी” जो मोटे मोटे लाल गालों वाला मौजी क़िस्म का ईरानी था, एक अधेड़ उम्र की ख़ोजा ऐक्ट्रस की मोहब्बत में गिरफ़्तार था। हर नौ-वारिद लड़की के पिस्तान टटोल कर देखना उसका शग़ल था। कलकत्ता के बू बाज़ार की एक मुसलमान रंडी थी जो अपने डायरेक्टर, साउंड रिकार्डिस्ट और स्टोरी राईटर तीनों से ब-यक-वक़्त इश्क़ लड़ा रही थी। उस इश्क़ का दर अस्ल मतलब ये था कि न तीनों का इलतिफ़ात उसके लिए ख़ासतौर पर महफ़ूज़ रहे।

“बन की सुंदरी” की शूटिंग चल रही थी। नयाज़ मोहम्मद विलेन की जंगली बिल्लियों को जो उसने ख़ुदा मालूम स्टूडियो के लोगों पर क्या असर पैदा करने के लिए पाल रखी थीं। दो पैसे का दूध पिला कर मैं हर रोज़ उस “बन की सुंदरी” के लिए एक ग़ैर मानूस ज़बान में मकालमे लिखा करता था। उस फ़िल्म की कहानी क्या थी, प्लाट कैसा था, इसका इल्म जैसा कि ज़ाहिर है, मुझे बिल्कुल नहीं था क्योंकि मैं उस ज़माने में एक मुंशी था जिसका काम सिर्फ़ हुक्म मिलने पर जो कुछ कहा जाये, ग़लत सलत उर्दू में जो डायरेक्टर साहब की समझ में आजाए, पेंसिल से एक काग़ज़ पर लिख कर देना होता था।

ख़ैर “बन की सुंदरी” की शूटिंग चल रही थी और ये अफ़वाह गर्म थी कि “वैम्प” का पार्ट अदा करने के लिए एक नया चेहरा सेठ हुर्मुज़ जी फ्रॉम जी कहीं से ला रहे हैं। हीरो का पार्ट राजकिशोर को दिया गया था। राजकिशोर रावलपिंडी का एक ख़ुश शक्ल और सेहत मंद नौजवान था। उसके जिस्म के मुतअ’ल्लिक़ लोगों का ये ख़याल था कि बहुत मर्दाना और सुडौल है। मैंने कई मर्तबा उसके मुतअ’ल्लिक़ ग़ौर किया मगर मुझे उसके जिस्म में जो यक़ीनन कसरती और मुतनासिब था, कोई कशिश नज़र न आई। मगर उसकी वजह ये भी हो सकती है कि मैं बहुत ही दुबला और मरियल क़िस्म का इंसान हूँ और अपने हम जिंसों के मुतअ’ल्लिक़ सोचने का आदी हूँ।

मुझे राजकिशोर से नफ़रत नहीं थी, इसलिए कि मैंने अपनी उम्र में शाज़-ओ-नादिर ही किसी इंसान से नफ़रत की है, मगर वो मुझे कुछ ज़्यादा पसंद नहीं था। इसकी वजह मैं आहिस्ता आहिस्ता आप से बयान करूंगा। राजकिशोर की ज़बान उसका लब-ओ-लहजा जो ठेट रावलपिंडी का था, मुझे बेहद पसंद था। मेरा ख़याल है कि पंजाबी ज़बान में अगर कहीं ख़ूबसूरत क़िस्म की शीरीनी मिलती है तो रावलपिंडी की ज़बान ही में आपको मिल सकती है। इस शहर की ज़बान में एक अ’जीब क़िस्म की मर्दाना निसाइयत है जिसमें ब-यक-वक़्त मिठास और घुलावट है। अगर रावलपिंडी की कोई औरत आपसे बात करे तो ऐसा लगता है कि लज़ीज़ आम का रस आपके मुँह में चुवाया जा रहा है। मगर मैं आमों की नहीं राजकिशोर की बात कर रहा हूँ जो मुझे आम से बहुत कम अ’ज़ीज़ था।

राजकिशोर जैसा कि मैं अ’र्ज़ कर चुका हूँ एक ख़ुश शक्ल और सेहतमंद नौजवान था। यहां तक बात ख़त्म हो जाती तो मुझे कोई ए’तराज़ न होता मगर मुसीबत ये है कि उसे या’नी किशोर को ख़ुद अपनी सेहत और अपने ख़ुश शक्ल होने का एहसास था। ऐसा एहसास जो कम अज़ कम मेरे लिए नाक़ाबिल-ए-क़बूल था। सेहतमंद होना बड़ी अच्छी चीज़ है मगर दूसरों पर अपनी सेहत को बीमारी बना कर आ’इद करना बिल्कुल दूसरी चीज़ है। राजकिशोर को यही मर्ज़ लाहक़ था कि वो अपनी सेहत अपनी तंदुरुस्ती, अपने मुतनासिब और सुडौल आ’ज़ा की ग़ैर ज़रूरी नुमाइश के ज़रिये हमेशा दूसरे लोगों को जो उस से कम सेहतमंद थे, मरऊब करने की कोशिश में मसरूफ़ रहता था।

इसमें कोई शक नहीं कि मैं दाइमी मरीज़ हूँ, कमज़ोर हूँ, मेरे एक फेफड़े में हवा खींचने की ताक़त बहुत कम है मगर ख़ुदा वाहिद शाहिद है कि मैंने आज तक इस कमज़ोरी का कभी प्रोपेगंडा नहीं किया, हालाँकि मुझे इसका पूरी तरह इल्म है कि इंसान अपनी कमज़ोरियों से उसी तरह फ़ायदा उठा सकता है जिस तरह कि अपनी ताक़तों से उठा सकता है मगर ईमान है कि हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। ख़ूबसूरती मेरे नज़दीक वो ख़ूबसूरती है जिसकी दूसरे बुलंद आवाज़ में नहीं बल्कि दिल ही दिल में तारीफ़ करें।

मैं उस सेहत को बीमारी समझता हूँ जो निगाहों के साथ पत्थर बन कर टकराती रहे। राजकिशोर में वो तमाम ख़ूबसूरतियाँ मौजूद थीं जो एक नौजवान मर्द में होनी चाहिऐं। मगर अफ़सोस है कि उसे उन ख़ूबसूरतियों का निहायत ही भोंडा मुज़ाहिरा करने की आदत थी। आपसे बात कर रहा है और अपने एक बाज़ू के पट्ठे अकड़ा रहा है, और ख़ुद ही दाद दे रहा है। निहायत ही अहम गुफ़्तुगू हो रही है या’नी स्वराज का मसला छिड़ा है और वो अपने खादी के कुर्ते के बटन खोल कर अपने सीने की चौड़ाई का अंदाज़ा कर रहा है। मैंने खादी के कुरते का ज़िक्र किया तो मुझे याद आया कि राजकिशोर पक्का कांग्रेसी था, हो सकता है वो इसी वजह से खादी के कपड़े पहनता हो, मगर मेरे दिल में हमेशा इस बात की खटक रही है कि उसे अपने वतन से इतना प्यार नहीं था जितना कि उसे अपनी ज़ात से था।

बहुत लोगों का ख़याल था कि राजकिशोर के मुतअ’ल्लिक़ जो मैंने राय क़ायम की है, सरासर ग़लत है इसलिए कि स्टूडियो और स्टूडियो के बाहर हर शख़्स उसका मद्दाह था। उसके जिस्म का, उसके ख़यालात का, उसकी सादगी का, उसकी ज़बान का जो ख़ास रावलपिंडी की थी और मुझे भी पसंद थी। दूसरे एक्टरों की तरह वो अलग-थलग रहने का आदी नहीं था। कांग्रेस पार्टी का कोई जलसा हो तो राजकिशोर को आप वहां ज़रूर पाएंगे… कोई अदबी मीटिंग हो रही है तो राजकिशोर वहां ज़रूर पहुंचेगा। अपनी मसरूफ़ ज़िंदगी में से वो अपने हमसायों और मामूली जान पहचान के लोगों के दुख दर्द में शरीक होने के लिए भी वक़्त निकाल लिया करता था।

सब फ़िल्म प्रोडयूसर उसकी इज़्ज़त करते थे क्योंकि उसके कैरेक्टर की पाकीज़गी का बहुत शोहरा था। फ़िल्म प्रोडयूसरों को छोड़िए, पब्लिक को भी इस बात का अच्छी तरह इल्म था कि राजकिशोर एक बहुत बुलंद किरदार का मालिक है। फ़िल्मी दुनिया में रह कर किसी शख़्स का गुनाह के धब्बों से पाक रहना बहुत बड़ी बात है, यूं तो राजकिशोर एक कामयाब हीरो था मगर उसकी ख़ूबी ने उसे एक बहुत ही ऊंचे रुतबे पर पहुंचा दिया था। नागपाड़े में जब शाम को पान वाले की दुकान पर बैठता था तो अक्सर ऐक्टर एक्ट्रसों की बातें हुआ करती थीं। क़रीब क़रीब हर ऐक्टर और ऐक्ट्रस के मुतअ’ल्लिक़ कोई न कोई स्कैंडल मशहूर था मगर राजकिशोर का जब भी ज़िक्र आता, शामलाल पनवाड़ी बड़े फ़ख़्रिया लहजे में कहा करता, “मंटो साहब! राज भाई ही ऐसा ऐक्टर है जो लंगोट का पक्का है।”

मालूम नहीं शामलाल उसे राज भाई कैसे कहने लगा था। उसके मुतअ’ल्लिक़ मुझे इतनी ज़्यादा हैरत नहीं थी, इसलिए कि राज भाई की मामूली से मामूली बात भी एक कारनामा बन कर लोगों तक पहुंच जाती थी। मसलन बाहर के लोगों को उसकी आमदनी का पूरा हिसाब मालूम था। अपने वालिद को माहवार ख़र्च क्या देता है, यतीमख़ानों के लिए कितना चंदा देता है, उसका अपना जेब ख़र्च क्या है, ये सब बातें लोगों को इस तरह मालूम थीं जैसे उन्हें अज़बर याद कराई गई हैं।

शामलाल ने एक रोज़ मुझे बताया कि राज भाई का अपनी सौतेली माँ के साथ बहुत ही अच्छा सुलूक है। उस ज़माने में जब आमदनी का कोई ज़रिया नहीं था, बाप और उसकी नई बीवी उसे तरह तरह के दुख देते थे। मगर मर्हबा है राज भाई का कि उसने अपना फ़र्ज़ पूरा किया और उनको सर आँखों पर जगह दी। अब दोनों छप्पर खटों पर बैठे राज करते हैं। हर रोज़ सुबह-सवेरे राज अपनी सौतेली माँ के पास जाता है और उसके चरण छूता है। बाप के सामने हाथ जोड़ के खड़ा हो जाता है और जो हुक्म मिले, फ़ौरन बजा लाता है। आप बुरा न मानिएगा, मुझे राजकिशोर की तारीफ़-ओ-तौसीफ़ सुन कर हमेशा उलझन सी होती है, ख़ुदा जाने क्यों?

मैं जैसा कि पहले अ’र्ज़ कर चुका हूँ, मुझे उससे हाशा-ओ-कल्ला नफ़रत नहीं थी। उसने मुझे कभी ऐसा मौक़ा नहीं दिया था, और फिर उस ज़माने में जब मुंशियों की कोई इज़्ज़त-ओ-वक़अ’त ही नहीं थी वो मेरे साथ घंटों बातें किया करता था। मैं नहीं कह सकता, क्या वजह थी, लेकिन ईमान की बात है कि मेरे दिल-ओ-दिमाग़ के किसी अंधेरे कोने में ये शक बिजली की तरह कौंद जाता कि राज बन रहा है… राज की ज़िंदगी बिल्कुल मस्नूई है। मगर मुसीबत ये है कि मेरा कोई हमख़याल नहीं था। लोग देवताओं की तरह उसकी पूजा करते थे और मैं दिल ही दिल में उससे कुढ़ता था।

राज की बीवी थी, राज के चार बच्चे थे, वो अच्छा ख़ाविंद और अच्छा बाप था। उसकी ज़िंदगी पर से चादर का कोई कोना भी अगर हटा कर देखा जाता तो आपको कोई तारीक चीज़ नज़र न आती। ये सब कुछ था, मगर इसके होते हुए भी मेरे दिल में शक की गुदगुदी होती ही रहती थी। ख़ुदा की क़सम मैं ने कई दफ़ा अपने आपको ला’नत मलामत की कि तुम बड़े ही वाहियात हो कि ऐसे अच्छे इंसान को जिसे सारी दुनिया अच्छा कहती है और जिसके मुतअ’ल्लिक़ तुम्हें कोई शिकायत भी नहीं, क्यों बेकार शक की नज़रों से देखते हो। अगर एक आदमी अपना सुडौल बदन बार बार देखता है तो ये कौन सी बुरी बात है। तुम्हारा बदन भी अगर ऐसा ही ख़ूबसूरत होता तो बहुत मुम्किन है कि तुम भी यही हरकत करते।

कुछ भी हो, मगर मैं अपने दिल-ओ-दिमाग़ को कभी आमादा न कर सका कि वो राजकिशोर को उसी नज़र से देखे जिससे दूसरे देखते हैं। यही वजह है कि मैं दौरान-ए-गुफ़्तुगू में अक्सर उससे उलझ जाया करता था। मेरे मिज़ाज के ख़िलाफ़ कोई बात की और मैं हाथ धो कर उसके पीछे पड़ गया लेकिन ऐसी चिपक़लिशों के बाद हमेशा उसके चेहरे पर मुस्कुराहट और मेरे हलक़ में एक नाक़ाबिल-ए-बयान तल्ख़ी रही, मुझे इससे और भी ज़्यादा उलझन होती थी।

इसमें कोई शक नहीं कि उसकी ज़िंदगी में कोई स्कैंडल नहीं था। अपनी बीवी के सिवा किसी दूसरी औरत का मैला या उजला दामन उससे वाबस्ता नहीं था। मैं ये भी तस्लीम करता हूँ कि वो सब एक्ट्रसों को बहन कह कर पुकारता था और वो भी उसे जवाब में भाई कहती थीं। मगर मेरे दिल ने हमेशा मेरे दिमाग़ से यही सवाल किया कि ये रिश्ता क़ायम करने की ऐसी अशद ज़रूरत ही क्या है। बहन-भाई का रिश्ता कुछ और है मगर किसी औरत को अपनी बहन कहना इस अंदाज़ से जैसे ये बोर्ड लगाया जा रहा है कि सड़क बंद है या यहां पेशाब करना मना है, बिल्कुल दूसरी बात है।

अगर तुम किसी औरत से जिंसी रिश्ता क़ायम नहीं करना चाहते तो इसका ऐ’लान करने की ज़रूरत ही क्या है। अगर तुम्हारे दिल में तुम्हारी बीवी के सिवा और किसी औरत का ख़याल दाख़िल नहीं हो सकता तो इसका इश्तिहार देने की क्या ज़रूरत है। यही और इसी क़िस्म की दूसरी बातें चूँकि मेरी समझ में नहीं आती थीं, इसलिए मुझे अ’जीब क़िस्म की उलझन होती थी।

ख़ैर! “बन की सुंदरी” की शूटिंग चल रही थी। स्टूडियो में ख़ासी चहल पहल थी। हर रोज़ एक्स्ट्रा लड़कियां आती थीं जिनके साथ हमारा दिन हंसी-मज़ाक़ में गुज़र जाता था। एक रोज़ नियाज़ मोहम्मद विलेन के कमरे में मेकअप मास्टर जिसे हम उस्ताद कहते थे, ये ख़बर ले कर आया कि वैम्प के रोल के लिए जो नई लड़की आने वाली थी, आ गई है और बहुत जल्द उसका काम शुरू हो जाएगा।

उस वक़्त चाय का दौर चल रहा था, कुछ उसकी हरारत थी, कुछ इस ख़बर ने हमको गर्मा दिया। स्टूडियो में एक नई लड़की का दाख़िला हमेशा एक ख़ुशगवार हादिसा हुआ करता है, चुनांचे हम सब नियाज़ मोहम्मद विलेन के कमरे से निकल कर बाहर चले आए ताकि उसका दीदार किया जाये। शाम के वक़्त जब सेठ हुर्मुज़ जी फ्रॉम जी ऑफ़िस से निकल कर ईसा तबलची की चांदी की डिबिया से दो ख़ुशबूदार तंबाकू वाले पान अपने चौड़े कल्ले में दबा कर बिलियर्ड खेलने के कमरे का रुख़ कर रहे थे कि हमें वो लड़की नज़र आई।

साँवले रंग की थी, बस मैं सिर्फ़ इतना ही देख सका क्योंकि वो जल्दी जल्दी सेठ के साथ हाथ मिला कर स्टूडियो की मोटर में बैठ कर चली गई… कुछ देर के बाद मुझे नियाज़ मोहम्मद ने बताया कि उस औरत के होंट मोटे थे। वो ग़ालिबन सिर्फ़ होंट ही देख सका था। उस्ताद जिसने शायद इतनी झलक भी न देखी थी, सर हिला कर बोला, “हूँह… कंडम…” या’नी बकवास है। चार-पाँच रोज़ गुज़र गए मगर ये नई लड़की स्टूडियो में न आई। पांचवें या छट्ठे रोज़ जब मैं गुलाब के होटल से चाय पी कर निकल रहा था, अचानक मेरी और उसकी मुडभेड़ होगई।

मैं हमेशा औरतों को चोर आँख से देखने का आदी हूँ। अगर कोई औरत एक दम मेरे सामने आजाए तो मुझे उसका कुछ भी नज़र नहीं आता। चूँकि ग़ैर मुतवक़्क़े तौर पर मेरी उसकी मुडभेड़ हुई थी, इस लिए मैं उसकी शक्ल-ओ-शबाहत के मुतअ’ल्लिक़ कोई अंदाज़ा न कर सका, अलबत्ता पांव मैंने ज़रूर देखे जिनमें नई वज़ा के स्लीपर थे। लेबोरेटरी से स्टूडियो तक जो रविश जाती है, उस पर मालिकों ने बजरी बिछा रखी है। उस बजरी में बेशुमार गोल गोल बट्टियां हैं जिनपर से जूता बार बार फिसलता है। चूँकि उसके पांव में खुले स्लीपर थे, इसलिए चलने में उसे कुछ ज़्यादा तकलीफ़ महसूस हो रही थी।

उस मुलाक़ात के बाद आहिस्ता आहिस्ता मिस नीलम से मेरी दोस्ती होगई। स्टूडियो के लोगों को तो ख़ैर इसका इल्म नहीं था मगर उसके साथ मेरे तअ’ल्लुक़ात बहुत ही बेतकल्लुफ़ थे। उसका असली नाम राधा था। मैंने जब एक बार उससे पूछा कि तुमने इतना प्यारा नाम क्यों छोड़ दिया तो उसने जवाब दिया, “यूंही।” मगर फिर कुछ देर के बाद कहा, “ये नाम इतना प्यारा है कि फ़िल्म में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।”

आप शायद ख़याल करें कि राधा मज़हबी ख़याल की औरत थी। जी नहीं, उसे मज़हब और उसके तवह्हुमात से दूर का भी वास्ता नहीं था। लेकिन जिस तरह मैं हर नई तहरीर शुरू करने से पहले काग़ज़ पर बिसमिल्लाह के आ’दाद ज़रूर लिखता हूँ, उसी तरह शायद उसे भी ग़ैर-इरादी तौर पर राधा के नाम से बेहद प्यार था। चूँकि वो चाहती थी कि उसे राधा न कहा जाये, इसलिए मैं आगे चल कर उसे नीलम ही कहूंगा। नीलम बनारस की एक तवाइफ़ज़ादी थी। वहीं का लब-ओ-लहजा जो कानों को बहुत भला मालूम होता था। मेरा नाम सआदत है मगर वो मुझे हमेशा सादिक़ ही कहा करती थी। एक दिन मैंने उससे कहा, “नीलम! मैं जानता हूँ तुम मुझे सआदत कह सकती हो, फिर मेरी समझ में नहीं आता कि तुम अपनी इस्लाह क्यों नहीं करतीं।” ये सुन कर उसके साँवले होंटों पर जो बहुत ही पतले थे एक ख़फ़ीफ़ सी मुस्कुराहट नुमूदार हुई और उसने जवाब दिया, “जो ग़लती मुझसे एक बार हो जाये, मैं उसे ठीक करने की कोशिश नहीं करती।”

मेरा ख़याल है बहुत कम लोगों को मालूम है कि वो औरत जिसे स्टूडियो के तमाम लोग एक मामूली ऐक्ट्रस समझते थे, अ’जीब-ओ-ग़रीब क़िस्म की इन्फ़िरादियत की मालिक थी। उसमें दूसरी एक्ट्रसों का सा ओछापन बिल्कुल नहीं था। उसकी संजीदगी जिसे स्टूडियो का हर शख़्स अपनी ऐनक से ग़लत रंग में देखता था, बहुत प्यारी चीज़ थी। उसके साँवले चेहरे पर जिसकी जिल्द बहुत ही साफ़ और हमवार थी, ये संजीदगी, ये मलीह मतानत मौज़ूं-ओ-मुनासिब ग़ाज़ा बन गई थी। इसमें कोई शक नहीं कि इससे उसकी आँखों में उसके पतले होंटों के कोनों में, ग़म की बेमालूम तल्ख़ियां घुल गई थीं मगर ये वाक़िया है कि उस चीज़ ने उसे दूसरी औरतों से बिल्कुल मुख़्तलिफ़ कर दिया था।

मैं उस वक़्त भी हैरान था और अब भी वैसा ही हैरान हूँ कि नीलम को “बन की सुंदरी” में वैम्प के रोल के लिए क्यों मुंतख़ब किया गया? इसलिए कि उसमें तेज़ी-ओ-तर्रारी नाम को भी नहीं थी। जब वो पहली मर्तबा अपना वाहियात पार्ट अदा करने के लिए तंग चोली पहन कर सेट पर आई तो मेरी निगाहों को बहुत सदमा पहुंचा। वो दूसरों का रद्द-ए-अ’मल फ़ौरन ताड़ जाया करती थी। चुनांचे मुझे देखते ही उसने कहा, “डायरेक्टर साहब कह रहे थे कि तुम्हारा पार्ट चूँकि शरीफ़ औरत का नहीं है, इसलिए तुम्हें इस क़िस्म का लिबास दिया गया है। मैंने उनसे कहा, अगर ये लिबास है तो मैं आपके साथ नंगी चलने के लिए तैयार हूँ।”

मैंने उससे पूछा, “डायरेक्टर साहब ने ये सुन कर क्या कहा?” नीलम के पतले होंटों पर एक ख़फ़ीफ़ सी पुरअसरार मुस्कुराहट नुमूदार हुई, “उन्होंने तसव्वुर में मुझे नंगी देखना शुरू कर दिया… ये लोग भी कितने अहमक़ हैं। या’नी इस लिबास में मुझे देख कर बेचारे तसव्वुर पर ज़ोर डालने की ज़रूरत ही क्या थी!” ज़हीन क़ारी के लिए नीलम का इतना तआ’रुफ़ ही काफ़ी है। अब मैं उन वाक़ियात की तरफ़ आता हूँ जिनकी मदद से मैं ये कहानी मुकम्मल करना चाहता हूँ।

बंबई में जून के महीने से बारिश शुरू हो जाती है और सितंबर के वस्त तक जारी रहती है। पहले दो ढाई महीनों में इस क़दर पानी बरसता है कि स्टूडियो में काम नहीं हो सकता। “बन की सुंदरी” की शूटिंग अप्रैल के अवाख़िर में शुरू हुई थी। जब पहली बारिश हुई तो हम अपना तीसरा सेट मुकम्मल कर रहे थे। एक छोटा सा सीन बाक़ी रह गया था जिसमें कोई मुकालमा नहीं था, इसलिए बारिश में भी हमने अपना काम जारी रखा। मगर जब ये काम ख़त्म हो गया तो हम एक अर्से के लिए बेकार हो गए।

इस दौरान में स्टूडियो के लोगों को एक दूसरे के साथ मिल कर बैठने का बहुत मौक़ा मिलता है। मैं तक़रीबन सारा दिन गुलाब के होटल में बैठा चाय पीता रहता था। जो आदमी भी अंदर आता था तो सारे का सारा भीगा होता था या आधा… बाहर की सब मक्खियां पनाह लेने के लिए अंदर जमा होगई थीं। इस क़दर ग़लीज़ फ़िज़ा थी कि अलअमां।

एक कुर्सी पर चाय निचोड़ने का कपड़ा पड़ा है, दूसरी पर प्याज़ काटने की बदबूदार छुरी पड़ी झक मार रही है। गुलाब साहब पास खड़े हैं और अपने मास ख़ौरा लगे दाँतों तले बंबई की उर्दू चबा रहे हैं, “तुम उधर जाने को नहीं सकता… हम उधर से जाके आता… बहुत लफ़ड़ा होगा… हाँ… बड़ा वांदा हो जाएंगा।”

उस होटल में जिसकी छत कोरोगेटेड स्टील की थी, सेठ हुर्मुज़ जी फ्रॉम जी, उनके साले एडल जी और हीरोइनों के सिवा सबलोग आते थे। नियाज़ मोहम्मद को तो दिन में कई मर्तबा यहां आना पड़ता था क्योंकि वो चुन्नी मुन्नी नाम की दो बिल्लियां पाल रहा था। राजकिशोर दिन में एक चक्कर लगा जाता था। जूंही वो अपने लंबे क़द और कसरती बदन के साथ दहलीज़ पर नुमूदार होता, मेरे सिवा होटल में बैठे हुए तमाम लोगों की आँखें तमतमा उठतीं। एक्स्ट्रा लड़के उठ उठ कर राज भाई को कुर्सी पेश करते और जब वो उनमें से किसी की पेश की हुई कुर्सी पर बैठ जाता तो सारे परवानों की मानिंद उसके गिर्द जमा हो जाते।

इसके बाद दो क़िस्म की बातें सुनने में आतीं। एक्स्ट्रा लड़कों की ज़बान पर पुरानी फिल्मों में राज भाई के काम की तारीफ़ की, और ख़ुद राजकिशोर की ज़बान पर उसके स्कूल छोड़कर कॉलिज और कॉलिज छोड़कर फ़िल्मी दुनिया में दाख़िल होने की तारीख़… चूँकि मुझे ये सब बातें ज़बानी याद हो चुकी थीं इसलिए जूंही राजकिशोर होटल में दाख़िल होता मैं उससे अलैक सलैक करने के बाद बाहर निकल जाता।

