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प्राचीनकाल में एक हिरण्‍यकश्‍यप नाम का राजा था, वह काफी बलशाली असुर था. उसको अपनी शक्तियों का भी खूब गुमान था. उसका यह अभिमान इस कदर बढ़ गया था कि उसने संपूर्ण प्रजा को उसे भगवान मानकर पूजा करने का आदेश दे डाला. लेकिन उसका बेटा प्रह्लााद नारायण का परम भक्‍त था. वह हर समय श्री हर‍ि-श्री हरि का नाम जपता रहता था. हिरण्‍यकश्‍यप को इससे काफी समस्‍या थी. कई बार उसे खुद समझाया तो कई बार अपनी सभा के मंत्रिमंडल को भेजा. जब भक्त प्रह्लााद नही माना तो परेशान हिरण्यकश्‍यप ने उससे छुटकारा पाने के लिए उसे नदी में डुबोया, पहाड़ से गिरवाया किन्तु उसका बाल भी बांका नहीं हुआ और वह तो बस हरि का भक्ति में ही लीन रहा. पिता के बहुत समझाने के बाद भी जब पुत्र ने श्री विष्णु जी की पूजा करनी बन्द नहीं कि तो हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को दण्ड देने के लिए दूसरी ही युक्ति निकाली.

हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलवाया. होलिका अग्निदेव की उपासक थी. अग्निदेव से इन्हें वरदान में ऐसा वस्त्र मिला था जिसे धारण करने के बाद अग्नि उन्हें जला नहीं सकती थी. बस इसी बात के चलते हिरण्‍यकश्‍यप ने उन्‍हें यह आदेश दिया कि वह उनके पुत्र प्रह्लाद यानी कि होलिका के भतीजे को लेकर हवन कुंड में बैठें. भाई के इस आदेश का पालन करने के लिए वह प्रहलाद को लेकर अग्नि कुंड में बैठ गईं. इसके बाद ईश्‍वर की कृपा से इतनी तेज हवा चली कि वह वस्‍त्र होलिका के शरीर से उड़कर भक्‍त प्रहलाद के शरीर पर गिर गया. इससे प्रहलाद तो बच गया लेकिन होलिका जलकर भस्‍म हो गईं. यह देख हिरण्यकश्यप अपने पुत्र से और अधिक नाराज हुआ.

हिरण्यकश्यप को वरदान था कि वह वह न दिन में मर सकता है न रात में, न जमीन पर मर सकता है और न आकाश या पाताल में, न मनुष्य उसे मार सकता है और न जानवर या पशु- पक्षी, इसीलिए भगवान उसे मारने का समय संध्या चुना और आधा शरीर सिंह का और आधा मनुष्य का- नृसिंह अवतार. हिरण्यकश्यप को मारने के लिए भगवान विष्णु नरंसिंह अवतार में खंभे से निकल कर गोधूली समय (सुबह और शाम के समय का संधिकाल) में दरवाजे की चौखट पर बैठकर अत्याचारी हिरण्यकश्यप को मार डाला. तभी से होली का त्यौहार मनाया जाने लगा.

इस कथा से यही धार्मिक संदेश मिलता है कि प्रह्लाद धर्म के पक्ष में था और हिरण्यकश्यप व उसकी बहन होलिका अधर्म निति से कार्य कर रहे थे. अतंत: देव कृपा से अधर्म और उसका साथ देने वालों का अंत हुआ. इस कथा से प्रत्येक व्यक्ति को यह प्ररेणा लेनी चाहिए, कि प्रह्लाद प्रेम, स्नेह, अपने देव पर आस्था, द्र्ढ निश्चय और ईश्वर पर अगाध श्रद्धा का प्रतीक है. वहीं, हिरण्यकश्यप व होलिका ईर्ष्या, द्वेष, विकार और अधर्म के प्रतीक है. होलिका दहन के पूर्व पूजन के दौरान असुर राज ह‍िरण्‍यकश्‍यप और भक्‍तपरायण प्रह्लााद की यह कथा पढ़ने का विधान है. मान्‍यता है कि जो भी जातक इस कथा को पूरी श्रद्धा से पढ़ता या सुनता है. उसपर श्री हरि विष्‍णु की कृपा बनी रहती है. उसकी सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती हैं. साथ ही जीवन की सभी परेशान‍ियां भी दूर हो जाती हैं. सुख-समृद्धि का वास होता है.

इलोजी-होलिका की प्रेम कहानी
हम लोग होलिका को एक खलनायिका के रूप में जानते हैं लेकिन हिमाचल प्रदेश में होलिका के प्रेम की व्यथा जन-जन में प्रचलित है. इस कथा को आधार मानें तो होलिका एक बेबस प्रेयसी नजर आती है जिसने प्रिय से मिलन की खातिर मौत को गले लगा लिया.
हिरण्यकश्यप की बहन होलिका का विवाह इलोजी से तय हुआ था और विवाह की तिथि पूर्णिमा निकली. इधर हिरण्यकश्यप अपने बेटे प्रहलाद की भक्ति से परेशान था. उसकी महात्वाकांक्षा ने बेटे की बलि को स्वीकार कर लिया. बहन होलिका के सामने जब उसने यह प्रस्ताव रखा तो होलिका ने इंकार कर दिया. फिर हिरण्यकश्यप ने उसके विवाह में खलल डालने की धमकी दी. बेबस होकर होलिका ने भाई की बात मान ली. और प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठने की बात स्वीकार कर ली. वह अग्नि की उपासक थी और अग्नि का उसे भय नहीं था.
उसी दिन होलिका के विवाह की तिथि भी थी. इन सब बातों से बेखबर इलोजी बारात लेकर आ रहे थे और होलिका प्रहलाद को जलाने की कोशिश में स्वयं जलकर भस्म हो गई. जब इलोजी बारात लेकर पहुंचे तब तक होलिका की देह खाक हो चुकी थी. इलोजी यह सब सहन नहीं कर पाए और उन्होंने भी हवन में कूद लगा दी. तब तक आग बुझ चुकी थी. अपना संतुलन खोकर वे राख और लकड़ियां लोगों पर फेंकने लगे. उसी हालत में बावले से होकर उन्होंने जीवन काटा. होलिका-इलोजी की प्रेम कहानी आज भी हिमाचल प्रदेश के लोग याद करते हैं.

होलिका से जुड़े कुछ सवाल और उनके जवाब
सवाल – होलिका कौन थी?
जवाब – होलिका हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप नामक राजा की बहन और प्रह्लाद नामक विष्णु भक्त की बुआ थी. जिसका जन्म जनपद- कासगंज के सोरों शूकरक्षेत्र नामक स्थान पर हुआ था.
सवाल – होलिका के पति का नाम क्या था?
जवाब – होलिका के पति का नाम इलोजी बताया जाता है. हालाकि दोनो की शादी नही हुई थी.
सवाल – होलिका कहां जली थी? भगवान नृसिंह कहां प्रकट हुए थे
जवाब – पूर्णिया जिले के बनमनखी प्रखंड के सिकलीगढ़ में आज भी वह स्‍थान मौजूद हैं, जहां असली में होलिका भक्‍त प्रह्लाद को लेकर जली थी. मान्‍यता है कि इसी स्‍थान पर होलिका अपने भाई हिरण्‍यकश्‍यप के कहने पर भक्‍त प्रह्लाद को लेकर जलती चिता पर बैठ गई थी. दावा किया जाता है कि यहीं पर वह खंभा भी मौजूद जहां से भगवान विष्‍णु नरसिंह अवतार में प्रकट हुए थे और हिरण्‍यकश्‍यप का वध किया था.
सवाल – होलिका दहन क्यों मनाया जाता है?
जवाब – होलिका दहन, हिन्दुओं का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें होली के एक दिन पहले यानी पूर्व सन्ध्या को होलिका का सांकेतिक रूप से दहन किया जाता है. होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत के पर्व के रूप में मनाया जाता है.

