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यही मेरा वतन हिंदी कहानी, Munshi Premchand Kahani Yhi Mera Vatan
आज पूरे साठ बरस के बाद मुझे अपने वतन, प्यारे वतन का दर्शन फिर नसीब हुआ. जिस वक़्त मैं अपने प्यारे देश से विदा हुआ और क़िस्मत मुझे पच्छिम की तरफ़ ले चली, मेरी उठती जवानी थी. मेरी रगों में ताज़ा ख़ून दौड़ता था और सीना उमंगों और बड़े-बडें़ इरादों से भरा हुआ था. मुझे प्यारे हिन्दुस्तान से किसी ज़ालिम की सख़्तियों और इंसाफ़ के ज़बर्दस्त हाथों ने अलग नहीं किया था. नहीं, ज़ालिम का जुल्म और क़ानून की सख्तियाँ मुझसे जो चाहें करा सकती हैं मगर मेरा वतन मुझसे नहीं छुड़ा सकतीं. यह मेरे बुलन्द इरादे और बड़े-बड़े मंसूबे थे जिन्होंने मुझे देश निकाला दिया. मैंने अमरीका में खूब व्यापार किया, खूब दौलत कमायी और खूब ऐश किये. भाग्य से बीवी भी ऐसी पायी जो अपने रूप में बेजोड़ थी, जिसकी ख़ूबसूरती की चर्चा सारे अमरीका में फैली हुई थी और जिसके दिल में किसी ऐसे ख़याल की गुंजाइश भी न थी जिसका मुझसे सम्बन्ध न हो. मैं उस पर दिलोजान से न्योछावर था और वह मेरे लिए सब कुछ थी. मेरे पाँच बेटे हुए, सुन्दर,हृष्ट-पुष्ट और नेक, जिन्होंने व्यापार को और भी चमकाया और जिनके भोले,नन्हें बच्चे उस वक़्त मेरी गोद में बैठे हुए थे जब मैंने प्यारी मातृभूमि का अन्तिम दर्शन करने के लिए क़दम उठाया. मैंने बेशुमार दौलत, वफ़ादार बीवी, सपूत बेटे और प्यारे-प्यारे जिगर के टुकड़े, ऐसी-ऐसी अनमोल नेमतें छोड़ दीं. इसलिए कि प्यारी भारतमाता का अन्तिम दर्शन कर लूँ. मैं बहुत बुड्ढा हो गया था. दस और हों तो पूरे सौर बरस का हो जाऊँ, और अब अगर मेरे दिल में कोई आरजू बाक़ी है तो यही कि अपने देश की ख़ाक में मिल जाऊँ. यह आरजू कुछ आज ही मेरे मन में पैदा नहीं हुई है, उस वक़्त भी थी जब कि मेरी बीवी अपनी मीठी बातों और नाज़ुक अदाओं से मेरा दिल खुश किया करती थी. जबकि मेरे नौजवान बेटे सबेरे आकर अपने बूढ़े बाप को अदब से सलाम करते थे, उस वक़्त भी मेरे जिगर में एक काँटा-सा खटकता था और वह काँटा यह था कि मैं यहाँ अपने देश से निर्वासित हूँ. यह देश मेरा नहीं है, मैं इस देश का नहीं हूँ. धन मेरा था, बीवी मेरी थी, लड़के मेरे थे और जायदादें मेरी थीं, मगर जाने क्यों मुझे रह रहकर अपनी मातृभूमि के टूटे-फूटे झोंपड़े, चार छ: बीघा मौरूसी ज़मीन और बचपन के लंगोटिया यारों की याद सताया करती थी और अक्सर खुशियों की धूमधाम में भी यह ख़याल चुटकी लिया करता कि काश अपने देश में होता!

मगर जिस वक़्त बम्बई में जहाज़ से उतरा और काले कोट-पतलून पहने, टूटी-फूटी अंगे्रजी बोलते मल्लाह देखे, फिर अंगे्रजी दुकानें, ट्रामवे और मोटर-गाडिय़ाँ नज़र आयीं, फिर रबड़वाले पहियों और मुँह में चुरुट दाबे आदमियों से मुठभेड़ हुई,फिर रेल का स्टेशन, और रेल पर सवार होकर अपने गाँव को चला, प्यारे गाँव को जो हरी-भरी पहाडिय़ों के बीच में आबाद था, तो मेरी आँखों में आँसू भर आये. मैं खूब रोया, क्योंकि यह मेरा प्यारा देश न था, यह वह देश न था जिसके दर्शन की लालसा हमेशा मेरे दिल में लहरें लिया करती थीं. यह कोई और देश था. यह अमरीका था, इंग्लिस्तान था मगर प्यारा भारत नहीं.

रेलगाड़ी जंगलों, पहाडों, नदियों और मैदानों को पार करके मेरे प्यारे गाँव के पास पहुँची जो किसी ज़माने में फूल-पत्तों की बहुतायत और नदी-नालों की प्रचुरता में स्वर्ग से होड़ करता था. मैं गाड़ी से उतरा तो मेरा दिल बाँसों उछल रहा था-अब अपना प्यारा घर देखूँगा, अपने बचपन के प्यारे साथियों से मिलूँगा. मुझे उस वक़्त यह बिल्कुल याद न रहा कि मैं नब्बे बरस का बूढ़ा आदमी हूँ. ज्यों-ज्यों मैं गाँव के पास पहुँचता था, मेरे क़दम जल्द-जल्द उठते थे और दिल में एक ऐसी खुशी लहरें मार रही थी जिसे बयान नहीं किया जा सकता. हर चीज़ पर आँखें फाड़-फाडक़र निगाह डालता-अहा, यह वो नाला है जिसमें हम रोज़ घोड़े नहलाते और खुद गोते लगाते थे, मगर अब इसके दोनों तरफ़ काँटेदार तारों की चहारदीवारी खिंची हुई थी और सामने एक बंगला था जिसमें दो-तीन अंग्रेज़ बन्दूकें लिए इधर-उधर ताक रहे थे. नाले में नहाने या नहलाने की सख़्त मनाही थी. गाँव में गया और आँखें बचपन के साथियों को ढँूढऩे लगीं मगर अफ़सोस वह सब के सब मौत का निवाला बन चुके थे और मेरा टूटा-फूटा झोंपड़ा जिसकी गोद में बरसों तक खेला था, जहाँ बचपन और बेफ़िक्रियों के मज़े लूटे थे, जिसका नक्शा अभी तक आँखों में फिर रहा है, वह अब एक मिट्टी का ढेर बन गया था. जगह ग़ैर-आबाद न थी. सैकड़ों आदमी चलते-फिरते नज़र आये, जो अदालत और कलक्टरी और थाने-पुलिस की बातें कर रहे थे. उनके चेहरे बेजान और फ़िक्र में डूबे हुए थे और वह सब दुनिया की परेशानियों से टूटे हुए मालूम होते थे. मेरे साथियों के से हृष्ट-पुष्ट, सुन्दर, गोरे-चिट््टे नौजवान कहीं न दिखाई दिये. वह अखाड़ा जिसकी मेरे हाथों ने बुनियाद डाली थी, वहाँ अब एक टूटा-फूटा स्कूल था और उसमें गिनती के बीमार शक्ल-सूरत के बच्चे जिनके चेहरों पर भूख लिखी थी, चिथड़े लगाये बैठे ऊँघ रहे थे. नहीं, यह मेरा देश नहीं है. यह देश देखने के लिए मैं इतनी दूर से नहीं आया. यह कोई और देश है, मेरा प्यारा देश नहीं है.