एक रोज़ जब बारिश थमी हुई थी और हुर्मुज़ जी फ्रॉम जी का अलसेशियन कुत्ता नियाज़ मोहम्मद की दो बिल्लियों से डर कर गुलाब के होटल की तरफ़ दुम दबाये भागा आ रहा था। मैंने मौलसिरी के दरख़्त के नीचे बने हुए गोल चबूतरे पर नीलम और राजकिशोर को बातें करते हुए देखा। राजकिशोर खड़ा हस्ब-ए-आदत हौले-हौले झूल रहा था, जिसका मतलब ये था कि वो अपने ख़याल के मुताबिक़ निहायत ही दिलचस्प बातें कर रहा है। मुझे याद नहीं कि नीलम से राजकिशोर का तआ’रुफ़ कब और किस तरह हुआ था, मगर नीलम तो उसे फ़िल्मी दुनिया में दाख़िल होने से पहले ही अच्छी तरह जानती थी और शायद एक दो मर्तबा उसने मुझसे बर-सबील-ए-तज़्किरा उसके मुतनासिब और ख़ूबसूरत जिस्म की तारीफ़ भी की थी।

मैं गुलाब के होटल से निकल कर रिकार्डिंग रुम के छज्जे तक पहुंचा तो राजकिशोर ने अपने चौड़े कांधे पर से खादी का थैला एक झटके के साथ उतारा और उसे खोल कर एक मोटी कापी बाहर निकाली। मैं समझ गया… ये राजकिशोर की डायरी थी। हर रोज़ तमाम कामों से फ़ारिग़ हो कर अपनी सौतेली माँ का आशीरवाद ले कर राजकिशोर सोने से पहले डायरी लिखने का आदी है। यूं तो उसे पंजाबी ज़बान बहुत अ’ज़ीज़ है मगर ये रोज़नामचा अंग्रेज़ी में लिखता है जिसमें कहीं टैगोर के नाज़ुक स्टाइल की और कहीं गांधी के सियासी तर्ज़ की झलक नज़र आती है… उसकी तहरीर पर शेक्सपियर के ड्रामों का असर भी काफ़ी है। मगर मुझे इस मुरक्कब में लिखने वाले का ख़ुलूस कभी नज़र नहीं आया।

अगर ये डायरी आपको कभी मिल जाये तो आपको राजकिशोर की ज़िंदगी के दस-पंद्रह बरसों का हाल मालूम हो सकता है। उसने कितने रुपये चंदे में दिए, कितने ग़रीबों को खाना खिलाया, कितने जलसों में शिरकत की, क्या पहना, क्या उतारा… और अगर मेरा क़ियाफ़ा दुरुस्त है तो आपको उस डायरी के किसी वर्क़ पर मेरे नाम के साथ पैंतीस रुपये भी नज़र आजाऐंगे जो मैंने उससे एक बार क़र्ज़ लिए थे और इस ख़याल से अभी तक वापस नहीं किए कि वो अपनी डायरी में उनकी वापसी का ज़िक्र कभी नहीं करेगा।

ख़ैर… नीलम को वो उस डायरी के चंद औराक़ पढ़ कर सुना रहा था। मैंने दूर ही से उसके ख़ूबसूरत होंटों की जुंबिश से मालूम कर लिया कि वो शेक्सपियरन अंदाज़ में प्रभु की हम्द बयान कर रहा है। नीलम, मौलसिरी के दरख़्त के नीचे गोल सीमेंट लगे चबूतरे पर ख़ामोश बैठी थी। उसके चेहरे की मलीह मतानत पर राजकिशोर के अल्फ़ाज़ कोई असर पैदा नहीं कर रहे थे।

वो राजकिशोर की उभरी हुई छाती की तरफ़ देख रही थी। उसके कुर्ते के बटन खुले थे, और सफ़ेद बदन पर उसकी छाती के काले बाल बहुत ही ख़ूबसूरत मालूम होते थे। स्टूडियो में चारों तरफ़ हर चीज़ धुली हुई थी। नियाज़ मोहम्मद की दो बिल्लियां भी आम तौर पर ग़लीज़ रहा करती थीं, उस रोज़ बहुत साफ़ सुथरी दिखाई दे रही थीं। दोनों सामने बेंच पर लेटी नर्म नर्म पंजों से अपना मुँह धो रही थीं। नीलम जॉर्जट की बेदाग़ सफ़ेद साड़ी में मलबूस थी। ब्लाउज़ सफ़ेद लिनन का था जो उसकी सांवली और सुडौल बांहों के साथ एक निहायत ही ख़ुशगवार और मद्धम सा तज़ाद पैदा कर रहा था।

“नीलम इतनी मुख़्तलिफ़ क्यों दिखाई दे रही है?” एक लहज़े के लिए ये सवाल मेरे दिमाग़ में पैदा हुआ और एक दम उसकी और मेरी आँखें चार हुईं तो मुझे उसकी निगाह के इज़्तिराब में अपने सवाल का जवाब मिल गया। नीलम मोहब्बत में गिरफ़्तार हो चुकी थी। उसने हाथ के इशारे से मुझे बुलाया। थोड़ी देर इधर उधर की बातें हुईं, जब राजकिशोर चला गया तो उसने मुझसे कहा, “आज आप मेरे साथ चलिएगा!”

शाम को छः बजे मैं नीलम के मकान पर था। जूंही हम अंदर दाख़िल हुए उसने अपना बैग सोफे पर फेंका और मुझसे नज़र मिलाए बग़ैर कहा, “आपने जो कुछ सोचा है ग़लत है।” मैं उसका मतलब समझ गया। चुनांचे मैंने जवाब दिया, “तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि मैंने क्या सोचा था?” उसके पतले होंटों पर ख़फ़ीफ़ सी मुस्कुराहट पैदा हुई। “इसलिए कि हम दोनों ने एक ही बात सोची थी… आपने शायद बाद में ग़ौर नहीं किया। मगर मैं बहुत सोच-बिचार के बाद इस नतीजे पर पहुंची हूँ कि हम दोनों ग़लत थे।”

“अगर मैं कहूं कि हम दोनों सही थे।” उसने सोफे पर बैठते हुए कहा, “तो हम दोनों बेवक़ूफ़ हैं।”ये कह कर फ़ौरन ही उसके चेहरे की संजीदगी और ज़्यादा सँवला गई, “सादिक़ ये कैसे हो सकता है। मैं बच्ची हूँ जो मुझे अपने दिल का हाल मालूम नहीं… तुम्हारे ख़्याल के मुताबिक़ मेरी उम्र क्या होगी?” “बाईस बरस।” “बिल्कुल दुरुस्त… लेकिन तुम नहीं जानते कि दस बरस की उम्र में मुझे मोहब्बत के मा’नी मालूम थे… मा’नी क्या हुए जी… ख़ुदा की क़सम मैं मोहब्बत करती थी। दस से लेकर सोलह बरस तक मैं एक ख़तरनाक मोहब्बत में गिरफ़्तार रही हूँ। मेरे दिल में अब क्या ख़ाक किसी की मोहब्बत पैदा होगी?”

ये कह कर उसने मेरे मुंजमिद चेहरे की तरफ़ देखा और मुज़्तरिब हो कर कहा, “तुम कभी नहीं मानोगे, मैं तुम्हारे सामने अपना दिल निकाल कर रख दूं, फिर भी तुम यक़ीन नहीं करोगे, मैं तुम्हें अच्छी तरह जानती हूँ… भई ख़ुदा की क़सम, वो मर जाये जो तुम से झूट बोले… मेरे दिल में अब किसी की मोहब्बत पैदा नहीं हो सकती, लेकिन इतना ज़रूर है कि…” ये कहते कहते वो एक दम रुक गई।

मैंने उससे कुछ न कहा क्योंकि वो गहरे फ़िक्र में ग़र्क़ हो गई थी। शायद वो सोच रही थी कि “इतना ज़रूर” क्या है? थोड़ी देर के बाद उसके पतले होंटों पर वही ख़फ़ीफ़ पुरअसरार मुस्कुराहट नुमूदार हुई जिससे उसके चेहरे की संजीदगी में थोड़ी सी आ’लिमाना शरारत पैदा हो जाती थी। सोफे पर से एक झटके के साथ उठकर उसने कहना शुरू किया, “मैं इतना ज़रूर कह सकती हूँ कि ये मोहब्बत नहीं है और कोई बला हो तो मैं कह नहीं सकती, सादिक़ मैं तुम्हें यक़ीन दिलाती हूँ।” मैंने फ़ौरन ही कहा, “या’नी तुम अपने आपको यक़ीन दिलाती हो।”

वो जल गई, “तुम बहुत कमीने हो… कहने का एक ढंग होता है। आख़िर तुम्हें यक़ीन दिलाने की मुझे ज़रूरत ही क्या पड़ी है? मैं अपने आपको यक़ीन दिला रही हूँ, मगर मुसीबत ये है कि आ नहीं रहा… क्या तुम मेरी मदद नहीं कर सकते?” ये कह कर वो मेरे पास बैठ गई और अपने दाहिने हाथ की छंगुलिया पकड़ कर मुझसे पूछने लगी, “राजकिशोर के मुतअ’ल्लिक़ तुम्हारा क्या ख़याल है… मेरा मतलब है तुम्हारे ख़याल के मुताबिक़ राजकिशोर में वो कौन सी चीज़ है जो मुझे पसंद आई है।” छंगुलिया छोड़ कर उसने एक एक कर के दूसरी उंगलियां पकड़नी शुरू कीं।

“मुझे उसकी बातें पसंद नहीं… मुझे उसकी ऐक्टिंग पसंद नहीं। मुझे उसकी डायरी पसंद नहीं, जाने क्या ख़ुराफ़ात सुना रहा था।” ख़ुद ही तंग आकर वो उठ खड़ी हुई, “समझ में नहीं आता मुझे क्या हो गया है। बस सिर्फ़ ये जी चाहता है कि एक हंगामा हो। बिल्लियों की लड़ाई की तरह शोर मचे, धूल उड़े… और मैं पसीना पसीना हो जाऊं।” फिर एक दम वो मेरी तरफ़ पलटी, “सादिक़… तुम्हारा क्या ख़याल है… मैं कैसी औरत हूँ?”

मैंने मुस्कुरा कर जवाब दिया, “बिल्लियां और औरतें मेरी समझ से हमेशा बालातर रही हैं।” उसने एक दम पूछा, “क्यों?” मैंने थोड़ी देर सोच कर जवाब दिया, “हमारे घर में एक बिल्ली रहती थी। साल में एक मर्तबा उस पर रोने के दौरे पड़ते थे… उसका रोना-धोना सुन कर कहीं से एक बिल्ला आ जाया करता था। फिर उन दोनों में इस क़दर लड़ाई और ख़ून ख़राबा होता कि अलअमां… मगर उसके बाद वो ख़ाला बिल्ली चार बच्चों की माँ बन जाया करती थी।” नीलम का जैसे मुँह का ज़ायक़ा ख़राब हो गया, “थू… तुम कितने गंदे हो।” फिर थोड़ी देर बाद इलायची से मुँह का ज़ायक़ा दुरुस्त करने के बाद उसने कहा, “मुझे औलाद से नफ़रत है। ख़ैर, हटाओ जी इस क़िस्से को।”

ये कह कर नीलम ने पानदान खोल कर अपनी पतली पतली उंगलियों से मेरे लिए पान लगाना शुरू कर दिया। चांदी की छोटी छोटी कुल्हियों से उसने बड़ी नफ़ासत से चमची के साथ चूना और कथ्था निकाल कर रगें निकाले हुए पान पर फैलाया और गिलौरी बना कर मुझे दी, “सादिक़! तुम्हारा क्या ख़्याल है?” ये कह कर वो ख़ाली-उज़-ज़ेहन हो गई। मैंने पूछा, “किस बारे में?” उसने सरौते से भुनी हुई छालिया काटते हुए कहा, “उस बकवास के बारे में जो ख़्वाह-मख़्वाह शुरू हो गई है… ये बकवास नहीं तो क्या है, या’नी मेरी समझ में कुछ आता ही नहीं… ख़ुद ही फाड़ती हूँ, ख़ुद ही रफू करती हूँ। अगर ये बकवास इसी तरह जारी रहे तो जाने क्या होगा…. तुम जानते हो मैं बहुत ज़बरदस्त औरत हूँ।”

“ज़बरदस्त से तुम्हारी क्या मुराद है?” नीलम के पतले होंटों पर वही ख़फ़ीफ़ पुरअसरार मुस्कुराहट पैदा हुई, “तुम बड़े बेशर्म हो। सब कुछ समझते हो मगर महीन-महीन चुटकियां ले कर मुझे उकसाओगे ज़रूर।” ये कहते हुए उसकी आँखों की सफेदी गुलाबी रंगत इख़्तियार कर गई। “तुम समझते क्यों नहीं कि मैं बहुत गर्म मिज़ाज की औरत हूँ।” ये कह कर वो उठ खड़ी हुई, “अब तुम जाओ, मैं नहाना चाहती हूँ।”

मैं चला गया। उसके बाद नीलम ने बहुत दिनों तक राजकिशोर के बारे में मुझसे कुछ न कहा। मगर इस दौरान में हम दोनों एक दूसरे के ख़यालात से वाक़िफ़ थे। जो कुछ वो सोचती थी, मुझे मालूम हो जाता था और जो कुछ मैं सोचता था उसे मालूम हो जाता था। कई रोज़ तक यही ख़ामोश तबादला जारी रहा।     एक दिन डायरेक्टर कृपलानी जो “बन की सुंदरी” बना रहा था, हीरोइन की रिहर्सल सुन रहा था। हम सब म्यूज़िक रुम में जमा थे। नीलम एक कुर्सी पर बैठी अपने पांव की जुंबिश से हौले-हौले ताल दे रही थी। एक बाज़ारी क़िस्म का गाना मगर धुन अच्छी थी। जब रिहर्सल ख़त्म हुई तो राजकिशोर कांधे पर खादी का थैला रखे कमरे में दाख़िल हुआ।

डायरेक्टर कृपलानी, म्यूज़िक डायरेक्टर घोष, साउंड रिकार्डिस्ट पी ए एन मोघा… इन सबको फ़र्दन फ़र्दन उसने अंग्रेज़ी में आदाब किया। हीरोइन मिस ईदन बाई को हाथ जोड़ कर नमस्कार किया और कहा, “ईदन बहन! कल मैंने आपको क्राफर्ड मार्किट में देखा। मैं आपकी भाभी के लिए मौसंबियाँ ख़रीद रहा था कि आपकी मोटर नज़र आई।” झूलते झूलते उसकी नज़र नीलम पर पड़ी जो प्यानो के पास एक पस्त-क़द की कुर्सी में धंसी हुई थी। एक दम उसके हाथ नमस्कार के लिए उठे, ये देखते ही नीलम उठ खड़ी हुई, “राज साहब! मुझे बहन न कहिएगा।” नीलम ने ये बात कुछ इस अंदाज़ से कही कि म्यूज़िक रुम में बैठे हुए सब आदमी एक लहज़े के लिए मब्हूत हो गए। राजकिशोर खिसयाना सा हो गया और सिर्फ़ इस क़दर कह सका, “क्यों?”

नीलम जवाब दिए बग़ैर बाहर निकल गई। तीसरे रोज़ मैं नागपाड़े में सह-पहर के वक़्त शाम लाल पनवाड़ी की दुकान पर गया तो वहां इसी वाक़े के मुतअ’ल्लिक़ चेमि-गोईयां होरही थीं… शाम लाल बड़े फ़ख़्रिया लहजे में कह रहा था, “साली का अपना मन मैला होगा… वर्ना राज भाई किसी को बहन कहे, और वो बुरा माने… कुछ भी हो, उसकी मुराद कभी पूरी नहीं होगी। राज भाई लंगोट का बहुत पक्का है।” राज भाई के लंगोट से मैं बहुत तंग आ गया था। मगर मैंने शाम लाल से कुछ न कहा और ख़ामोश बैठा उसकी और उसके दोस्त ग्राहकों की बातें सुनता रहा जिनमें मुबालग़ा ज़्यादा और असलियत कम थी।

स्टूडियो में हर शख़्स को म्यूज़िक रुम के इस हादिसे का इल्म था, और तीन रोज़ से गुफ़्तुगू का मौज़ू बस यही चीज़ थी कि राजकिशोर को मिस नीलम ने क्यों एक दम बहन कहने से मना किया। मैंने राजकिशोर की ज़बानी इस बारे में कुछ न सुना मगर उसके एक दोस्त से मालूम हुआ कि उसने अपनी डायरी में उस पर निहायत पर दिलचस्प तब्सिरा लिखा है और प्रार्थना की है कि मिस नीलम का दिल-ओ-दिमाग़ पाक-ओ-साफ़ हो जाये।

उस हादिसे के बाद कई दिन गुज़र गए मगर कोई क़ाबिल-ए-ज़िकर बात वक़ूअ-पज़ीर न हुई। नीलम पहले से कुछ ज़्यादा संजीदा हो गई थी और राजकिशोर के कुर्ते के बटन अब हर वक़्ते खुले रहते थे जिसमें से उसकी सफ़ेद और उभरी हुई छाती के काले बाल बाहर झांकते रहते थे। चूँकि एक दो रोज़ से बारिश थमी हुई थी और “बन की सुंदरी” का चौथे सेट का रंग ख़ुश्क हो गया था, इसलिए डायरेक्टर ने नोटिस बोर्ड पर शूटिंग का ऐ’लान चस्पाँ कर दिया। ये सीन जो अब लिया जाने वाला था, नीलम और राजकिशोर के दरमियान था। चूँकि मैंने ही इसके मकालमे लिखे थे, इस लिए मुझे मालूम था कि राजकिशोर बातें करते करते नीलम का हाथ चूमेगा।

इस सीन में चूमने की बिल्कुल गुंजाइश न थी। मगर चूँकि अवाम के जज़्बात को उकसाने के लिए आम तौर पर फिल्मों में औरतों को ऐसे लिबास पहनाए जाते हैं जो लोगों को सताएं, इसलिए डायरेक्टर कृपलानी ने पुराने नुस्ख़े के मुताबिक़ दस्त बोसी का ये टच रख दिया था।

जब शूटिंग शुरू हुई तो मैं धड़कते हुए दिल के साथ सेट पर मौजूद था। राजकिशोर और नीलम, दोनों का रद्द-ए-अ’मल क्या होगा, इसके तसव्वुर ही से मेरे जिस्म में सनसनी की एक लहर दौड़ जाती थी। मगर सारा सीन मुकम्मल हो गया, और कुछ न हुआ। हर मकालमे के बाद एक थका देने वाली आहंगी के साथ बर्क़ी लैम्प रौशन और गुल हो जाते। स्टार्ट और कट की आवाज़ें बुलंद होतीं और शाम को जब सीन के क्लाइमेक्स का वक़्त आया तो राजकिशोर ने बड़े रूमानी अंदाज़ में नीलम का हाथ पकड़ा मगर कैमरे की तरफ़ पीठ कर के अपना हाथ चूम कर अलग कर दिया।

मेरा ख़याल था कि नीलम अपना हाथ खींच कर राजकिशोर के मुँह पर एक ऐसा चांटा जड़ेगी कि रिकार्डिंग रुम में पी एन मोघा के कानों के पर्दे फट जाऐंगे। मगर इसके बरअ’क्स मुझे नीलम के पतले होंटों पर एक तहलील शुदा मुस्कुराहट दिखाई दी, जिसमें औरत के मजरूह जज़्बात का शाइबा तक मौजूद न था।

मुझे सख़्त ना-उम्मीदी हुई थी। मैंने इसका ज़िक्र नीलम से न किया। दो-तीन रोज़ गुज़र गए और जब उसने भी मुझसे इस बारे में कुछ न कहा… तो मैंने ये नतीजा अख़्ज़ किया कि उसे इस हाथ चूमने वाली बात की अहमियत का इल्म ही नहीं था, बल्कि यूं कहना चाहिए कि उसके ज़की-उल-हिस दिमाग़ में इसका ख़याल तक भी न आया था और उसकी वजह सिर्फ़ यह हो सकती है कि वो उस वक़्त राजकिशोर की ज़बान से जो औरत को बहन कहने का आदी था, आशिक़ाना अल्फ़ाज़ सुन रही थी।

नीलम का हाथ चूमने की बजाय राजकिशोर ने अपना हाथ क्यों चूमा था… क्या उसने इंतिक़ाम लिया था… क्या उसने उस औरत की तज़लील करने की कोशिश की थी, ऐसे कई सवाल मेरे दिमाग़ में पैदा हुए मगर कोई जवाब न मिला। चौथे रोज़ जब मैं हस्ब-ए-मा’मूल नागपाड़े में शाम लाल की दुकान पर गया तो उसने मुझसे शिकायत भरे लहजे में कहा, “मंटो साहब, आप तो हमें अपनी कंपनी की कोई बात सुनाते ही नहीं… आप बताना नहीं चाहते या फिर आपको कुछ मालूम ही नहीं होता? पता है आपको, राज भाई ने क्या किया?”

इसके बाद उसने अपने अंदाज़ में ये कहानी शुरू की कि “बन की सुंदरी” में एक सीन था जिसमें डायरेक्टर साहब ने राज भाई को मिस नीलम का मुँह चूमने का आर्डर दिया लेकिन साहब कहाँ राज भाई और कहाँ वो साली टखयाई। राज भाई ने फ़ौरन कह दिया, “ना साहब मैं ऐसा काम कभी नहीं करूंगा। मेरी अपनी पत्नी है, उस गंदी औरत का मुँह चूम कर क्या मैं उसके पवित्र होंटों से अपने होंट मिला सकता हूँ।”

बस साहब फ़ौरन डायरेक्टर साहब को सीन बदलना पड़ा और राज भाई से कहा गया कि अच्छा भई, तुम मुँह न चूमो, हाथ चूम लो, मगर राज साहब ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेलीं। जब वक़्त आया तो उसने इस सफ़ाई से अपना हाथ चूमा कि देखने वालों को यही मालूम हुआ कि उसने उस साली का हाथ चूमा है।” मैंने इस गुफ़्तुगू का ज़िक्र नीलम से न किया, इसलिए कि जब वो इस सारे क़िस्से ही से बेख़बर थी, उसे ख़्वाह-मख़्वाह रंजीदा करने से क्या फ़ायदा।

बंबई में मलेरिया आम है। मालूम नहीं, कौन सा महीना था और कौन सी तारीख़ थी, सिर्फ़ इतना याद है कि “बन की सुंदरी” का पांचवां सेट लग रहा था और बारिश बड़े ज़ोरों पर थी कि नीलम अचानक बहुत तेज़ बुख़ार में मुब्तला हो गई। चूँकि मुझे स्टूडियो में कोई काम नहीं था, इसलिए मैं घंटों उस के पास बैठा उसकी तीमारदारी करता रहता। मलेरिया ने उसके चेहरे की सँवलाहट में एक अ’जीब क़िस्म की दर्द अंगेज़ ज़र्दी पैदा कर दी थी… उसकी आँखों और उसके पतले होंटों के कोनों में जो नाक़ाबिल-ए-बयान तल्ख़ियां घुली रहती थीं, अब उनमें एक बेमालूम बेबसी की झलक भी दिखाई देती थी।

कुनैन के टीकों से उसकी समाअ’त किसी क़दर कमज़ोर हो गई थी। चुनांचे उसे अपनी नहीफ़ आवाज़ ऊंची करना पड़ती थी। उसका ख़याल था कि शायद मेरे कान भी ख़राब हो गए हैं।

एक दिन जब उसका बुख़ार बिल्कुल दूर हो गया था, और वो बिस्तर पर लेटी नक़ाहत भरे लहजे में ईदन बाई की बीमार-पुर्सी का शुक्रिया अदा कर रही थी, नीचे से मोटर के हॉर्न की आवाज़ आई। मैंने देखा कि ये आवाज़ सुन कर नीलम के बदन पर एक सर्द झुरझुरी सी दौड़ गई। थोड़ी देर के बाद कमरे का दबीज़ सागवानी दरवाज़ा खुला और राजकिशोर खादी के सफ़ेद कुर्ते और तंग पाजामे में अपनी पुरानी वज़ा की बीवी के हमराह अंदर दाख़िल हुआ।

ईदन बाई को ईदन बहन कह कर सलाम किया। मेरे साथ हाथ मिलाया और अपनी बीवी को जो तीखे तीखे नक़्शों वाली घरेलू क़िस्म की औरत थी, हम सबसे मुतआ’रिफ़ करा कर के वो नीलम के पलंग पर बैठ गया। चंद लम्हात वो ऐसे ही ख़ला में मुस्कुराता रहा। फिर उसने बीमार नीलम की तरफ़ देखा और मैंने पहली मर्तबा उसकी धुली हुई आँखों में एक गर्द-आलूद जज़्बा तैरता हुआ पाया।

मैं अभी पूरी तरह मुतहय्यर भी न होने पाया था कि उसने खलंडरे आवाज़ में कहना शुरू किया, “बहुत दिनों से इरादा कर रहा था कि आपकी बीमार-पुर्सी के लिए आऊं, मगर इस कमबख़्त मोटर का इंजन कुछ ऐसा ख़राब हुआ कि दस दिन कारख़ाने में पड़ी रही। आज आई तो मैंने (अपनी बीवी की तरफ़ इशारा कर के) शांति से कहा कि भई चलो इसी वक़्त उठो… रसोई का काम कोई और करेगा, आज इत्तिफ़ाक़ से रक्षा बंधन का त्यौहार भी है… नीलम बहन की ख़ैर-ओ-आ’फ़ियत भी पूछ आयेंगे और उनसे रक्षा भी बंधवाएंगे।”

ये कहते हुए उसने अपने खादी के कुरते से एक रेशमी फुंदने वाला गजरा निकाला। नीलम के चेहरे की ज़र्दी और ज़्यादा दर्द अंगेज़ हो गई। राजकिशोर जानबूझ कर नीलम की तरफ़ नहीं देख रहा था, चुनांचे उसने ईदन बाई से कहा, “मगर ऐसे नहीं। ख़ुशी का मौक़ा है, बहन बीमार बन कर रक्षा नहीं बांधेगी।” “शांति, चलो उठो। इनको लिपस्टिक वग़ैरा लगाओ। मेकअप बक्स कहाँ है?” सामने मेंटल पीस पर नीलम का मेकअप बक्स पड़ा था। राजकिशोर ने चंद लंबे लंबे क़दम उठाए और उसे ले आया। नीलम ख़ामोश थी… उसके पतले होंट भिंच गए थे जैसे वो चीख़ें बड़ी मुश्किल से रोक रही है।

जब शांति ने पति व्रता स्त्री की तरह उठ कर नीलम का मेकअप करना चाहा तो उसने कोई मुज़ाहमत पेश न की। ईदन बाई ने एक बेजान लाश को सहारा देकर उठाया और जब शांति ने निहायत ही ग़ैर सनआ’ना तरीक़ पर उसके होंटों पर लिपस्टिक लगाना शुरू की तो वो मेरी तरफ़ देख कर मुस्कुराई… नीलम की ये मुस्कुराहट एक ख़ामोश चीख़ थी।