सवाल –  हिरण्यकश्यप की पत्नी का क्या नाम था?
जवाब –  हिरण्यकश्यप की पत्नी का नाम कयाधु था
सवाल – हिरण्यकश्यप की माता का नाम क्या था?
जवाब – हिरण्यकश्यप की माता का नाम दिति था. बता दें कि कश्यप ऋषि की अनेक पत्निया थी, उनमे से एक दिति थी. दिति के दो पुत्र थे हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष.
सवाल – हिरण्यकश्यप के बेटे का क्या नाम था?
जवाब – हिरण्यकशिपु ने कयाधु नामक कन्या से विवाह किया जिससे उसे पांच पुत्र – प्रह्लाद, संह्लाद, आह्लाद, शिवि एवं वाष्कल तथा एक पुत्री सिंहिका की प्राप्ति हुई. सिंहिका ने विप्रचित्ति दानव से विवाह किया जिससे उसे स्वर्भानु नामक पुत्र की प्राप्ति हुई.
सवाल – हिरण्यकश्यप को क्या वरदान मिला था?
जवाब – हिरण्यकश्यप को वरदान था कि वह न तो दिन में मरेगा या रात में, न अस्त्र से मरेगा न शस्त्र से, न मनुष्य से मरेगा, न पशु से, न घर के भीतर मरेगा और न बाहर. ऐसी विचित्र और कठिन शर्तों के साथ मिला वरदान उसके लिए अभिशाप बन गया, क्योंकि वरदान के साथ उसने भगवान से विवेक नहीं मांगा.

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क्यों मनाई जाती है दीपावली, Kyo Manayi Jati Hai Diwali
भारत को त्योहारों की भूमि कहा जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार भारत में कुल 33 करोड़ देवी-देवता हैं और इसी कारण यहां पर हमेशा त्यौहारों का सीजन बना ही रहता है। इन्हीं पर्वों में से एक खास पर्व है दीपावली जो पांच दिवसीय त्यौहार है। केवल भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी इस पर्व को धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन हम दीपावली क्‍यों मनाते हैं, आखिर इसके पीछे क्‍या कारण है? तो दिपावली मनाने के पीछे एक नहीं बल्कि कई कार छिपे हैं. दीपावली मनाने के पीछे कई पौराणिक कथाएं व मान्यताएं हैं। आइए आज हम आपको दीपावली से संबंधित 7 ऐसी कहानियां बताते हैं जिसके कारण यह पर्व मनाया जाता है।

पहली कहानी -श्री राम जी का अयोध्या लौटना -Shri Ram Ka Ayodhya Lautna
दीपावली श्री राम जी के वनवास से लौटने की ख़ुशी में मनाते हैं। मंथरा के गलत विचारों से पीड़ित हो कर भरत की माता कैकई श्री राम को उनके पिता दशरथ से वनवास भेजने के लिए वचनवद्ध कर देती हैं। ऐसे में श्री राम अपने पिता के आदेश को सम्मान मानते हुए माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्ष के वनवास के लिए निकल पड़ते हैं। वहीँ वन में रावण माता सीता को छल से अपहरण कर लेता है। तब श्री राम सुग्रीव के वानर सेना और प्रभु हनुमान के साथ मिल कर रावण की सेना को परास्त करते हैं और श्री राम रावण का वध करके सीता माता को छुड़ा लाते हैं। उस दिन को दशहरे के रूप में मनाया जाता है और जब श्री राम अपने घर अयोध्या लौटते हैं तो पूरे राज्य के लोग उनके आने की ख़ुशी में रात्री के समय दीप जलाते हैं और खुशियाँ मनाते हैं। तब से उस दिन का नाम दीपावली के नाम से जाना जाता है।

दूसरी कहानी- श्री कृष्ण द्वारा नरकासुर राक्षस का वध – Shri Krishna Dwara Narkasur Vadh
दीपावली का त्यौहार मनाने के पीछे एक और सबसे बड़ी कहानी है। इसी दिन प्रभु श्री कृष्ण ने नरकासुर राक्षस का वध किया था। नरकासुर उस समय प्रागज्योतिषपुर (जो कि आज दक्षिण नेपाल में एक प्रान्त है) का राजा था। नरकासुर इतना क्रूर था की उसने देवमाता अदिति के शानदार बालियों तक को छीन लिया। देवमाता अदिति श्री कृष्ण की पत्नी सत्यभामा की सम्बन्धी थी। नरकासुर ने कुल सोलह भगवान की कन्याओं को बंधित कर के रखा था। श्री कृष्ण की मदद से, सत्यभामा ने नरकासुर का वध किया और सभी देवी कन्याओं को उसके चंगुल से छुड़ाया। यह भी दीपावली मनाने का एक मुख्य कारण है।

तीसरी कहानी- पांडवों का अपने राज्य में लौटना- Pandavon Ka Apne Rajya Me Lautna
आप ने महाभारत की कहानी तो सुनी ही होगी। कौरवों ने, शकुनी मामा के चाल की मदद से शतरंज के खेल में पांडवों का सब कुछ छीन लिया था और यहाँ तक की उन्हें राज्य छोड़ कर 13 वर्ष के लिए वनवास भी जाना पड़ा। इसी कार्तिक अमावस्या को वो 5 पांडव (युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव) अपने 13 वर्ष के वनवास से अपने राज्य लौटे थे। उनके लौटने के ख़ुशी में उनके राज्य के लोगों नें दीप जला कर खुशियाँ मनाया। यह भी दीपावली मनाने का एक बहुत ही मुख्य कारण है।

चौथी कहानी- माता लक्ष्मी जी ने लिया सृष्टि में अवतार – Laxmi Ka Avtar
हर बार दीपावली का त्यौहार हिन्दी कैलंडर के अनुसार कार्तिक महीने के ‘अमावस्या’ के दिन मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन समुन्द्र मंथन के दौरान माता लक्ष्मी जी ने सृष्टि में अवतार लिया था। माता लक्ष्मी को धन और समृद्धि की देवी माना जाता है। इसीलिए हर घर में दीप जलने के साथ-साथ हम माता लक्ष्मी जी की पूजा भी करतें हैं। पांचवीं कहानी सिख गुरु की आजादी

पांचवीं कहानी – हिरण्यकश्यप का वध- Hiranyakashyap Vadh
एक पौराणिक कथा के अनुसार विष्णु ने नरसिंह रूप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था। दैत्यराज की मृत्यु पर प्रजा ने घी के दीये जलाकर दिवाली मनाई थी।

छठवीं कहानी – राजा विक्रमादित्य का राज्याभिषेक- Raja Vikramaditya Rajyabhishek
राजा विक्रमादित्य प्राचीन भारत के एक महान सम्राट थे। वे एक बहुत ही आदर्श राजा थे और उन्हें उनके उदारता, साहस तथा विद्वानों के संरक्षणों के कारण हमेशा जाना गया है। इसी कार्तिक अमावस्या को उनका राज्याभिषेक हुआ था। राजा विक्रमादित्य मुगलों को धूल चटाने वाले भारत के अंतिम हिंदू सम्राट थे।

सातवीं कहानी- सिक्खों के 6वें गुरु को मिली थी आजादी – Sikkhon ke Guru ki Aazadi
मुगल बादशाह जहांगीर ने सिखों के 6वें गुरु गोविंद सिंह सहित 52 राजाओं को ग्वालियर के किले में बंदी बनाया था। गुरू को कैद करने के बाद जहांगीर मानसिक रूप से परेशान रहने लगा। जहांगीर को स्वप्न में किसी फकीर से गुरू जी को आजाद करने का हुक्म मिला था। जब गुरु को कैद से आजाद किया जाने लगा तो वे अपने साथ कैद हुए राजाओं को भी रिहा करने की मांग करने लगे। गुरू हरगोविंद सिंह के कहने पर राजाओं को भी कैद से रिहाई मिली थी। इसलिए इस त्यौहार को सिख समुदाय के लोग भी मनाते हैं।

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द्रौपदी को श्री कृष्ण ने सुनाई शिव-पार्वती कथा, Karva Chauth Vrat Katha In Hindi
एक बार अर्जुन नीलगिरि पर तपस्या करने गए। द्रौपदी ने सोचा कि यहाँ हर समय अनेक प्रकार की विघ्न-बाधाएं आती रहती हैं। उनके शमन के लिए अर्जुन तो यहाँ हैं नहीं, अत: कोई उपाय करना चाहिए। यह सोचकर उन्होंने भगवान श्री कृष्ण का ध्यान किया।
भगवान वहाँ उपस्थित हुए तो द्रौपदी ने अपने कष्टों के निवारण हेतु कोई उपाय बताने को कहा। इस पर श्रीकृष्ण बोले- एक बार पार्वती जी ने भी शिव जी से यही प्रश्न किया था तो उन्होंने कहा था कि करवाचौथ का व्रत गृहस्थी में आने वाली छोटी- मोटी विघ्न-बाधाओं को दूर करने वाला है। यह पित्त प्रकोप को भी दूर करता है। फिर श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को ब्राह्मण के सात पुत्र तथा एक पुत्री की कथा सुनाई, जो इस प्रकार है-