उस बरगद के पेड़ की तरफ़ दौड़ा जिसकी सुहानी छाया में हमने बचपन के मज़े लूटे थे, जो हमारे बचपन का हिण्डोला और ज़वानी की आरामगाह था. इस प्यारे बरगद को देखते ही रोना-सा आने लगा और ऐसी हसरतभरी, तड़पाने वाली और दर्दनाक यादें ताज़ी हो गयीं कि घण्टों ज़मीन पर बैठकर रोता रहा. यही प्यारा बरगद है जिसकी फुनगियों पर हम चढ़ जाते थे, जिसकी जटाएँ हमारा झूला थीं और जिसके फल हमें सारी दुनिया की मिठाइयों से ज़्यादा मज़ेदार और मीठे मालूम होते थे. वह मेरे गले में बाँहें डालकर खेलने वाले हमजोली जो कभी रूठते थे, कभी मनाते थे, वह कहाँ गये? आह, मैं बेघरबार मुसाफ़िर क्या अब अकेला हूँ? क्या मेरा कोर्ई साथी नहीं. इस बरगद के पास अब थाना और पेड़ के नीचे एक कुर्सी पर कोई लाल पगड़ी बाँधे बैठा हुआ था. उसके आसपास दस-बीस और लाल पगड़ीवाले हाथ बाँधे खड़े थे और एक अधनंगा अकाल का मारा आदमी जिस पर अभी-अभी चाबुकों की बौछार हुई थी, पड़ा सिसक रहा था. मुझे ख़याल आया, यह मेरा प्यारा देश नहीं है, यह कोई और देश है, यह योरप है, अमरीका है, मगर मेरा प्यारा देश नहीं है, हरगिज़ नहीं.

इधर से निराश होकर मैं उस चौपाल की ओर चला जहाँ शाम को पिताजी गाँव के और बड़े-बूढ़ों के साथ हुक़्क़ा पीते और हँसी-दिल्लगी करते थे. हम भी उस टाट पर क़लाबाजियाँ खाया करते. कभी-कभी वहाँ पंचायत भी बैठती थी जिसके सरपंच हमेशा पिताजी ही होते थे. इसी-चौपाल से लगी हुई एक गोशाला थी. जहाँ गाँव भर की गायें रक्खी जाती थीं और हम यहीं बछड़ों के साथ कुलेलें किया करते थे. अफ़सोस, अब इस चौपाल का पता न था. वहाँ अब गाँव के टीका लगाने का स्टेशन और एक डाकख़ाना था. उन दिनों इसी चौपाल से लगा हुआ एक कोल्हाड़ा था जहाँ जाड़े के दिनों मे ऊख पेरी जाती थी और गुड़ की महक से दिमाग़ तर हो जाता था. हम और हमारे हमजोली घण्टों गँडेरियों के इन्तज़ार में बैठे रहते थे और गँडेरियाँ काटने वाले मज़दूरो के हाथों की तेज़ी पर अचरज करते थे, जहाँ सैकड़ों बार मैंने कच्चा रस और पक्का दूध मिलाकर पिया था. यहाँ आसपास के घरों से औरतें और बच्चे अपने-अपने घड़े लेकर आते और उन्हें रस से भरवाकर ले जाते. अफ़सोस, वह कोल्हू अभी ज्यों के त्यों गड़े हुए हैं मगर देखो, कोल्हाड़े की जगह पर अब एक सन लपेटने वाली मशीन है और उसके सामने एक तम्बोली और सिगरेट की दूकान है. इन दिल को छलनी करने वाले दृश्यों से दुखी होकर मैंने एक आदमी से जो सूरत से शरीफ़ नज़र आता था, कहा-बाबा, मैं परदेशी मुसाफ़िर हूँ, रात भर पड़े रहने के लिए मुझे जगह दे दो. इस आदमी ने मुझे सर से पैर तक घूरकर देखा और बोला-आगे जाओ, यहाँ जगह नहीं है. मैं आगे गया और यहाँ से फिर हुक्म मिला- आगे जाओ. पाँचवीं बार सवाल करने पर एक साहब ने मुठ्ठी भर चने मेरे हाथ पर रख दिये. चने मेरे हाथ से छूटकर गिर पड़े और आँखों से आँसू बहने लगे. हाय, यह मेरा प्यारा देश नहीं है, यह कोई और देश है. यह हमारा मेहमान और मुसाफ़िर की आवभगत करने वाला प्यारा देश नहीं, हरगिज़ नहीं.

मैंने एक सिगरेट की डिबिया ली और एक सुनसान जगह पर बैठकर बीते दिनों की याद करने लगा कि यकायक मुझे उस धर्मशाला का ख़याल आया जो मेरे परदेश जाते वक़्त बन रहा था. मैं उधर की तरफ़ लपका कि रात किसी तरह वहीं काटँू, मगर अफ़सोस, हाय अफ़सोस, धर्मशाला की इमारत ज्यों की त्यों थी, लेकिन उसमें ग़रीब मुसाफ़िरों के रहने के लिए जगह न थी. शराब और शराबखोरी, जुआ और बदचलनी का वहाँ अड्डा था. यह हालत देखकर बरबस दिल से एक ठण्डी आह निकली, मैं ज़ोर से चीख़ उठा-नहीं-नहीं और हज़ार बार नहीं यह मेरा वतन, मेरा प्यारा देश, मेरा प्यारा भारत नहीं है. यह कोई और देश है. यह योरप है, अमरीका है, मगर भारत हरिगज नहीं.

अँधेरी रात थी. गीदड़ और कुत्ते अपने राग अलाप रहे थे. मैं दर्दभरा दिल लिये उसी नाले के किनारे जाकर बैठ गया और सोचने लगा कि अब क्या करूँ? क्या फिर अपने प्यारे बच्चों के पास लौट जाऊँ और अपनी नामुराद मिट्टी अमरीका की ख़ाक में मिलाऊँ? अब तो मेरा कोई वतन न था, पहले मैं वतन से अलग ज़रूर था मगर प्यारे वतन की याद दिल में बनी हुई थी. अब बेवतन हूँ, मेरा कोई वतन नहीं. इसी सोच-विचार में बहुत देर तक चुपचाप घुटनों में सिर दिये बैठा रहा. रात आँखों ही आँखों में कट गयी, घडिय़ाल ने तीन बजाये और किसी के गाने की आवाज़ कानों मे आयी. दिल ने गुदगुदाया, यह तो वतन का नग्मा है, अपने देश का राग है. मैं झट उठ खड़ा हुआ. क्या देखता हूँ कि पन्द्रह-बीस औरतें, बूढ़ी, कमज़ोर, सफेद धोतियाँ पहने, हाथों में लोटे लिये स्नान को जा रही हैं और गाती जाती हैं-

प्रभु, मेरे अवगुन चित न धरो
इस मादक और तड़पा देने वाले राग से मेरे दिल की जो हालत हुई उसका बयान करना, मुश्किल है. मैंने अमरीका की चंचल से चंचल, हँसमुख से हँसमुख सुन्दरियों की अलाप सुनी थी और उनकी ज़बानों से मुहब्बत और प्यार के बोल सुने थे जो मोहक गीतों से भी ज़्यादा मीठे थे. मैंने प्यारे बच्चों के अधूरे बोलों और तोतली बानी का आनन्द उठाया था. मैंने सुरीली चिडिय़ों का चहचहाना सुना था. मगर जो लुत्फ़, जो मज़ा, जो आनन्द मुझे गीत में आया वह जि़न्दगी में कभी और हासिल न हुआ था. मैंने खुद गुनगुनाना शुरू किया-

प्रभु, मेरे अवगुन चित न धरो
तन्मय हो रहा था कि फिर मुझे बहुत से आदमियों की बोलचाल सुनाई पड़ी और कुछ लोग हाथों में पीतल के कमण्डल लिये शिव शिव,हर, हर गंगे गंगे, नारायण-नारायण कहते हुए दिखाई दिये. मेरे दिल ने, फिर गुद-गुदाया, यह तो मेरे देश प्यारे देश की बाते हैं. मारे खुशी के दिल बाग़-बाग हो गया . मैं इन आदमियों के साथ हो लिया और एक दो तीन चार पाँच छ: मील पहाड़ी रास्ता पार करने के बाद हम उस नदी के किनारे पहुँचे जिसका नाम पवित्र है, जिसकी लहरों में डुबकी लगाना और जिसकी गोद में मरना हर हिन्दू सबसे बड़ा पुण्य समझता है. गंगा मेरे प्यारे गाँव से छ: सात मील पर बहती थी और किसी ज़माने में सुबह के वक़्त घोड़े पर चढक़र गंगा माता के दर्शन को आया करता था. उनके दर्शन की कामना मेरे दिल में हमेशा थी. यहाँ मैंने हज़ारों आदमियों को इस सर्द, ठिठुरते हुए पानी में डुबकी लगाते देखा. कुछ लोग बालू पर बैठे गायत्री मन्त्र जप रहे थे. कुछ लोग हवन करने में लगे हुए थे. कुछ लोग माथे पर टीके लगा रहे थे. कुछ और लोग वेदमन्त्र सस्वर पढ़ रहे थे. मेरे दिल ने फिर गुदगुदाया और मैं ज़ोर से कह उठा- हाँ हाँ, यही मेरा देश है, यही मेरा प्यारा वतन है, यही मेरा भारत है. और इसी के दर्शन की, इसी की मिट्टी में मिल जाने की आरजू मेरे दिल में थी.