मेरा ख़याल था… नहीं, मुझे यक़ीन था कि एक दम कुछ होगा… नीलम के भिंचे हुए होंट एक धमाके के साथ वा होंगे और जिस तरह बरसात में पहाड़ी नाले बड़े बड़े मज़बूत बंद तोड़ कर दीवानावार आगे निकल जाते हैं, उसी तरह नीलम अपने रुके हुए जज़्बात के तूफ़ानी बहाव में हम सबके क़दम उखेड़ कर ख़ुदा मालूम किन गहराईयों में धकेल ले जाएगी। मगर तअ’ज्जुब है कि वो बिल्कुल ख़ामोश रही। उसके चेहरे की दर्द अंगेज़ ज़र्दी ग़ाज़े और सुर्ख़ी के गुबार में छुपती रही और वो पत्थर के बुत की तरह बेहिस बनी रही।

आख़िर में जब मेकअप मुकम्मल हो गया तो उसने राजकिशोर से हैरत-अंगेज़ तौर पर मज़बूत लहजे में कहा, “लाईए! अब मैं रक्षा बांध दूं।” रेशमी फुंदनों वाला गजरा थोड़ी देर में राजकिशोर की कलाई में था और नीलम जिसके हाथ काँपने चाहिऐं थे बड़े संगीन सुकून के साथ उसका तुक्मा बंद कर रही थी। इस अ’मल के दौरान में एक मर्तबा फिर मुझे राजकिशोर की धुली हुई आँख में एक गर्द आलूद जज़्बे की झलक नज़र आई जो फ़ौरन ही उसकी हंसी में तहलील होगई।

राजकिशोर ने एक लिफ़ाफ़े में रस्म के मुताबिक़ नीलम को कुछ रुपये दिए जो उसने शुक्रिया अदा कर के अपने तकिए के नीचे रख लिये… जब वो लोग चले गए, मैं और नीलम अकेले रह गए तो उस ने मुझ पर एक उजड़ी हुई निगाह डाली और तकिए पर सर रख कर ख़ामोश लेट गई। पलंग पर राजकिशोर अपना थैला भूल गया था। जब नीलम ने उसे देखा तो पांव से एक तरफ़ कर दिया। मैं तक़रीबन दो घंटे उसके पास बैठा अख़बार पढ़ता रहा। जब उसने कोई बात न की तो मैं रुख़सत लिए बग़ैर चला आया।

इस वाक़िया के तीन रोज़ बाद मैं नागपाड़े में अपनी नौ रुपये माहवार की खोली के अंदर बैठा शेव कर रहा था और दूसरी खोली से अपनी हमसाई मिसेज़ फेर्नेंन्डिज़ की गालियां सुन रहा था कि एक दम कोई अंदर दाख़िल हुआ, मैंने पलट कर देखा, नीलम थी। एक लहज़े के लिए मैंने ख़याल किया कि नहीं, कोई और है… उसके होंटों पर गहरे सुर्ख़ रंग की लिपस्टिक कुछ इस तरह फैली हुई थी जैसे मुँह से ख़ून निकल निकल कर बहता रहा और पोछा नहीं गया… सर का एक बाल भी सही हालत में नहीं था। सफ़ेद साड़ी की बूटियां उड़ी हुई थीं। ब्लाउज़ के तीन चार हुक खुले थे और उसकी सांवली छातियों पर ख़राशें नज़र आ रही थीं।

नीलम को इस हालत में देख कर मुझसे पूछा ही न गया कि तुम्हें क्या हुआ, और मेरी खोली का पता लगा कर तुम कैसे पहुंची हो। पहला काम मैंने ये किया कि दरवाज़ा बंद कर दिया। जब मैं कुर्सी खींच कर उसके पास बैठा तो उसने अपने लिपस्टिक से लिथड़े हुए होंट खोले और कहा, “मैं सीधी यहां आ रही हूँ।” मैंने आहिस्ता से पूछा,“कहाँ से?” “अपने मकान से… और मैं तुमसे ये कहने आई हूँ कि अब वो बकवास जो शुरू हुई थी, ख़त्म हो गई है।” “कैसे?”

“मुझे मालूम था कि वो फिर मेरे मकान पर आएगा। उस वक़्त जब और कोई नहीं होगा! चुनांचे वो आया… अपना थैला लेने के लिए।” ये कहते हुए उसके पतले होंटों पर जो लिपस्टिक ने बिल्कुल बे-शक्ल कर दिए थे, वही ख़फ़ीफ़ सी पुरअसरार मुस्कुराहट नुमूदार हूई, “वो अपना थैला लेने आया था… मैंने कहा चलिए, दूसरे कमरे में पड़ा है। मेरा लहजा शायद बदला हुआ था क्योंकि वो कुछ घबरा सा गया… मैंने कहा घबराईए नहीं… जब हम दूसरे कमरे में दाख़िल हुए तो मैं थैला देने की बजाय ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठ गई और मेकअप करना शुरू कर दिया।”

यहां तक बोल कर वो ख़ामोश हो गई… सामने मेरे टूटे हुए मेज़ पर शीशे के गिलास में पानी पड़ा था। उसे उठा कर नीलम गटा गट पी गई और साड़ी के पल्लू से होंट पोंछ कर उसने फिर अपना सिलसिल-ए-कलाम जारी किया, “मैं एक घंटे तक मेकअप करती रही। जितनी लिपस्टिक होंटों पर थोप सकती थी, मैंने थोपी, जितनी सुर्ख़ी मेरे गालों पर चढ़ सकती थी, मैंने चढ़ाई। वो ख़ामोश एक कोने में खड़ा आईने में मेरी शक्ल देखता रहा। जब मैं बिल्कुल चुड़ैल बन गई तो मज़बूत क़दमों के साथ चल कर मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया।”

“फिर क्या हुआ” मैंने जब अपने सवाल का जवाब हासिल करने के लिए नीलम की तरफ़ देखा तो वो मुझे बिल्कुल मुख़्तलिफ़ नज़र आई। साड़ी से होंट पोंछने के बाद उसके होंटों की रंगत कुछ अ’जीब सी हो गई थी। इसके इलावा उसका लहजा इतना ही दबा हुआ था जितना सुर्ख़ गर्म किए हुए लोहे का, जिसे हथौड़े से कूटा जा रहा है। उस वक़्त तो वो चुड़ैल नज़र नहीं आ रही थी, लेकिन जब उसने मेकअप किया होगा तो ज़रूर चुड़ैल दिखाई देती होगी।

मेरे सवाल का जवाब उसने फ़ौरन ही न दिया… टाट की चारपाई से उठकर वो मेरे मेज़ पर बैठ गई और कहने लगी, “मैंने उसको झिंजोड़ दिया… जंगली बिल्ली की तरह मैं उसके साथ चिमट गई। उस ने मेरा मुँह नोचा, मैंने उसका… बहुत देर तक हम दोनों एक दूसरे के साथ कुश्ती लड़ते रहे।

“ओह… उसमें बला की ताक़त थी… लेकिन… लेकिन… जैसा कि मैं तुमसे एक बार कह चुकी हूँ… मैं बहुत ज़बरदस्त औरत हूँ… मेरी कमज़ोरी… वो कमज़ोरी जो मलेरिया ने पैदा की थी, मुझे बिल्कुल महसूस न हुई। मेरा बदन तप रहा था। मेरी आँखों से चिनगारियां निकल रही थीं… मेरी हड्डियां सख़्त हो रही थीं। मैंने उसे पकड़ लिया।

मैंने उससे बिल्लियों की तरह लड़ना शुरू किया… मुझे मालूम नहीं क्यों… मुझे पता नहीं किसलिए… बे-सोचे समझे मैं उससे भिड़ गई… हम दोनों ने कोई भी ऐसी बात ज़बान से न निकाली जिसका मतलब कोई दूसरा समझ सके… मैं चीख़ती रही…. वो सिर्फ़ हूँ हूँ करता रहा… उसके सफ़ेद खादी के कुरते की कई बूटीयां मैंने इन उंगलियों से नोचीं… उसने मेरे बाल, मेरी कई लटें जड़ से निकाल डालीं, उसने अपनी सारी ताक़त सर्फ़ कर दी। मगर मैंने तहय्या कर लिया था कि फ़तह मेरी होगी… चुनांचे वो क़ालीन पर मुरदे की तरह लेटा था… और मैं इस क़दर हांप रही थी कि ऐसा लगता था कि मेरा सांस एक दम रुक जाएगा… इतना हाँपते हुए भी मैंने उसके कुरते को चिन्दी चिन्दी कर दिया। उस वक़्त मैंने उसका चौड़ा चकला सीना देखा तो मुझे मालूम हुआ कि वो बकवास क्या थी… वही बकवास जिसके मुतअ’ल्लिक़ हम दोनों सोचते थे और कुछ समझ नहीं सकते थे…”

ये कह कर वो तेज़ी से उठ खड़ी हुई और अपने बिखरे हुए बालों को सर की जुंबिश से एक तरफ़ हटाते हुए कहने लगी “सादिक़… कमबख़्त का जिस्म वाक़ई ख़ूबसूरत है… जाने मुझे क्या हुआ। एक दम मैं उसपर झुकी और उसे काटना शुरू कर दिया… वो सी सी करता रहा… लेकिन जब मैंने उसके होंटों से अपने लहू भरे होंट पैवस्त किए और उसे एक ख़तरनाक जलता हुआ बोसा दिया तो वो अंजाम रसीदा औरत की तरह ठंडा हो गया। मैं उठ खड़ी हुई… मुझे उससे एक दम नफ़रत पैदा हो गई… मैंने पूरे ग़ौर से उसकी तरफ़ नीचे देखा… उसके ख़ूबसूरत बदन पर मेरे लहू और लिपस्टिक की सुर्ख़ी ने बहुत ही बदनुमा बेल-बूटे बना दिए थे… मैंने अपने कमरे की तरफ़ देखा तो हर चीज़ मस्नूई नज़र आई। चुनांचे मैंने जल्दी से दरवाज़ा खोला कि शायद मेरा दम घुट जाये और सीधी तुम्हारी पास चली आई।”

ये कह वो ख़ामोश हो गई… मुर्दे की तरह ख़ामोश। मैं डर गया उसका एक हाथ जो चारपाई से नीचे लटक रहा था, मैंने छुवा… आग की तरह गर्म था।
“नीलम… नीलम…”
मैंने कई दफ़ा उसे ज़ोर ज़ोर से पुकारा मगर उसने कोई जवाब न दिया। आख़िर जब मैंने बहुत ज़ोर से ख़ौफ़ज़दा आवाज़ में “नीलम” कहा तो वो चौंकी, और उठ कर जाते हुए उसने सिर्फ़ इस क़दर कहा, “सआदत मेरा नाम राधा है!”

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जम्मू तवी के रास्ते कश्मीर जाइए तो कुद के आगे एक छोटा सा पहाड़ी गांव बटोत आता है। बड़ी पुरफ़िज़ा जगह है। यहां दिक़ के मरीज़ों के लिए एक छोटा सा सिनेटोरियम है। यूं तो आज से आठ नौ बरस पहले बटोत में पूरे तीन महीने गुज़ार चुका हूँ, और इस सेहत अफ़ज़ा मुक़ाम से मेरी जवानी का एक नापुख़्ता रुमान भी वाबस्ता है मगर इस कहानी से मेरी किसी भी कमज़ोरी का तअ’ल्लुक़ नहीं।

छः सात महीने हुए मुझे बटोत में अपने एक दोस्त की बीवी को देखने के लिए जाना पड़ा जो वहां सिनेटोरियम में ज़िंदगी के आख़िरी सांस ले रही थी। मेरे वहां पहुंचते ही एक मरीज़ चल बसा और बेचारी पदमा के सांस जो पहले ही उखड़े हुए थे और भी ग़ैर यक़ीनी होगए। मैं नहीं कह सकता वजह क्या थी लेकिन मेरा ख़याल है कि महज़ इत्तफ़ाक़ था कि चार रोज़ के अंदर अंदर इस छोटे से सिनेटोरियम में तीन मरीज़ ऊपर तले मर गए। जूंही कोई बिस्तर ख़ाली होता या तीमारदारी करते करते थके हुए इंसानों की थकी हुई चीख़ पुकार सुनाई देती, सारे सिनेटोरियम पर एक अजीब क़िस्म की ख़ाकसतरी उदासी छा जाती और वो मरीज़ जो उम्मीद के पतले धागे के साथ चिमटे होते थे, यास की अथाह गहराइयों में डूब जाते।

मेरे दोस्त की बीवी पदमा तो बिल्कुल दमबख़ुद हो जाती। उसके पतले होंटों पर मौत की ज़रदियाँ काँपने लगतीं और उसकी गहरी आँखों में एक निहायत ही रहम अंगेज़ इस्तफ़सार पैदा हो जाता। सब से आगे एक ख़ौफ़ज़दा “क्यों?” और उसके पीछे बहुत से डरपोक “नहीं।” तीसरे मरीज़ की मौत के बाद में बाहर बरामदे में बैठ कर ज़िंदगी और मौत के मुतअ’ल्लिक़ सोचने लगा… सिनेटोरियम एक मर्तबान सा लगता है जिसमें ये मरीज़ प्याज़ की तरह सिरके में डले हुए हैं। एक कांटा आता है और जो प्याज़ अच्छी तरह गल गई है, उसे ढूंढता है और निकाल कर ले जाता है।

ये कितनी मज़हकाख़ेज़ तशबीह थी। लेकिन जाने क्यों बार बार यही मेरे ज़ेहन में आई। मैं इससे ज़्यादा और कुछ न सोच सका कि मौत एक बहुत ही भोंडी चीज़ है… या’नी आप अच्छे भले जी रहे हैं, एक मर्ज़ कहीं से आन चिमटता है और मर जाते हैं। अफ़सानवी नुक़्ता-ए-नज़र से भी ज़िंदगी की कहानी का ये अंजाम कुछ चुस्त मालूम नहीं होता। बरामदे से उठ कर अंदर दाख़िल हुआ। दस-पंद्रह क़दम उठाए होंगे कि पीछे से आवाज़ आई,“दफ़ना आए आप, नंबर बाईस को?”

मैंने मुड़ कर देखा। सफ़ेद बिस्तर पर दो काली आँखें मुस्कुरा रही थीं।
ये आँखें जैसा कि मुझे बाद में मालूम हुआ, एक बंगाली औरत की थीं जो दूसरे मरीज़ों से बिल्कुल अलग तरीक़े पर अपनी मौत का इंतिज़ार कर रही थी। उसने जब ये कहा, “दफ़ना आए आप, नंबर बाईस को?” तो मुझे ऐसा महसूस हुआ कि हम इंसान को नहीं बल्कि एक अदद दफ़ना कर आरहे हैं। और सच पूछिए तो उस मरीज़ को क़ब्र के सपुर्द करते हुए मेरे दिल-ओ-दिमाग़ के किसी कोने में भी ये एहसास पैदा नहीं हुआ था कि वो एक इंसान था, और उसकी मौत से दुनिया में एक ख़ला पैदा हो गया है।

मैं जब मज़ीद गुफ़्तुगू करने के लिए उस बंगाली औरत के पास बैठा जिसकी स्याह फ़ाम आँखें ऐसी हौलनाक बीमारी के बावजूद तर-ओ-ताज़ा और चमकीली थीं तो उसने ठीक उसी तरह मुस्कुरा कर कहा, “मेरा नंबर चार है।” फिर उसने अपनी सफ़ेद चादर की चंद सलवटें अपने उस्तख़्वानी हाथ से दुरुस्त कीं और बड़े बेतकल्लुफ़ अंदाज़ में कहा, “आप मुर्दों को जलाने-दफ़नाने में काफ़ी दिलचस्पी लेते हैं।”

मैंने यूंही सा जवाब दिया, “नहीं तो…” इसके बाद ये मुख़्तसर गुफ़्तुगू ख़त्म हो गई और मैं अपने दोस्त के पास चला गया।
दूसरे रोज़ में हस्ब-ए-मा’मूल सैर को निकला। हल्की हल्की फ़ुवार गिर रही थी, जिससे फ़िज़ा बहुत ही प्यारी और मासूम होगई थी, या’नी जैसे उसको उन मरीज़ों से कोई सरोकार ही नहीं जो उसमें जरासीम भरे सांस ले रहे थे… चीड़ के लाँबे-लाँबे दरख़्त, नीली नीली धुन्द में लिपटी हुई पहाड़ियां, सड़क पर लुढ़कते हुए पत्थर, पस्त क़द मगर सेहतमंद भैंसें। हर तरफ़ ख़ूबसूरती थी… एक पर ए’तिमाद ख़ूबसूरती जिसे किसी चोर का खटका नहीं था। मैं सैर से लौट कर सिनेटोरियम में दाख़िल हुआ तो मरीज़ों के उतरे हुए चेहरों ही से मुझे मालूम होगया कि एक और अ’दद चल बसा है… ग्यारह नंबर, यानी पदमा। उसकी धंसी हुई आँखों में जो खुली रह गई थीं मैंने बहुत से ख़ौफ़ज़दा “क्यों” और उनके पीछे बेशुमार डरपोक “नहीं” मुंजमिद पाए… बेचारी!

पानी बरस रहा था, इसलिए ख़ुश्क ईंधन जमा करने में बड़ी दिक़्क़त का सामना करना पड़ा। बहरहाल, उस ग़रीब की लाश को आग के सपुर्द कर दिया गया। मेरा दोस्त वहीं चिता के पास बैठा रहा और मैं उसका सामान ठीक करने के लिए सिनेटोरियम आ गया… अंदर दाख़िल होते हुए मुझे फिर उस बंगाली औरत की आवाज़ आई,“बहुत देर लग गई आपको!”

“जी हाँ, बारिश की वजह से ख़ुश्क ईंधन नहीं मिल रहा था इसलिए देर हो गई।”
“और जगहों पर तो ईंधन की दुकानें होती हैं, पर मैंने सुना है यहां इधर-उधर से ख़ुद ही लकड़ियां काटनी और चुननी पड़ती हैं।”
“जी हाँ।”
“ज़रा बैठ जाईए।”
मैं उसके पास स्टूल पर बैठ गया तो उसने एक अ’जीब सा सवाल किया, “तलाश करते करते जब आपको ख़ुश्क लकड़ी का टुकड़ा मिल जाता होगा तो आप बहुत ख़ुश होते होंगे?”
उसने मेरे जवाब का इंतिज़ार न किया और अपनी चमकीली आँखों से मुझे बग़ौर देखते हुए कहा, “मौत के मुतअ’ल्लिक़ आपका क्या ख़याल है?”
“मैंने कई बार सोचा है लेकिन समझ नहीं सका।”

वो दानाओं की तरह मुस्कुराई और बच्चों के से अंदाज़ में कहने लगी, “मैं कुछ कुछ समझ सकी हूँ… इसलिए कि बहुत मौतें देख चुकी हूँ… इतनी कि आप शायद हज़ार बरस भी ज़िंदा रह कर न देख सकें। मैं बंगाल की रहने वाली हूँ जहां का क़हत आजकल बहुत मशहूर है। आपको तो पता ही होगा। लाखों आदमी वहां मर चुके हैं… बहुत सी कहानियां छप चुकी हैं। सैंकड़ों मज़मून लिखे जा चुके हैं। फिर भी सुना है कि इंसान की इस बिप्ता का अच्छी तरह नक़्शा नहीं खींचा जा सका। मौत की उसी मंडी में मौत के मुतअ’ल्लिक़ मैंने सोचा।”

मैंने पूछा, “क्या?”
उसने उसी अंदाज़ से जवाब दिया, “मैंने सोचा कि एक आदमी का मरना मौत है… एक लाख आदमियों का मरना तमाशा है। सच कहती हूँ, मौत का वो ख़ौफ़ जो कभी मेरे दिल पर हुआ करता था, बिल्कुल दूर होगया। हर बाज़ार में दस-बीस अर्थियां और जनाज़े नज़र आएं तो क्या मौत का असली मतलब फ़ौत नहीं हो जाएगा?. मैं सिर्फ़ इतना समझ सकी हूँ कि ऐसी बेतहाशा मौतों पर रोना बेकार है… बेवक़ूफ़ी है… अव़्वल तो इतने आदमियों का मरना ही सबसे बड़ी हमाक़त है।”
मैंने फ़ौरन ही पूछा, “किसकी।”

“किसी की भी हो… हमाक़त, हमाक़त है। एक भरे शहर पर आप ऊपर से बम गिरा दीजिए… लोग मर जाऐंगे… कुओं में ज़हर डाल दीजिए… जो भी उनका पानी पीएगा, मर जाएगा। ये काल, क़हत, जंग और बीमारियां सब वाहियात हैं… इनसे मर जाना बिल्कुल ऐसा ही है जैसे ऊपर से छत आ गिरे। लेकिन दिल की एक जायज़ ख़्वाहिश की मौत बहुत बड़ी मौत है… इंसान को मारना कुछ नहीं, लेकिन उसकी फ़ित्रत को हलाक करना बहुत बड़ा ज़ुल्म है।

ये कह कर वो कुछ देर के लिए चुप हो गई लेकिन फिर करवट बदल कर कहने लगी, “मेरे ख़यालात पहले ऐसे नहीं थे। सच पूछिए तो मुझे सोचने का वक़ूफ़ ही नहीं था, लेकिन इस क़हत ने मुझे एक बिल्कुल नई दुनिया में फेंक दिया।” रुक कर एक दम वो मेरी तरफ़ मुतवज्जा हुई। मैं अपनी कापी में याददाशत के तौर पर उसकी चंद बातें नोट कर रहा था।

“ये आप क्या लिख रहे हैं?”
मैंने साफगोई से काम लिया और कहा, “मैं अफ़साना निगार हूँ… जो बातें मुझे दिलचस्प मालूम हों, नोट करलिया करता हूँ।”
“ओह! तो फिर मैं आपको अपनी पूरी कहानी सुनाऊंगी।”
तीन घंटे तक नहीफ़ आवाज़ में वो मुझे अपनी कहानी सुनाती रही। मैं अब अपने अल्फ़ाज़ में उसे बयान करता हूँ। ग़ैर ज़रूरी तफ़सीलात में जाने की ज़रूरत नहीं।

बंगाल में जब क़हत फैला और लोग धड़ा-धड़ मरने लगे तो सकीना को उसके चचा ने एक ओबाश आदमी के पास पाँसौ रुपये में बेच दिया जो उसे लाहौर ले आया और एक होटल में ठहरा कर उस से रुपया कमाने की कोशिश करने लगा। पहला आदमी जो उसके पास इस ग़रज़ से लाया गया एक ख़ूबसूरत और तंदुरुस्त नौजवान था।

क़हत से पहले जब रोटी कपड़े की फ़िक्र नहीं थी, वो ऐसे ही नौजवान के ख़्वाब देखा करती थी जो उसका शौहर बने मगर यहां उस का सौदा किया जा रहा था। एक ऐसे फ़े’ल के लिए उसे मजबूर किया जा रहा था जिसके तसव्वुर ही से वो काँप काँप उठती थी।

जब वो कलकत्ता से लाहौर लाई गई तो उसे मालूम था कि उसके साथ क्या सुलूक होने वाला है। वो बाशऊर लड़की थी। अच्छी तरह जानती थी कि चंद ही रोज़ में उसे एक सिक्का बना कर जगह जगह भुनाया जाएगा। उसको ये सब कुछ मालूम था लेकिन उस क़ैदी की तरह जो रहम की उम्मीद न होने पर भी आस लगाए रहता है, वो किसी नामुमकिन हादिसे की मुतवक़्क़े थी।

ये हादिसा तो न हुआ लेकिन ख़ुद उसमें इतनी हिम्मत पैदा हो गई कि वो रात को कुछ अपनी होशियारी से और कुछ उस नौजवान की ख़ामकारी की बदौलत होटल से भाग निकलने में कामयाब होगई।

अब लाहौर की सड़कें थीं और उनके नए ख़तरे। क़दम क़दम पर ऐसा लगता था कि लोगों की नज़रें उसे खा जाएंगी। लोग उसे कम देखते थे, लेकिन उसकी जवानी को जो छुपने वाली चीज़ नहीं थी, कुछ इतना ज़्यादा घूरते थे, जैसे बर्मे से उसके अंदर सूराख़ कर रहे हैं। सोने-चांदी का कोई ज़ेवर या मोती होता तो वो शायद लोगों की नज़रों से बचा लेती। मगर वो एक ऐसी चीज़ की हिफ़ाज़त कर रही थी जिस पर कोई भी आसानी के साथ हाथ मार सकता था।

तीन दिन और तीन रातें वो कभी इधर कभी उधर घूमती भटकती रही। भूक के मारे उसका बुरा हाल था मगर उसने किसी के आगे हाथ न फैलाया क्योंकि उसे डर था कि उसका ये फैला हुआ हाथ उस की इस्मत समेत किसी अंधेरी कोठरी में खींच लिया जाएगा। दुकानों में सजी हुई मिठाईयां देखती थी, भटियार ख़ानों में लोग बड़े बड़े नवाले उठाते थे। उसके हर तरफ़ खाने-पीने की चीज़ों का बड़ी बेदर्दी से इस्तेमाल होता था… लेकिन जैसे दुनिया में उसके मक़सूम का कोई दाना ही नहीं रहा था।

उसे ज़िंदगी में पहली बार खाने की अहमियत मालूम हुई। पहले उसको खाना मिलता था, अब वो खाने से मिलना चाहती थी। चार रोज़ के फ़ाक़ों ने उसे अपनी ही नज़रों में एक बहुत बड़ा शहीद तो बना दिया लेकिन उसके जिस्म की सारी बुनियादें हिल गईं। वो जो रुहानी तस्कीन होती है एक वक़्त आगया कि वो भी सिकुड़ने लगी।

चौथे रोज़ शाम को वो एक गली में से गुज़र रही थी। जाने क्या जी में आई कि एक मकान के अंदर घुस गई। अंदर चल कर ख़याल आया कि नहीं, कोई पकड़ लेगा और तमाम किए कराए पर पानी फिर जाएगा। अब उसमें इतनी ताक़त भी तो नहीं। लेकिन सोचते सोचते वो सहन के पास पहुंच चुकी थी।

मलगजे अंधेरे में उसने घड़ौंचियों पर दो साफ़ घड़े देखे और उनके साथ ही फलों से भरे हुए दो थाल… सेब… नाशपातियां… अनार… उसने सोचा अनार बकवास है… सेब और नाशपातियां ठीक हैं। घड़े के ऊपर चिपनी के बजाय एक प्याला पड़ा था… उसने तश्तरी उठा कर देखा तो मलाई से पुर था।