ब्राह्मण के सात पुत्र तथा एक पुत्री की कहानी:
प्राचीनकाल में एक धर्मपरायण ब्राह्मण के सात पुत्र तथा एक पुत्री थी। बड़ी होने पर पुत्री का विवाह कर दिया गया। कार्तिक की चतुर्थी को कन्या ने करवा चौथ का व्रत रखा। सात भाइयों की लाड़ली बहन को चंद्रोदय से पहले ही भूख सताने लगी। उसका फूल सा चेहरा मुरझा गया। भाइयों के लिए बहन की यह वेदना असहनीय थी। अत: वे कुछ उपाय सोचने लगे।
उन्होंने बहन से चंद्रोदय से पहले ही भोजन करने को कहा, पर बहन न मानी। तब भाइयों ने स्नेहवश पीपल के वृक्ष की आड़ में प्रकाश करके कहा- देखो ! चंद्रोदय हो गया। उठो, अर्ध्य देकर भोजन करो।’ बहन उठी और चंद्रमा को अर्ध्य देकर भोजन कर लिया। भोजन करते ही उसका पति मर गया। वह रोने चिल्लाने लगी। दैवयोग से इन्द्राणी देवदासियों के साथ वहाँ से जा रही थीं। रोने की आवाज़ सुन वे वहाँ गईं और उससे रोने का कारण पूछा।

ब्राह्मण कन्या ने सब हाल कह सुनाया। तब इन्द्राणी ने कहा- तुमने करवा चौथ के व्रत में चंद्रोदय से पूर्व ही अन्न-जल ग्रहण कर लिया, इसी से तुम्हारे पति की मृत्यु हुई है। अब यदि तुम मृत पति की सेवा करती हुई बारह महीनों तक प्रत्येक चौथ को यथाविधि व्रत करो, फिर करवा चौथ को विधिवत गौरी, शिव, गणेश, कार्तिकेय सहित चंद्रमा का पूजन करो और चंद्र उदय के बाद अर्ध्य देकर अन्न-जल ग्रहण करो तो तुम्हारे पति अवश्य जीवित हो उठेंगे।
ब्राह्मण कन्या ने अगले वर्ष 12 माह की चौथ सहित विधिपूर्वक करवा चौथ का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उनका मृत पति जीवित हो गया। इस प्रकार यह कथा कहकर श्रीकृष्ण द्रौपदी से बोले- यदि तुम भी श्रद्धा एवं विधिपूर्वक इस व्रत को करो तो तुम्हारे सारे दुख दूर हो जाएंगे और सुख-सौभाग्य, धन-धान्य में वृद्धि होगी। फिर द्रौपदी ने श्रीकृष्ण के कथनानुसार करवा चौथ का व्रत रखा। उस व्रत के प्रभाव से महाभारत के युद्ध में कौरवों की हार तथा पाण्डवों की जीत हुई.

पतिव्रता करवा धोबिन की कथा
पुराणों के अनुसार करवा नाम की एक पतिव्रता धोबिन अपने पति के साथ तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित गांव में रहती थी। उसका पति बूढ़ा और निर्बल था। एक दिन जब वह नदी के किनारे कपड़े धो रहा था तभी अचानक एक मगरमच्छ वहां आया, और धोबी के पैर अपने दांतों में दबाकर यमलोक की ओर ले जाने लगा। वृद्ध पति यह देख घबराया और जब उससे कुछ कहते नहीं बना तो वह करवा..! करवा..! कहकर अपनी पत्नी को पुकारने लगा।
पति की पुकार सुनकर धोबिन करवा वहां पहुंची, तो मगरमच्छ उसके पति को यमलोक पहुंचाने ही वाला था। तब करवा ने मगर को कच्चे धागे से बांध दिया और मगरमच्छ को लेकर यमराज के द्वार पहुंची।
उसने यमराज से अपने पति की रक्षा करने की गुहार लगाई और बोली- हे भगवन्! मगरमच्छ ने मेरे पति के पैर पकड़ लिए है। आप मगरमच्छ को इस अपराध के दंड-स्वरूप नरक भेज दें।

करवा की पुकार सुन यमराज ने कहा- अभी मगर की आयु शेष है, मैं उसे अभी यमलोक नहीं भेज सकता। इस पर करवा ने कहा- अगर आपने मेरे पति को बचाने में मेरी सहायता नहीं कि तो मैं आपको श्राप दूंगी और नष्ट कर दूंगी।
करवा का साहस देख यमराज भी डर गए और मगर को यमपुरी भेज दिया। साथ ही करवा के पति को दीर्घायु होने का वरदान दिया।
तब से कार्तिक कृष्ण की चतुर्थी को करवा चौथ व्रत का प्रचलन में आया। जिसे इस आधुनिक युग में भी महिलाएं अपने पूरी भक्ति भाव के साथ करती है और भगवान से अपनी पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं।

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नरक चतुर्दशी की कथा, Narak Chaturdashi Katha In Hindi
दिवाली से एक दिन पहले आने वाले त्यौहार रूप चौदस यानि छोटी दिवाली को भी बड़े ही धूमधाम से सेलिब्रेट किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन जो व्यक्ति मृत्यु के देवता यमराज की पूजा करता है उसको जीवन की सभी परेशानियों से मुक्ति मिल जाती है। रूप चौदस पर यमराज के लिए दीप जलाने की प्रथा है। कहा जाता है कि ऐसा करने से व्यक्ति की अकाल मृत्यु नही होती. छोटी दिवाली को रूप चौदस, नरक चतुर्दशी और काली चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है. पर क्या आप जानते हैं इसके पीछे का कारण क्या है, अगर नहीं तो आज हम आपके लिए इसके पीछे की कहानी लेकर आए हैं, जानिए इसके बारे में-

नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) को क्‍यों कहते हैं रूप चतुर्दशी?
मान्‍यता के अनुसार हिरण्‍यगभ नाम के एक राजा ने राज-पाट छोड़कर तप में विलीन होने का फैसला किया. कई वर्षों तक तपस्‍या करने की वजह से उनके शरीर में कीड़े पड़ गए. इस बात से दुखी हिरण्‍यगभ ने नारद मुनि से अपनी व्‍यथा कही. नारद मुनि ने राजा से कहा कि कार्तिक मास कृष्‍ण पक्ष चतुर्दशी के दिन शरीर पर लेप लगाकर सूर्योदय से पूर्व स्‍नान करने के बाद रूप के देवता श्री कृष्‍ण की पूजा करें. ऐसा करने से फिर से सौन्‍दर्य की प्राप्ति होगी. राजा ने सबकुछ वैसा ही किया जैसा कि नारद मुनि ने बताया था. राजा फिर से रूपवान हो गए. तभी से इस दिन को रूप चतुर्दशी भी कहते हैं.

नरक चतुर्दशी को छोटी दीपावली क्यों कहा जाता है?
दीपावली से एक दिन पहले नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली पांच पर्वों की श्रृंखला के मध्य में रहने वाला त्योहार है। इसे छोटी दीपावली इसलिए कहा जाता है क्योंकि दीपावली से एक दिन पहले रात के वक्त उसी प्रकार दीए की रोशनी से रात के तिमिर को प्रकाश पुंज से दूर भगा दिया जाता है जैसे दीपावली की रात को।
छोटी दिवाली को क्यों कहते हैं नरक चतुर्दशी ?
नरक चतुर्दशी को मुक्ति पाने वाला पर्व कहा जाता है। इस दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। इसलिए इस चतुर्दशी का नाम नरक चतुर्दशी पड़ा। इस दिन सूर्योदय से पहले उठने और स्नान करने का महत्त्व है। इससे मनुष्य को यम लोक का दर्शन नहीं करना पड़ता है।

पहली कथा- विष्णु और श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार नरकासुर नामक असुर ने अपनी शक्ति से देवी-देवताओं और मानवों को परेशान कर रखा था। असुर ने संतों के साथ 16 हजार स्त्रियों को भी बंदी बनाकर रखा था। जब उसका अत्याचार बहुत बढ़ गया तो देवता और ऋषि-मुनियों ने भगवान श्रीकृष्ण की शरण में आकर कहा कि इस नरकासुर का अंत कर पृथ्वी से पाप का भार कम करें। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें नरकासुर से मुक्ति दिलाने का आश्वासन दिया लेकिन नरकासुर को एक स्त्री के हाथों मरने का शाप था इसलिए भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया और उनकी सहायता से नरकासुर का वध किया। जिस दिन नरकासुर का अंत हुआ, उस दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी थी।
नरकासुर के वध के बाद श्रीकृष्ण ने कन्याओं को बंधन से मुक्त करवाया। मुक्ति के बाद कन्याओं ने भगवान कृष्ण से गुहार लगाई कि समाज अब उन्हें कभी स्वीकार नहीं करेगा, इसके लिए आप कोई उपाय निकालें। हमारा सम्मान वापस दिलवाएं। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए भगवान कृष्ण ने सत्यभामा के सहयोग से 16 हजार कन्याओं से विवाह कर लिया। 16 हजार कन्याओं को मुक्ति और नरकासुर के वध के उपलक्ष्य में घर-घर दीपदान की परंपरा शुरू हुई।