मैं खुशी में पागल हो रहा था. मैंने अपना पुराना कोट और पतलून उतार फेंका और जाकर गंगा माता की गोद में गिर पड़ा, जैसे कोई नासमझ, भोला-भाला बच्चा दिन भर पराये लोगों के साथ रहने के बाद शाम को अपनी प्यारी माँ की गोद में दौडक़र चला आये, उसकी छाती से चिपट जाए. हाँ, अब अपने देश में हूँ. यह मेरा प्यारा वतन है, यह लोग मेरे भाई , गंगा मेरी माता है.

मैंने ठीक गंगाजी के किनारे एक छोटी सी झोंपड़ी बनवा ली है और अब मुझे सिवाय रामनाम जपने के और कोई काम नहीं. मैं रोज़ शाम-सबेरे गंगा-स्नान करता हूँ और यह मेरी लालसा है कि इसी जगह मेरा दम निकले और मेरी हड्डियाँ गंगामाता की लहरों की भेंट चढ़ें.

मेरे लड़के और मेरी बीवी मुझे बार-बार बुलाते हैं, मगर अब मैं यह गंगा का किनारा और यह प्यारा देश छोडक़र वहाँ नहीं जा सकता. मैं अपनी मिट्टी गंगाजी को सौंपूँगा. अब दुनिया की कोई इच्छा, कोई आकांक्षा मुझे यहाँ से नहीं हटा सकती क्योंकि यह मेरा प्यारा देश, मेरी प्यारी मातृभूमि है और मेरी लालसा है कि मैं अपने देश में मरूँ.

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शोक का पुरस्कार हिंदी कहानी, मुंशी प्रेमचंद की कहानी शोक का पुरस्कार
आज तीन दिन गुज़र गये. शाम का वक्त था. मैं युनिवर्सिटी हॉल से खुश-खुश चला आ रहा था. मेरे सैकड़ों दोस्त मुझे बधाइयाँ दे रहे थे. मारे खुशी के मेरी बाँछें खिली जाती थीं. मेरी ज़िन्दगी की सबसे प्यारी आरजू कि मैं एम०ए० पास हो जाऊँ, पूरी हो गयी थी और ऐसी खूबी से जिसकी मुझे तनिक भी आशा न थी. मेरा नम्बर अव्वल था. वाइस चान्सलर साहब ने खुद मुझसे हाथ मिलाया था और मुस्कराकर कहा था कि भगवान तुम्हें और भी बड़े कामों की शक्ति दे. मेरी खुशी की कोई सीमा न थी. मैं नौजवान था, सुन्दर था, स्वस्थ था, रुपये-पैसे की न मुझे इच्छा थी और न कुछ कमी, माँ-बाप बहुत कुछ छोड़ गये थे. दुनिया में सच्ची खुशी पाने के लिए जिन चीज़ों की ज़रूरत है, वह सब मुझे प्राप्त थीं. और सबसे बढक़र पहलू में एक हौसलामन्द दिल था जो ख्याति प्राप्त करने के लिए अधीर हो रहा था.

घर आया, दोस्तों ने यहाँ भी पीछा न छोड़ा, दावत की ठहरी. दोस्तों की खातिरतवाजों में बारह बज गये, लेटा तो बरबस ख़याल मिस लीलावती की तरफ़ जा पहुँचा जो मेरे पड़ोस में रहती थीं और जिसने मेरे साथ बी०ए० का डिप्लोमा हासिल किया था. भाग्यशाली होगा वह व्यक्ति जो मिस लीला को ब्याहेगा, कैसी सुन्दर है! कितना मीठा गला है! कैसा हँसमुख स्वभाव! मैं कभी-कभी उसके यहाँ प्रोफेसर साहब से दर्शनशास्त्र में सहायता लेने के लिए जाया करता था. वह दिन शुभ होता था जब प्रोफेसर साहब घर पर न मिलते थे. मिस लीला मेरे साथ बड़े तपाक से पेश आतीं और मुझे ऐसा मालूम होता था कि मैं ईसा मसीह की शरण में आ जाऊँ तो उसे मुझे अपना पति बना लेने में आपत्ति न होगी. वह शेली, बायरन और कीट्स की प्रेमी थी और मेरी रुचि भी बिल्कुल उसी के समान थी. हम जब अकेले होते तो अक्सर प्रेम और प्रेम के दर्शन पर बातें करने लगते और उसके मुँह से भावों में डूबी हुई बातें सुन-सुनकर मेरे दिल में गुदगुदी पैदा होने लगती थी. मगर अफ़सोस, मैं अपना मालिक न था. मेरी शादी एक ऊँचे घराने में कर दी गयी थी और अगरचे मैंने अब तक अपनी बीबी की सूरत भी न देखी थी मगर मुझे पूरा-पूरा विश्वास था कि मुझे उसकी संगत में वह आनन्द नहीं मिल सकता जो मिस लीला की संगत में सम्भव है. शादी हुए दो साल हो चुके थे मगर उसने मेरे पास एक ख़त भी न लिखा था. मैंने दो तीन ख़त लिखे भी, मगर किसी का जवाब न मिला. इससे मुझे शक हो गया था कि उसकी तालीम भी यों ही-सी है.

आह! क्या मैं इसी लडक़ी के साथ ज़िन्दगी बसर करने पर मजबूर हूँगा? …. इस सवाल ने मेरे उन तमाम हवाई क़िलों को ढा दिया जो मैंने अभी-अभी बनाये थे. क्या मैं मिस लीला से हमेशा के लिए हाथ धो लूँ? नामुमकिन है. मैं कुमुदिनी को छोड़ दूँगा, मैं अपने घरवालों से नाता तोड़ लूँगा, मैं बदनाम हूँगा, परेशान हूॅँगा, मगर मिस लीला को ज़रूर अपना बनाऊँगा.

इन्हीं ख़यालों के असर में मैंने अपनी डायरी लिखी और उसे मेज पर खुला छोडक़र बिस्तर पर लेटा रहा और सोचते-सोचते सो गया.
सबेरे उठकर देखता हूँ तो बाबू निरंज़नदास मेरे सामने कुर्सी पर बैठे हैं. उनके हाथ में डायरी थी जिसे वह ध्यानपूर्वक पढ़ रहे थे. उन्हें देखते ही मैं बड़े चाव से लिपट गया. अफ़सोस, अब उस देवोपम स्वभाव वाले नौजवान की सूरत देखनी न नसीब होगी. अचानक मौत ने उसे हमेशा के लिए हमसे अलग कर दिया. कुमुदिनी के सगे भाई थे, बहुत स्वस्थ, सुन्दर और हँसमुख, उम्र मुझसे दो ही चार साल ज़्यादा थी, ऊँचे पद पर नियुक्त थे, कुछ दिनों से इसी शहर में तबदील होकर आ गये थे. मेरी और उनकी गाढ़ी दोस्ती हो गयी थी. मैंने पूछा-क्या तुमने मेरी डायरी पढ़ ली?
निरंजन-हाँ!
मैं-मगर कुमुदिनी से कुछ न कहना.
निरंजन-बहुत अच्छा, न कहूँगा.
मैं-इस वक़्त किसी सोच में हो. मेरा डिप्लोमा देखा?
निरंजन-घर से ख़त आया है, पिता जी बीमार हैं, दो-तीन दिन में जाने वाला हूँ.
मैं-शौक़ से जाइए, ईश्वर उन्हें जल्द स्वस्थ करे.
निरंजन-तुम भी चलोगे? न मालूम कैसा पड़े, कैसा न पड़े.
मैं-मुझे तो इस वक़्त माफ़ कर दो.
निरंजनदास यह कहकर चले गये. मैंने हजामत बनायी, कपड़े बदले और मिस लीलावती से मिलने का चाव मन में लेकर चला. वहाँ जाकर देखा तो ताला पड़ा हुआ है. मालूम हुआ कि मिस साहिबा की तबीयत दो-तीन दिन से ख़राब थी. आबहवा बदलने के लिए नैनीताल चली गयीं. अफ़सोस, मैं हाथ मलकर रह गया. क्या लीला मुझसे नाराज़ थी? उसने मुझे क्यों ख़बर नहीं दी. लीला, क्या तू बेवफा है, तुझसे बेवफ़ाई की उम्मीद न थी. फ़ौरन पक्का इरादा कर लिया कि आज की डाक से नैनीताल चल दूँ. मगर घर आया तो लीला का ख़त मिला. काँपते हुए हाँथों से खोला, लिखा था-मैं बीमार हूँ, मेरी जीने की कोई उम्मीद नहीं है, डाक्टर कहते हैं कि प्लेग है. जब तक तुम आओगे, शायद मेरा क़िस्सा तमाम हो जाएगा. आखिरी वक़्त तुमसे न मिलने का सख्त सदमा है. मेरी याद दिल में क़ायम रखना. मुझे सख्त अफ़सोस है कि तुमसे मिलकर नहीं आयी. मेरा क़सूर माफ करना और अपनी अभागिनी लीला को भुला मत देना. ख़त मेरे हाथ से छूटकर गिर पड़ा. दुनिया आँखों में अँधेरी हो गयी, मुँह से एक ठण्डी आह निकली. बिना एक क्षण गँवाये मैंने बिस्तर बाँधा और नैनीताल चलने के लिए तैयार हो गया. घर से निकला ही था कि प्रोफेसर बोस से मुलाक़ात हो गयी. कालेज से चले आ रहे थे, चेहरे पर शोक लिखा हुआ था. मुझे देखते ही उन्होंने जेब से एक तार निकालकर मेरे सामने फेंक दिया. मेरा कलेजा धक् से हो गया. आँखों में अँधेरा छा गया, तार कौन उठाता है. और हाय मारकर बैठ गया. लीला, तू इतनी जल्दी मुझसे जुदा हो गयी!