उसने उठा लिया और पेशतर इसके कि वो कुछ सोच सके, जल्दी जल्दी उसने नवाले उठाने शुरू किए सारी मलाई उसके पेट में थी… कितना राहत बख़्श लम्हा था। भूल गई कि किसी ग़ैर के मकान में है। वहीं बैठ कर उसने सेब और नाशपातियां खाना शुरू करदीं। घड़ौंची के नीचे कुछ और भी था… यख़्नी… ठंडी थी लेकिन उसने सारी पतीली ख़त्म कर दी। एक दम जाने क्या हुआ, पेट की गहराईयों से गुबार सा उठा और उसका सर चकराने लगा। वो उठ खड़ी हुई। कहीं से खांसी की आवाज़ आई। भागने की कोशिश की मगर चकरा कर गिरी और बेहोश हो गई।

जब होश आया तो वो एक साफ़-सुथरे बिस्तर में लेटी थी। सबसे पहले उसे ख़याल आया, कहीं मैं लूटी तो नहीं गई… लेकिन फ़ौरन ही उसे इत्मिनान हो गया कि वो सही सलामत थी। कुछ और सोचने ही लगी थी कि पतली पतली खांसी की आवाज़ आई। एक हड्डियों का ढांचा कमरे में दाख़िल हुआ। सकीना ने अपने गांव में बहुत से क़हत के मारे इंसान देखे थे मगर ये इंसान उनसे बहुत मुख़्तलिफ़ था। बेचारगी उसकी आँखों में भी थी मगर उसमें वो अनाज की तरसी हुई ख़्वाहिश नहीं थी। उसने पेट के भूके देखे थे जिनकी निगाहों में एक नंगी और भोंडी ललचाहट थी लेकिन उस मर्द की निगाहों में उसे एक चिलमन सी नज़र आई… एक धुँदला पर्दा जिसके पीछे से वो डर डर कर उसकी तरफ़ देख रहा था।

ख़ौफ़ज़दा सकीना को होना चाहिए लेकिन सहमा हुआ वो था… उसने रुक रुक कर कुछ झेंपते हुए अजीब क़िस्म का हिजाब महसूस करते हुए उससे कहा, “जब तुम खा रही थीं तो मैं तुम से दूर खड़ा था… उफ़! मैंने किन मुश्किलों से अपनी खांसी रोके रखी कि तुम आराम से खा सको और मैं ये ख़ूबसूरत मंज़र ज़्यादा देर तक देख सकूं। भूक बड़ी प्यारी चीज़ है। लेकिन एक मैं हूँ कि इस नेअ’मत से महरूम हूँ। नहीं, महरूम नहीं कहना चाहिए क्योंकि मैंने ख़ुद इसको हलाक किया है।” सकीना कुछ भी समझ न सकी… वो एक पहेली थी जो बूझते बूझते एक और पहेली बन जाती थी लेकिन इसके बावजूद सकीना को उसकी बातें अच्छी लगीं जिनमें इंसानियत की गर्मी थी। चुनांचे उस ने अपनी सारी आपबीती उसको सुना दी।

वो ख़ामोश सुनता रहा जैसे उसपर असर ही नहीं हुआ लेकिन जब सकीना उसका शुक्रिया अदा करने लगी तो उसकी आँखें जो आँसूओं से बेनियाज़ मालूम होती थीं एक दम नमनाक होगईं और उसने भर्राई हुई आवाज़ में कहा, “यहीं रह जाओ सकीना… मैं दिक़ का बीमार हूँ। मुझे कोई खाना… कोई फल अच्छा नहीं लगता। तुम खाया करना और मैं तुम्हें देखा करूंगा…” लेकिन फ़ौरन ही वो मुस्कुराने लगा। “क्या हमाक़त है… कोई और सुनता तो क्या कहता… या’नी दूसरा खाया करे और मैं देखा करूंगा। नहीं सकीना… वैसे मेरी दिली ख़्वाहिश है कि तुम यहीं रहो…” सकीना कुछ सोचने लगी, “जी नहीं… मेरा मतलब है आप इस घर में अकेले हैं और मैं… नहीं नहीं… बात ये है कि मैं…”

ये सुन कर उसको कुछ ऐसा सदमा पहुंचा कि वो थोड़ी देर के बिल्कुल खो सा गया। जब बोला तो उसकी आवाज़ खोखली थी, “मैं दस बरस तक स्कूल में लड़कियां पढ़ाता रहा हूं, हमेशा मैंने उनको अपनी बच्चियां समझा… तुम… तुम एक और हो जाओगी।”
सकीना के लिए कोई और जगह ही नहीं थी! चुनांचे उस प्रोफ़ेसर के हाँ ठहर गई। वो एक बरस और चंद महीने ज़िंदा रहा। इस दौरान में बजाय इसके कि सकीना उसकी ख़बरगीरी करती, उल्टा वो जो कि बीमार था, उसको आराइश-ओ-आराम पहुंचाने में कुछ इस बेकली से मसरूफ़ रहा जैसे डाक जाने वाली है और वो जल्दी जल्दी एक ख़त में जो बात उसके ज़ेहन में आती है लिखता जा रहा है। उसकी इस तवज्जो ने सकीना को जिसे तवज्जो की ज़रूरत थी, चंद महीनों में निखार दिया। अब प्रोफ़ेसर उससे कुछ दूर रहने लगा। मगर उसकी तवज्जो में कोई फ़र्क़ न आया।

आख़िरी दिनों में अचानक उसकी हालत ख़राब होगई। एक रात जब कि सकीना उसके पास ही सो रही थी, वो हड़बड़ा कर उठा और ज़ोर से चिल्लाने लगा, “सकीना, सकीना।” ये चीख़ें सुन कर सकीना घबरा गई। प्रोफ़ेसर की धंसी हुई आँखों में वो जो चिलमन सी हुआ करती थी मौजूद नहीं थी। अब एक अथाह दुख सकीना को उनमें नज़र आया। प्रोफ़ेसर ने काँपते हुए हाथों से सकीना के हाथ पकड़े और कहा, “मैं मर रहा हूँ… लेकिन इस मौत का मुझे दुख नहीं… क्योंकि बहुत सी मौतें मेरे अंदर वाक़ा हो चुकी हैं। तुम सुनना चाहती हो मेरी दास्तान… जानना चाहती हो, मैं क्या हूँ? सुनो… मैं एक झूट हूँ… बहुत बड़ा झूट… मेरी सारी ज़िंदगी अपने आपसे झूट बोलने और फिर उसे सच बनाने में गुज़री है। उफ़ कितना तकलीफ़देह ग़ैर-फ़ित्री और ग़ैर-इंसानी काम था।

“मैंने एक ख़्वाहिश को मारा था लेकिन मुझे ये मालूम नहीं था कि इस क़त्ल के बाद मुझे और बहुत से ख़ून करने पड़ेंगे। मैं समझता था कि एक मसाम बंद कर देने से क्या होगा… लेकिन मुझे इसकी ख़बर नहीं थी कि मुझे अपने जिस्म के सारे दरवाज़े बंद करदेने पड़ेंगे… सकीना! ये मैं जो कुछ कह रहा हूँ फ़लसफ़ियाना बकवास है, सीधी बात ये है कि मैं अपना कैरेक्टर ऊंचा करता रहा और ख़ुद इंतिहाई पस्तियों के दलदल में धंसता चला गया।

“मैं मर जाऊंगा और ये कैरेक्टर… ये बेरंग फुरेरा मेरी ख़ाक पर उड़ता रहेगा। वो तमाम लड़कियां जिन्हें में स्कूल में पढ़ाया करता था… कभी मुझे याद करेंगी तो कहेंगी एक फ़रिश्ता था जो इंसानों में चला आया था। तुम भी मेरी नेकियों को नहीं भूलोगी… लेकिन हक़ीक़त ये है कि जबसे तुम इस घर में आई हो… एक लम्हा भी ऐसा नहीं गुज़रा जब मैंने तुम्हारी जवानी को दुज़दीदा निगाहों से न देखा हो।

मैंने तसव्वुर में कई बार तुम्हारे होंटों को चूमा है… कई बार मैंने तुम्हारी बांहों पर अपना सर रखा है… लेकिन हर बार मुझे उन तस्वीरों को पुरज़े पुरज़े करना पड़ा। फिर उन पुर्ज़ों को जला कर मैंने राख बनाई कि उनका नाम-ओ-निशान तक बाक़ी न रहे। मैं मर जाऊंगा… काश मुझ में इतनी हिम्मत होती कि अपने इस ऊंचे कैरेक्टर को एक लंबे बांस पर लंगूर की तरह बिठा देता और डुगडुगी बजा कर लोगों को इकट्ठा करता कि आओ देखो और इबरत हासिल करो।”

इस वाक़िया के बाद प्रोफ़ेसर सिर्फ़ पाँच रोज़ ज़िंदा रहा। सकीना का बयान है कि मरने से पहले वो बहुत ख़ुश था… जब वो आख़िरी सांस ले रहा था तो उसने सकीना से सिर्फ़ इतना कहा, “सकीना! मैं लालची नहीं… ज़िंदगी के ये आख़िरी पाँच दिन मेरे लिए बहुत हैं… मैं तुम्हारा शुक्र गुज़ार हूँ।”

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दो क़ौमें हिंदी कहानी,  Saadat Hasan Manto Ki Kahani Do Qaumein
मुख़्तार ने शारदा को पहली मर्तबा झरनों में से देखा। वो ऊपर कोठे पर कटा हुआ पतंग लेने गया तो उसे झरनों में से एक झलक दिखाई दी। सामने वाले मकान की बालाई मंज़िल की खिड़की खुली थी। एक लड़की डोंगा हाथ में लिए नहा रही थी। मुख़्तार को बड़ा ता’ज्जुब हुआ कि ये लड़की कहाँ से आ गई, क्योंकि सामने वाले मकान में कोई लड़की नहीं थी, जो थीं, ब्याही जा चुकी थीं। सिर्फ़ रूप कौर थी, उसका पिलपिला ख़ाविंद कालू मल था, उसके तीन लड़के थे और बस। मुख़्तार ने पतंग उठाया और ठिटक के रह गया… लड़की बहुत ख़ूबसूरत थी। उसके नंगे बदन पर सुनहरे रोएँ थे। उनमें फंसी हुई पानी की नन्ही नन्ही बूंद्नियाँ चमक रही थीं। उसका रंग हल्का साँवला था, साँवला भी नहीं। ताँबे के रंग जैसा, पानी की नन्ही नन्ही बूंद्नियाँ ऐसी लगती थीं जैसे उस का बदन पिघल कर क़तरे क़तरे बन कर गिर रहा है।

मुख़्तार ने झरने के सुराखों के साथ अपनी आँखें जमा दीं और उस लड़की के जो डोंगा हाथ में लिये नहा रही थी, दिलचस्पी और ग़ौर से देखना शुरू कर दिया। उसकी उम्र ज़्यादा से ज़्यादा सोलह बरस की थी, गीले सीने पर उसकी छोटी छोटी गोल छातियां जिन पर पानी के क़तरे फिसल रहे थे, बड़ी दिलफ़रेब थीं। उसको देख कर मुख़्तार के दिल-ओ-दिमाग़ में सिफ़ली जज़्बात पैदा न हुए। एक जवान, ख़ूबसूरत, और बिल्कुल नंगी लड़की उसकी निगाहों के सामने थी। होना ये चाहिए था कि मुख़्तार के अंदर शहवानी हैजान बरपा हो जाता, मगर वो बड़े ठंडे इन्हेमाक से उसे देख रहा था, जैसे किसी मुसव्विर की तस्वीर देख रहा है।

लड़की के निचले होंट के इख़्ततामी कोने पर बड़ा सा तिल था… बेहद मतीन, बेहद संजीदा, जैसे वो अपने वजूद से बेख़बर है, लेकिन दूसरे उसके वजूद से आगाह हैं, सिर्फ़ इस हद तक कि उसे वहीं होना चाहिए था जहां कि वो था। बाँहों पर सुनहरे रोएँ पानी की बूंदों के साथ लिपटे हुए चमक रहे थे। उसके सर के बाल सुनहरे नहीं, भोसले थे, जिन्हों ने शायद सुनहरे होने से इन्कार कर दिया था। जिस्म सुडौल और गदराया हुआ था लेकिन उसको देखने से इश्तआ’ल पैदा नहीं होता था। मुख़्तार देर तक झरने के साथ आँखें जमाए रहा। लड़की ने बदन पर साबुन मला। मुख़्तार तक उसकी ख़ुश्बू पहुंची। सलोने, ताँबे जैसे रंग वाले बदन पर सफ़ेद सफ़ेद झाग बड़े सुहाने मालूम होते थे। फिर जब ये झाग पानी के बहाव से फ़िस्ले तो मुख़्तार ने महसूस किया जैसे उस लड़की ने अपना बुलबुलों का लिबास बड़े इत्मिनान से उतार कर एक तरफ़ रख दिया है।

ग़ुस्ल से फ़ारिग़ हो कर लड़की ने तौलिये से अपना बदन पोंछा। बड़े सुकून और इत्मिनान से आहिस्ता आहिस्ता कपड़े पहने। खिड़की के डंडे पर दोनों हाथ रखे और सामने देखा। एक दम उसकी आँखें शर्माहट की झीलों में ग़र्क़ हो गईं। उसने खिड़की बंद कर दी। मुख़्तार बेइख़्तयार हंस पड़ा। लड़की ने फ़ौरन खिड़की के पट खोले और बड़े ग़ुस्से में झरने की तरफ़ देखा। मुख़्तार ने कहा, “मैं क़सूरवार बिल्कुल नहीं… आप क्यों खिड़की खोल कर नहा रही थीं।” लड़की ने कुछ न कहा। ग़ैज़ आलूदा निगाहों से झरने को देखा और खिड़की बंद करली।

चौथे दिन रूप कौर आई। उसके साथ यही लड़की थी। मुख़्तार की माँ और बहन दोनों सिलाई और क्रोशिए के काम की माहिर थीं, गली की अक्सर लड़कियां उनसे ये काम सीखने के लिए आया करती थीं। रूप कौर भी उस लड़की को इसी ग़रज़ से लाई थी क्योंकि उसको क्रोशिए के काम का बहुत शौक़ था। मुख़्तार अपने कमरे से निकल कर सहन में आया तो उसने रूप कौर को परनाम किया। लड़की पर उसकी निगाह पड़ी तो वो सिमट सी गई। मुख़्तार मुस्कुरा कर वहां से चला गया।

लड़की रोज़ाना आने लगी। मुख़्तार को देखती तो सिमट जाती। आहिस्ता आहिस्ता उसका ये रद्द-ए-अ’मल दूर हुआ और उसके दिमाग़ से ये ख़याल किसी क़दर मह्व हुआ कि मुख़्तार ने उसे नहाते देखा था। मुख़्तार को मालूम हुआ कि उसका नाम शारदा है। रूप कौर के चचा की लड़की है, यतीम है। चिचो की मल्लियां में एक ग़रीब रिश्तेदार के साथ रहती थी। रूप कौर ने उसको अपने पास बुला लिया। एंट्रेंस पास है, बड़ी ज़हीन है, क्योंकि उसने क्रोशिए का मुश्किल से मुश्किल काम यूं चुटकियों में सीख लिया था।

दिन गुज़रते गए। इस दौरान में मुख़्तार ने महसूस किया कि वो शारदा की मोहब्बत में गिरफ़्तार हो गया है। ये सब कुछ धीरे धीरे हुआ। जब मुख़्तार ने उसको पहली बार झरने में से देखा था तो उस वक़्त उसके सामने एक नज़ारा था, बड़ा फ़रहतनाक नज़ारा। लेकिन अब शारदा आहिस्ता आहिस्ता उसके दिल में बैठ गई थी। मुख़्तार ने कई दफ़ा सोचा था कि ये मोहब्बत का मुआ’मला बिल्कुल ग़लत है, इसलिए कि शारदा हिंदू है। मुस्लमान कैसे एक हिंदू लड़की से मोहब्बत करने की जुरअत कर सकता है। मुख़्तार ने अपने आपको बहुत समझाया लेकिन वो अपने मोहब्बत के जज़्बे को मिटा न सका।

शारदा अब उससे बातें करने लगी थी मगर खुल के नहीं, उसके दिमाग़ में मुख़्तार को देखते ही ये एहसास बेदार हो जाता था कि वो नंगी नहा रही थी और मुख़्तार झरने में से उसे देख रहा था। एक रोज़ घर में कोई नहीं था। मुख़्तार की माँ और बहन दोनों किसी अज़ीज़ के चालीसवें पर गई हुई थीं। शारदा हस्ब-ए-मा’मूल अपना थैला उठाए सुबह दस बजे आई। मुख़्तार सहन में चारपाई पर लेटा अख़बार पढ़ रहा था। शारदा ने उससे पूछा, “बहन जी कहाँ हैं?”

मुख़्तार के हाथ काँपने लगे, “वो… वो कहीं बाहर गई है।”
शारदा ने पूछा, “माता जी?”
मुख़्तार उठ कर बैठ गया, “वो… वो भी उसके साथ ही गई हैं।”
“अच्छा!” ये कह कर शारदा ने किसी क़दर घबराई हुई निगाहों से मुख़्तार को देखा और नमस्ते करके चलने लगी। मुख़्तार ने उसको रोका, “ठहरो शारदा!”
शारदा को जैसे बिजली के करंट ने छू लिया, चौंक कर रुक गई, “जी?”
मुख़्तार चारपाई पर से उठा, “बैठ जाओ… वो लोग अभी आ जाऐंगे!”
“जी नहीं… मैं जाती हूँ।” ये कह कर भी शारदा खड़ी रही।

मुख़्तार ने बड़ी जुरअत से काम लिया, आगे बढ़ा, उसकी एक कलाई पकड़ी और खींच कर उसके होंटों को चूम लिया। ये सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि मुख़्तार और शारदा दोनों को एक लहज़े के लिए बिल्कुल पता न चला कि क्या हुआ है… इसके बाद दोनों लरज़ने लगे। मुख़्तार ने सिर्फ़ इतना कहा, “मुझे माफ़ कर देना!”

शारदा ख़ामोश खड़ी रही। उसका ताँबे जैसा रंग सुर्ख़ी माइल हो गया। होंटों में ख़फ़ीफ़ सी कपकपाहट थी, जैसे वो छेड़े जाने पर शिकायत कर रहे हैं। मुख़्तार अपनी हरकत और उसके नताइज भूल गया। उसने एक बार फिर शारदा को अपनी तरफ़ खींचा और सीने के साथ भींच लिया… शारदा ने मुज़ाहमत न की। वो सिर्फ़ मुजस्समा हैरत बनी हुई थी। वो एक सवाल बन गई थी… एक ऐसा सवाल जो अपने आप से किया गया हो। वो शायद ख़ुद से पूछी रही थी, ये क्या हुआ है, ये क्या हो रहा है? क्या उसे होना चाहिए था… क्या ऐसा किसी और से भी हुआ है?

मुख़्तार ने उसे चारपाई पर बिठा लिया और पूछा, “तुम बोलती क्यों नहीं हो शादरा?”
शादरा के दुपट्टे के पीछे उसका सीना धड़क रहा था। उसने कोई जवाब न दिया। मुख़्तार को उसका ये सुकूत बहुत परेशानकुन महसूस हुआ, “बोलो शारदा, अगर तुम्हें मेरी ये हरकत बुरी लगी है तो कह दो… ख़ुदा की क़सम मैं माफ़ी मांग लूंगा… तुम्हारी तरफ़ निगाह उठा कर नहीं देखूंगा। मैंने कभी ऐसी जुरअत न की होती, लेकिन जाने मुझे क्या हो गया है… दरअसल… दरअसल मुझे तुमसे मोहब्बत है।”

शारदा के होंट हिले जैसे उन्होंने लफ़्ज़ ‘मोहब्बत’ अदा करने की कोशिश की है। मुख़्तार ने बड़ी गर्मजोशी से कहना शुरू किया, “मुझे मालूम नहीं, तुम मोहब्बत का मतलब समझती हो कि नहीं… मैं ख़ुद इसके मुतअ’ल्लिक़ ज़्यादा वाक़फ़ियत नहीं रखता, सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि तुम्हें चाहता हूँ, तुम्हारी सारी हस्ती को अपनी इस मुट्ठी में ले लेना चाहता हूँ। अगर तुम चाहो तो मैं अपनी सारी ज़िंदगी तुम्हारे हवाले कर दूँगा, शारदा तुम बोलती क्यों नहीं हो?”

शारदा की आँखें ख़्वाबगूं हो गईं। मुख़्तार ने फिर बोलना शुरू कर दिया, “मैंने उस रोज़ झरने में से तुम्हें देखा… नहीं। तुम मुझे ख़ुद दिखाई दीं… वो एक ऐसा नज़ारा था जो मैं ता क़ियामत नहीं भूल सकता… तुम शरमाती क्यों हो… मेरी निगाहों ने तुम्हारी ख़ूबसूरती चुराई तो नहीं… मेरी आँखों में सिर्फ़ उस नज़ारे की तस्वीर है… तुम उसे ज़िंदा कर दो तो मैं तुम्हारे पांव चूम लूंगा।” ये कह कर मुख़्तार ने शादरा का एक पांव चूम लिया।

वो काँप गई। चारपाई पर से एक दम उठ कर उसने लर्ज़ां आवाज़ में कहा, “ये आप क्या कर रहे हैं?… हमारे धर्म में…”
मुख़्तार ख़ुशी से उछल पड़ा, “धर्म-वर्म को छोड़ो… प्रेम के धर्म में सब ठीक है।” ये कह कर उसने शारदा को चूमना चाहा। मगर वो तड़प कर एक तरफ़ हटी और बड़े शर्मीले अंदाज़ में मुस्कुराती भाग गई। मुख़्तार ने चाहा कि वो उड़ कर ममटी पर पहुंच जाये। वहां से नीचे सहन में कूदे और नाचना शुरू करदे। मुख़्तार की वालिदा और बहन आ गईं तो शारदा आई। मुख़्तार को देख कर उसने फ़ौरन निगाहें नीची कर लीं। मुख़्तार वहां से खिसक गया कि राज़ इफ़शा न हो। दूसरे रोज़ ऊपर कोठे पर चढ़ा। झरने में से झांका तो देखा कि शारदा खिड़की के पास खड़ी बालों में कंघी कर रही है। मुख़्तार ने उसको आवाज़ दी, “शारदा।” शादरा चौंकी। कंघी उसके हाथ से छूट कर नीचे गली में जा गिरी। मुख़्तार हंसा। शारदा के होंटों पर भी मुस्कुराहट पैदा हुई। मुख़्तार ने उससे कहा, “कितनी डरपोक हो तुम… हौले से आवाज़ दी और तुम्हारी कंघी छूट गई।”

शारद ने कहा, “अब ला के दीजिए नई कंघी मुझे… ये तो मोरी में जागरी है।”
मुख़्तार ने जवाब दिया, “अभी लाऊं।”
शारद ने फ़ौरन कहा, “नहीं नहीं… मैंने तो मज़ाक़ किया है।”
मैंने भी मज़ाक़ किया था, “तुम्हें छोड़कर मैं कंघी लेने जाता? कभी नहीं!”
शारद मुस्कुराई, “मैं बाल कैसे बनाऊं?”
मुख़्तार ने झरने के सुराखों में अपनी उंगलियां डालीं, “ये मेरी उंगलियां ले लो!”
शारद हंसी… मुख़्तार का जी चाहा कि वो अपनी सारी उम्र उस हंसी की छाओं में गुज़ार दे। “शारदा, ख़ुदा की क़सम, तुम हंसी हो, मेरा रोवां रोवां शादमां होगया है… तुम क्यों इतनी प्यारी हो? क्या दुनिया में कोई और लड़की भी तुम जितनी प्यारी होगी… ये कमबख़्त झरने… ये मिट्टी के ज़लील पर्दे। जी चाहता है इनको तोड़ फोड़ दूं।”

शारदा फिर हंसी। मुख़्तार ने कहा, “ये हंसी कोई और न देखे, कोई और न सुने। शारदा सिर्फ़ मेरे सामने हंसना… और अगर कभी हंसना हो तो मुझे बुला लिया करो। मैं इसके इर्दगिर्द अपने होंटों की दीवारें खड़ी कर दूँगा।
शारद ने कहा, “आप बातें बड़ी अच्छी करते हैं।”
“तो मुझे इनाम दो… मोहब्बत की एक हल्की सी निगाह उन झरनों से मेरी तरफ़ फेंक दो… मैं उसे अपनी पलकों से उठा कर अपनी आँखों में छुपा लूंगा।” मुख़्तार ने शारदा के अ’क़ब में दूर एक साया सा देखा और फ़ौरन झरने से हट गया। थोड़ी देर बाद वापस आया तो खिड़की ख़ाली था। शारद जा चुकी थी।
आहिस्ता आहिस्ता मुख़्तार और शारद दोनों शीर-ओ-शकर हो गए। तन्हाई का मौक़ा मिलता तो देर तक प्यार मोहब्बत की बातें करते रहते… एक दिन रूप कौर और उसका ख़ाविंद लाला कालू मल कहीं बाहर गए हुए थे। मुख़्तार गली में से गुज़र रहा था कि उसको एक कंकर लगा। उसने ऊपर देखा, शारदा थी। उसने हाथ के इशारे से उसे बुलाया।

मुख़्तार उसके पास पहुंच गया। पूरा तख़लिया था, ख़ूब घुल मिल के बातें हुईं।
मुख़्तार ने उससे कहा, “उस रोज़ मुझसे गुस्ताख़ी हुई थी और मैंने माफ़ी मांग ली थी। आज फिर गुस्ताख़ी करने का इरादा रखता हूँ, लेकिन माफ़ी नहीं मांगूंगा।” और अपने होंट शारदा के कपकपाते हुए होंटों पर रख दिए।
शारद ने शर्मीली शरारत से कहा, “अब माफ़ी माँगिए।”
“जी नहीं… अब ये होंट आपके नहीं… मेरे हैं, क्या मैं झूट कहता हूँ?”
शारदा ने निगाहें नीची कर के कहा, “ये होंट क्या,मैं ही आपकी हूँ।”

मुख़्तार एक दम संजीदा होगया, “देखो शारदा। हम इस वक़्त एक आतिश फ़िशां पहाड़ पर खड़े हैं तुम सोच लो, समझ लो… मैं तुम्हें यक़ीन दिलाता हूँ। ख़ुदा की क़सम खा कर कहता हूँ कि तुम्हारे सिवा मेरी ज़िंदगी में और कोई औरत नहीं आएगी… मैं क़सम खाता हूँ कि ज़िंदगी भर मैं तुम्हारा रहूँगा। मेरी मोहब्बत साबित क़दम रहेगी… क्या तुम भी इसका अह्द करती हो?”