दूसरी कथा- नरक चतुर्दशी (रूप चौदस) के दिन व्रत और पूजा के संदर्भ में दूसरी कथा
इस दिन के व्रत और पूजा के संदर्भ में एक दूसरी कथा यह है कि रंति देव नामक एक पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा थे। उन्होंने अनजाने में भी कोई पाप नहीं किया था लेकिन जब मृत्यु का समय आया तो उनके समक्ष यमदूत आ खड़े हुए।  यमदूत को सामने देख राजा अचंभित हुए और बोले मैंने तो कभी कोई पाप कर्म नहीं किया फिर आप लोग मुझे लेने क्यों आए हो क्योंकि आपके यहां आने का मतलब है कि मुझे नर्क जाना होगा। आप मुझ पर कृपा करें और बताएं कि मेरे किस अपराध के कारण मुझे नरक जाना पड़ रहा है। यह सुनकर यमदूत ने कहा कि हे राजन् एक बार आपके द्वार से एक बार एक ब्राह्मण भूखा लौट गया था,यह उसी पापकर्म का फल है। इसके बाद राजा ने यमदूत से एक वर्ष समय मांगा। तब यमदूतों ने राजा को एक वर्ष की मोहलत दे दी। राजा अपनी परेशानी लेकर ऋषियों के पास पहुंचे और उन्हें अपनी सारी कहानी सुनाकर उनसे इस पाप से मुक्ति का क्या उपाय पूछा।
तब ऋषि ने उन्हें बताया कि कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करें और ब्राह्मणों को भोजन करवा कर उनके प्रति हुए अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें। राजा ने वैसा ही किया जैसा ऋषियों ने उन्हें बताया।  इस प्रकार राजा पाप मुक्त हुए और उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ। उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति हेतु भूलोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है।

तीसरी कथा- दैत्यराज बलि की कथा
एक अन्य पौराणिक कथा में दैत्यराज बलि को भगवान श्री कृष्ण द्वारा मिले वरदान का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने वामन अवतार के समय त्रयोदशी से अमावस्या की अवधि के बीच दैत्यराज बलि के राज्य को 3 कदम में नाप दिया था। राजा बलि जो कि परम दानी थे, उन्होंने यह देखकर अपना समस्त राज्य भगवान वामन को दान कर दिया। इसके बाद भगवान वामन ने बलि से वरदान मांगने को कहा। दैत्यराज बलि ने कहा कि हे प्रभु, त्रयोदशी से अमावस्या की अवधि में इन तीनों दिनों में हर वर्ष मेरा राज्य रहना चाहिए। इस दौरान जो मनुष्य में मेरे राज्य में दीपावली मनाए उसके घर में लक्ष्मी का वास हो और चतुर्दशी के दिन नरक के लिए दीपों का दान करे, उनके सभी पितर नरक में ना रहें और ना उन्हें यमराज यातना ना दें। राजा बलि की बात सुनकर भगवान वामन प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया। इस वरदान के बाद से ही नरक चतुर्दशी व्रत, पूजन और दीपदान का प्रचलन शुरू हुआ।

रूप चौदस (नरक चौदस) को क्यों कहते हैं काली चौदस?
दरअसल पूरे भारतवर्ष में रूप चतुर्दशी का पर्व यमराज के प्रति दीप प्रज्जवलित कर, यम के प्रति आस्था प्रकट करने के लिए मनाया जाता है, लेकिन बंगाल में मां काली के जन्मदिन के रूप में भी मनाया जाता है, जिसके कारण इस दिन को काली चौदस कहा जाता है। इस दिन मां काली की आराधना का विशेष महत्व होता है। काली मां के आर्श‍िवाद से शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने में सफलता मिलती है।
रूप चौदस का महत्त्व
इस दिन सुबह यमराज की पूजा और शाम के समय दीप दान करने से अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल लगाकर और पानी में चिरचिरी के पत्ते डालकर उससे स्नान करके विष्णु मंदिर और कृष्ण मंदिर में भगवान का दर्शन करना करना चाहिए। इससे पाप कटता है और रूप सौन्दर्य की प्राप्ति होती है। कई घरों में इस दिन रात को घर का सबसे बुजुर्ग सदस्य एक दिया जला कर पूरे घर में घुमाता है और फिर उसे ले कर घर से बाहर कहीं दूर रख कर आता है। घर के अन्य सदस्य अंदर रहते हैं और इस दिए को नहीं देखते। यह दीया यम का दीया कहलाता है। माना जाता है कि पूरे घर में इसे घुमा कर बाहर ले जाने से सभी बुराइयां और कथित बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं।

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धनतेरस पौराणिक कथा, Dhanteras Pauranik Katha, धनतेरस के दिन क्‍यों की जाती है लक्ष्‍मी जी की पूजा, Dhanteras Ke Din K‍yon Hoti Hai Laksh‍mi Ji Ki Puja, Why Is Laxmi Worshiped On Dhanteras

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धनतेरस के दिन क्‍यों की जाती है लक्ष्‍मी जी की पूजा, Dhanteras Ke Din K‍yon Hoti Hai Laksh‍mi Ji Ki Puja
दिवाली के दो दिन पहले धनतेरस के दिन आखिर लक्ष्मी जी की पूजा क्यों की जाती है? इसके पीछे एक पौराणिक कथा प्रचलित है. पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान विष्णु मृत्युलोक में विचरण करने के लिए आ रहे थे तब लक्ष्मी जी ने भी उनसे साथ चलने का आग्रह किया. तब विष्णु जी ने कहा, ‘अगर मैं जो बात कहूं तुम अगर वैसा ही मानो तो फिर चलो.’ तब लक्ष्मी जी उनकी बात मान गईं और भगवान विष्णु के साथ भूमंडल पर आ गईं. कुछ देर बाद एक जगह पर पहुंचकर भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी से कहा, ‘जब तक मैं न आऊं तुम यहां ठहरो. मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूं, तुम उधर मत आना.’ विष्णुजी के जाने पर लक्ष्मी के मन में कौतूहल जागा, ‘आखिर दक्षिण दिशा में ऐसा क्या रहस्य है जो मुझे मना किया गया है और भगवान स्वयं चले गए.’

लक्ष्मी जी से रहा न गया और जैसे ही भगवान आगे बढ़े लक्ष्मी भी पीछे-पीछे चल पड़ीं. कुछ ही आगे जाने पर उन्हें सरसों का एक खेत दिखाई दिया जिसमें खूब फूल लगे थे. सरसों की शोभा देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गईं और फूल तोड़कर अपना श्रृंगार करने के बाद आगे बढ़ीं. आगे जाने पर एक गन्ने के खेत से लक्ष्मी जी गन्ने तोड़कर रस चूसने लगीं. उसी क्षण विष्णु जी आए और यह देख लक्ष्मी जी पर नाराज होकर उन्हें शाप देते हुए बोले, ‘मैंने तुम्हें इधर आने को मना किया था, पर तुम न मानी और किसान के खेत में चोरी का अपराध कर बैठी. अब तुम इस अपराध के जुर्म में इस किसान की 12 वर्ष तक सेवा करो.’ ऐसा कहकर भगवान उन्हें छोड़कर क्षीरसागर चले गए. तब लक्ष्मी जी उस गरीब किसान के घर रहने लगीं.

एक दिन लक्ष्मीजी ने उस किसान की पत्नी से कहा- तुम स्नान कर पहले मेरी बनाई गई इस देवी लक्ष्मी का पूजन करो, फिर रसोई बनाना, तब तुम जो मांगोगी मिलेगा. किसान की पत्नी ने ऐसा ही किया. पूजा के प्रभाव और लक्ष्मी की कृपा से किसान का घर दूसरे ही दिन से अन्न, धन, रत्न, स्वर्ण आदि से भर गया. लक्ष्मी ने किसान को धन-धान्य से पूर्ण कर दिया. किसान के 12 वर्ष बड़े आनंद से कट गए. फिर 12 वर्ष के बाद लक्ष्मीजी जाने के लिए तैयार हुईं.
विष्णुजी लक्ष्मीजी को लेने आए तो किसान ने उन्हें भेजने से इंकार कर दिया. तब भगवान ने किसान से कहा, ‘इन्हें कौन जाने देता है ,यह तो चंचला हैं, कहीं नहीं ठहरतीं. इनको बड़े-बड़े नहीं रोक सके. इनको मेरा शाप था इसलिए 12 वर्ष से तुम्हारी सेवा कर रही थीं. तुम्हारी 12 वर्ष सेवा का समय पूरा हो चुका है.’ किसान हठपूर्वक बोला- नहीं! अब मैं लक्ष्मीजी को नहीं जाने दूंगा.