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मैं रोता हुआ घर आया और चारपाई पर मुँह ढाँपकर खूब रोया. नैनीताल जाने का इरादा खत्म हो गया. दस-बारह दिन तक मैं उन्माद की-सी दशा में इधर-उधर घूमता रहा. दोस्तों की सलाह हुई कि कुछ रोज़ के लिए कहीं घूमने चले जाओ. मेरे दिल में भी यह बात जम गयी. निकल खड़ा हुआ और दो महीने तक विन्ध्याचल, पारसनाथ वग़ैरह पहाडिय़ों में आवारा फिरता रहा. ज्यों-त्यों करके नई-नई जगहों और दृश्यों की सैर से तबियत को ज़रा तस्कीन हुई. मैं आबू में था जब मेरे नाम तार पहुँचा कि मैं कालेज की असिस्टेण्ट प्रोफेसरी के लिए चुना गया हूँ. जी तो न चाहता था कि फिर इस शहर में आऊँ, मगर प्रिन्सिपल के ख़त ने मजबूर कर दिया. लाचार, लौटा और अपने काम में लग गया. ज़िन्दादिली नाम को न बाक़ी रही थी. दोस्तों की संगत से भागता और हँसी मज़ाक से चिढ़ मालूम होती.

एक रोज़ शाम के वक्त मैं अपने अँधेरे कमरे में लेटा हुआ कल्पना-लोक की सैर कर रहा था कि सामने वाले मकान से गाने की आवाज़ आयी. आह, क्या आवाज़ थी, तीर की तरह दिल में चुभी जाती थी, स्वर कितना करुण था! इस वक्त मुझे अन्दाज़ा हुआ कि गाने में क्या असर होता है. तमाम रोंगटे खड़े हो गये, कलेजा मसोसने लगा और दिल पर एक अजीब वेदना-सी छा गयी. आँखों से आँसू बहने लगे. हाय, यह लीला का प्यारा गीत था-

पिया मिलन है कठिन बावरी.
मुझसे ज़ब्त न हो सका, मैं एक उन्माद की-सी दशा में उठा और जाकर सामने वाले मकान का दरवाज़ा खटखटाया. मुझे उस वक़्त यह चेतना न रही कि एक अजनबी आदमी के मकान पर आकर खड़े हो जाना और उसके एकान्त में विघ्न डालना परले दर्जे की असभ्यता है.

3
एक बुढिय़ा ने दरवाज़ा खोल दिया और मुझे खड़े देखकर लपकी हुई अन्दर गयी. मैं भी उसके साथ चला गया. देहलीज़ तय करते ही एक बड़े कमरे में पहुँचा. उस पर एक सफेद फ़र्श बिछा हुआ था. गावतकिए भी रखे थे. दीवारों पर ख़ूबसूरत तस्वीरें लटक रही थीं और एक सोलह-सत्रह साल का सुन्दर नौजवान जिसकी अभी मसें भीग रही थीं मसनद के क़रीब बैठा हुआ हारमोनियम पर गा रहा था. मैं क़सम खा सकता हूँ कि ऐसा सुन्दर स्वस्थ नौजवान मेरी नज़र से कभी नहीं गुज़रा चाल-ढाल से सिख मालूम होता था. मुझे देखते ही चौंक पड़ा और हारमोनियम छोडक़र खड़ा हो गया. शर्म से सिर झुका लिया और कुछ घबराया हुआ-सा नजर आने लगा. मैंने कहा-माफ कीजिएगा, मैंने आपको बड़ी तकलीफ़ दी. आप इस फन के उस्ताद मालूम होते हैं. ख़ासकर जो चीज़ अभी आप गा रहे थे, वह मुझे पसन्द है.
नौजवान ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मेरी तरफ़ देखा और सर नीचा कर लिया और होठों ही में कुछ अपने नौसिखियेपन की बात कही. मैंने फिर पूछा-आप यहाँ कब से हैं?
नौजवान-तीन महीने के क़रीब होता है.
मैं-आपका शुभ नाम.
नौजवान-मुझे मेहर सिंह कहते हैं.
मैं बैठ गया और बहुत गुस्ताख़ाना बेतकल्लुफ़ी से मेहर सिंह का हाथ पकडक़र बिठा दिया और फिर माफ़ी माँगी. उस वक्त की बातचीत से मालूम हुआ कि वह पंजाब का रहने वाला है और यहाँ पढ़ने के लिए आया हुआ है. शायद डाक्टरों ने सलाह दी थी कि पंजाब की आबहवा उसके लिए ठीक नहीं है. मैं दिल में तो झेंपा कि एक स्कूल के लड़के के साथ बैठकर ऐसी बेतकल्लुफ़ी से बातें कर रहा हूँ, मगर संगीत के प्रेम ने इस ख़याल को रहने न दिया. रस्मी परिचय के बाद मैंने फिर प्रार्थना की कि वही चीज़ छेडिय़े. मेहर सिंह ने आँखें नीचे करके जवाब दिया कि मैं अभी बिलकुल नौसिखिया हूँ.
मैं-यह तो आप अपनी जबान से कहिये.
मेहर सिंह-(झेंपकर) आप कुछ फ़रमायें, हारमोनियम हाज़िर है.
मैं-मैं इस फ़न में बिलकुल कोरा हूँ वर्ना आपकी फ़रमाइश ज़रूर पूरी करता.
इसके बाद मैंने बहुत-बहुत आग्रह किया मगर मेहर सिंह झेंपता ही रहा. मुझे स्वभावत: शिष्टाचार से घृणा है. हालाँकि इस वक्त मुझे रूखा होने का कोई हक़ न था मगर जब मैंने देखा कि यह किसी तरह न मानेगा तो ज़रा रुखाई से बोला-खैर जाने दीजिए. मुझे अफ़सोस है कि मैंने आपका बहुत वक्त बर्बाद किया. माफ़ कीजिए. यह कहकर उठ खड़ा हुआ. मेरी रोनी सूरत देखकर शायद मेहर सिंह को उस वक्त तरस आ गया, उसने झेंपते हुए मेरा हाथ पकड़ लिया और बोला-आप तो नाराज़ हुए जाते हैं.
मैं-मुझे आपसे नाराज़ होने का कोई हक़ हासिल नहीं.
मेहर सिंह-अच्छा बैठ जाइए, मैं आपकी फ़रमाइश पूरी करूँगा. मगर मैं अभी बिल्कुल अनाड़ी हूँ.
मैं बैठ गया और मेहर सिंह ने हारमोनियम पर वही गीत अलापना शुरू किया-
पिया मिलन है कठिन बावरी.
कैसी सुरीली तान थी, कैसी मीठी आवाज, कैसा बेचैन करने वाला भाव! उसके गले में वह रस था जिसका बयान नहीं हो सकता. मैंने देखा कि गाते-गाते खुद उसकी आँखों में आँसू भर आये. मुझ पर इस वक़्त एक मोहक सपने की-सी दशा छायी हुई थी. एक बहुत मीठा, नाजुक, दर्दनाक असर, दिल पर हो रहा था जिसे बयान नहीं किया जा सकता. एक हरे-भरे मैदान का नक्शा आँखों के सामने खिंच गया और लीला, प्यारी लीला, उस मैदान पर बैठी हुई मेरी तरफ़ हसरतनाक आँखों से ताक रही थी. मैंने एक लम्बी आह भरी और बिना कुछ कहे उठ खड़ा हुआ. इस वक्त मेहर सिंह ने मेरी तरफ़ ताका, उसकी आँखों में मोती के क़तरे डबडबाये हुए थे और बोला-कभी-कभी तशरीफ़ लाया कीजिएगा.
मैं सिर्फ इतना जवाब दिया-मैं आपका बहुत कृतज्ञ हूँ.