शारद ने अपनी निगाहें उठा कर मुख़्तार की तरफ़ देखा, “मेरा प्रेम सच्चा है।”
मुख़्तार ने उसको सीने के साथ भींच लिया और कहा, “ज़िंदा रहो… सिर्फ़ मेरे लिए, मेरी मोहब्बत के लिए वक़्फ़ रहो…ख़ुदा की क़सम शारदा। अगर तुम्हारा इलतिफ़ात मुझे न मिलता तो मैं यक़ीनन ख़ुदकुशी कर लेता… तुम मेरी आग़ोश में हो। मुझे ऐसा महसूस होता है कि सारी दुनिया की ख़ुशियों से मेरी झोली भरी हुई है। मैं बहुत ख़ुशनसीब हूँ।”

शारदा ने अपना सर मुख़्तार के कंधे पर गिरा दिया, “आप बातें करना जानते हैं… मुझसे अपने दिल की बात नहीं कही जाती।”
देर तक दोनों एक दूसरे में मुदग़म रहे। जब मुख़्तार वहां से गया तो उसकी रूह एक नई और सुहानी लज़्ज़त से मा’मूर थी। सारी रात वो सोचता रहा। दूसरे दिन कलकत्ते चला गया, जहां उसका बाप कारोबार करता था। आठ दिन के बाद वापस आया। शारदा हस्ब-ए-मा’मूल क्रोशिए का काम सीखने मुक़र्ररा वक़्त पर आई। उसकी निगाहों ने इससे कई बातें कीं, कहाँ ग़ायब रहे इतने दिन? मुझसे कुछ न कहा और कलकत्ते चले गए?… मोहब्बत के बड़े दा’वे करते थे?… मैं नहीं बोलूंगी तुम से… मेरी तरफ़ क्या देखते हो, क्या कहना चाहते हो मुझसे?

मुख़्तार बहुत कुछ कहना चाहता था मगर तन्हाई नहीं थी। वो काफ़ी तवील गुफ़्तगु उससे करना चाहता था। दो दिन गुज़र गए, मौक़ा न मिला। निगाहों ही निगाहों में गूंगी बातें होती रहीं। आख़िर तीसरे रोज़ शारदा ने उसे बुलाया। मुख़्तार बहुत ख़ुश हुआ। रूप कौर और उसका ख़ाविंद लाला कालू मल घर में नहीं थे।

शारदा सीढ़ियों में मिली। मुख़्तार ने वहीं उसको अपने सीने के साथ लगाना चाहा, वो तड़प कर ऊपर चली गई। नाराज़ थी। मुख़्तार ने उससे कहा, “देख मेरी जान, मेरे पास बैठो, मैं तुमसे बहुत ज़रूरी बातें करना चाहता हूँ। ऐसी बातें जिनका हमारी ज़िंदगी से बड़ा गहरा तअ’ल्लुक़ है।”

शारदा उसके पास पलंग पर बैठ गई, “तुम बात टालो नहीं… बताओ मुझे बताए बग़ैर कलकत्ते क्यों गए… सच मैं बहुत रोई।”
मुख़्तार ने बढ़ कर उसकी आँखें चूमीं, “उस रोज़ मैं जब से गया तो सारी रात सोचता रहा… जो कुछ उस रोज़ हुआ उसके बाद ये सोच बिचार लाज़िमी थी। हमारी हैसियत मियां-बीवी की थी। मैंने ग़लती की। तुमने कुछ न सोचा। हमने एक ही जस्त में कई मंज़िलें तय कर लीं और ये ग़ौर ही न किया कि हमें जाना किस तरफ़ है… समझ रही हो ना शारदा?”
शारदा ने आँखें झुका लीं, “जी हाँ।”
“मैं कलकत्ते इसलिए गया था कि अब्बा जी से मशवरा करूं। तुम्हें सुन कर ख़ुशी होगी मैंने उनको राज़ी कर लिया है। मुख़्तार की आँखें ख़ुशी से चमक उठीं। शारदा के दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर उसने कहा, “मेरे दिल का सारा बोझ हल्का हो गया है… मैं अब तुम से शादी कर सकता हूँ।” हिंदी कहानी: दो क़ौमें – सआदत हसन मंटो (Do Qaumein By Saadat Hasan Manto Hindi Story)

शारदा ने हौले से कहा, “शादी।”
“हाँ शादी।”
शारद ने पूछा, “कैसे हो सकती है हमारी शादी?”
मुख़्तार मुस्कुराया, “इसमें मुश्किल ही क्या है… तुम मुसलमान हो जाना!”
शारद एक दम चौंकी, “मुसलमान?”
मुख़्तार ने बड़े इत्मिनान से कहा, “हाँ हाँ… इसके इलावा और हो ही क्या सकता है… मुझे मालूम है कि तुम्हारे घर वाले बड़ा हंगामा मचाएंगे लेकिन मैंने इसका इंतिज़ाम कर लिया है। हम दोनों यहां से ग़ायब हो जाएंगे, सीधे कलकत्ते चलेंगे। बाक़ी काम अब्बा जी के सुपुर्द है। जिस रोज़ वहां पहुंचेंगे उसी रोज़ मौलवी बुला कर तुम्हें मुसलमान बना देंगे। शादी भी उसी वक़्त हो जाएगी।”

शारदा के होंट जैसे किसी ने सी दिए। मुख़्तार ने उसकी तरफ़ देखा, “ख़ामोश क्यों हो गईं?”
शारदा न बोली। मुख़्तार को बड़ी उलझन हुई, “बताओ शारदा क्या बात है?”
शारदा ने बमुश्किल इतना कहा, “तुम हिंदू हो जाओ।”
“मैं हिंदू हो जाऊं?” मुख़्तार के लहजे में हैरत थी। वो हंसा, “मैं हिंदू कैसे हो सकता हूँ?”
“मैं कैसे मुसलमान हो सकती हूँ।” शारदा की आवाज़ मद्धम थी। “तुम क्यों मुसलमान नहीं हो सकतीं… मेरा मतलब है कि…तुम मुझसे मोहब्बत करती हो। इसके इलावा इस्लाम सबसे अच्छा मज़हब है… हिंदू मज़हब भी कोई मज़हब है। गाय का पेशाब पीते हैं। बुत पूजते हैं… मेरा मतलब है कि ठीक है अपनी जगह ये मज़हब भी। मगर इस्लाम का मुक़ाबला नहीं कर सकता।” मुख़्तार के ख़्यालात परेशान थे, “तुम मुसलमान हो जाओगी तो बस… मेरा मतलब है कि सब ठीक हो जाएगा।”

शारदा के चेहरे का ताँबे जैसा ज़र्द रंग ज़र्द पड़ गया, “आप हिंदू नहीं होंगे?”
मुख़्तार हंसा, “पागल हो तुम?”
शारदा का रंग और ज़र्द पड़ गया, “आप जाईए… वो लोग आने वाले हैं।” ये कह कर वो पलंग पर से उठी।
मुख़्तार मुतहय्यर हो गया, “लेकिन शारदा…”
“नहीं नहीं, जाईए आप… जल्दी जाईए… वो आजाऐंगे।” शारदा के लहजे में बेए’तिनाई की सर्दी थी।
मुख़्तार ने अपने ख़ुश्क हलक़ से बमुशकिल ये अलफ़ाज़ निकाले, “हम दोनों एक दूसरे से मोहब्बत करते हैं। शारदा तुम नाराज़ क्यों होगईं?”
“जाओ… चले जाओ… हमारा हिंदू मज़हब बहुत बुरा है… तुम मुसलमान बहुत अच्छे हो।” शारदा के लहजे में नफ़रत थी। वो दूसरे कमरे में चली गई और दरवाज़ा बंद कर दिया। मुख़्तार अपना इस्लाम सीने में दबाये वहां से चला गया।

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शफ़क़त दोपहर को दफ़्तर से आया तो घर में मेहमान आए हुए थे। औरतें थीं जो बड़े कमरे में बैठी थीं। शफ़क़त की बीवी आयशा उनकी मेहमान नवाज़ी में मसरूफ़ थी। जब शफ़क़त सहन में दाख़िल हुआ तो उसकी बीवी बाहर निकली और कहने लगी, “अज़ीज़ साहब की बीवी और उनकी लड़कियाँ आई हैं।” शफ़क़त ने हैट उतार कर माथे का पसीना पोंछा, “कौन अज़ीज़ साहब?” आयशा ने आवाज़ दबा कर जवाब दिया, “हाय, आपके अब्बा जी के दोस्त”। “ओह…अज़ीज़ चचा।” “हाँ, हाँ वही।”

शफ़क़त ने ज़रा हैरत से कहा,“ मगर वो तो अफ़्रीक़ा में थे।” आयशा ने मुँह पर उंगली रखी, “ज़रा आहिस्ता बात कीजिए। आप तो चिल्लाना शुरू कर देते हैं… वो अफ़्रीक़ा ही में थे, लेकिन जो अफ़्रीक़ा में हो क्या वापस नहीं आ सकता?” “लो, अब तुम लगीं मीन मेख़ करने।” “आप तो लड़ने लगे”, आयशा ने एक नज़र अंदर कमरे में डाली, “अज़ीज़ साहब अफ़्रीक़ा में हैं, लेकिन उनकी बीवी अपनी लड़की की शादी करने आई हैं। कोई अच्छा बर ढूंढ रही हैं।”

अंदर से अज़ीज़ की बीवी की आवाज़ आई, “आयशा, तुमने रोक क्यों लिया शफ़क़त को। आने दो… आओ शफ़क़त बेटा, आओ… तुम्हें देखे इतनी मुद्दत हो गई है।” “आया चची जान।” शफ़क़त ने हैट स्टैंड की खूंटी पर रखा और अंदर कमरे में दाख़िल हुआ, “आदाब अर्ज़ चची जान।” अज़ीज़ की बीवी ने उठ कर उसको दुआएँ दीं, सर पर हाथ फेरा और बैठ गई। शफ़क़त बैठने लगा तो उसने देखा कि सामने सोफ़े पर दो गोरी गोरी लड़कियाँ बैठी हैं। एक छोटी थी, दूसरी बड़ी। दोनों की शक्ल आपस में मिलती थी। अज़ीज़ साहब बड़े वजीह आदमी थे। उनकी ये वजाहत उन लड़कियों में बड़े दिलकश तौर पर तक़सीम हुई थी।

आँखें माँ की थीं, नीली। बाल भूरे और काफ़ी लंबे। दोनों की दो चोटियाँ थीं। छोटी का चेहरा बड़ी के मुक़ाबले में ज़्यादा निखरा हुआ था। बड़ी का चेहरा ज़रूरत से ज़्यादा संजीदा था। उनकी माँ उनसे मुख़ातिब हुई, “बेटा सलाम करो भाई को।” छोटी ने उठ कर शफ़क़त को आदाब अर्ज़ किया। बड़ी ने बैठे बैठे ज़रा झुक कर कहा, “तस्लीमात।” शफ़क़त ने मुनासिब ओ मौज़ूँ जवाब दिया। उसके बाद अज़ीज़ साहब और अफ़्रीक़ा के मुतअ’ल्लिक़ बातों का लामतनाही सिलसिला शुरू हो गया। नैरुबी, टांगानेका, दारुस्सलाम, करातेना, युगंडा, इन सबकी बातें हुईं। कहाँ का मौसम अच्छा है, कहाँ का ख़राब है, फल कहाँ अच्छे होते हैं। फलों का ज़िक्र छेड़ा तो छोटी ने कहा, “यहां हिंदुस्तान में तो निहायत ही ज़लील फल मिलते हैं।”

“जी नहीं, बड़े अच्छे फल मिलते हैं, बशर्ते-कि मौसम हो।” शफ़क़त ने अपने हिंदुस्तान की आबरू बचाना चाही। “ग़लत है।” छोटी ने नाक चढ़ाई, “अम्मी जान, ये जो कल आपने मार्किट से माल्टे लिए थे, क्या वहाँ के मचंगों का मुक़ाबला कर सकते हैं।” लड़कियों की माँ बोली, “शफ़क़त बेटा ये सही कहती है। यहाँ के माल्टे वहाँ के मचंगों का मुक़ाबला नहीं कर सकते।” आयशा ने छोटी से पूछा, “तलअ’त, ये मचंगा क्या होता है…नाम तो बड़ा अ’जीब-ओ-ग़रीब है।” तलअ’त मुस्कुराई, “आपा एक फल है। माल्टे और मीठे की तरह… इतना लज़ीज़ होता है कि मैं बयान नहीं कर सकती और रस… एक निचोड़िए… ये गिलास जो तिपाई पर पड़ा है, लबालब भर जाये।”

शफ़क़त ने गिलास की तरफ़ देखा और अंदाज़ा लगाने की कोशिश की कि वो फल कितना बड़ा होगा। “एक मचंगे से इतना बड़ा गिलास भर जाता है?” तलअ’त ने बड़े फ़ख़्रिया अंदाज़ में जवाब दिया, “जी हाँ!” शफ़क़त ने ये सुन कर कहा, “तो फल यक़ीनन बहुत बड़ा होगा।” तलअ’त ने सर हिलाया, “जी नहीं… बड़ा होता है न छोटा… बस आपके यहाँ के बड़े माल्टे के बराबर होता है। यही तो उसकी ख़ूबी है कि रस ही रस होता है उसमें और अम्मी जान वहाँ का अनन्नास… बड़ी रोटी के बराबर उसकी एक क़ाश होती है।”

देर तक अनन्नास की बातें होती रहीं। तलअ’त बहुत बातूनी थी। अफ़्रीक़ा से उसको इशक़ था। वहाँ की हर चीज़ उसको पसंद थी। बड़ी जिसका नाम निकहत था बिल्कुल ख़ामोश बैठी थी। उसने गुफ़्तगु में हिस्सा न लिया। शफ़क़त को जब महसूस हुआ कि वो ख़ामोश बैठी रही है तो वो उससे मुख़ातिब हुआ, “आपको ग़ालिबन इन बातों से कोई दिलचस्पी नहीं।”

निकहत ने अपने होंट खोले, “जी नहीं… सुनती रही हूँ बड़ी दिलचस्पी से।” शफ़क़त ने कहा, “लेकिन आप बोलीं नहीं।” अज़ीज़ की बीवी ने जवाब दिया, “शफ़क़त बेटा इसकी तबीयत ही ऐसी है।” शफ़क़त ने ज़रा बेतकल्लुफ़ी से कहा, “चची जान… इस उम्र में लड़कियों को ख़ामोशी पसंद नहीं होना चाहिए। ये भी कोई बात है कि मुँह में घुनघुनियाँ डाले बैठे रहो।” फिर वो निकहत से मुख़ातिब हुआ, “जनाब आपको बोलना पड़ेगा।” निकहत के होंटों पर एक शर्मीली मुस्कुराहट पैदा हुई, “बोल तो रही हूँ भाई जान।”

शफ़क़त मुस्कुराया, “तस्वीरों से दिलचस्पी है आपको?” निकहत ने निगाहें नीची करके जवाब दिया, “जी है।” “तो उठिए, मैं आपको अपना एलबम दिखाऊँ…दूसरे कमरे में है।” ये कह कर शफ़क़त उठा। “चलिए।” आयशा ने शफ़क़त का हाथ दबाया। पलट कर उसने अपनी बीवी की तरफ़ सवालिया नज़रों से देखा। उसने आँखों ही आँखों में कोई इशारा किया जिसे शफ़क़त न समझ सका। वो मुतहय्यर था कि ख़ुदा मालूम क्या बात थी कि उसकी बीवी ने उसका हाथ दबाया और इशारा भी किया। वो सोच ही रहा था कि तलअ’त खट से उठी, “चलिए भाई जान, मुझे दूसरों के एलबम देखने का शौक़ है। मेरे पास भी एक कलेक्शन है।”

शफ़क़त, तलअ’त के साथ दूसरे कमरे में चला गया। निकहत, ख़ामोश बैठी रही। शफ़क़त, तलअ’त को तस्वीरें दिखाता रहा, हस्ब-ए-आदत तलअ’त बोलती रही। शफ़क़त का दिमाग़ किसी और तरफ़ था। वो निकहत के मुतअ’ल्लिक़ सोच रहा था कि वो इस क़दर ख़ामोश क्यों है। तस्वीरें देखने उसके साथ क्यों न आई। जब उसने उसको चलने के लिए कहा तो आयशा ने उसका हाथ क्यों दबाया। इस इशारे का क्या मतलब था जो उसने आँखों के ज़रिये किया था। तस्वीरें ख़त्म हो गईं। तलअ’त ने एलबम उठाया और शफ़क़त से कहा, “बाजी को दिखाती हूँ। उनको बहुत शौक़ है तस्वीरें जमा करने का।”

शफ़क़त पूछने ही वाला था कि अगर उनको शौक़ है तो वो उसके साथ क्यों न आईं मगर तलअ’त एलबम उठा कर कमरे से निकल गई। शफ़क़त बड़े कमरे में दाख़िल हुआ तो निकहत बड़ी दिलचस्पी से एलबम की तस्वीरें देख रही थी। हर तस्वीर उसको मसर्रत पहुँचाती थी। आयशा लड़कियों की माँ से बातें करने में मशग़ूल देख रही थी। शफ़क़त कनखियों से देखता रहा। उस का चेहरा जो पहले ज़रूरत से ज़्यादा संजीदगी की धुंद में लिपटा था, अब बश्शाश था। ऐसा लगता था कि तस्वीरें जो आर्ट का बेहतरीन नमूना थीं उसको राहत बख़्श रही हैं। उसकी आँखों में अब चमक थी। लेकिन जब एक घोड़े और सेहतमंद औरत की तस्वीर आई तो ये चमक माँद पड़ गई। एक हल्की सी आह उसके सीने में लरज़ी और वहीं दब गई।

तस्वीरें ख़त्म हुईं तो निकहत ने शफ़क़त की तरफ़ देखा और बड़े प्यारे अंदाज़ में कहा, “भाई जान शुक्रिया!” शफ़क़त ने एलबम निकहत के हाथ से लिया और मैंटल पीस पर रख दिया। उसके दिमाग़ में खुद बुद् हो रही थी। उसको ऐसा लगता था कि कोई बहुत बड़ा इसरार इस लड़की की ज़िंदगी के साथ वाबस्ता है। उसने सोचा, शायद कोई नामुकम्मल रुमान हो, या कोई नफ़सियाती हादिसा। चाय आई तो शफ़क़त, निकहत से मुख़ातिब हुआ, “उठिए, चाय बनाइऐ,ये प्रिविलेज लेडीज़ का है।”

निकहत ख़ामोश रही लेकिन तलअ’त फुदक कर उठी, “भाई जान, मैं बनाती हूँ।” निकहत का चेहरा फिर धुंद में मलफ़ूफ़ हो गया। शफ़क़त का तजस्सुस बढ़ता गया। एक बार जब उस ने ग़ैर इरादी तौर पर निकहत को घूर के देखा तो वो सिटपिटा सी गई। शफ़क़त को दिल ही दिल में इस बात का अफ़सोस हुआ कि उसने क्यों ऐसी ना ज़ेबा हरकत की।

चाय पर इधर उधर की बेशुमार बातें हुईं। तलअ’त ने इनमें सब से ज़्यादा हिस्सा लिया। टेनिस का ज़िक्र आया तो उसने शफ़क़त को बड़े फ़ख़्रिया अंदाज़ में जो शेख़ी की हद तक जा पहुँचा था, बताया कि वो नैरुबी में नंबर वन टेनिस प्लेयर थी और पंद्रह-बीस कप जीत चुकी थी। निकहत बिल्कुल ख़ामोश रही, उसकी ख़ामोशी बड़ी उदास थी। साफ़ अ’याँ था कि उसको इस बात का एहसास है कि वो ख़ामोश है।

एक बात जो शफ़क़त ने ख़ास तौर पर नोट की, ये थी कि अज़ीज़ की बीवी की ममता का रुख़ ज़्यादातर निकहत की तरफ़ था। उसने ख़ुद उठ कर बड़े प्यार मुहब्बत से उसको क्रीम रोल दिए। मुँह पोंछने के लिए अपना रूमाल दिया। उससे कोई बात करती थी तो इसमें प्यार भी होता था। ऐसा लगता था कि वो बातों के ज़रिये से भी उसके सर पर मुहब्बत भरा हाथ फेर रही है या उसको चुमकार रही है।

रुख़स्त का वक़्त आया तो अज़ीज़ की बीवी उठी, बुर्क़ा उठाया, आयशा से गले मिली। शफ़क़त को दुआएँ दीं और निकहत के पास जा कर आँखों में आँसू ला देने वाले प्यार से कहा, “चलो बेटा चलें।”

तलअ’त फुदक कर उठी। अज़ीज़ की बीवी ने निकहत का एक बाज़ू थामा, दूसरा बाज़ू तलअ’त ने पकड़ा। उसको उठाया गया… शफ़क़त ने देखा कि उसका निचला धड़ बिल्कुल बेजान है। एक लहज़े के लिए शफ़क़त का दिल-ओ-दिमाग़ साकित हो गया, जब वो सँभला तो उसे अपने अंदर एक टीस सी उठती महसूस हुई।

लड़खड़ाती हुई टांगों पर माँ और बहन का सहारा लिए निकहत ग़ैर यक़ीनी क़दम उठा रही थी। उस ने माथे के क़रीब हाथ ले जा कर शफ़क़त और आयशा को आदाब अर्ज़ किया। कितना प्यारा अंदाज़ था। मगर उसके हाथ ने शफ़क़त के दिल पर जैसे घूंसा मारा… सारा इसरार उस पर वाज़ेह हो गया था। सबसे पहला ख़याल उसके दिमाग़ में ये आया, “क़ुदरत क्यों इतनी बेरहम है…ऐसी प्यारी लड़की और उसके साथ इस क़दर ज़ालिमाना बहीमाना सलूक… उस मासूम का आख़िर गुनाह क्या था, जिस की सज़ा इतनी कड़ी दी गई?”

सब चले गए। आयशा उनको बाहर तक छोड़ने गई। शफ़क़त एक फ़लसफ़ी बन कर सोचता रह गया, इतने में शफ़क़त के दोस्त आगए और वो भी अपनी बीवी से निकहत के बारे में कोई बात न कर सका… अपने दोस्तों के साथ ताश खेलने में ऐसा मशग़ूल हुआ कि निकहत और उसके रोग को भूल गया। जब रात हो गई और आयशा ने उसे नौकर के ज़रिये से खाने पर बुलवाया तो उसे अफ़सोस हुआ कि उसने महज़ एक खेल की ख़ातिर निकहत को फ़रामोश कर दिया, चुनांचे उसका ज़िक्र उसने आयशा से भी किया, लेकिन उसने कहा, “आप खाना खाईए, मुफ़स्सल बातें फिर हो जाएँगी।”

मियाँ-बीवी दोनों इकट्ठे सोते थे। जब से उनकी शादी हुई थी वो कभी रात को एक दूसरे से जुदा नहीं हुए थे, और उनकी शादी को क़रीब क़रीब छः बरस हो गए थे, मगर इस दौरान में कोई बच्चा न हुआ था। डाक्टरों का ये कहना था कि आयशा में कुछ क़ुसूर है जो सिर्फ़ ऑप्रेशन से दूर हो सकता है, मगर वो इससे बहुत ख़ाइफ़ थी। मियाँ-बीवी बहुत प्यार-मुहब्बत की ज़िंदगी गुज़ार रहे थे। उनके दरमियान कोई रंजिश नहीं थी।

रात को वो इकट्ठे लेटते। हस्ब-ए-मा’मूल जब एक दूसरे के साथ लेटे तो शफ़क़त को निकहत याद आई। उसने एक आह भर कर अपनी बीवी से पूछा, “आयशा, निकहत बेचारी को क्या रोग है?” आयशा ने भी आह भरी और बड़े अफ़सोसनाक लहजे में कहा, “तीन बरस की नन्ही मुन्नी बच्ची थी कि तप-ए-मोहरक़ा हुआ। निचला धड़ मफ़लूज हो गया।” शफ़क़त के दिल में निकहत के लिए हमदर्दी का बेपनाह जज़्बा पैदा हुआ। उसने अपनी बीवी की पीठ को अपने सीने के साथ लगा लिया और कहा, “आयशा, ख़ुदा क्यों इतना ज़ालिम है?”

आयशा ने कोई जवाब न दिया। शफ़क़त को दिन के वाक़ियात याद आने लगे। जब मैंने उससे कहा था कि चलो, मैं तुम्हें एलबम दिखाता हूँ तो तुमने मेरा हाथ इसीलिए दबाया था कि…” “हाँ हाँ, और क्या? आप तो बार बार…” “खु़दा की क़सम मुझे मालूम न था।” “उसको इसका बहुत एहसास है कि वो अपाहिज है।” “तुमने ये कहा है तो मुझे ऐसा मालूम हुआ है कि मेरे सीने में किसी ने तीर मारा है?” “जब वो आई, तो ख़ुदा की क़सम मुझे बहुत दुख हुआ… बेचारी को पेशाब करना था। माँ और छोटी बहन साथ गईं। इज़ारबंद खोला…फिर बंद किया। कितनी ख़ूबसूरत है…बैठी हो…” “तो ख़ुदा की क़सम बिल्कुल पता नहीं चलता कि फ़ालिजज़दा है।”

“बड़ी ज़हीन लड़की है।” “अच्छा?” “माँ कहती थी कि उसने कहा था कि अम्मी जान मैं शादी नहीं करूंगी, कुंवारी रहूँगी!” शफ़क़त थोड़ी देर के लिए ख़ामोश हो गया। उसके बाद उसने इंतिहाई दुख महसूस करते हुए कहा, “तो उसको इस बात का एहसास है कि उससे शादी करने के लिए कोई रज़ामंद नहीं होगा।” आयशा ने शफ़क़त की छाती के बालों में उंगलियों से कंघी करते हुए कहा, “शफ़क़त साहब, कौन शादी करेगा एक अपाहिज से?” “नहीं, नहीं ऐसा न कहो, आयशा!” “इतनी बड़ी क़ुर्बानी कौन कर सकता है शफ़क़त साहब?”

“तुम ठीक कहती हो।” “ख़ूबसूरत है, अच्छे खाते-पीते माँ-बाप की लड़की है, सब ठीक है, मगर…” “मैं समझता हूँ… लेकिन…” “मर्दों के दिल में रहम कहाँ?” शफ़क़त ने करवट बदली, “ऐसा न कहो, आयशा।” आयशा ने भी करवट बदली। दोनों रूबरू हो गए, “मैं सब जानती हूँ, कोई ऐसा मर्द ढूँढिए जो उस बेचारी से शादी करने पर आमादा हो।”“मुझे मालूम नहीं,लेकिन…” “बड़ी बहन है, ग़रीब को कितना बड़ा दुख है कि उसकी छोटी बहन की शादी की बातचीत हो रही है।” “सही कहती हो तुम!”