तब लक्ष्मीजी ने कहा- हे किसान! तुम मुझे रोकना चाहते हो तो जो मैं कहूं वैसा करो. कल तेरस है. तुम कल घर को लीप-पोतकर स्वच्छ करना. रात्रि में घी का दीपक जलाकर रखना और सायंकाल मेरा पूजन करना और एक तांबे के कलश में रुपये भरकर मेरे लिए रखना, मैं उस कलश में निवास करुंगी. किंतु पूजा के समय मैं तुम्हें दिखाई नहीं दूंगी.
लक्ष्‍मी जी ने आगे कहा- इस एक दिन की पूजा से वर्ष भर मैं तुम्हारे घर से नहीं जाऊंगी. यह कहकर वह दीपकों के प्रकाश के साथ दसों दिशाओं में फैल गईं. अगले दिन किसान ने लक्ष्मीजी के कथानुसार पूजन किया. उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया. तभी से हर साल तेरस के दिन लक्ष्मीजी की पूजा होने लगी.

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धनतेरस के दिन क्‍यों की जाती है यमराज की पूजा
पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में हेम नाम का एक राजा था, जिसकी कोई संतान नहीं थी. बहुत समय बाद उन्‍हें एक पुत्र की प्राप्‍ति हुई. जब उस बालक की कुंडली बनवाई तब ज्‍योतिष ने कहा कि इसकी शादी के दसवें दिन मृत्‍यु का योग है. यह सुनकर राजा हेम ने पुत्र की शादी कभी न करने का निश्‍चय लिया और उसे एक ऐसे स्‍थान पर भेज दिया जहां कोई भी स्‍त्री न हो. लेकिन नियति को कौन टाल सकता? घने जंगल में राजा के बेटे को एक सुंदर स्‍त्री मिली और दोनों को आपस में प्रेम हो गया. फिर दोनों ने गंधर्व विवाह कर लिया.
भव‍िष्‍यवाणी के अनुसार विवाह के दसवें दिन यमदूत राजा के प्राण लेने पृथ्‍वीलोक आए. जब वे प्राण ले जा रहे थे तब उसकी पत्‍नी के रोने की आवाज सुनकर यमदूत का मन दुखी हो गया. यमदूत जब प्राण लेकर यमराज के पास पहुंचे तो बेहद दुखी थे. यमराज ने कहा कि दुखी होना स्‍वाभाविक है लेकिन कर्तव्‍य के आगे कुछ नहीं होता. ऐसे में यमदूत ने यमराज से पूछा, ‘क्‍या इस अकाल मृत्‍यु को रोकने का कोई उपाय है?’ तब यमराज ने कहा, ‘अगर मनुष्‍य कार्तिक कृष्‍ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन व्‍यक्ति संध्‍याकाल में अपने घर के द्वार पर दक्षिण दिशा में दीपक जलाएगा तो उसके जीवन से अकाल मृत्‍यु का योग टल जाएगा.’ तब से धनतेरस के दिन यम पूजा का विधान है.

धनतेरस के दिन क्यों जलाते हैं यम का दीपक
देश के अधिकांश भागों में ‘यम’ के नाम पर दीपदान की परंपरा है। दीपावली के दो दिन पूर्व धन्वं‍तरि-त्रयोदशी के सायंकाल मिट्टी का कोरा दीपक लेते हैं। उसमें तिल का तेल डालकर नवीन रूई की बत्ती रखते हैं और फिर उसे प्रकाशित कर, दक्षिण की तरह मुंह करके मृत्यु के देवता यम को समर्पित करते हैं। तत्पश्चात इसे दरवाजे के बगल में अनाज की ढेरी पर रख देते हैं। प्रयास यह रहता है कि यह रातभर जलता रहे, बुझे नहीं। क्यों प्रकाशित करते हैं यह दीपक? क्या है इसका रहस्य? इस संबंध में एक रोचक और सुन्दर पुराण कथा मिलती है।
कहते हैं, बहुत पहले हंसराज नामक एक प्रतापी राजा था। एक बार वह अपने मित्रों, सैनिकों और अंगरक्षकों के साथ जंगल में शिकार खेलने गया। संयोग से राजा सबसे बिछुड़कर अकेला रह गया और भटकते हुए एक अन्य राजा हेमराज के राज्य में पहुंच गया।

हेमराज ने थके-हारे हंसराज का भव्य स्वागत किया। उसी रात हेमराज के यहां पुत्र जन्म हुआ। इस खुशी के अवसर पर हेमराज ने राजकीय उत्सव में सम्मिलित होने के लिए आग्रह के साथ हंसराज को कुछ दिनों के लिए अपने यहां रोक लिया। बच्चे के छठवीं के दिन एक विचित्र घटना घटी। पूजा के समय देवी प्रकट हुई और बोली- आज इस शिशु की जो इतनी खुशियां मनाई जा रही हैं, यह अपने विवाह के चौथे दिन मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा।
इस भविष्यवाणी से सारे राज्य में शोक छा गया। हेमराज और उसके परिजनों पर तो वज्रपात ही हो गया। सबके सब स्तब्ध रह गए। इस शोक के समय हंसराज ने राजा हेमराज और उसके परिवार को ढांढस दिया- मित्र, आप तनिक भी विचलित न हों। इस बालक की मैं रक्षा करूंगा। संसार की कोई भी शक्ति इसका बाल बांका नहीं कर सकेगी।

हंसराज ने यमुना के किनारे एक भूमिगत किला बनवाया और उसी के अंदर राजकुमार के पालन-पोषण की व्यवस्था कराई। इसके अतिरिक्त राजकुमार की प्राणरक्षा के लिए हंसराज ने सुयोग्य ब्राह्मणों से अनेक तांत्रिक अनुष्ठान, यज्ञ, मंत्रजाप आदि की भी व्यवस्था करा रखी थी। धीर-धीरे राजकुमार युवा हुआ। उसकी सुंदरता एवं ते‍जस्विता की चर्चा सर्वत्र फैल गई। राजा हंसराज के कहने से हेमराज ने राजकुमार का विवाह भी कर दिया। जिस राजकुमारी से युवराज का विवाह हुआ था, वह साक्षात लक्ष्मी लगती थी। ऐसी सुंदर वर-वधू की जोड़ी जीवन में किसी ने न देखी थी।
विधि का विधान… विवाह के ठीक चौथे दिन यम के दूत राजकुमार के प्राण हरण करने आ पहुंचे। अभी राज्य में मांगलिक समारोह ही चल रहा था। राजपरिवार और प्रजाजन खुशियां मनाने में मग्न थे। राजकुमार और राजकुमारी की छवि देखकर यमदूत भी विचलित हो उठे, किंतु राजकुमार के प्राणहरण का अप्रिय कार्य उन्हें करना ही पड़ा।

यमदूत जिस समय राजकुमार के प्राण लेकर चले, उस समय ऐसा हाहाकार मचा और दारुण दृश्य उपस्थित हुआ जिससे द्रवित होकर दूत भी स्वयं रोने लगे। इस घटना के कुछ समय पश्चात एक दिन यमराज ने प्रसन्न मुद्रा में अपने दूतों से पूछा- दूतों! तुम सब अनंत काल से पृथ्वी के जीवों का प्राणहरण करते आ रहे हो, क्या तुम्हें कभी किसी जीव पर दया आई है और मन में यह विचार उठा है कि इसे छोड़ देना चाहिए?
यम के दूत एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। यमराज ने उनके संकोच को भांपकर उन्हें उत्साहित किया- झिझको मत, अगर ऐसा प्रसंग आया हो, तो निर्भय होकर बताओ। इस पर एक दूत ने सिर झुकाकर निवेदन किया- मृत्युदेव, ऐसे प्रसंग तो कम ही आए हैं किंतु एक घटना अवश्य हुई है जिसकी स्मृति मुझे आज भी विह्वल कर देती है। यह कहते हुए दूत ने हेमराज के पुत्र के प्राणहरण की घटना सुना दी। इस दु:खद प्रसंग से यमराज भी विचलित हो उठे। इसे लक्ष्य करके दूत बोला- नाथ! क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे इस प्रकार की अकाल मृत्यु से प्राणियों को छुटकारा मिल जाए?