4
धीरे-धीरे मेरी यह हालत हो गयी कि जब तक मेहर सिंह के यहाँ जाकर दो-चार गाने न सुन लूँ जी को चैन न आता. शाम हुई और मैं जा पहुँचा. कुछ देर तक गानों की बहार लूटता और तब उसे पढ़ाता. ऐसे ज़हीन और समझदार लड़के को पढ़ाने में मुझे ख़ास मज़ा आता था. मालूम होता था कि मेरी एक-एक बात उसके दिल पर नक्श हो रही है. जब तक मैं पढ़ाता वह पूरे जी-जान से कान लगाये बैठा रहता जब उसे देखता, पढ़ने-लिखने में डूबा हुआ पाता. साल भर में अपने भगवान के दिये हुए जेहन की बदौलत उसने अंग्रेजी में अच्छी योग्यता प्राप्त कर ली. मामूली चि_ियाँ लिखने लगा, और दूसरा साल गुज़रते-गुज़रते वह अपने स्कूल के कुछ छात्रों से बाज़ी ले गया. जितने मुदर्रिस थे, सब उसकी अक्ल पर हैरत करते और सीधा नेक-चलन ऐसा कि कभी झूठ-मूठ भी किसी ने उसकी शिकायत नहीं की. वह अपने सारे स्कूल की उम्मीद और रौनक़ था, लेकिन बावजूद सिख होने के उसे खेलकूद में रुचि न थी. मैंने उसे कभी क्रिकेट में नहीं देखा. शाम होते ही सीधे घर चला आता और लिखने-पढ़ने में लग जाता.

मैं धीरे-धीरे उससे इतना हिल-मिल गया कि बजाय शिष्य के उसको अपना दोस्त समझने लगा. उम्र के लिहाज़ से उसकी समझ आश्चर्यजनक थी. देखने में 16-17 साल से ज़्यादा न मालूम होता मगर जब कभी मैं रवानी में आकर दुर्बोध कवि-कल्पनाओं और कोमल भावों की उसके सामने व्याख्या करता तो मुझे उसकी भंगिमा से ऐसा मालूम होता कि एक-एक बारीकी को समझ रहा है. एक दिन मैंने उससे पूछा-मेहर सिंह, तुम्हारी शादी हो गयी?
मेहर सिंह ने शरमाकर जवाब दिया-अभी नहीं.
मैं-तुम्हें कैसी औरत पसन्द है?
मेहर सिंह-मैं शादी करूँगा ही नहीं.
मैं-क्यों?
मेहर सिंह-मुझ जैसे जाहिल गँवार के साथ शादी करना कोई औरत पसन्द न करेगी.
मैं-बहुत कम ऐसे नौजवान होंगे तो तुमसे ज़्यादा लायक़ हों या तुमसे ज़्यादा समझ रखते हों.
मेहर सिंह ने मेरी तरफ़ अचम्भे से देखकर कहा-आप दिल्लगी करते हैं.
मैं-दिल्लगी नहीं, मैं सच कहता हूँ. मुझे खुद आश्चर्य होता है कि इतने कम दिनों में तुमने इतनी योग्यता क्योंकर पैदा कर ली. अभी तुम्हें अंग्रेजी शुरू किए तीन बरस से ज़्यादा नहीं हुए.
मेहर सिंह-क्या मैं किसी पढ़ी-लिखी लेडी को खुश रख सकूँगा.
मैं-(जोश से) बेशक!

5
गर्मी का मौसम था. मैं हवा खाने शिमले गया हुआ था. मेहर सिंह भी मेरे साथ था. वहाँ मैं बीमार पड़ा. चेचक निकल आयी. तमाम जिस्म में फफोले पड़ गये. पीठ के बल चारपाई पर पड़ा रहता. उस वक़्त मेहर सिंह ने मेरे साथ जो-जो एहसान किए वह मुझे हमेशा याद रहेंगे. डाक्टरों की सख्त मनाही थी कि वह मेरे कमरे में न आवे. मगर मेहर सिंह आठों पहर मेरे ही पास बैठा रहता. मुझे खिलाता-पिलाता, उठाता-बिठाता. रात-रात भर चारपाई के क़रीब बैठकर जागते रहना मेहर सिंह ही का काम था. सगा भाई भी इससे ज़्यादा सेवा नहीं कर सकता था. एक महीना गुज़र गया. मेरी हालत रोज़-ब-रोज़ बिगड़ती जाती थी. एक रोज़ मैंने डाक्टर को मेहर सिंह से कहते सुना कि ‘इनकी हालत नाजुक है. मुझे यकीन हो गया कि अब न बचूँगा, मगर मेहर सिंह कुछ ऐसी दृढ़ता से मेरी सेवा सुश्रुषा में लगा हुआ था जैसे वह मुझे ज़बर्दस्ती मौत के मुँह से बचा लेगा. एक रोज़ शाम के वक़्त मैं कमरे में लेटा हुआ था कि किसी के सिसकी लेने की आवाज़ आयी. वहाँ मेहर सिंह को छोडक़र और कोई न था. मैंने पूछा-मेहर सिंह, मेहर सिंह, तुम रोते हो.
मेहर सिंह ने ज़ब्त करके कहा-नहीं, रोऊँ क्यों, और मेरी तरफ़ बड़ी दर्द-भरी आँखों से देखा.
मैं-तुम्हारे सिसकने की आवाज़ आयी.
मेहर सिंह-वह कुछ बात न थी. घर की याद आ गयी थी.
मैं-सच बोलो.
मेहर सिंह की आँखें फिर डबडबा आयीं. उसने मेज पर से आईना उठाकर मेरे सामने रख दिया. हे नारायण! मैं खुद को पहचान न सका. चेहरा इतना ज़्यादा बदल गया था. रंगत बजाय सुर्ख के सियाह हो रही थी और चेचक के बदनुमा दागों ने सूरत बिगाड़ दी थी. अपनी यह बुरी हालत देखकर मुझसे भी जब्त न हो सका और आँखें डबडबा गयीं. वह सौन्दर्य जिस पर मुझे इतना गर्व था बिल्कुल विदा हो गया था.