आयशा ने एक लंबी आह भरी, “क्या बेचारी इसी तरह सारी उम्र कुढ़ती रहेगी?” “नहीं!” ये कह कर शफ़क़त उठ कर बैठ गया। आयशा ने पूछा, “क्या मतलब?” “तुम्हें उससे हमदर्दी है?” “क्यों नहीं?” “ख़ुदा की क़सम खा कर कहो।” “हाय, ये भी कोई क़सम खिलवाने की बात है, हर इंसान को उससे हमदर्दी होनी चाहिए।” शफ़क़त ने चंद लम्हात ख़ामोश रहने के बाद कहा, “तो मैंने एक बात सोची है।” आयशा ने ख़ुश हो कर कहा “क्या?”

“मुझे हमेशा इस बात का एहसास रहा है तुम बहुत बलंद ख़्याल की औरत हो। आज तुमने मेरे इस ख़याल को साबित कर दिया है… मैंने… ख़ुदा मेरे इस इरादे को इस्तिक़ामत बख़्शे। मैंने इरादा कर लिया है कि मैं निकहत से शादी कर लूंगा…सारा सवाब तुम्हें मिलेगा।” थोड़ी देर ख़ामोशी रही, फिर एकदम जैसे गोला सा फटा, “शफ़क़त साहब, मैं गोली मार दूंगी उसे, अगर आपने उससे शादी की…” शफ़क़त ने ऐसा महसूस किया कि उसे ज़बरदस्त गोली लगी है और वो मर कर अपनी बीवी की आग़ोश में दफ़न हो गया है।

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सड़क के किनारे हिंदी कहानी, Saadat Hasan Manto Ki Kahani Sadak Ke Kinaare
“यही दिन थे… आसमान उसकी आँखों की तरह ऐसा ही नीला था जैसा कि आज है। धुला हुआ, निथरा हुआ… और धूप भी ऐसी ही कुनकुनी थी… सुहाने ख़्वाबों की तरह। मिट्टी की बॉस भी ऐसी ही थी जैसी कि इस वक़्त मेरे दिल-ओ-दिमाग़ में रच रही है और मैंने इसी तरह लेटे लेटे अपनी फड़फड़ाती हुई रूह उसके हवाले कर दी थी।”

“उनने मुझ से कहा था… तुमने मुझे जो ये लम्हात अता किए हैं यक़ीन जानो, मेरी ज़िंदगी उनसे ख़ाली थी… जो ख़ाली जगहें तुम ने आज मेरी हस्ती में पुर की हैं, तुम्हारी शुक्रगुज़ार हैं। तुम मेरी ज़िंदगी में न आतीं तो शायद वो हमेशा अधूरी रहती… मेरी समझ में नहीं आता। मैं तुम से और क्या कहूं… मेरी तकमील हो गई है। ऐसे मुकम्मल तौर पर कि महसूस होता है मुझे अब तुम्हारी ज़रूरत नहीं रही… और वो चला गया… हमेशा के लिए चला गया।”

“मेरी आँखें रोईं… मेरा दिल रोया… मैंने उसकी मिन्नत समाजत की। उससे लाख मर्तबा पूछा कि मेरी ज़रूरत अब तुम्हें क्यों नहीं रही… जबकि तुम्हारी ज़रूरत… अपनी तमाम शिद्दतों के साथ अब शुरू होई है। उन लम्हात के बाद जिन्होंने बक़ौल तुम्हारे, तुम्हारी हस्ती की ख़ाली जगहें पुर की हैं।”

उसने कहा, “तुम्हारे वजूद के जिस जिस ज़र्रे की मेरी हस्ती की तामीर-ओ-तकमील को ज़रूरत थी, ये लम्हात चुन चुन कर देते रहे… अब कि तकमील हो गई है तुम्हारा मेरा रिश्ता ख़ुद-ब-ख़ुद ख़त्म हो गया है।”

किस क़दर ज़ालिमाना लफ़्ज़ थे… मुझसे ये पथराव बर्दाश्त न किया गया… मैं चीख़ चीख़ कर रोने लगी… मगर उस पर कुछ असर न हुआ, मैंने उससे कहा, “ये ज़र्रे जिनसे तुम्हारी हस्ती की तकमील हुई है, मेरे वजूद का एक हिस्सा थे… क्या इनका मुझसे कोई रिश्ता नहीं… क्या मेरे वजूद का बक़ाया हिस्सा उनसे अपना नाता तोड़ सकता है? तुम मुकम्मल हो गए हो… लेकिन मुझे अधूरा कर के… क्या मैंने इसीलिए तुम्हें अपना माबूद बनाया था?”

उसने कहा, “भौंरे, फूलों और कलियों का रस चूस चूस कर शहीद कशीद करते हैं, मगर वो उसकी तलछट तक भी उन फूलों और कलियों के होंटों तक नहीं लाते… ख़ुदा अपनी परस्तिश कराता है, मगर ख़ुद बंदगी नहीं करता… अदम के साथ ख़ल्वत में चंद लम्हात बसर करके उसने वजूद की तकमील की… अब अदम कहाँ है… उसकी अब वजूद को क्या ज़रूरत है। वो एक ऐसी माँ थी जो वजूद को जन्म देते ही ज़चगी के बिस्तर पर फ़ना हो गई थी।”

औरत रो सकती है… दलीलें पेश नहीं कर सकती… उसकी सबसे बड़ी दलील उसकी आँख से ढलका हुआ आँसू है… मैंने उससे कहा, “देखो… मैं रो रही हूँ… मेरी आँखें आँसू बरसा रही हैं तुम जा रहे हो तो जाओ, मगर इनमें से कुछ आँसूओं को तो अपने रूमाल के कफ़न में लपेट कर साथ लेते जाओ… मैं तो सारी उम्र रोती रहूंगी… मुझे इतना तो याद रहेगा कि चंद आँसूओं के कफ़न-दफ़न का सामान तुमने भी किया था… मुझे ख़ुश करने के लिए!”

उसने कहा, “मैं तुम्हें ख़ुश कर चुका हूँ… तुम्हें उस ठोस मसर्रत से हमकनार कर चुका हूँ जिसके तुम सराब ही देखा करती थीं… क्या उसका लुत्फ़ उसका कैफ़, तुम्हारी ज़िंदगी के बक़ाया लम्हात का सहारा नहीं बन सकता। तुम कहती हो कि मेरी तकमील ने तुम्हें अधूरा कर दिया है… लेकिन ये अधूरापन ही क्या तुम्हारी ज़िंदगी को मुतहर्रिक रखने के लिए काफ़ी नहीं… मैं मर्द हूँ… आज तुमने मेरी तकमील की है… कल कोई और करेगा… मेरा वजूद कुछ ऐसे आब-ओ-गिल से बना है जिसकी ज़िंदगी में ऐसे कई लम्हात आयेंगे जब वो ख़ुद को तिश्ना-ए-तकमील समझेगा… वो तुम जैसी कई औरतें आयेंगी जो उन लम्हात की पैदा की हुई ख़ाली जगहें पुर करेंगी।”

मैं रोती रही, झुँझलाती रही। मैं ने सोचा… ये चंद लम्हात जो अभी अभी मेरी मुट्ठी में थे… नहीं… मैं उन लम्हात की मुट्ठी में थी… मैंने क्यों ख़ुद को उनके हवाले कर दिया… मैंने क्यों अपनी फड़फड़ाती रूह उनके मुँह खोले क़फ़स में डाल दी… उसमें मज़ा था।

एक लुत्फ़ था… एक कैफ़ था… था, ज़रूर था और ये उसके और मेरे तसादुम में था… लेकिन… ये क्या कि वो साबित-ओ-सालिम रहा… और मुझ में तरेड़े पड़ गए… ये क्या, कि वो अब मेरी ज़रूरत महसूस नहीं करता… लेकिन मैं और भी शिद्दत से उसकी ज़रूरत महसूस करती हूँ… वो ताक़तवर बन गया है। मैं नहीफ़ हो गई हूँ… ये क्या कि आसमान पर दो बादल हमआग़ोश हों… एक रो रो कर बरसने लगा, दूसरा बिजली का कौंदा बन कर उस बारिश से खेलता, कुदकड़े लगाता भाग जाये… ये किसका क़ानून है?… आसमानों का?… ज़मीनों का… या उनके बनाने वालों का?

मैं सोचती रही और झुँझलाती रही। दो रूहों का सिमट कर एक हो जाना और एक हो कर वालिहाना वुसअत इख़्तियार कर जाना… क्या ये सब शायरी है… नहीं, दो रूहें सिमट कर ज़रूर उस नन्हे से नुक्ते पर पहुंचती हैं जो फैल कर कायनात बनता है… लेकिन इस कायनात में एक रूह क्यों कभी कभी घायल छोड़ दी जाती है… क्या इस क़सूर पर कि उसने दूसरी रूह को उस नन्हे से नुक्ते पर पहुंचने में मदद थी।

ये कैसी कायनात है। यही दिन थे… आसमान की आँखों की तरह ऐसा ही नीला था जैसा कि आज है और धूप भी ऐसी ही कुनकुनी थी और मैंने उसी तरह लेटे लेटे अपनी फड़फड़ाती हुई रूह उसके हवाले कर दी थी… वो मौजूद नहीं है… बिजली का कौंदा बन कर जाने वो किन बदलियों की गिर्या-ओ-ज़ारी से खेल रहा है… अपनी तकमील कर के चला गया। एक साँप था जो मुझे डस कर चला गया… लेकिन अब उसकी छोड़ी हुई लकीर क्यों मेरे पेट में करवटें ले रही है… क्या ये मेरी तकमील हो रही है?

नहीं, नहीं… ये कैसी तकमील हो सकती है… ये तो तख़्रीब है। लेकिन ये मेरे जिस्म की ख़ाली जगहें पुर हो रही हैं… ये जो गढ़्ढ़े थे किस मल्बे से पुर किए जा रहे हैं… मेरी रगों में ये कैसी सरसराहटें दौड़ रही हैं… मैं सिमट कर अपने पेट में किस नन्हे से नुक्ते पर पहुंचने के लिए पेच-ओ-ताब खा रही हूँ… मेरी नाव डूब कर अब किन समुंदरों में उभरने के लिए उठ रही है?

ये मेरे अंदर दहकते हुए चूल्हों पर किस मेहमान के लिए दूध गर्म किया जा रहा है… ये मेरा दिल मेरे ख़ून को धुनक धुनक कर किसके लिए नर्म-ओ-नाज़ुक रज़ाइयां तैयार कर रहा है। ये मेरा दिमाग़ मेरे हालात के रंग बिरंग धागों से किसके लिए नन्ही-मुन्नी पोशाकें बुन रहा है?

मेरा रंग किसके लिए निखर रहा है… मेरे अंग-अंग और रोम-रोम में फंसी हुई हिचकियां लोरियों में क्यों तबदील हो रही हैं? यही दिन थे… आसमान उसकी आँखों की तरह ऐसा ही नीला था जैसा कि आज है… लेकिन ये आसमान अपनी बुलंदियों से उतर कर क्यों मेरे पेट में तन गया है… उसकी नीली नीली आँखें क्यों मेरी रगों में दौड़ती फिरती हैं?

मेरे सीने की गोलाइयों में मस्जिदों के मेहराबों ऐसी तक़दीस क्यों आ रही है? नहीं, नहीं… ये तक़दीस कुछ भी नहीं… मैं इन मेहराबों को ढहा दूंगी… मैं अपने अंदर तमाम चूल्हे सर्द कर दूँगी जिन पर बिन बुलाए मेहमान की ख़ातिर हाडियां चढ़ी हैं… मैं अपने ख़यालात के तमाम रंग बिरंग धागे आपस में उलझा दूंगी।

यही दिन थे… आसमान उसकी आँखों की तरह ऐसा ही नीला था जैसा कि आज है… लेकिन मैं वो दिन क्यों याद करती हूँ जिनके सीने पर से वो अपने नक़श-ए-क़दम भी उठा कर ले गया था। लेकिन ये… ये नक़श-ए-क़दम किसका है… ये जो मेरे पेट की गहराइयों में तड़प रहा है… क्या यह मेरा जाना पहचाना नहीं? मैं उसे खुरच दूंगी… उसे मिटा दूंगी… ये रसोली है… फोड़ा है… बहुत ख़ौफ़नाक फोड़ा।

लेकिन मुझे क्यों महसूस होता है कि ये फाहा है… फाहा है तो किस ज़ख़्म का? उस ज़ख़्म का जो वो मुझे लगा कर चला गया था?… नहीं नहीं… ये तो ऐसा लगता है किसी पैदाइशी ज़ख़्म के लिए है… ऐसे ज़ख़्म के लिए जो मैं ने कभी देखा ही नहीं था… जो मेरी कोख में जाने कब से सो रहा था। ये कोख क्या? फ़ुज़ूल सी मिट्टी की हन्डकुलिया… बच्चों का खिलौना। मैं इसे तोड़ फोड़ दूंगी। लेकिन ये कौन मेरे कान में कहता है। ये दुनिया एक चौराहा है… अपना भांडा क्यों इसमें फोड़ती है… याद रख तुझ पर उंगलियां उठेंगी।

उंगलियां उधर क्यों न उठेंगी, जिधर वो अपनी हस्ती मुकम्मल कर के चला गया था… क्या उन उंगलियों को वो रास्ता मालूम नहीं… ये दुनिया एक चौराहा है… लेकिन उस वक़्त तो वो मुझे एक दोराहे पर छोड़ कर चला गया था… इधर भी अधूरापन था। उधर भी अधूरा पन… इधर भी आँसू, उधर भी आँसू। लेकिन ये किसका आँसू, मेरे सीप में मोती बन रहा है… ये कहाँ बंधेगा? उंगलियां उठेंगी… जब सीप का मुँह खुले और मोती फिसल कर बाहर चौराहे में गिर पड़ेगा तो उंगलियां उठेंगी… सीपी की तरफ़ भी और मोती की तरफ़ भी… और ये उंगलियां संपोलियां बन बन कर उन दोनों को डसेंगी और अपने ज़हर से उनको नीला कर देंगी।

आसमान उसकी आँखों की तरह ऐसा ही नीला था जैसा कि आज है… ये गिर क्यों नहीं पड़ता… वो कौन से सुतून हैं जो उसको थामे हुए हैं… क्या उस दिन जो ज़लज़ला आया था वो उन सुतूनों की बुनियादें हिला देने के लिए काफ़ी नहीं था… ये क्यों अब तक मेरे सर के ऊपर उसी तरह तना हुआ है?

मेरी रूह पसीने में ग़र्क़ है… उसका हर मसाम खुला हुआ है। चारों तरफ़ आग दहक रही है… मेरे अंदर कठाली में सोना पिघल रहा है… धोंकनियां चल रही हैं, शोले भड़क रहे हैं। सोना, आतिश फ़िशां पहाड़ के लावे की तरह उबल रहा है… मेरी रगों में नीली आँखें दौड़ दौड़ कर हांप रही हैं… घंटियां बज रही हैं… कोई आ रहा है… कोई आ रहा है।

बंद कर दो.. .बंद कर दो किवाड़… कठाली उलट गई है… पिघला हुआ सोना बह रहा है… घंटियां बज रही हैं… वो आ रहा है… मेरी आँखें मुंद रही हैं… नीला आसमान गदला हो कर नीचे आ रहा है। ये किसके रोने की आवाज़ है… उसे चुप कराओ… उसकी चीख़ें मेरे दिल पर हथौड़े मार रही हैं… चुप कराओ… उसे चुप कराओ… उसे चुप कराओ.. .मैं गोद बन रही हूँ… मैं क्यों गोद बन रही हूँ? मेरी बांहें खुल रही हैं… चूल्हों पर दूध उबल रहा है… मेरे सीने की गोलाइयाँ प्यालियां बन रही हैं… लाओ इस गोश्त के लोथड़े को मेरे दिल के धुनके हुए ख़ून के नर्म-नर्म गालों में लेटा दो।

मत छीनो… मत छीनो उसे… मुझसे जुदा न करो। ख़ुदा के लिए मुझ से जुदा न करो। उंगलियां… उंगलियां… उठने दो उंगलियां… मुझे कोई पर्वा नहीं… ये दुनिया चौराहा है… फूटने दो मेरी ज़िंदगी के तमाम भाँडे। मेरी ज़िंदगी तबाह हो जाएगी? हो जाने दो… मुझे मेरा गोश्त वापस दे दो… मेरी रूह का ये टुकड़ा मुझसे मत छीनो… तुम नहीं जानते ये कितना क़ीमती है… ये गौहर है जो मुझे उन चंद लम्हात ने अता किया है… उन चंद लम्हात ने जिन्होंने मेरे वजूद के कई ज़र्रे चुन-चुन कर किसी की तकमील की थी और मुझे अपने ख़याल में अधूरा छोड़ के चले गए थे… मेरी तकमील आज हुई है।

मान लो… मान लो… मेरे पेट के खला से पूछो… मेरी दूध भरी हुई छातियों से पूछो… उन लोरियों से पूछो, जो मेरे अंग-अंग और रोम-रोम में तमाम हिचकियां सुला कर आगे बढ़ रही हैं… उन झूलनों से पूछो जो मेरे बाज़ूओं में डाले जा रहे हैं। मेरे चेहरे की ज़र्दियों से पूछो जो गोश्त के इस लोथड़े के गालों को अपनी तमाम सुर्खियां छुपाती रही हैं… उन सांसों से पूछो, जो छुपे चोरी उसको उसका हिस्सा पहुंचाते रहे हैं।

उंगलियां… उठने दो उंगलियां… मैं उन्हें काट डालूंगी… शोर मचेगा… मैं ये उंगलियां उठा कर अपने कानों में ठूंस लूंगी… मैं गूंगी हो जाऊंगी, बहरी हो जाऊंगी, अंधी हो जाऊंगी… मेरा गोश्त, मेरे इशारे समझ लिया करेगा… मैं उसे टटोल टटोल कर पहचान लिया करूंगी। मत छीनो… मत छीनो उसे… ये मेरी कोख की मांग का सिंदूर है… ये मेरी ममता के माथे की बिंदिया है… मेरे गुनाह का कड़वा फल है? लोग इस पर थू थू करेंगे?… मैं चाट लूंगी ये सब थूकें… आँवल समझ कर साफ़ कर दूँगी।

देखो, मैं हाथ जोड़ती हूँ… तुम्हारे पांव पड़ती हूँ। मेरे भरे हुए दूध के बर्तन औंधे न करो… मेरे दिल के धुन्के हुए ख़ून के नर्म-नर्म गालों में आग न लगाओ… मेरी बाँहों के झूलों की रस्सियां न तोड़ो… मेरे कानों को उन गीतों से महरूम न करो जो उसके रोने में मुझे सुनाई देते हैं। मत छीनो… मत छीनो… मुझसे जुदा न करो… ख़ुदा के लिए मुझे उससे जुदा न करो।

लाहौर, 21 जनवरी
धोबी मंडी से पुलिस ने एक नौज़ाईदा बच्ची को सर्दी से ठिठुरते सड़क के किनारे पड़ी हुई पाया और अपने क़ब्ज़े में ले लिया। किसी संगदिल ने बच्ची की गर्दन को मज़बूती से कपड़े में जकड़ रखा था और उर्यां जिस्म को पानी से गीले कपड़े में बांध रखा था ताकि वो सर्दी से मर जाये। मगर वो ज़िंदा थी, बच्ची बहुत ख़ूबसूरत है। आँखें नीली हैं। उसको हस्पताल पहुंचा दिया गया है।

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अब्जी डूडू हिंदी कहानी,  Saadat Hasan Manto Ki Kahani Abji Du Du
“मुझे मत सताईए… ख़ुदा की क़सम, मैं आपसे कहती हूँ, मुझे मत सताईए।” “तुम बहुत ज़ुल्म कर रही हो आजकल!” “जी हाँ, बहुत ज़ुल्म कर रही हूँ।” “ये तो कोई जवाब नहीं।” “मेरी तरफ़ से साफ़ जवाब है और ये मैं आपसे कई दफ़ा कह चुकी हूँ।” “आज मैं कुछ नहीं सुनूंगा।” “मुझे मत सताईए। ख़ुदा की क़सम, मैं आपसे सच कहती हूँ, मुझे मत सताईए, मैं चिल्लाना शुरू कर दूँगी।” “आहिस्ता बोलो, बच्चियां जाग पड़ेंगी।” “आप तो बच्चियों के ढेर लगाना चाहते हैं।”

“तुम हमेशा मुझे यही ताना देती हो।” “आपको कुछ ख़याल तो होना चाहिए… मैं तंग आचुकी हूँ।” “दुरुस्त है… लेकिन…” “लेकिन-वेकिन कुछ नहीं!” “तुम्हें मेरा कुछ ख़याल नहीं…असल में अब तुम मुझसे मोहब्बत नहीं करतीं। आज से आठ बरस पहले जो बात थी वो अब नहीं रही… तुम्हें अब मेरी ज़ात से कोई दिलचस्पी नहीं रही।” “जी हाँ।” “वो क्या दिन थे जब हमारी शादी हुई थी। तुम्हें मेरी हर बात का कितना ख़याल रहता था। हम बाहम किस क़दर शेर-ओ-शक्कर थे… मगर अब तुम कभी सोने का बहाना कर देती हो। कभी थकावट का उज़्र पेश कर देती और कभी दोनों कान बंद कर लेती हो कुछ सुनती ही नहीं।”

“मैं कुछ सुनने के लिए तैयार नहीं!” “तुम ज़ुल्म की आख़िरी हद तक पहुंच गई।” “मुझे सोने दीजिए।” “सो जाईए… मगर मैं सारी रात करवटें बदलता रहूँगा… आपकी बला से!” “आहिस्ता बोलिए… साथ हमसाए भी हैं।” “हुआ करें।” “आपको तो कुछ ख़याल ही नहीं… सुनेंगे तो क्या कहेंगे?” “कहेंगे कि इस ग़रीब आदमी को कैसी कड़ी बीवी मिली है।” “ओह हो।”

“आहिस्ता बोलो… देखो बच्ची जाग पड़ी!” “अल्लाह अल्लाह… अल्लाह जी अल्लाह… अल्लाह अल्लाह… अल्लाह जी अल्लाह… सो जाओ बेटे सो जाओ… अल्लाह, अल्लाह… अल्लाह जी अल्लाह… ख़ुदा की क़सम आप बहुत तंग करते हैं, दिन भर की थकी माँदी को सोने तो दीजिए!” “अल्लाह, अल्लाह… अल्लाह जी, अल्लाह… अल्लाह अल्लाह… अल्लाह जी अल्लाह… तुम्हें अच्छी तरह सुलाना भी नहीं आता…” “आपको तो आता है ना… सारा दिन आप घर में रह कर यही तो करते रहते हैं।”

“भई मैं सारा दिन घर में कैसे रह सकता हूँ… जब फ़ुरसत मिलती है आ जाता हूँ और तुम्हारा हाथ बटा देता हूँ।” “मेरा हाथ बटाने की आपको कोई ज़रूरत नहीं। आप मेहरबानी करके घर से बाहर अपने दोस्तों ही के साथ गुलछड़े उड़ाया करें।” “गुल छड़े?” “मैं ज़्यादा बातें नहीं करना चाहती।” “अच्छा देखो, मेरी एक बात का जवाब दो…” “ख़ुदा के लिए मुझे तंग न कीजिए।” “कमाल है, मैं कहाँ जाऊं।” “जहां आपके सींग समाएं चले जाईए।” “लो अब हमारे सींग भी होगए।”

“आप चुप नहीं करेंगे।” “नहीं… मैं आज बोलता ही रहूँगा। ख़ुद सोऊंगा न तुम्हें सोने दूंगा।” “सच कहती हूँ, मैं पागल हो जाऊंगी… लोगो ये कैसा आदमी है, कुछ समझता ही नहीं। बस हर वक़्त, हर वक़्त, हर वक़्त…” “तुम ज़रूर तमाम बच्चियों को जगा कर रहोगी।” “न पैदा की होतीं इतनी!” “पैदा करने वाला मैं तो नहीं हूँ… ये तो अल्लाह की देन है… अल्लाह, अल्लाह… अल्लाह जी, अल्लाह, अल्लाह… अल्लाह जी, अल्लाह।” “बच्ची को अब मैंने जगाया था?” “मुझे अफ़सोस है!”

“अफ़सोस है, कह दिया… चलो छुट्टी हुई… गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाये चले जा रहे हैं। हमसायगी का कुछ ख़याल ही नहीं, लोग क्या कहेंगे, इसकी पर्वा ही नहीं… ख़ुदा की क़सम मैं अनक़रीब ही दीवानी हो जाऊंगी!” “दीवाने हों तुम्हारे दुश्मन।” “मेरी जान के दुश्मन तो आप हैं।” “तो ख़ुदा मुझे दीवाना करे।” “वो तो आप हैं!” “मैं दीवाना हूँ, मगर तुम्हारा।” “अब चोंचले ना बघारिए।”

“तुम तो न यूं मानती हो न वूं।” “मैं सोना चाहती हूँ।” “सो जाओ, मैं पड़ा बकवास करता रहूँगा।” “ये बकवास क्या अशद ज़रूरी है?” “है तो सही… ज़रा इधर देखो…” “मैं कहती हूँ, मुझे तंग न कीजिए। मैं रो दूंगी।” “तुम्हारे दिल में इतनी नफ़रत क्यों पैदा होगई… मेरी सारी ज़िंदगी तुम्हारे लिए है। समझ में नहीं आता तुम्हें क्या होगया है… मुझसे कोई ख़ता हुई हो तो बता दो।” “आपकी तीन ख़ताएं ये सामने पलंग पर पड़ी हैं।”

“ये तुम्हारे कोसने कभी ख़त्म नहीं होंगे।” “आपकी हट कब ख़त्म होगी?” “लो बाबा, मैं तुमसे कुछ नहीं कहता। सो जाओ… मैं नीचे चला जाता हूँ।” “कहाँ?” “जहन्नम में।” “ये क्या पागलपन है… नीचे इतने मच्छर हैं, पंखा भी नहीं… सच कहती हूँ, आप बिल्कुल पागल हैं… मैं नहीं जाने दूंगी आपको।” “मैं यहां क्या करूंगा… मच्छर हैं पंखा नहीं है, ठीक है। मैंने ज़िंदगी के बुरे दिन भी गुज़ारे हैं। तन आसान नहीं हूँ… सो जाऊंगा सोफ़े पर।” “सारा वक़्त जागते रहेंगे।” “तुम्हारी बला से।”

“मैं नहीं जाने दूंगी आपको… बात का बतंगड़ बना देते हैं।” “मैं मर नहीं जाऊंगा… मुझे जाने दो।” “कैसी बातें मुँह से निकालते हैं! ख़बरदार जो आप गए!” “मुझे यहां नींद नहीं आएगी।” “न आए।” “ये अजीब मंतिक़ है… मैं कोई लड़-झगड़ कर तो नहीं जा रहा।” “लड़ाई-झगड़ा क्या अभी बाक़ी है… ख़ुदा की क़सम आप कभी-कभी बिल्कुल बच्चों की सी बातें करते हैं। अब ये ख़ब्त सर में समाया है कि मैं नीचे गर्मी और मच्छरों में जा कर सोऊंगा… कोई और होती तो पागल हो जाती।”

“तुम्हें मेरा बड़ा ख़याल है।” “अच्छा बाबा नहीं है… आप चाहते क्या हैं?” “अब सीधे रास्ते पर आई हो।” “चलिए, हटिए… मैं कोई रास्ता-वास्ता नहीं जानती। मुँह धोके रखिए अपना।” “मुँह सुबह धोया जाता है… लो, अब मन जाओ।” “तौबा!” “साड़ी पर वो बोर्डर लग कर आ गया?” “नहीं!” “अजब उल्लू का पट्ठा है दर्ज़ी… कह रहा था आज ज़रूर पहुंचा देगा।” “लेकर आया था, मगर मैंने वापस करदी…” “क्यों?” “एक दो जगह झोल थे।” “ओह… अच्छा, मैंने कहा, कल “बरसात” देखने चलेंगे। मैंने पास का बंदोबस्त कर लिया है।”

“कितने आदमियों का?” “दो का… क्यों?” “बाजी भी जाना चाहती थीं।” “हटाओ बाजी को, पहले हम देखेंगे फिर उसको दिखा देंगे… पहले हफ़्ते में पास बड़ी मुश्किल से मिलते हैं… चांदनी रात में तुम्हारा बदन कितना चमक रहा है।” “मुझे तो इस चांदनी से नफ़रत है। कमबख़्त आँखों में घुसती है, सोने नहीं देती।” “तुम्हें तो बस हर वक़्त सोने ही की पड़ी रहती है।”

“आपको बच्चियों की देखभाल करना पड़े तो फिर पता चले। आटे-दाल का भाव मालूम हो जाएगा। एक के कपड़े बदलो, तो दूसरी के मैले हो जाते हैं। एक को सुलाओ, दूसरी जाग पड़ती है, तीसरी नेअमतख़ाने की ग़ारतगरी में मसरूफ़ होती है।” “दो नौकर घर में मौजूद हैं।” “नौकर कुछ नहीं करते।” “ले आऊं, नीचे से?” “जल्दी जाईए रोना शुरू कर देगी।” “जाता हूँ!” “मैंने कहा, सुनिए… आग जला कर ज़रा कुनकुना कर कीजिएगा दूध।” “अच्छा, अच्छा… सुन लिया है!”