इस पर यमराज ने कहा- जीवन और मृत्यु सृष्टि का अटल नियम है तथा इसे बदला नहीं जा सकता किंतु धनतेरस को पूरे दिन का व्रत और यमुना में स्नान कर धन्वंतरि और यम का पूजन-दर्शन अकाल मृत्यु से बचाव कर सकता है। यदि यह संभव न हो तो भी संध्या के समय घर के प्रवेश द्वार पर यम के नाम का एक दीपक प्रज्वलित करना चाहिए। इससे असामयिक मृत्यु और रोग से मुक्त जीवन प्राप्त किया जा सकता है।
इसके पश्चात से ही धनतेरस के दिन धन्वंतरि के पूजन और प्रवेश द्वार पर यम दीपक प्रज्वलित करने की परंपरा है।

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देवी पार्वती हिमनरेश हिमवान और उनकी रानी मैनावती की पुत्री हैं। पार्वती जी का विवाह भगवान शंकर से हुआ है। इन्‍हें पार्वती के अलावा उमा, गौरी और सती सहित अनेक नामों से जाना जाता है। माता पार्वती प्रकृति स्वरूपा कहलाती हैं। किंवदंतियों के अनुसार पार्वती के जन्म का समाचार सुनकर देवर्षि नारद हिमालय नरेश के घर आये थे और उनके पूछने पर देवर्षि ने बताया कि ये कन्या सभी सुलक्षणों से सम्पन्न है और उनका विवाह शंकरजी से होगा। साथ ही उन्‍होंने ये भी कहा कि महादेव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिये देवी पार्वती को घोर तपस्या करनी होगी। माता पार्वती शिव जी को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तप कर रही थीं। उनके तप को देखकर देवताओं ने शिव जी से देवी की मनोकामना पूर्ण करने की प्रार्थना की। शिव जी ने पार्वती जी की परीक्षा लेने सप्तर्षियों को भेजा।

सप्तर्षियों ने देवी के पास जाकर यह समझाने के अनेक प्रयत्न किये कि शिव जी औघड़, अमंगल वेषधारी, जटाधारी और भूत प्रेतों के संगी हैं, इसलिए वे, उनके लिए उपयुक्त वर नहीं हैं। शिव जी के साथ विवाह करके पार्वती को सुख की प्राप्ति नहीं होगी, अत: वे अपना इरादा बदल दें, किन्तु पार्वती अपने निर्णय पर दृढ़ रहीं। सप्तर्षियों ने शिव जी के सैकड़ों अवगुण गिनाए पर पार्वती जी को महादेव के अलावा किसी और से विवाह मंजूर न था। यह देखकर सप्तऋषि अत्यन्त प्रसन्न हुये और उन्हें सफल मनोरथ होने का आशीर्वाद देकर शिव जी के पास वापस आ गये। सप्तऋषियों से पार्वती के अपने प्रति गहन प्रेम की जानकारी पा कर भगवान शंकर अत्यन्त प्रसन्न हुये। विवाह से पहले सभी वर अपनी भावी पत्नी को लेकर आश्वस्त होना चाहते हैं। इसलिए शिव जी ने स्वयं भी पार्वती की परीक्षा लेने की ठानी। भगवान शंकर प्रकट हुए और पार्वती को वरदान देकर अंतर्ध्यान हुए। इतने में जहां वह तप कर रही थीं, वही पास में तालाब में मगरमच्छ ने एक लड़के को पकड़ लिया। लड़का जान बचाने के लिए चिल्लाने लगा। पार्वती जी से उस बच्चे की चीख सुनी न गई। द्रवित हृदय होकर वह तालाब पर पहुंचीं। देखती हैं कि मगरमच्छ लड़के को तालाब के अंदर खींचकर ले जा रहा है।

लड़के ने देवी को देखकर कहा- मेरी न तो मां है न बाप, न कोई मित्र… माता आप मेरी रक्षा करें.. .
पार्वती जी ने कहा- हे ग्राह ! इस लडके को छोड़ दो। मगरमच्छ बोला- दिन के छठे पहर में जो मुझे मिलता है, उसे अपना आहार समझ कर स्वीकार करना, मेरा नियम है। ब्रह्मदेव ने दिन के छठे पहर इस लड़के को भेजा है। मैं इसे क्यों छोडूं ? पार्वती जी ने विनती की- तुम इसे छोड़ दो। बदले में तुम्हें जो चाहिए वह मुझसे कहो। मगरमच्छ बोला- एक ही शर्त पर मैं इसे छोड़ सकता हूं। आपने तप करके महादेव से जो वरदान लिया, यदि उस तप का फल मुझे दे दोगी तो मैं इसे छोड़ दूंगा। पार्वती जी तैयार हो गईं। उन्होंने कहा- मैं अपने तप का फल तुम्हें देने को तैयार हूं लेकिन तुम इस बालक को छोड़ दो। मगरमच्छ ने समझाया- सोच लो देवी, जोश में आकर संकल्प मत करो। हजारों वर्षों तक जैसा तप किया है वह देवताओं के लिए भी संभव नहीं। उसका सारा फल इस बालक के प्राणों के बदले चला जाएगा। पार्वती जी ने कहा- मेरा निश्चय पक्का है। मैं तुम्हें अपने तप का फल देती हूं। तुम इसका जीवन दे दो। मगरमच्छ ने पार्वती जी से तपदान करने का संकल्प करवाया। तप का दान होते ही मगरमच्छ का देह तेज से चमकने लगा।

मगर बोला- हे पार्वती, देखो तप के प्रभाव से मैं तेजस्वी बन गया हूं। तुमने जीवन भर की पूंजी एक बच्चे के लिए व्यर्थ कर दी। चाहो तो अपनी भूल सुधारने का एक मौका और दे सकता हूं। पार्वती जी ने कहा- हे ग्राह ! तप तो मैं पुन: कर सकती हूं, किंतु यदि तुम इस लड़के को निगल जाते तो क्या इसका जीवन वापस मिल जाता ? देखते ही देखते वह लड़का अदृश्य हो गया। मगरमच्छ लुप्त हो गया। पार्वती जी ने विचार किया- मैंने तप तो दान कर दिया है। अब पुन: तप आरंभ करती हूं। पार्वती ने फिर से तप करने का संकल्प लिया। भगवान सदाशिव फिर से प्रकट होकर बोले- पार्वती, भला अब क्यों तप कर रही हो? पार्वती जी ने कहा- प्रभु ! मैंने अपने तप का फल दान कर दिया है। आपको पतिरूप में पाने के संकल्प के लिए मैं फिर से वैसा ही घोर तप कर आपको प्रसन्न करुंगी।

महादेव बोले- मगरमच्छ और लड़के दोनों रूपों में मैं ही था। तुम्हारा चित्त प्राणिमात्र में अपने सुख-दुख का अनुभव करता है या नहीं, इसकी परीक्षा लेने को मैंने यह लीला रची। अनेक रूपों में दिखने वाला मैं एक ही एक हूं। मैं अनेक शरीरों में, शरीरों से अलग निर्विकार हूं। तुमने अपना तप मुझे ही दिया है इसलिए अब और तप करने की जरूरत नहीं….देवी ने महादेव को प्रणाम कर प्रसन्न मन से विदा किया।
इसके बाद सप्तऋषियों ने शिव, पार्वती के विवाह का लग्न मुहूर्त आदि निश्चित कर दिया। विवाह के दिन भोलेनाथ बारात ले कर हिमालय के घर आये। दूल्‍हा बने भगवान शंकर बैल पर सवार थे, उनके एक हाथ में त्रिशूल और एक हाथ में डमरू था। उनकी बारात में समस्त देवताओं के साथ उनके गण भूत, प्रेत, पिशाच आदि सभी शामिल थे। इस तरह शुभ घड़ी और शुभ मुहूर्त में शिव और पार्वती का विवाह हुआ। बाद में इनके दो पुत्र कार्तिकेय तथा गणेश हुए। कई पुराणों के अनुसार इनकी अशोक सुंदरी नाम की एक पुत्री भी थी।