6
मैं शिमले से वापस आने की तैयारी कर रहा था. मेहर सिंह उसी रोज मुझसे विदा होकर अपने घर चला गया था. मेरी तबीयत बहुत उचाट हो रही थी. असबाब सब बँध चुका था कि एक गाड़ी मेरे दरवाज़े पर आकर रुकी और उसमें से कौन उतरा मिस लीला! मेरी आँखों को विश्वास न हो रहा था, चकित होकर ताकने लगा. मिस लीलावती ने आगे बढक़र मुझे सलाम किया और हाथ मिलाने को बढ़ाया. मैंने भी बौखलाहट में हाथ तो बढ़ा दिया मगर अभी तक यह यक़ीन नहीं हुआ था कि मैं सपना देख रहा हूँ या हक़ीक़त है. लीला के गालों पर वह लाली न थी न वह चुलबुलापन बल्कि वह बहुत गम्भीर और पीली-पीली सी हो रही थी. आख़िर मेरी हैरत कम न होते देखकर उसने मुस्कराने की कोशिश करते हुए कहा-तुम कैसे जेण्टिलमैन हो कि एक शरीफ़ लेडी को बैठने के लिए कुर्सी भी नहीं देते.
मैंने अन्दर से कुर्सी लाकर उसके लिए रख दी. मगर अभी तक यही समझ रहा था कि सपना देख रहा हूँ.
लीलावती ने कहा-शायद तुम मुझे भूल गये.
मैं-भूल तो उम्र भर नहीं सकता मगर आँखों को एतबार नहीं आता.
लीला-तुम तो बिलकुल पहचाने नहीं जाते.
मैं-तुम भी तो वह नहीं रही. मगर आख़िर यह भेद क्या है, क्या तुम स्वर्ग से लौट आयी?
लीला-मैं तो नैनीताल में अपने मामा के यहाँ थी.
मैं-और वह चिठ्ठी मुझे किसने लिखी थी और तार किसने दिया था?
लीला-मैंने ही.
मैं-क्यों-तुमने यह मुझे धोखा क्यों दिया? शायद तुम अन्दाजा नहीं कर सकती कि मैंने तुम्हारे शोक में कितनी पीड़ा सही है.
मुझे उस वक़्त एक अनोखा गुस्सा आया-यह फिर मेरे सामने क्यों आ गयी! मर गयी तो मरी ही रहती!
लीला-इसमें एक गुर था, मगर यह बात तो फिर होती रहेंगी. आओ इस वक़्त तुम्हें अपनी एक लेडी फ्रेण्ड से इण्ट्रोड्यूस कराऊँ, वह तुमसे मिलने की बहुत इच्छुक हैं.
मैंने अचरज से पूछा-मुझसे मिलने की! मगर लीलावती ने इसका कुछ जवाब न दिया और मेरा हाथ पकडक़र गाड़ी के सामने ले गयी. उसमें एक युवती हिन्दुस्तानी कपड़े पहने बैठी हुई थी. मुझे देखते ही उठ खड़ी हुई और हाथ बढ़ा दिया. मैंने लीला की तरफ़ सवाल करती हुई आँखों से देखा.
लीला-क्या तुमने नहीं पहचाना?
मैं-मुझे अफ़सोस है कि मैंने आपको पहले कभी नहीं देखा और अगर देखा भी हो तो घूँघट की आड़ से क्योंकर पहचान सकता हूँ.
लीला-यह तुम्हारी बीवी कुमुदिनी है!
मैंने आश्चर्य के स्वर में कहा-कुमुदिनी, यहाँ?
लीला-कुमुदिनी मुँह खोल दो और अपने प्यारे पति का स्वागत करो.
कुमुदिनी ने काँपते हुए हाथों से ज़रा-सा घूँघट उठाया. लीला ने सारा मुँह खोल दिया और ऐसा मालूम हुआ कि जैसे बादल से चाँद निकल आया. मुझे ख़याल आया, मैंने यह चेहरा कहीं देखा है. कहाँ? अहा, उसकी नाक पर भी तो वही तिल है, उँगुली में वही अँगूठी भी है.
लीला-क्या सोचते हो, अब पहचाना?
मैं-मेरी कुछ अक्ल काम नहीं करती. हूबहू यही हुलिया मेरे एक प्यारे दोस्त मेहर सिंह का है.
लीला-(मुस्कराकर) तुम तो हमेशा निगाह के तेज़ बनते थे, इतना भी नहीं पहचान सकते!
मैं खुशी से फूल उठा-कुमुदिनी मेहर सिंह के भेष में! मैंने उसी वक़्त उसे गले से लगा लिया और खूब दिल खोलकर प्यार किया. इन कुछ क्षणों में मुझे जो खुशी हासिल हुई उसके मुक़ाबिले ज़िन्दगी भर की खुशियाँ, हेच हैं. हम दोनों आलिंगन-पाश में बँधे हुए थे. कुमुदिनी, प्यारी कुमुदिनी के मुँह से आवाज़ न निकलती थी. हाँ, आँखों से आँसू जारी थे.
मिस लीला बाहर खड़ी कोमल आँखों से यह दृश्य देख रही थी. मैंने उसके हाथों को चूमकर कहा-प्यारी लीला, तुम सच्ची देवी हो, जब तक जिएँगे तुम्हारे कृतज्ञ रहेंगे.
लीला के चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कराहट दिखायी दी. बोली-अब तो शायद तुम्हें मेरे शोक का काफ़ी पुरस्कार मिल गया.

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हिंदी कहानी सवा सेर गेहूँ, मुंशी प्रेमचंद की कहानी सवा सेर गेहूं
किसी गाँव में शंकर नामी एक किसान रहता था। सीधा-सादा ग़रीब आदमी था। अपने काम से काम, न किसी के लेने में, न किसी के देने में, छक्का-पंजा न जानता था। छल-कपट की उसे छूत भी न लगी थी। ठगे जाने की फ़िक्र न थी। विद्या न जानता था। खाना मिला तो खा लिया न मिला तो चरबन पर क़नाअत की। चरबन भी न मिला तो पानी लिया और रामा का नाम लेकर सो रहा। मगर जब कोई मेहमान दरवाज़े पर आ जाता तो उसे ये इसत्ग़िना का रास्ता तर्क कर देना पड़ता था। ख़ुसूसन जब कोई साधू महात्मा आ जाते थे तो उसे लाज़िमन दुनियावी बातों का सहारा लेना पड़ता। ख़ुद भूका सो सकता था मगर साधू को कैसे भूका सुलाता। भगवान के भगत जो ठहरे।

एक रोज़ शाम को एक महात्मा ने आकर उसके दरवाज़े पर डेरा जमा दिया। चेहरे पर जलाल था। पीताम्बर गले में, जटा सर पर, पीतल का कमंडल हाथ में, खड़ाऊ पैर में, ऐनक आँखों पर, ग़र्ज़ कि पूरा भेस उन महात्मा का सा था जो रउसा के महलों में रियाज़त, हवा गाड़ियों पर मंदिरों का तवाफ़ और योग (मुराक़बा) में कमाल ए हाल करने के लिए लज़ीज़ ग़िज़ाएं खाते हैं। घर में जौ का आटा था वो उन्हें कैसे खिलाता? ज़माना-ए-क़दीम में जौ की ख़्वाह कुछ अहमियत रही हो, मगर ज़माना-ए-हाल में जौ की ख़ुरिश महात्मा लोगों के लिए सक़ील और देर हज़म हुई है, बड़ी फ़िक्र हुई कि महात्मा जी को क्या खिलाऊँ?

आख़िर तय किया कि कहीं से गेहूँ का आटा उधार लाऊँ। गाँव भर में गेहूँ का आटा न मिला। गाँव भर में सब आदमी ही आदमी थे, देवता एक भी न था, देवताओं को ख़ुरिश कैसे मिलती? ख़ुश क़िस्मती से गाँव के पुरोहित जी के यहाँ थोड़े से गेहूँ मिल गए। उनसे सवा सेर गेहूँ उधार लिये और बीवी से कहा कि पीस दे। महात्मा ने खाया। लंबी तान कर सोए और सुबह आशीर्वाद दे कर अपना रास्ता लिया।

पुरोहित जी साल में दो बार खलियानी लिया करते थे। शंकर ने दिल में कहा कि सवा सेर गेहूँ क्या लौटाऊँ। पनसेरी के बदले कुछ ज़्यादा खलियानी दे दूँगा। वो भी समझ जाएँगे, मैं भी समझ जाऊँगा। चैत में जब वो पुरोहित जी पहुँचे तो उन्हें डेढ़ पनसेरी के क़रीब गेहूँ दे दिए और अपने को सुबुकदोश समझ कर इसका कोई तज़किरा न किया। पुरोहित जी ने भी फिर कभी न माँगा। सीधे साधे शंकर को क्या मालूम कि ये सवा सेर गेहूँ चुकाने के लिए मुझे दुबारा जन्म लेना पड़ेगा।

सात साल गुज़र गए। पुरोहित जी ब्रहमन से महाजन हुए। शंकर किसान से मज़दूर हो गया। उसका छोटा भाई मंगल उससे अलग हो गया था। एक साथ रह कर दोनों किसान थे, अलग हो कर दोनों मज़दूर हो गए थे। शंकर ने बहुत चाहा कि निफ़ाक़ की आग भड़कने न पावे। मगर हालत ने उसको मजबूर कर दिया। जिस वक़्त अलग चूल्हे जले वो फूट-फूट कर रोया। आज से भाई-भाई दुश्मन हो जाएँगे। एक रोऐ तो दूसरा हंसेगा, एक के घर में ग़मी होगी तो दूसरे के घर गुलगुले पकेंगे। मुहब्बत का रिश्ता, दूध का रिश्ता आज टूटा जाता है।