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गुरमुख सिंह की वसीयत हिंदी कहानी, Manto Ki Kahani Gurmukh Singh Ki Vasiyat
पहले छुरा भोंकने की इक्का दुक्का वारदात होती थीं, अब दोनों फ़रीक़ों में बाक़ायदा लड़ाई की ख़बरें आने लगी जिनमें चाक़ू-छुरियों के इलावा कृपाणें, तलवारें और बंदूक़ें आम इस्तेमाल की जाती थीं। कभी-कभी देसी साख़्त के बम फटने की इत्तिला भी मिलती थी।

अमृतसर में क़रीब क़रीब हर एक का यही ख़्याल था कि ये फ़िर्क़ावाराना फ़सादात देर तक जारी नहीं रहेंगे। जोश है, जूंही ठंडा हुआ, फ़िज़ा फिर अपनी असली हालत पर आजाएगी। इससे पहले ऐसे कई फ़साद अमृतसर में हो चुके थे जो देर पा नहीं थे। दस से पंद्रह रोज़ तक मार कटाई का हंगामा रहता था, फिर ख़ुद बख़ुद फ़िरो हो जाता था। चुनांचे पुराने तजुर्बे की बिना पर लोगों का यही ख़याल था कि ये आग थोड़ी देर के बाद अपना ज़ोर ख़त्म करके ठंडी हो जाएगी। मगर ऐसा न हुआ, बलवों का ज़ोर दिन ब दिन बढ़ता ही गया।

हिंदुओं के मुहल्ले में जो मुसलमान रहते थे भागने लगे। इसी तरह वो हिंदू जो मुसलमानों के मुहल्ले में थे, अपना घर-बार छोड़ के महफ़ूज़ मुक़ामों का रुख़ करने लगे। मगर ये इंतिज़ाम सब के नज़दीक आरिज़ी था, उस वक़्त तक के लिए जब फ़िज़ा फ़सादात के तकद्दुर से पाक हो जाने वाली थी।

मियां अब्दुलहई रिटायर्ड सब जज को तो सौ फ़ीसदी यक़ीन था कि सूरत-ए-हाल बहुत जल्द दुरुस्त हो जाएगी, यही वजह है कि वो ज़्यादा परेशान नहीं थे, उनका एक लड़का था ग्यारह बरस का। एक लड़की थी सत्रह बरस की। एक पुराना मुलाज़िम था जिसकी उम्र सत्तर के लगभग थी। मुख़्तसर सा ख़ानदान था। जब फ़सादात शुरू हुए तो मियां साहिब ने बतौर हिफ़्ज़-ए-मातक़द्दुम काफ़ी राशन घर में जमा कर लिया था।

इस तरह से वो बिल्कुल मुतमइन थे कि अगर ख़ुदा-ना-ख़ास्ता हालात कुछ ज़्यादा बिगड़ गए और दुकानें वग़ैरा बंद होगईं तो उन्हें खाने-पीने के मुआमले में तरद्दुद नहीं करना पड़ेगा। लेकिन उनकी जवान लड़की सुग़रा बहुत मुतरद्दिद थी। उनका घर तीन मंज़िला था। दूसरी इमारतों के मुक़ाबले में काफ़ी ऊंचा। उसकी ममटी से शहर का तीन चौथाई हिस्सा बख़ूबी नज़र आता था। सुग़रा अब कई दिनों से देख रही थी कि नज़दीक दूर कहीं न कहीं आग लगी होती है। शुरू शुरू में तो फ़ायर ब्रिगेड की टन टन सुनाई देती थी पर अब वो भी बंद होगई थी, इसलिए कि जगह जगह आग भड़कने लगी थी।

रात को अब कुछ और ही समां होता। घुप्प अंधेरे में आग के बड़े-बड़े शोले उठते जैसे देव हैं जो अपने मुँह से आग के फव्वारे से छोड़ रहे हैं। फिर अजीब-अजीब सी आवाज़ें आतीं जो हर हर महादेव और अल्लाह अकबर के नारों के साथ मिल कर बहुत ही वहशतनाक बन जातीं।

सुग़रा बाप से अपने ख़ौफ़-ओ-हरास का ज़िक्र नहीं करती थी। इसलिए कि वो एक बार घर में कह चुके थे कि डरने की कोई वजह नहीं। सब ठीक ठाक हो जाएगा। मियां साहिब की बातें अक्सर दुरुस्त हुआ करती थीं। सुग़रा को इससे एक गो न इत्मिनान था। मगर जब बिजली का सिलसिला मुनक़ते होगया और साथ ही नलों में पानी आना बंद होगया तो उसने मियां साहिब से अपनी तशवीश का इज़हार किया और डरते-डरते राय दी थी कि चंद रोज़ के लिए शरीफ़पुरे उठ जाएं जहां अड़ोस-पड़ोस के सारे मुसलमान आहिस्ता आहिस्ता जा रहे थे। मियां साहिब ने अपना फ़ैसला न बदला और कहा, “बेकार घबराने की कोई ज़रूरत नहीं। हालात बहुत जल्द ठीक हो जाऐंगे।”

मगर हालात बहुत जल्दी ठीक न हुए और दिन बदिन बिगड़ते गए। वो मुहल्ला जिसमें मियां अब्दुलहई का मकान था मुसलमानों से ख़ाली होगया। और ख़ुदा का करना ऐसा हुआ कि मियां साहिब पर एक रोज़ अचानक फ़ालिज गिरा जिसके बाइस वो साहब-ए-फ़िराश होगए। उनका लड़का बशारत भी जो पहले अकेला घर में ऊपर-नीचे तरह तरह के खेलों में मसरूफ़ रहता था अब बाप की चारपाई के साथ लग कर बैठ गया और हालात की नज़ाकत समझने लगा।

वो बाज़ार जो उनके मकान के साथ मुल्हिक़ था सुनसनान पड़ा था। डाक्टर ग़ुलाम मुस्तफ़ा की डिस्पेंसरी मुद्दत से बंद पड़ी थी। उससे कुछ दूर हट कर डाक्टर गौर अंदता मल थे। सुग़रा ने शहनशीन से देखा था कि उनकी दुकान में भी ताले पड़े हैं। मियां साहब की हालत बहुत मख़दूश थी। सुग़रा इस क़दर परेशान थी कि उसके होश-ओ-हवास बिल्कुल जवाब दे गए थे। बशारत को अलग ले जा कर उसने कहा, “ख़ुदा के लिए, तुम ही कुछ करो। मैं जानती हूँ कि बाहर निकलना ख़तरे से ख़ाली नहीं, मगर तुम जाओ… किसी को भी बुला लाओ। अब्बा जी की हालत बहुत ख़तरनाक है।”

बशारत गया, मगर फ़ौरन ही वापस आगया। उसका चेहरा हल्दी की तरह ज़र्द था। चौक में उसने एक लाश देखी थी, ख़ून से तरबतर… और पास ही बहुत से आदमी ठाटे बांधे एक दुकान लूट रहे थे। सुग़रा ने अपने ख़ौफ़ज़दा भाई को सीने के साथ लगाया और सब्र-शुक्र के बैठ गई। मगर उससे अपने बाप की हालत नहीं देखी जाती थी। मियां साहब के जिस्म का दाहिना हिस्सा बिल्कुल सुन होगया था जैसे उसमें जान ही नहीं। गोयाई में भी फ़र्क़ पड़ गया था और वो ज़्यादातर इशारों ही से बातें करते थे जिसका मतलब ये था कि सुग़रा घबराने की कोई बात नहीं। ख़ुदा के फ़ज़ल-ओ-करम से सब ठीक हो जाएगा।

कुछ भी न हुआ। रोज़े ख़त्म होने वाले थे, सिर्फ़ दो रह गए थे। मियां साहब का ख़याल था कि ईद से पहले पहले फ़िज़ा बिल्कुल साफ़ हो जाएगी मगर अब ऐसा मालूम होता था कि शायद ईद ही का रोज़ रोज़-ए-क़ियामत हो, क्योंकि ममटी पर से अब शहर के क़रीब क़रीब हर हिस्से से धुंए के बादल उठते दिखाई देते थे। रात को बम फटने की ऐसी ऐसी हौलनाक आवाज़ें आती थीं कि सुग़रा और बशारत एक लहज़े के लिए भी सो नहीं सकते थे।

सुग़रा को यूं भी बाप की तीमारदारी के लिए जागना पड़ता था, मगर अब ये धमाके, ऐसा मालूम होता था कि उसके दिमाग़ के अंदर हो रहे हैं। कभी वो अपने मफ़लूज बाप की तरफ़ देखती और कभी अपने वहशतज़दा भाई की तरफ़… सत्तर बरस का बुढ्ढा मुलाज़िम अकबर था जिसका वजूद होने न होने के बराबर था। वो सारा दिन और सारी रात पर अपनी कोठड़ी में खाँसता खंकारता और बलग़म निकालता रहता था।

एक रोज़ तंग आकर सुग़रा उस पर बरस पड़ी, “तुम किस मर्ज़ की दवा हो। देखते नहीं हो, मियां साहब की क्या हालत है। असल में तुम परले दर्जे के नमक हराम हो। अब ख़िदमत का मौक़ा आया है तो दमे का बहाना करके यहां पड़े रहते हो… वो भी ख़ादिम थे जो आक़ा के लिए अपनी जान तक क़ुर्बान कर देते थे।”

सुग़रा अपना जी हल्का करके चली गई। बाद में उसको अफ़सोस हुआ कि नाहक़ उस ग़रीब को इतनी लानत-मलामत की। रात का खाना थाल में लगा कर उसकी कोठड़ी में गई तो देखा ख़ाली है। बशारत ने घर में इधर उधर तलाश किया मगर वो न मिला। बाहर के दरवाज़े की कुंडी खुली थी जिसका ये मतलब था कि वो मियां साहब के लिए कुछ करने गया है। सुग़रा ने बहुत दुआएं मांगीं कि ख़ुदा उसे कामयाब करे लेकिन दो दिन गुज़र गए और वो न आया।

शाम का वक़्त था। ऐसी कई शामें सुग़रा और बशारत देख चुके थे। जब ईद की आमद-आमद के हंगामे बरपा होते थे, जब आसमान पर चांद देखने के लिए उनकी नज़रें जमी रहती थीं। दूसरे रोज़ ईद थी। सिर्फ़ चांद को इसका ऐलान करना था। दोनों इस ऐलान के लिए कितने बेताब हुआ करते थे। आसमान पर चांद वाली जगह पर अगर बादल का कोई हटीला टुकड़ा जम जाता तो कितनी कोफ़्त होती थी उन्हें, मगर अब चारों तरफ़ धुंए के बादल थे। सुग़रा और बशारत दोनों ममटी पर चढ़े। दूर कहीं कहीं कोठों पर लोगों के साये धब्बों की सूरत में दिखाई देते थे, मगर मालूम नहीं ये चांद देख रहे थे या जगह जगह सुलगती और भड़कती हुई आग।

चांद भी कुछ ऐसा ढीट था कि धुंए की चादर में से भी नज़र आगया। सुग़रा ने हाथ उठा कर दुआ मांगी कि ख़ुदा अपना फ़ज़ल करे और उसके बाप को तंदुरुस्ती अता फ़रमाए। बशारत दिल ही दिल में कोफ़्त महसूस कर रहा था कि गड़बड़ के बाइस एक अच्छी भली ईद ग़ारत हो गई। दिन अभी पूरी तरह ढला नहीं था, यानी शाम की स्याही अभी गहरी नहीं हुई थी। मियां साहब की चारपाई छिड़काव किए हुए सहन में बिछी थी। वो उस पर बेहिस-ओ-हरकत लेटे थे और दूर आसमान पर निगाहें जमाए जाने क्या सोच रहे थे।

ईद का चांद देख कर जब सुग़रा ने पास आकर उन्हें सलाम किया तो उन्हों ने इशारे से जवाब दिया। सुग़रा ने सर झुकाया तो उन्होंने वो बाज़ू जो ठीक था उठाया और उस पर शफ़क़त से हाथ फेरा। सुग़रा की आँखों से टप टप आँसू गिरने लगे तो मियां साहब की आँखें भी नमनाक होगईं, मगर उन्होंने तसल्ली देने की ख़ातिर बमुश्किल अपनी नीम मफ़लूज ज़बान से ये अल्फ़ाज़ निकाले,“अल्लाह तबारक-ओ-ताला सब ठीक करदेगा।”

ऐन उसी वक़्त बाहर दरवाज़े पर दस्तक हुई। सुग़रा का कलेजा धक से रह गया। उसने बशारत की तरफ़ देखा जिसका चेहरा काग़ज़ की तरह सफ़ेद होगया था। दरवाज़े पर दस्तक हुई। मियां साहब सुग़रा से मुख़ातिब हुए, “देखो, कौन है!” सुग़रा ने सोचा कि शायद बुढ्ढा अकबर हो। इस ख़याल ही से उसकी आँखें तमतमा उठीं। बशारत का बाज़ू पकड़ कर उसने कहा, “जाओ देखो…. शायद अकबर आया है।” ये सुन कर मियां साहब ने नफ़ी में यूं सर हिलाया जैसे वो ये कह रहे हैं, “नहीं… ये अकबर नहीं है।” सुग़रा ने कहा, “तो और कौन हो सकता है अब्बा जी?”

मियां अब्दुलहई ने अपनी क़ुव्वत-ए-गोयाई पर ज़ोर दे कर कुछ कहने की कोशिश की कि बशारत आगया। वो सख़्त ख़ौफ़ज़दा था। एक सांस ऊपर, एक नीचे, सुग़रा को मियां साहब की चारपाई से एक तरफ़ हटा कर उसने हौले से कहा, “एक सिख है!” सुग़रा की चीख़ निकल गई, “सिख?… क्या कहता है?” बशारत ने जवाब दिया, “कहता है दरवाज़ा खोलो।” सुग़रा ने काँपते हुए बशारत को खींच कर अपने साथ चिमटा लिया और बाप की चारपाई पर बैठ गई और अपने बाप की तरफ़ वीरान नज़रों से देखने लगी।

मियां अब्दुलहई के पतले पतले बेजान होंटों पर एक अजीब सी मुस्कुराहट पैदा हो गई, “जाओ… गुरमुख सिंह है!” बशारत ने नफ़ी में सर हिलाया, “कोई और है?” मियां साहब ने फ़ैसलाकुन अंदाज़ में कहा, “जाओ सुग़रा वही है!” सुग़रा उठी। वो गुरमुख सिंह को जानती थी। पेंशन लेने से कुछ देर पहले उसके बाप ने इस नाम के एक सिख का कोई काम किया था। सुग़रा को अच्छी तरह याद नहीं था। शायद उसको एक झूटे मुक़द्दमे से नजात दिलाई थी। जब से वो हर छोटी ईद से एक दिन पहले रूमाली सिवैयों का एक थैला लेकर आया करता था।

उसके बाप ने कई मर्तबा उससे कहा था, “सरदार जी, आप ये तकलीफ़ न किया करें।” मगर वो हाथ जोड़ कर जवाब दिया करता था, “मियां साहब, वाहगुरु जी की कृपा से आपके पास सब कुछ है। ये तो एक तोहफ़ा ये जो मैं जनाब की ख़िदमत में हर साल लेकर आता हूँ। मुझ पर जो आपने एहसान किया था। उसका बदला तो मेरी सौ पुश्त भी नहीं चुका सकती… ख़ुदा आपको ख़ुश रखे।” सरदार गुरमुख सिंह को हर साल ईद से एक रोज़ पहले सिवैयों का थैला लाते इतना अर्सा होगया था कि सुग़रा को हैरत हुई कि उसने दस्तक सुन कर ये क्यों ख़याल न किया कि वही होगा, मगर बशारत भी तो उसको सैंकड़ों मर्तबा देख चुका था, फिर उसने क्यों कहा कोई और है… और कौन हो सकता है। ये सोचती सुग़रा डेयोढ़ी तक पहुंची।

दरवाज़ा खोले या अंदर ही से पूछे, उसके मुतअल्लिक़ वो अभी फ़ैसला ही कररही थी कि दरवाज़े पर ज़ोर से दस्तक हुई। सुग़रा का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा। बमुश्किल तमाम उसने हलक़ से आवाज़ निकाली, “कौन है?” बशारत पास खड़ा था। उसने दरवाज़े की एक दर्ज़ की तरफ़ इशारा किया और सुग़रा से कहा, “इसमें से देखो?” सुग़रा ने दर्ज़ में से देखा। गुरमुख सिंह नहीं था। वो तो बहुत बूढ़ा था, लेकिन ये जो बाहर थड़े पर खड़ा था जवान था। सुग़रा अभी दर्ज़ पर आँख जमाए उसका जायज़ा ले रही थी कि उसने फिर दरवाज़ा खटखटाया। सुग़रा ने देखा कि उसके हाथ में काग़ज़ का थैला था वैसा ही जैसा गुरमुख सिंह लाया करता था।

सुग़रा ने दर्ज़ से आँख हटाई और ज़रा बुलंद आवाज़ में दस्तक देने वाले से पूछा, “कौन हैं आप?” बाहर से आवाज़ आई, “जी… जी मैं… मैं सरदार गुरमुख सिंह का बेटा हूँ… संतोख!” सुग़रा का ख़ौफ़ बहुत हद तक दूर होगया। बड़ी शाइस्तगी से उसने पूछा, “फ़रमाईए। आप कैसे आए हैं?” बाहरसे आवाज़ आई, “जी… जज साहब कहाँ हैं।” सुग़रा ने जवाब दिया, “बीमार हैं।” सरदार संतोख सिंह ने अफ़सोस आमेज़ लहजे में कहा, “ओह… फिर उसने काग़ज़ का थैला खड़खड़ाया। जी, ये सिवय्यां हैं… सरदार जी का देहांत हो गया है… वो मर गए हैं!” सुग़रा ने जल्दी से पूछा, “मर गए हैं?”

बाहर से आवाज़ आई, “जी हाँ… एक महीना होगया है… मरने से पहले उन्होंने मुझे ताकीद की थी कि देखो बेटा, मैं जज साहब की ख़िदमत में पूरे दस बरसों से हर छोटी ईद पर सिवय्यां ले जाता रहा हूँ.. ये काम मेरे मरने के बाद अब तुम्हें करना होगा… मैंने उन्हें वचन दिया था जो मैं पूरा कररहा हूँ… ले लीजिए सिवय्यां।” सुग़रा इस क़दर मुतास्सिर हुई कि उसकी आँखों में आँसू आगए। उसने थोड़ा सा दरवाज़ा खोला। सरदार गुरमुख सिंह के लड़के ने सिवय्यों का थैला आगे बढ़ा दिया जो सुग़रा ने पकड़ लिया और कहा, “ख़ुदा सरदार जी को जन्नत नसीब करे।”

गुरमुख सिंह का लड़का कुछ तवक्कुफ़ के बाद बोला, “जज साहब बीमार हैं?” सुग़रा ने जवाब दिया, “जी हाँ!” “क्या बीमारी है?” “फ़ालिज !” “ओह… सरदार जी ज़िंदा होते तो उन्हें ये सुन कर बहुत दुख होता… मरते दम तक उऩ्हें जज साहब का एहसान याद था। कहते थे कि वो इंसान नहीं देवता है… अल्लाह मियां उन्हें ज़िंदा रखे… उन्हें मेरा सलाम।” और ये कह कर वो थड़े से उतर गया… सुग़रा सोचती ही रह गई कि वो उसे ठहराए और कहे कि जज साहब के लिए किसी डाक्टर का बंदोबस्त कर दे।

सरदार गुरमुख सिंह का लड़का संतोख जज साहब के मकान से थड़े से उतर कर चंद गज़ के आगे बढ़ा तो चार ठाटा बांधे हुए आदमी उसके पास आए। दो के पास जलती मशालें थीं और दो के पास मिट्टी के तेल के कनस्तर और कुछ दूसरी आतिशख़ेज़ चीज़ें। एक ने संतोख से पूछा, “क्यों सरदार जी, अपना काम कर आए?” संतोख ने सर हिला कर जवाब दिया, “हाँ कर आया।” उस आदमी ने ठाटे के अंदर हंस कर पूछा, “तो करदें मुआमला ठंडा जज साहब का।” “हाँ… जैसी तुम्हारी मर्ज़ी!” ये कह कर सरदार गुरमुख सिंह का लड़का चल दिया।

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क़र्ज़ की पीते थे हिंदी कहानी, Qarz Ki Peete The Hindi Kahani
एक जगह महफ़िल जमी थी। मिर्ज़ा ग़ालिब वहां से उकता कर उठे, बाहर हवादार मौजूद था। उसमें बैठे और अपने घर का रुख़ किया। हवादार से उतर कर जब दीवानख़ाने में दाख़िल हुए तो क्या देखते हैं कि मथुरादास महाजन बैठा है। ग़ालिब ने अंदर दाख़िल होते ही कहा, “अख़ाह! मथुरा दास! भई तुम आज बड़े वक़्त पर आए… मैं तुम्हें बुलवाने ही वाला था!” मथुरा दास ने ठेट महाजनों के से अंदाज़ में कहा, “हुज़ूर रूपों को बहुत दिन हो गए। फ़क़त दो क़िस्त आपने भिजवाए थे… उसके बाद पाँच महीने हो गए, एक पैसा भी आपने न दिया।”

असद उल्लाह ख़ान ग़ालिब मुस्कुराए, “भई मथुरादास, देने को मैं सब दे दूंगा। गले-गले पानी दूंगा… दो-एक जायदाद अभी मेरी बाक़ी है।” “अजी सरकार! इस तरह व्यपार हो चुका। न असल में से न सूद में से, पहला ही ढाई हज़ार वसूल नहीं हुआ। छः सौ छप्पन सूद के हो गए हैं।” मिर्ज़ा ग़ालिब ने हुक़्क़े की नय पकड़ कर एक कश लिया, “लाला, जिस दरख़्त का फल खाना मंज़ूर होता है, उसको पहले पानी देते हैं… मैं तुम्हारा दरख़्त हूँ, पानी दो तो अनाज पैदा हो।”

मथुरादास ने अपनी धोती की लॉंग ठीक की, “जी, दीवाली को बारह दिन बाक़ी रह गए हैं। खाता बंद किया जाएगा। आप पहले रुपये का असल सूद मिला कर दस्तावेज़ बना दें तो आगे का नाम लें।” मिर्ज़ा ग़ालिब ने हुक़्क़े की नय एक तरफ़ की, “लो, अभी दस्तावेज़ लिखे देता हूँ। पर शर्त ये है कि दो हज़ार अभी अभी मुझे और दो।” मथुरा दास ने थोड़ी देर ग़ौर किया, “अच्छा, में इशटाम मंगवाता हूँ… बही साथ लाया हूँ। आप मुंशी ग़ुलाम रसूल अर्ज़ी नवीस को बुलालें, पर सूद वही सवा रुपया सैकड़ा होगा।”

“लाला कुछ तो इंसाफ़ करो। बारह आने सूद लिखवाए देता हूँ।” मथुरादास ने अपनी धोती की लॉंग दूसरी बार दुरुस्त की, “सरकार बारह आने पर बारह बरस भी कोई महाजन क़र्ज़ नहीं देगा… आजकल तो ख़ुद बादशाह सलामत को रुपये की ज़रूरत है।” उन दिनों वाक़ई बहादुर शाह ज़फ़र की हालत बहुत नाज़ुक थी, उसको अपने अख़राजात के लिए रुपये की हर वक़्त ज़रूरत रहती थी। बहादुर शाह तो ख़ैर बादशाह था लेकिन मिर्ज़ा ग़ालिब महज़ शायर थे। गो वो अपने शे’रों में अपना रिश्ता सिपाहगिरी से जोड़ते थे।

ये मिर्ज़ा साहिब की ज़िंदगी के चालीसवीं और पैंतालीसवीं साल के दरमियानी अर्से की बात है। जब मथुरादास महाजन ने उन पर अदम-ए-अदाइगी क़र्ज़ा के बाइ’स अ’दालत-ए-दीवानी में दावा दायर किया… मुक़द्दमे की समाअ’त मिर्ज़ा साहिब के मुरब्बी और दोस्त मुफ़्ती सदर उद्दीन आज़ुर्दा को करना थी, जो ख़ुद बहुत अच्छे शायर और ग़ालिब के मद्दाह थे। मुफ़्ती साहब के मिर्धा ने अदालत के कमरे से बाहर निकल कर आवाज़ दी, “लाला मथुरादास महाजन मुद्दई और मिर्ज़ा असद उल्लाह ख़ान ग़ालिब मुद्दआ-अलैह हाज़िर हैं?”