सवाल – जवाब
सवाल – भगवान शिव के माता पिता का नाम क्या है?
जवाब – शिव महापुराण के प्रकरण से सिद्ध हुआ कि श्री शकंर जी की माता श्री दुर्गा देवी (अष्टंगी देवी) है तथा पिता सदाशिव अर्थात् काल ब्रह्म है
सवाल – शिव और पार्वती का विवाह कब हुआ?
जवाब – भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माता पार्वती ने कठोर तपस्या की थी। शिवजी ने तपस्या से प्रसन्न होकर फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन माता पार्वती के साथ विवाह किया था।
सवाल – भोलेनाथ की बारात में कौन कौन गए थे?
जवाब – क्योंकि शंकर जी की बारात में भूत-प्रेत और आत्माएं थीं, क्योंकि शिवजी देवताओं के साथ दानवों के भी इष्ट हैं। बारात में शिव जी का रूप देखकर पार्वती बहुत डर गईं। शिव जी का ये रूप देखकर पार्वती की मां ने कहा कि अपनी बेटी का हाथ ऐसे दूल्हे के हाथ में नहीं सौंपेंगी।

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हनुमान जी को सिंदूर क्यों चढ़ाया जाता है, Hanuman Ji Sindoor Kyo Lagate Hein
मंगलवार यानी हनुमानजी की पूजा-अर्चना का दिन और उन्हें प्रसन्न करने के लिए उनकी प्रिय वस्तुओं को उन पर अर्पण करने का दिन. अक्सर ही देखा जाता है कि हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाया जाता है और कई लोग मन्नत पूरी होने के बाद भी हनुमानजी पर सिंदूर चढ़ाते हैं. क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों किया जाता है? सिंदूर चढ़ाने के पीछे क्या कारण या कथा है? अगर नहीं तो जानिए क्या कहते हैं शास्त्र और क्यों प्रिय हैं हनुमान जी को सिंदूर. Why Offer Sindoor to Hanuman Ji

रामायण में प्रसिद्ध है एक कथा
श्री हनुमान जी ने जगजननी श्री सीता जी के मांग में सिंदूर लगा देखकर आश्चर्यपूर्वक पूछा- माता! आपने यह लाल द्रव्य मस्तक पर क्यों लगाया है? सीता जी ने ब्रह्मचारी हनुमान की इस सीधी-सादी बात पर प्रसन्न होकर कहा, पुत्र! इसके लगाने से मेरे स्वामी की दीर्घायु होती है और वह मुझ पर प्रसन्न रहते हैं. श्री हनुमान ने यह सुना तो बहुत प्रसन्न हुए और विचार किया कि जब उंगली भर सिंदूर लगाने से आयुष्य वृद्धि होती है तो फिर क्यों न सारे शरीर पर इसे पोतकर अपने स्वामी को अजर-अमर कर दूं.
हनुमान जी ने वैसा ही किया. सारे शरीर में सिंदूर पोतकर सभा में पहुंचे तो भगवान उन्हें देखकर हंसे और बहुत प्रसन्न भी हुए. हनुमान जी को माता जानकी के वचनों में और अधिक दृढ़ विश्वास हो गया. कहते हैं उस दिन से हनुमान जी को इस उदात्त स्वामी-भक्ति के स्मरण में उनके शरीर पर सिंदूर चढ़ाया जाने लगा.
हनुमान चालीसा में भी वर्णित है –
राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा ।।
इस बात से सिद्ध होता है कि हनुमान जी जीवनदायिनी बूटी के समान हैं, जिनकी उपासना से शारीरिक रूप से निर्बल भक्त में भी ऊर्जा का संचार होता है और वह स्वस्थ रहता है.

सिंदूर चढ़ाने की व‍िध‍ि
सबसे पहले हनुमान जी की प्रतिमा को स्‍नान कराएं. इसके बाद पूजा-सामग्री अर्पण करें. फिर मंत्र का उच्‍चारण करते हुए चमेली के तेल में सिंदूर मिलाकर या हनुमान जी की मूर्ति पर देसी घी लगाकर उस पर सिंदूर चढ़ा दें.
सिंदूर चढ़ाते वक्त करें इस मंत्र का जप
श्री हनुमान की प्रतिमा पर सिंदूर का चोला चढ़ाने जा रहे हैं तो पहले उनकी प्रतिमा को जल से स्नान कराएं. इसके बाद सभी पूजा सामग्री अर्पण करें. इसके बाद मंत्र का उच्चारण करते हुए चमेली के तेल में सिंदूर मिलाकर या सीधे प्रतिमा पर हल्का सा देसी घी लगाकर उस पर सिंदूर का चोला चढ़ा दें.
मंत्र है-
सिन्दूरं रक्तवर्णं च सिन्दूरतिलकप्रिये।
भक्तयां दत्तं मया देव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम।।

हनुमान जी को चोला कब और कैसे चढ़ाएं
भगवान शिव के एकादश रुद्रावतारों में से एक हैं हनुमानजी। आपका जन्म वैशाख पूर्णिमा को हुआ माना जाता है। इसी दिन हनुमान जयंती मनाई जाती है। शिवार्चन के जैसी सरल साधना विधि है। आवश्यकता के अनुसार मंत्र इत्यादि में परिवर्तन किया जाता है। पूर्णत: सात्विक रहते हुए हनुमानजी का पूजन-भजन करना चाहिए अन्यथा देव कोप भोगना पड़ सकता है।
साधारणतया हनुमान प्रतिमा को चोला चढ़ाते हैं। हनुमानजी की कृपा प्राप्त करने के लिए मंगलवार को तथा शनि महाराज की साढ़े साती, अढैया, दशा, अंतरदशा में कष्ट कम करने के लिए शनिवार को चोला चढ़ाया जाता है। मान्यता इन्हीं दिनों की है, लेकिन दूसरे दिनों में रवि, सोम, बुध, गुरु, शुक्र को चढ़ाने का निषेध नहीं है। चोले में चमेली के तेल में सिन्दूर मिलाकर प्रतिमा पर लेपन कर अच्‍छी तरह मलकर, रगड़कर चांदी या सोने का वर्क चढ़ाते हैं।

हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने के नियम
1- हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए मंगलवार को सिंदूर अर्पित करना चाहिए।
2- अगर मंगल बाधा दे रहा हो या कोई विशेष संकट हो, तो हनुमान जी को चमेली का तेल और सिंदूर अर्पित करना चाहिए।
3- पुरुष हनुमान जी को सिंदूर अर्पित कर सकते हैं, लेकिन मान्यता है कि महिलाओं को हनुमान जी को सिंदूर अर्पित नहीं करना चाहिए।
4- किसी भी मंगलवार को हनुमान जी के चरणों में सिंदूर रखें।
5- एक सफेद कागज पर उस सिंदूर से स्वस्तिक बनाएं।

हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने के फायदे
मंगलवार और शनिवार को हनुमानजी को घी के साथ सिन्दूर अर्पित करने से स्वयं को भगवान श्रीराम की कृपा प्राप्त होती है और उसके बिगड़े काम बन जाते हैं। मंगलवार के दिन व्रत रखकर सिन्दूर से हनुमानजी की पूजा करने एवं हनुमान चालीसा का पाठ करने से मंगली दोष शांत होता है। कहते हैं कि सिन्दूर के साथ चमेली का तेल भी चढ़ाना चाहिए। सिन्दूर चढ़ाने से एकाग्रता में वृद्धि होती है और दृष्टि भी बढ़ती है। इससे सौभाग्य की प्राप्ति भी होती है। जो व्यक्ति शनिवार को हनुमानजी को सिन्दूर अर्पित करता है, उसकी सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं।

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Mangalwar Vrat Katha Vidhi

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मंगलवार व्रत कथा, Mangalwar Vrat Katha Vidhi
लोग अपने संकटों से पार पाने और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मंगलवार का व्रत रखते हैं ताकि हनुमान जी को प्रसन्न कर पाएं और उनकी इच्छाओं की पूर्ति हो।
मंगलवार व्रत कथा
प्राचीन समय की बात है किसी नगर में एक ब्राह्मण दंपत्ति रहते थे उनके कोई संतान न होन कारण वह बेहद दुखी थे. हर मंगलवार ब्राह्मण वन में हनुमान जी की पूजा के करने जाता था. वह पूजा करके बजरंगबली से एक पुत्र की कामना करता था. उसकी पत्नी भी पुत्र की प्राप्ति के लिए मंगलवार का व्रत करती थी. वह मंगलवार के दिन व्रत के अंत में हनुमान जी को भोग लगाकर ही भोजन करती थी.