उसने सख़्त मेहनत कर के ख़ानदानी इज़्ज़त का ये दरख़्त लगाया था। उसे अपने ख़ून से सींचा था, उसका जड़ से उखड़ना देख कर उसके दिल के टुकड़े हुए जाते थे। सात रोज़ तक उसने दाने की सूरत भी न देखी। दिन भर जेठ की धूप में काम करता और रात में लपेट कर सो रहता। इस सख़्त रंज और नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त तकलीफ़ ने ख़ून को जला दिया, गोश्त और चर्बी को घुला दिया। बीमार पड़ा तो महीनों चारपाई से न उठा। अब गुज़र बसर कैसे हो? पाँच बीघे के आधे खेत रह गए, एक बैल रह गया। खेती क्या ख़ाक होती। आख़िर यहाँ तक नौबत पहुँची कि खेती सिर्फ़ नाम भर को रह गई। मआश का सारा भार मज़दूरी पर आ पड़ा।

सात साल गुज़र गए। एक दिन शंकर मज़दूरी कर के लौटा तो रास्ते में पुरोहित जी ने टोक कर कहा, “शंकर कल आके अपने बीज बैंक का हिसाब कर ले। तेरे यहाँ साढे़ पाँच मन गेहूँ कब से बाक़ी पड़े हैं और तू देने का नाम नहीं लेता। क्या हज़म करने का इरादा है?”
शंकर ने ताज्जुब से कहा, “मैंने तुम से कब गेहूँ लिये थे कि साढे़ पाँच मन हो गए? तुम भूलते हो, मेरे यहाँ न किसी छटांक भर अनाज है, न एक पैसा उधार।”
पुरोहित, ”इसी नीयत का तू ये फल भोग रहे हो खाने को नहीं जुड़ता।”

ये कह पुरोहित जी ने उसका सवा सेर गेहूँ का ज़िक्र किया जो आज से साल क़ब्ल शंकर को दिए थे। शंकर सुन कर साकित रह गया। मैंने कितनी बार उन्हें खलियानी दी। उन्होंने मेरा कौन सा काम किया। जब पोथी पत्रा देखने, साअत शगुन बिचारने द्वार पर आते थे तो कुछ न कुछ दछिना ले ही जाते थे। इतना स्वार्थ। सवा सेर अनाज को लेकर अंडे की तरह ये भूत खड़ा कर दिया। जो मुझे निगल ही जाएगा। इतने दिनों में एक बार भी कह देते तो गेहूँ दे ही देता। क्या इसी नीयत से चुप बैठे रहे। बोला, “महाराज नाम लेकर तो मैंने इतना अनाज नहीं दिया, मगर कई बार खलियानी में सेर-सेर, दो-दो सेर दे दिया है। अब आप आज साढे़ पाँच मन माँगते हो, मैं कहाँ से दूंगा?”

पुरोहित, “लेखा जो जो बक्सें सो-सो। तुम ने जो कुछ दिया होगा, खलियानी में दिया होगा, उसका कोई हिसाब नहीं। चाहे एक की जगह चार पनसेरी दे, तुम्हारे नाम ही में साढे़ पाँच मन लिखा हुआ। जिस से चाहे हिसाब लगवा लो। दे दो तो तुम्हारा नाम झीक (काट) दूँ, नहीं तो और बढ़ता रहेगा।”
शंकर, “पांडे, क्यों एक ग़रीब को सताते हो, मेरे खाने का ठिकाना नहीं, इतना गेहूँ किस के घर से दूँगा।”
पुरोहित, “जिसके घर से चाहे लाओ, मैं छटाँक भर भी न छोड़ूँगा। यहाँ न दोगे, भगवान के घर तो दोगे।

शंकर काँप उठा। हम पढ़े लिखे लोग होते तो कह देते, “अच्छी बात है, ईश्वर के घर ही देंगे वहाँ की तूल यहाँ से कुछ बड़ी तो न होगी। कम से कम इसका कोई सबूत हमारे पास नहीं। फिर उसकी क्या फ़िक्र?” मगर शंकर इतना अक़्लमंद, इतना चालाक न था। एक तो क़र्ज़, वो भी ब्रह्मण का! बही में नाम रहेगा तो सीधे नरक में जाऊँगा। इस ख़याल से ही उसके रोंगटे खड़े हो गए। बोला, “महाराज तुम्हारा जितना होगा यहीं दूँगा। ईश्वर के यहाँ क्यों दूँ? इस जन्म में तो ठोकर खा ही रहा हूँ उस जन्म के लिए क्यों काँटे बोऊँ? मगर ये कोई न्याय नहीं है। तुम ने राई का पर्वत बना दिया। ब्रहमन हो के तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। उसी घड़ी तक़ाज़ा कर के लिया होता तो आज मेरे ऊपर बड़ा बोझ क्यों पड़ता? मैं तो दे दूँगा, लेकिन तुम्हें भगवान के यहाँ जवाब देना पड़ेगा?”

पुरोहित, “वहाँ का डर तुम्हें होगा। मुझे क्यों होने लगा। वहाँ तो सब अपने ही भाई बंद हैं। ऋषि मुनी सब तो ब्रहमन ही हैं। कुछ बने बिगड़ेगी, सँभाल लेंगे। तो कब देते हो?”
शंकर, “मेरे पास धरा तो है नहीं, किसी से माँग-जाँच कर लाऊँगा तभी दूँगा।”
पुरोहित, “मैं ये न मानूँगा। सात साल हो गए। अब एक का भी मुलाहिज़ा न करूंगा। गेहूँ नहीं दे सकते तो दस्तावेज़ लिख दो।”
शंकर, “मुझे तो देना है। चाहे गेहूँ ले लो। चाहे दस्तावेज़ लिखवाओ किस हिसाब से दाम रखोगे?”
पुरोहित, “जब दे ही रहे हो तो बाज़ार भाव काटूँगा। पाव भर छुड़ा कर क्यों बुरा बनूँ।”

हिसाब लगाया गया तो गेहूँ की क़ीमत साठ रुपया बनी। साठ का दस्तावेज़ लिखा गया। तीन रुपये सैकड़ा सूद। साल भर में न देने पर सूद की शरह साढ़े तीन रुपये सैकड़ा। आठ आने का स्टैंप, एक रुपया दस्तावेज़ की तहरीर शंकर को अलैहदा देनी पड़ी।

सारे गाँव ने पुरोहित जी की मज़म्मत की मगर सामने नहीं। महाजन से सभी को काम पड़ता है उसके मुँह कौन लगे?
शंकर ने साल भर तक सख़्त रियाज़त की मीयाद से क़ब्ल उसने रुपया अदा करने का बरत सा कर लिया। दोपहर को पहले भी चूल्हा न जलता था, सिर्फ़ चरबन पर बसर होती थी। अब वो भी बंद हुआ। सिर्फ़ लड़के के लिए रात को रोटियाँ रख दी जातीं। एक पैसे की तंबाकू रोज़ पी जाता था। यही एक लत थी जिसे वो कभी न छोड़ सका था। अब वो भी इस कठिन बरत के भेंट हो गई। उसने चिलम पटक दी, हुक़्क़ा तोड़ दिया और तंबाकू की हाँडी चूर-चूर कर डाली। कपड़े पहले भी तर्क की इंतिहाई हद तक पहुँच चुके थे। अब वो बारीक तरीन क़ुदरती कपड़ों में मुंसलिक हो गए। माघ की हड्डियों तक में सरायत कर जाने वाली सर्दी को उसने आग के सहारे काट दिया।

इस अटल इरादे का नतीजा उम्मीद से बढ़ कर निकला। साल के आख़िर तक उसके पास साठ रुपया जमा हो गए। उसने समझा कि पण्डित जी को इतने रुपये दे दूँगा और कहूँगा महाराज बाक़ी रुपये भी जल्दी आप के सामने हाज़िर कर दूंगा। पंद्रह की तो और बात है। क्या पण्डित जी इतना भी न मानेंगे। उसने रुपये लिए और ले जा कर पण्डित जी के क़दमों पर रख दिए।