मथुरादास ने मिर्ज़ा ग़ालिब की तरफ़ देखा और मिर्धे से कहा, “जी दोनों हाज़िर हैं।” मिर्धे ने रूखेपन से कहा, “तो दोनों हाज़िर-ए-अदालत हों।” मिर्ज़ा ग़ालिब ने अ’दालत में हाज़िर हो कर मुफ़्ती सदर उद्दीन आज़ुर्दा को सलाम किया… मुफ़्ती साहब मुस्कुराए, “मिर्ज़ा नौशा, ये आप इस क़दर क़र्ज़ क्यों लिया करते हैं… आख़िर ये मुआ’मला क्या है?” ग़ालिब ने थोड़े तवक्कुफ़ के बाद कहा, “क्या अर्ज़ करूं… मेरी समझ में भी कुछ नहीं आता।” मुफ़्ती सदर उद्दीन मुस्कुराए, “कुछ तो है, जिसकी परदादारी है।” ग़ालिब ने बरजस्ता कहा, “एक शे’र मौज़ूं हो गया है मुफ़्ती साहब… हुक्म हो तो जवाब में अ’र्ज़ करूं।” “फ़रमाईए!”

ग़ालिब ने मुफ़्ती साहब और मथुरा दास महाजन को एक लहज़े के लिए देखा और अपने मख़सूस अंदाज़ में ये शे’र पढ़ा: क़र्ज़ की पीते थे मय, लेकिन समझते थे कि हाँ रंग लाएगी हमारी फ़ाक़ा मस्ती, एक दिन मुफ़्ती साहब बेइख़्तियार हंस पड़े, “ख़ूब, ख़ूब… क्यों साहब! रस्सी जल गई, पर बल न गया… आपके इस शेर की मैं तो ज़रूर दाद दूंगा। मगर चूँकि आपको असल और सूद, सबसे इक़रार है। अदालत मुद्दई के हक़ में फ़ैसला दिए बग़ैर नहीं रह सकती।”

मिर्ज़ा ग़ालिब ने बड़ी संजीदगी से कहा, “मुद्दई सच्चा है, तो क्यों फ़ैसला उसके हक़ में न हो और मैंने भी सच्ची बात नस्र में न कही, नज़्म में कह दी।” मुफ़्ती सदर उद्दीन आज़ुर्दा ने काग़ज़ात क़ानून एक तरफ़ रखे और मिर्ज़ा ग़ालिब से मुख़ातिब हुए, “अच्छा, तो ज़र-ए-डिग्री मैं अदा कर दूँगा कि हमारी आपकी दोस्ती की लाज रह जाये।” मिर्ज़ा ग़ालिब बड़े ख़ुद्दार थे। उन्होंने मुफ़्ती साहब से कहा, “हुज़ूर ऐसा नहीं होगा… मुझे मथुरादास का रुपया देना है, मैं बहुत जल्द अदा कर दूँगा।”

मुफ़्ती साहब मुस्कुराए, “हज़रत, रुपये की अदायगी, शायरी नहीं… आप तकल्लुफ़ को बरतरफ़ रखिए… मैं आपका मद्दाह हूँ… मुझे आज मौक़ा दीजिए कि आपकी कोई ख़िदमत कर सकूं।” ग़ालिब बहुत ख़फ़ीफ़ हुए, “लाहौल वला… आप मेरे बुज़ुर्ग हैं… मुझे कोई सज़ा दे दीजिए कि आप सदर-उल-सुदूर हैं।” “देखो, तुम ऐसी बातें मत करो…” “तो और कैसी बातें करूं?” “कोई शे’र सुनाईए।” “सोचता हूँ… हाँ एक शे’र रात को हो गया था… अ’र्ज़ किए देता हूँ…” “फ़रमाईए!” हम और वो सबब रंज-आशना दुश्मन

मुफ़्ती साहब ने अपने क़ानूनी क़लम से क़ानूनी काग़ज़ पर ये हुरूफ़ लिखे; “हम और वो बे-सबब रंज आश्ना दुश्मन, कि रखता है” मुफ़्ती साहब बहुत महज़ूज़ हुए। ये शे’र आसानी से समझ आ सकने वाला नहीं लेकिन वो ख़ुद बहुत बड़े शायर थे। इसलिए ग़ालिब की दक़ीक़ा बयानी को फ़ौरन समझ गए। मुक़द्दमे की बाक़ायदा समाअ’त हुई, मुफ़्ती सदर उद्दीन आज़ुर्दा ने मिर्ज़ा ग़ालिब से कहा, “आप आइंदा क़र्ज़ की न पिया करें।” ग़ालिब जो शायद किसी शे’र की फ़िक्र कर रहे थे,कहा, “एक शे’र हो गया, अगर आप इजाजत दें तो अर्ज़ करूं।”

मुफ़्ती साहब ने कहा, “फ़रमाइए, फ़रमाइए।” मिर्ज़ा ग़ालिब कुछ देर ख़ामोश रहे। ग़ालिबन उनको इस बात से बहुत कोफ़्त हुई थी कि मुफ़्ती साहब उन पर एक एहसान कर रहे हैं। मुफ़्ती साहब ने उनसे पूछा, “हज़रत आप ख़ामोश क्यों हो गए?” “जी कोई ख़ास बात नहीं; है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ वर्ना क्या बात कर नहीं आती “आपको बातें करना तो माशा अल्लाह आती हैं।” ग़ालिब ने जवाब दिया, “जी हाँ… लेकिन बनाना नहीं आतीं।” मुफ़्ती सदर उद्दीन मुस्कुराए, “अब आप जा सकते हैं… ज़र-ए-डिग्री मैं अदा कर दूँगा।”

मिर्ज़ा ग़ालिब ने मुफ़्ती साहब का शुक्रिया अदा किया, “आज आपने दोस्ती के तमस्सुक पर मोहर लगा दी… जब तक ज़िंदा हूँ, बंदा हूँ।” मुफ़्ती सदर उद्दीन आज़ुर्दा ने उनसे कहा, “अब आप तशरीफ़ ले जाईए… पर ख़याल रहे कि रोज़-रोज़ ज़र-ए-डिग्री मैं अदा नहीं कर सकता, आइंदा एहतियात रहे।” मिर्ज़ा ग़ालिब थोड़ी देर के लिए सोच में ग़र्क़ हो गए। मुफ़्ती साहब ने उनसे पूछा, “क्या सोच रहे हैं आप?” मिर्ज़ा ग़ालिब चौंक कर बोले, “जी! मैं कुछ भी नहीं सोच रहा था… शायद कुछ सोचने की कोशिश कर रहा था कि; मौत का एक दिन मुअ’य्यन है.

नींद क्यों रात भर नहीं आती मुफ़्ती साहब ने उनसे पूछा, “क्या आपको रात भर नींद नहीं आती?” मिर्ज़ा ग़ालिब ने मुस्कुरा कर कहा, “किसी ख़ुशनसीब ही को आती होगी।” मुफ़्ती साहब ने कहा, “आप शायरी छोड़िए… बस आइंदा एहतियात रहे।” मिर्ज़ा ग़ालिब अपने अंगरखे की शिकनें दुरुस्त करते हुए बोले, “आपकी नसीहत पर चल कर साबित क़दम रहने की ख़ुदा से दुआ करूंगा… मुफ़्ती साहब! मुफ़्त की ज़हमत आपको हुई। नक़दन सिवाए शुक्र है के और क्या अदा कर सकता हूँ। ख़ैर ख़ुदा आपको दस गुना दुनिया में, और सत्तर गुना आख़िरत में देगा।”

ये सुन कर मुफ़्ती सदर उद्दीन आज़ुर्दा ज़ेर-ए-लब मुस्कुराए, “आख़िरत वाले में तो आपको शरीक करना मुहाल है… दुनिया के दस गुने में भी आपको एक कौड़ी नहीं दूंगा कि आप मयख़्वारी कीजिए।” मिर्ज़ा ग़ालिब हंसे, “मयख़्वारी कैसी, मुफ़्ती साहब!” मय से ग़रज़ निशात है किस रू सियाह को इक गो न बेखु़दी मुझे दिन रात चाहिए और ये शे’र सुना कर मिर्ज़ा ग़ालिब अ’दालत के कमरे से बाहर चले गए।

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चौदहवीं का चाँद हिंदी कहानी, सआदत हसन मंटो की कहानी चौदहवीं का चाँद
अक्सर लोगों का तर्ज़-ए-ज़िंदगी, उनके हालात पर मुनहसिर होता है और बा’ज़ बेकार अपनी तक़दीर का रोना रोते हैं। हालाँकि इससे हासिल-वुसूल कुछ भी नहीं होता। वो समझते हैं अगर हालात बेहतर होते तो वो ज़रूर दुनिया में कुछ कर दिखाते। बेशतर ऐसे भी हैं जो मजबूरियों के बाइस क़िस्मत पर शाकिर रहते हैं। उनकी ज़िंदगी उन ट्राम कारों की तरह है जो हमेशा एक ही पटरी पर चलती रहती हैं। जब कंडम हो जाती हैं तो उन्हें महज़ लोहा समझ कर किसी कबाड़ी के पास फ़रोख़्त कर दिया जाता है।

ऐसे इंसान बहुत कम हैं। जिन्हों ने हालात की पर्वा न करते हुए ज़िंदगी की बागडोर अपने हाथ में सँभाल ली। टॉमस विल्सन भी इसी क़बील से था। उसने अपनी ज़िंदगी बदलने के लिए अनोखा क़दम उठाया। पर उसकी मंज़िल का चूँकि कोई पता नहीं था, इसलिए उसकी कामयाबी के बारे में अंदाज़ा लगाना मुश्किल था। उसके इस अनोखेपन के मुतअ’ल्लिक़ मैंने बहुत कुछ सुना। सबसे पहले लोग यही कहते कि वो ख़लवत पसंद है लेकिन मैंने दिल में तहय्या कर लिया कि किसी न किसी हीले उसे अपनी दास्तान-ए-ज़िंदगी बयान करने पर आमादा कर लूंगा क्योंकि मुझे दूसरे आदमियों के बयान की सदाक़त पर ए’तिमाद नहीं था। मैं चंद रोज़ के लिए एक सेहत अफ़्ज़ा मक़ाम पर गया, वहीं उससे मुलाक़ात हुई। मैं दरिया किनारे अपने मेज़बान के साथ खड़ा था कि वो एक दम पुकार उठा,“विल्सन।”

मैंने पूछा, “कहाँ है?” मेरे मेज़बान ने जवाब दिया, “अरे भई! वही जो मुंडेर पर नीली क़मीस पहने हमारी तरफ़ पीठ किए बैठा है।” मैंने उसकी तरफ़ देखा और मुझे नीली क़मीस और सफ़ेद बालों वाला सर नज़र आया। मेरी बड़ी ख़्वाहिश थी कि वो मुड़ कर देखे और हम उसे सैर-ओ-तफ़रीह के लिए साथ ले जाएं। उस वक़्त सूरज का अ’क्स दरिया में डूब रहा था। सैर करने वाले चहचहा रहे थे। इतने में गिरजे की यक-आहंग घंटियां बजने लगीं।

मैं उस वक़्त क़ुदरत की दिल-फ़रेबियों से इस क़दर मस्हूर हो चुका था कि विल्सन को अपनी तरफ़ आते न देख सका। जब वो मेरे पास से गुज़रा तो मेरे दोस्त ने उसे रोक लिया और उसका मुझ से तआ’रुफ़ कराया। उसने मेरे साथ हाथ मिलाया, लेकिन किसी क़दर बेए’तिनाई से। मेरे दोस्त ने इस को महसूस किया और उसको शराब की दा’वत दी। मदऊ किए जाने पर वो मुस्कुराया। अगरचे उसके दाँत ख़ूबसूरत न थे फिर भी उसकी मुस्कुराहट दिलकश थी। वो नीली क़मीस और ख़ाकिसतरी पतलून पहने था जो किसी हद तक मैली थी। उसके लिबास को उसके जिस्म की साख़्त से कोई मुनासिबत नहीं थी। उसका चेहरा लंबोतरा, पतले होंट और आँखें भूरे रंग की थीं।

चेहरे के ख़ुतूत नुमायां, जिनसे नुमायां था कि जवानी में वो ज़रूर ख़ूबसूरत होगा। वज़ा-क़ता के ए’तबार से वो किसी बीमा कंपनी का एजेंट मालूम होता था। हम चहल-क़दमी करते, एक रेस्तोरान में पहुंच कर, उससे मुल्हक़ा बाग़ीचे में बैठ गए और बैरे को शराब लाने के लिए कहा। होटल वाले की बीवी भी वहां मौजूद थी। अधेड़पन की वजह से अब उसमें वो बात नहीं रही थी लेकिन चेहरे का निखार अब भी गुज़री हुई करारी जवानी की चुग़लियाँ खा रहा था। तीस साल पहले बड़े बड़े आर्टिस्ट उसके दीवाने थे, उसकी बड़ी बड़ी शराबी आँखों और शहद भरी मुस्कुराहटों में अजब दिलकशी थी।

हम तीनों बैठे यूंही इधर-उधर की बातें करते रहे। चूँकि मौज़ू दिलचस्प नहीं थे इसलिए विल्सन थोड़ी देर के बाद रुख़सत मांग कर चला गया। हम भी उसके रुख़सत होने पर उदास होगए। रास्ते में मेरे दोस्त ने विल्सन के बारे में कहा, “मुझे तो तुम्हारी सुनाई हुई कहानी बेसर-ओ-पा मालूम होती है।” “क्यों?” “वो इस क़िस्म की हरकत का मुर्तकिब नहीं हो सकता।” उसने कहा, “कोई शख़्स किसी की फ़ितरत के मुत’अल्लिक़ सही अंदाज़ा कैसे लगा सकता है?” “मुझे तो वो आम इंसान दिखाई देता है जो चंद महफ़ूज़ किफ़ालतों के सहारे कारोबार से अलाहिदा हो चुका है।” “तुम यही समझो, ठीक है।”

दूसरे दिन दरिया किनारे विल्सन हमें फिर दिखाई दिया। भूरे रंग का लिबास पहने, दाँतों में पाइप दबाये खड़ा था। ऐसा मालूम होता था कि उसके चेहरे की झुर्रियों और सफ़ेद बालों से भी जवानी फूट रही है। हम कपड़े उतार कर पानी के अंदर चले गए। जब मैं नहा कर बाहर निकला तो विल्सन ज़मीन पर औंधे मुँह लेटा कोई किताब पढ़ रहा था। मैं सिगरेट सुलगा कर उसके पास गया। उसने किताब से नज़रें हटा कर मेरी तरफ़ देखा और पूछा, “बस, नहा चुके।” मैंने जवाब दिया, “हाँ… आज तो लुत्फ़ आगया… दुनिया में इससे बेहतर नहाने की और कोई जगह नहीं हो सकती… तुम यहां कितनी मुद्दत से हो?” उसने जवाब दिया, “पंद्रह बरस से।”

ये कह कर वह दरिया की मचलती हुई नीली लहरों की तरफ़ देखने लगा, उसके बारीक होंटों पर लतीफ़ सी मुस्कुराहट खेलने लगी, “पहली बार यहां आते ही मुझे इस जगह से मुहब्बत होगई… तुम्हें उस जर्मन का क़िस्सा मालूम है, जो एक बार यहां लंच खाने आया और यहीं का हो के रह गया। वो चालीस साल यहां रहा… मेरा भी यही हाल होगा। चालीस बरस नहीं तो पच्चीस तो कहीं नहीं गए।”

मैं चाहता था कि वो अपनी गुफ़्तुगू जारी रखी। उसके अलफ़ाज़ से ज़ाहिर था कि उसके अफ़साने की हक़ीक़त ज़रूर कुछ है। इतने में मेरा दोस्त भीगा हुआ हमारी तरफ़ आया। बहुत ख़ुश था क्योंकि वो दरिया में एक मील तैर कर आरहा था। उसके आते ही हमारी गुफ़्तुगू का मौज़ू बदल गया और बात अधूरी रह गई।

उसके बाद विल्सन से मुतअद्दिद बार मुलाक़ात हुई, उसकी बातें बड़ी दिलचस्प होतीं। वो इस जज़ीरे के चप्पे-चप्पे से वाक़िफ़ था। एक दिन चांदनी रात का लुत्फ़ उठाने के बाद, मैंने और मेरे दोस्त ने सोचा कि चलो मोंटी सलावर की पहाड़ी की सैर करें। मैंने विल्सन से कहा कि, “आओ यार, तुम भी हमारे साथ चलो।” विल्सन ने मेरी दा’वत क़बूल करली लेकिन मेरा दोस्त नासाज़ि-ए-तब्अ’ का बहाना करके हमसे जुदा होगया। ख़ैर, हम दोनों पहाड़ी की जानिब चल दिए और इस सैर का ख़ूब लुत्फ़ उठाया। शाम के धुंदलके में थके-मांदे, भूके सराय में आए।

खाने का इंतिज़ाम पहले ही कर रखा था जो बहुत लज़ीज़ साबित हुआ। शराब, अंगूर की थी। पहली बोतल तो सिवय्यां खाने के साथ ही ख़त्म होगई। दूसरी के आख़िरी जाम पीने के बाद मेरे और विल्सन के दिमाग़ में बयक-वक़्त ये ख़याल समाने लगा कि ज़िंदगी कुछ ऐसी दुशवार नहीं। हम उस वक़्त बाग़ीचे में अंगूरों से लदी हुई बेल के नीचे बैठे थे। रात की ख़ामोश फ़ज़ा में ठंडी हवा चल रही थी। सराय की ख़ादिमा हमारे लिए पनीर और इंजीरें ले आई। विल्सन थोड़े से वक़्फ़े के बाद मुझसे मुख़ातिब हुआ, “हमारे चलने में अभी काफ़ी देर है। चांद कम अज़ कम एक घंटे तक पहाड़ी के ऊपर आएगा।” मैंने कहा, “हमारे पास फ़ुर्सत ही फ़ुर्सत है… यहां आकर कोई इंसान भी उ’जलत के मुतअ’ल्लिक़ नहीं सोच सकता।”

विल्सन मुस्कुराया, “फ़ुर्सत… काश, लोग इससे वाक़िफ़ होते। हर इंसान को ये चीज़ मुफ़्त मयस्सर हो सकती है। लेकिन लोग कुछ ऐसे बेवक़ूफ़ हैं कि वो इसे हासिल करने की कोशिश ही नहीं करते… काम? कमबख़्त, इतना समझने के भी अह्ल नहीं कि काम करने से ग़रज़ सिर्फ़ फ़ुर्सत हासिल करना है।” शराब का असर उमूमन बा’ज़ लोगों को गौर-ओ-फ़िक्र की तरफ़ ले जाता है। विल्सन का ख़याल अपनी जगह दुरुस्त था मगर कोई अछूती और अनोखी बात नहीं थी। उसने सिगरेट सुलगाया और कहने लगा, “जब मैं पहली बार यहां आया, तो चांदनी रात का समां था… आज भी वही चौदहवीं का चांद आसमान पर नज़र आएगा।” मैं मुस्कुरा दिया, “ज़रूर नज़र आएगा”

वो बोला, “दोस्त, मेरा मज़ाक़ न उड़ाओ… जब मैं अपनी ज़िंदगी के पिछले पंद्रह बर्सों पर नज़र डालता हूँ तो मुझे ये तवील अ’र्सा एक महीने का धुंदलका वक़्फ़ा सा लगता है। आह, वो रात, जब पहली बार, मैंने चबूतरे पर बैठ कर चांद का नज़ारा किया। किरनें दरिया की सतह पर चांदी के पतरे चढ़ा रही थीं। मैंने उस वक़्त शराब ज़रूर पी रखी थी। लेकिन दरिया के नज़ारे और आस पास की फ़िज़ा ने जो नशा पैदा किया, वो शराब कभी पैदा न कर सकती।”

उसके होंट ख़ुश्क होने लगे। उसने अपना गिलास उठाया, मगर वो ख़ाली था, एक बोतल मंगवाई गई, विल्सन ने दो-चार बड़े बड़े घूँट पीए और कहने लगा, “अगले दिन मैं दरिया किनारे नहाया और जज़ीरे में इधर उधर घूमता रहा, बड़ी रौनक़ थी। मालूम हुआ कि हुस्न-ओ-इ’श्क़ की देवी अफ़्रो डाइट का त्योहार है… मगर मेरी तक़दीर में सदा बैंक का मुंतज़िम होना ही लिखा होता तो यक़ीनन मुझे ऐसी सैर कभी नसीब न होती।” मैंने उससे पूछा, “क्या तुम किसी बैंक के मैनेजर थे?”

“हाँ भाई था… वो रात मेरे क़ियाम की आख़िरी रात थी क्योंकि पीर की सुब्ह मुझे बैंक में हाज़िर होना था। पर जब मैंने चांद दरिया और कश्तियों को देखा तो ऐसा बेखु़द हुआ कि वापस जाने का ख़याल मेरे ज़ेहन से उतर गया।” इस के बाद उसने अपने गुज़िश्ता वाक़ियात तफ़सील से बताए और कहा कि वो जज़ीरे में पंद्रह साल से मुक़ीम है और अब उसकी उम्र उनचास बरस की थी। पहली बार जब वो यहां आया तो उसने सोचा कि मुलाज़मत का तौक़ गले से उतार देना चाहिए और ज़िंदगी के बाक़ी अय्याम यहां की मस्हूरकुन फ़ज़ाओं में गुज़ारने चाहिऐं।

जज़ीरे की फ़ज़ा और चांद की रौशनी विल्सन के दिमाग़ पर इस क़दर ग़ालिब आई कि उसने बैंक की मुलाज़मत तर्क कर दी। अगर वो चंद बरस और वहां रहता तो उसे मा’क़ूल पेंशन मिल जाती। मगर उसने उसकी मुतलक़ पर्वा न की। अलबत्ता बैंक वालों ने उसे उसकी ख़िदमात के इवज़ इनाम दिया। विल्सन ने अपना घर बेचा और जज़ीरे का रुख़ किया। उसके अपने हिसाब के मुताबिक़ वो पच्चीस बरस तक ज़िंदगी बसर कर सकता था।

मेरी उससे कई मुलाक़ातें हुईं। इस दौरान में मुझे मालूम हुआ कि वो बड़ा ए’तिदाल पसंद है। उसे कोई ऐसी बात गवारा नहीं जो उसकी आज़ादी में ख़लल डाले, इसी वजह से औरत भी उसको मुतअस्सिर न कर सकी। वो सिर्फ़ क़ुदरती मनाज़िर का परस्तार था। उसकी ज़िंदगी का वाहिद मक़सद सिर्फ़ अपने लिए ख़ुशी तलाश करना था और उसे ये नायाब चीज़ मिल गई थी। बहुत कम इंसान ख़ुशी की तलाश करना जानते हैं, मैं नहीं कह सकता वो समझदार था या बेवक़ूफ़। इतना ज़रूर है कि अपनी ज़ात के हर पहलू से बख़ूबी वाक़िफ़ था।

आख़िरी मुलाक़ात के बाद मैंने अपने मेज़बान दोस्त से रुख़सत चाही और अपने घर रवाना होगया। इस दौरान में जंग छिड़ गई और मैं तेरह बरस तक उस जज़ीरे पर न जा सका। तेरह बरस के बाद जब मैं जज़ीरे पर पहुंचा तो मेरे दोस्त की हालत बहुत ख़स्ता हो चुकी थी। मैंने एक होटल में कमरा किराए पर लिया खाने पर अपने दोस्त से विल्सन के मुतअ’ल्लिक़ बात हुई। वो ख़ामोश रहा। उसकी ये ख़ामोशी बड़ी अफ़्सुर्दा थी। मैंने बेचैन हो कर पूछा, “कहीं उसने ख़ुदकुशी तो नहीं करली।”

मेरे दोस्त ने आह भरी, “ये दर्द भरी दास्तान मैं तुम्हें क्या सुनाऊं?” विल्सन की स्कीम माक़ूल थी कि वो पच्चीस बरस आराम से गुज़ार सकता है। पर उसे ये मालूम नहीं था कि आराम के पच्चीस बरस गुज़ारने के साथ ही उसकी क़ुव्वत-ए-इरादी ख़त्म हो जाएगी। क़ुव्वत-ए-इरादी को ज़िंदा रखने के लिए कश्मकश ज़रूरी है। हमवार ज़मीन पर चलने वाले पहाड़ियों पर नहीं चढ़ सकते। उसका तमाम रुपया ख़त्म होगया। उधार लेता रहा, लेकिन ये सिलसिला कब तक जारी रहता।

क़र्ज़ ख्वाहों ने उसे तंग करना शुरू किया। आख़िर एक रोज़ उसने अपनी झोंपड़ी के उस कमरे में जहां वो सोता था, बहुत से कोयले जलाए और दरवाज़ा बंद कर दिया। सुब्ह जब उसकी नौकरानी नाशता तैयार करने आई तो उसे बेहोश पाया। लोग उसे हस्पताल ले गए। बच गया पर उसका दिमाग़ क़रीब क़रीब माऊफ़ हो गया। मैं उससे मिलने गया लेकिन वो कुछ इस तरह हैरान नज़रों से मेरी तरफ़ देखने लगा जैसे मुझे पहचान नहीं सका।

मैंने अपने दोस्त से पूछा, “अब कहाँ रहता है?” “घर-बार तो उसका नीलाम होगया है… पहाड़ियों पर आवारा फिरता रहता है। मैंने एक दो मर्तबा उसे पुकारा, मगर वो मेरी शक्ल देखते ही जंगली हिरनों की तरह क़ुलांचें भरता दौड़ गया।” दो-तीन दिन के बाद जब मैं और मेरा दोस्त चहल-क़दमी कर रहे थे कि मेरा दोस्त ज़ोर से पुकारा, “विल्सन।”

मेरी निगाहों ने उसे ज़ैतून के दरख़्त के पीछे छुपता देखा। हमारे क़रीब पहुंचने पर उसने कोई हरकत न की, बस साकित-ओ-सामत खड़ा रहा। फिर एका एकी जवानों के मानिंद बेतहाशा भागना शुरू कर दिया। इसके बाद मैंने फिर उसको कभी न देखा। घर वापस आया तो एक बरस के बाद मेरे दोस्त का ख़त आया कि विल्सन मर गया। उसकी लाश पहाड़ी के किनारे पड़ी थी। चेहरे से ये ज़ाहिर होता था कि सोते में दम निकल गया है… उस रात चौदहवीं का चांद था… मेरा ख़याल है, शायद ये चौदहवीं का चांद ही उसकी मौत का सबब हो।

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