एक बार व्रत के दिन ब्राह्मणी ने भोजन नहीं बना पाया और न ही हनुमान जी को भोग लगा सकी. तब उसने प्रण किया कि वह अगले मंगलवार को हनुमान जी को भोग लगाकर ही भोजन करेगी. वह भूखी प्यासी छह दिन तक पड़ी रही. मंगलवार के दिन वह बेहोश हो गई. हनुमान जी उसकी श्रद्धा और भक्ति देखकर प्रसन्न हुए. उन्होंने आशीर्वाद स्वरूप ब्राह्मणी को एक पुत्र दिया और कहा कि यह तुम्हारी बहुत सेवा करेगा.
बालक को पाकर ब्राह्मणी बहुत खुश हुई. उसने बालक का नाम मंगल रखा. कुछ समय उपरांत जब ब्राह्मण घर आया, तो बालक को देख पूछा कि वह कौन है? पत्नी बोली कि मंगलवार व्रत से प्रसन्न होकर हनुमान जी ने उसे यह बालक दिया है. यह सुनकर ब्राह्मण को अपनी पत्नी की बात पर विश्वास नहीं हुआ. एक दिन मौका पाकर ब्राह्मण ने बालक को कुएं में गिरा दिया. Mangalwar Vrat Katha Vidhi

घर पर लौटने पर ब्राह्मणी ने पूछा कि मंगल कहां है? तभी पीछे से मंगल मुस्कुरा कर आ गया. उसे वापस देखकर ब्राह्मण चौंक गया. उसी रात को बजरंगबली ने ब्राह्मण को सपने में दर्शन दिए और बताया कि यह पुत्र उन्होंने ही उसे दिया है. सच जानकर ब्राह्मण बहुत खुश हुआ. जिसके बाद से ब्राह्मण दंपत्ति नियमित रूप से मंगलवार व्रत रखने लगे. मंगलवार का व्रत रखने वाले मनुष्य पर हनुमान जी की अपार कृपा होती है. Mangalwar Vrat Katha Vidhi

ऐसे करें हनुमान जी को प्रसन्न
1. प्रात: मंगलवार को दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होकर स्नान करें और व्रत के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन जरूर करें।
2. पवनपुत्र हनुमान जी की मूर्ति को जल और पंचामृत से स्नान कराना जरूरी है। उसके बाद तिल के तेल में सिन्दूर मिलाकर उनके शरीर पर लगाएं। हनुमान जी सिन्दूर चढ़ाने से बहुत प्रसन्न होते हैं।
3. लाल रंग के फूल हनुमान जी को प्रिय होते हैं। अगर आप अपनी पूजा में लाल रंग के फूलों को शामिल करते हैं और हनुमान जी को अर्पित करते हैं तो वे जल्द प्रसन्न होंगे।
4. हनुमान जी की पूजा में दिशा का ध्यान रखना जरूरी है। हनुमान जी की पूजा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए।
5. हनुमान जी की पूजा में चरणामृत शामिल नहीं करना चाहिए।
6. संकटमोचन हलुमान जी को प्रसाद में लड्डू, नैवेद्य में गुड़ और गेहूं की रोटी या भींगा चना चढ़ा सकते हैं।
7. मंगलवार व्रत में पूजा के समय आप हनुमान चालीसा का पाठ करें। बजरंगबली जल्द प्रसन्न होने वाले देवता हैं।

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Sai Baba Pooja

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साईं बाबा की व्रत कथा कहानी, Sai Baba Vrat Kath In Hindi
शिरड़ी के साईं बाबा की जो भी मन से पूजा करता है या फिर केवल याद करता है, वह उनकी झोली भर देते हैं। आज के दौर में साईं बाबा के बड़ी संख्या में भक्त हैं। गुरुवार का दिन साईं बाबा को समर्पित है और अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए आप इस दिन व्रत रख सकते हैं। साईं बाबा की हर कोई पूजा करता है, चाहें वो किसी भी जाति या धर्म से क्यों ना हो, वह हर किसी की मनोकामना पूरी करते हैं। लेकिन गुरुवार के दिन व्रत रखने वाले जातकों पर उनकी विशेष कृपा बनी रहती है। अगर आप साईं बाबा की विशेष कृपा बनाए रखना चाहते हैं तो यहीं जानिए साईं बाबा का व्रत कैसे रखें और साईं बाबा व्रत कथा के बारे में-

कैसे रखें व्रत
साईं बाबा का व्रत कोई भी कर सकता है, चाहें वह बच्चा हो, बुजुर्ग हो या फिर महिला। उनके व्रत की संख्या 9 गुरुवार होनी चाहिए। व्रत के दौरान आप फलाहार ले सकते है। आप समय-समय पर चाय, फल आदि का सेवन कर सकते हैं। शाम में साईं बाबा के सामने दीपक जलाकर उनके मंदिर में दर्शन करने जाएं और एक समय भोजन कर सकते हैं। व्रत के दौरान अगर स्त्रियों को मासिक समस्या आए या फिर अन्य कारणों से आप व्रत नहीं कर सकते तो आप दूसरे गुरुवार को व्रत कर सकते हैं। अंतिम व्रत के दौरान आप गरीबों को खाना खिलाएं और दान करें। आप रिश्तेदारों और पड़ोसियों को साईं बाबा के व्रत की किताबें दे सकते हैं। इनकी 5, 11 या फिर 21 हो। इससे आपको उद्यापन भी पूरा हो जाएगा।

साईं बाबा व्रत कथा
कोकिला नाम की महिला और उनके पति महेशभाई गुजरात के एक शहर में रहते थे। वे दोनों एक-दुसरे के साथ प्रेमभाव से रहते थे। लेकिन महेशभाई का स्वाभाव झगड़ालू था। वहीं कोकिला बहन बहुत ही धार्मिक स्त्री थी, भगवान पर हमेशा विश्वास रखती थीं। झगड़ालू स्वाभाव के कारण उनके पति का धंधा-रोजगार ठप होने लगा और दूसरा कमाई को कोई जरिया नहीं था। रोजगार ठप हो जाने की वजह से महेशभाई अब दिनभर घर पर ही रहने लगे और अब उन्होंने गलत राह पकड़ ली। खाली रहने के कारण उनका स्वभाव भी अधिक चिड़चिड़ा हो गया।Sai Baba Pooja Vrat Vidhi And Katha On Thursday
एक दिन दोपहर का समय था। एक बुजुर्ग इंसान दरवाजे पर आकार खड़े हो गए और उन्होंने दल-चावल की मांग की। धार्मिक स्वभाव की कोकिला बहन ने दल-चावल दिए और दोनों हाथों से उस बुजुर्ग इंसान को प्रणाम किया। बुजुर्ग ने कहा साईं सुखी रखे, तब कोकिला बहन ने कहा बाबा सुख मेरी किस्मत में नहीं है और फिर उन्होंने अपने बारे में सभी जानकारी दी।

तब बुजुर्ग इंसान ने कोकिला बहन को साईं बाबा के व्रत के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि इस व्रत के करने से सभी मनोकामना पूरी होगी और बाबा का आशीर्वाद हमेशा उसके घर पर बना रहेगा। बुजुर्ग की बात मानकर कोकिला बहन ने 9 गुरुवार व्रत किया। जैसे बाबा ने बताया सभी कार्य किए। उसके थोड़े समय के बाद घर में सुख समृधि बढ़ गई। दोनो पति-पत्नी सुख-शांति से रहने लगे। उनका धंधा-रोजगार फिर से चालू हो गया और महेशभाई का स्वाभाव भी बदल गया।
एक दिन कोकिला बहन के जेठ-जेठानी सूरत से आए। बातों-बातों में उन्होंने बताया कि उनके बच्चें पढ़ाई-लिखाई में ध्यान नहीं देते हैं, जिसकी वजह से वह परिक्षा में फेल भी हो जाते हैं। तब कोकिला बहन ने 9 गुरुवार साईं बाबा का व्रत रखने को कहा और उनकी महिमा के बारे में बताया। साईं बाबा के भक्ति से बच्चे अच्छी तरह पढ़ाई-लिखाई कर पाएंगे लेकिन इसके लिए साईं बाबा पर विश्वास रखना बहुत जरूरी है।
सूरत से उनकी जेठानी का थोड़े दिनों में पत्र आया कि उनके बच्चे साईं व्रत करने लगे है और बहुत अच्छे तरह से पढ़ते है। उन्होंने भी व्रत किया था और व्रत की किताबें जेठ के ऑफिस में दी थी। फिर एक के बाद ऐसे कई अद्भुत चमत्कार हुए। हे साईं बाबा आप जैसे सभी लोगों पर प्रसन्न होते है, वैसे हम पर भी होना और अपना आशीर्वाद हमेशा बनाए रखना।Sai Baba Pooja Vrat Vidhi And Katha On Thursday

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