पण्डित जी ने मुतअज्जिब हो कर पूछा, “किसी से उधार लिया क्या?”
शंकर, “नहीं महाराज! आप की असीस से अब की मजूरी अच्छी मिली।”
पण्डित जी, “लेकिन ये तो साठ ही हैं।”
शंकर, “हाँ महाराज! इतने अभी ले लीजिए। बाक़ी दो तीन महीने में दे दूंगा। मुझे उरिण कर दीजिए।”
पण्डित जी, “उरिण तो जभी होंगे, जब मेरी कौड़ी कौड़ी चुका दोगे? जाकर मेरे पंद्रह और लाओ।”
शंकर, “महाराज! इतनी दया करो। अब साँझ की रोटियों का भी ठिकाना नहीं है। गाँव में हूँ तो कभी न कभी दे ही दूँगा।”
पण्डित, “मै ये रोग नहीं पालता। न बहुत बातें करना जानता हूँ। अगर मेरे पूरे रुपये न मिलेंगे तो आज से साढ़े तीन रुपये सैकड़ा का ब्याज चलेगा। इतने रुपये चाहे अपने घर में रखो चाहे मेरे यहाँ छोड़ जाओ।”
शंकर, “अच्छा, जितना लाया हूँ, उतना रख लीजिए। मैं जाता हूँ, कहीं से पंद्रह और लाने की फ़िक्र करता हूँ।”

शंकर ने सारा गाँव छान मारा मगर किसी ने रुपे न दिए। इसलिए नहीं कि उसका एतबार न था, या किसी के पास रुपे न थे, बल्कि पण्डित जी के शिकार को छेड़ने की किसी में हिम्मत न थी। अमल के बाद रद्द-ए-अमल का क़ुदरती क़ायदा है। शंकर साल भर तक तपस्या करने पर भी जब क़र्ज़ बेबाक़ करने में कामयाब न हुआ तो उसकी एहतियात मायूसी की शक्ल में तबदील हो गई। उसने समझ लिया कि जब इतनी तकलीफ़ उठाने पर साल भर में साठ रुपये से ज़्यादा न जमा कर सका तो अब कौन सा उपाय है जिससे उसके दूने रुपे जमा हों। जब सर पर क़र्ज़ का बोझ ही लदना है तो क्या मन भर और क्या सवा मन का। उसकी हिम्मत पस्त हो गई मेहनत से नफ़रत हो गई। उम्मीद ही हौसला की पैदा करने वाली है। उम्मीद में रौनक़ है, ताक़त है, ज़िंदगी है, उम्मीद ही दुनिया की मुतहर्रिक करने वाली क़ुव्वत है।

शंकर मायूस हो कर बे-परवा हो गया। वो ज़रूरतें जिनको उसने साल भर तक टाल रखा था। अब दरवाज़े पर खड़ी होने वाली भिकारनें न थीं, बल्कि सर पर सवार होने वाली चुड़ैलें थीं जो अपना चढ़ावा लिए बगै़र जान ही नहीं छोड़तीं। कपड़ों में पैवंद लगने की भी एक हद होती है। अब शंकर को हिसाब मिलता तो रुपे जमा न करता। कभी कपड़े लाता और कभी खाने की कोई चीज़। जहाँ पहले तंबाकू पिया करता था वहाँ अब गाँजा और चरस का चस्का भी लगा। उसे अब रुपे अदा करने की कोई फ़िक्र न थी। गोया उस पर किसी का एक पैसा भी न था। पहले लर्ज़ा आ जाने पर भी वो काम करने ज़रूर जाता था। अब काम पर न जाने का बहाना तलाश किया करता।

इस तरह तीन साल गुज़र गए। पण्डित जी महाराज ने एक बार भी तक़ाज़ा न किया। वो होशियार शिकारी की तरह तीर ब-हद्फ़ निशाना लगाना चाहते थे। पहले से शिकार को भड़का देना उनके शेवा के ख़िलाफ़ था। एक रोज़ पण्डित जी ने शंकर को बुलाया। हिसाब दिखाया। साठ रुपये जमा थे, वो मिनहा करने पर भी अब शंकर के ज़िम्मे एक सौ बीस रुपये निकले। “इतने रुपे तो उसी जन्म में दूँगा। इस जन्म में नहीं हो सकता?”

पण्डित, “मैं इसी जन्म में लूँगा। अस्ल न सही सूद तो देना ही पड़ेगा।”
शंकर, “एक बैल है वो ले लीजिए। एक झोंपड़ी है, वो ले लीजिए, और मेरे पास रखा क्या है?”
पण्डित, “मुझे बैल बधिया लेकर क्या करना है। मुझे देने को तुम्हारे पास बहुत कुछ है।”
शंकर, “और क्या है महाराज।”

पण्डित, “कुछ नहीं है, तुम तो हो? आख़िर तुम भी कहीं मज़दूरी करने ही जाते हो। मुझे भी खेती करने के लिए एक मज़दूर रखना ही पड़ता है। सूद में तुम हमारे यहाँ काम किया करो। जब सुभिता हो अस्ल भी दे देना। सच तो ये है कि अब तुम दूसरी जगह काम करने के लिए जा नहीं सकते। जब तक मेरे रुपे न चुका दो। तुम्हारे पास कोई जायदाद नहीं है। इतनी बड़ी गठरी मैं किस एतबार पर छोड़ दूँ? कौन इसका ज़िम्मा लेगा, तुम मुझे महीने महीने सूद दिए जाओगे। और कहीं कमा कर जब तुम मुझे सूद भी नहीं दे सकते तो अस्ल की कौन कहे?”

शंकर, “महाराज! सूद में तो काम करूँगा और खाऊँगा क्या?”
पण्डित, “तुम्हारी घर वाली है, लड़के हैं। क्या वो हाथ पैर कटा बैठेंगे, तुम्हें आध सेर जौ रोज़ चरबन के लिए दे दिया करूँगा। ओढ़ने के लिए साल में कम्बल पा जाओगे। एक सलूका भी बनवा दिया करूँगा और क्या चाहिए? ये सच है कि और लोग तुम्हें छः आने रोज़ देते हैं लेकिन मुझे ऐसी ग़रज़ नहीं है। मैं तो तुम्हें अपने रुपे भराने के लिए रखता हूँ।”

शंकर ने कुछ देर तक गहरे सोच में पड़े रहने के बाद कहा, “महाराज! ये तो जन्म भर की गुलामी हुई?”
पण्डित, “गु़लामी समझो, चाहे मजूरी समझो। मैं अपने रुपे भराए बिना तुम्हें न छोडूँगा। तुम भागोगे तो तुम्हारा लड़का। हाँ जब कोई न रहेगा तब की बात दूसरी है।”

इस फ़ैसले की कहीं अपील न थी। मज़दूर की ज़मानत कौन करता? कहीं पनाह न थी? भाग कर कहाँ जाता? दूसरे रोज़ से उसने पण्डित जी के हाँ काम करना शुरू कर दिया। सवा सेर गेहूँ की बदौलत उम्र भर के लिए गु़लामी की बेड़ियाँ पाँव में डालनी पड़ीं। उस बदनसीब को अब अगर किसी ख़याल से तस्कीन होती थी तो इसीसे कि ये सब मेरे पिछले जन्म का भोग है। औरत को वो काम करने पड़े थे जो उसने कभी न किए थे। बच्चे दाने-दाने को तरसते थे, लेकिन शंकर चुप देखने के सिवा और कुछ न कर सकता था। वो गेहूँ के दाने किसी देवता बुद्धा की तरह तमाम उम्र उसके सर से न उतरे।

शंकर ने पण्डित जी के यहाँ बीस बरस तक गु़लामी करने के बाद इस ग़मकदे से रहलत की। एक सौ बीस अभी तक उसके सर पर सवार थे। पण्डित जी ने उस ग़रीब को ईश्वर के दरबार में तकलीफ़ देना मुनासिब न समझा। पस उन्होंने उसके जवान बेटे की गर्दन पकड़ी। आज तक वो पण्डित जी के यहाँ काम करता है। उसका उधार कब अदा होगा, होगा भी या नहीं, ईश्वर ही जाने।

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अब बड़े-बड़े शहरों में दाइयाँ और नर्सें सभी नज़र आती हैं लेकिन देहातों में अभी तक ज़चा-ख़ाना रविश-ए-क़दीम की तरह भंगिनों के ही दायरा-ए-इक़तिदार में है और एक अरसा-ए-दराज़ तक इस में इस्लाह की कोई उम्मीद नहीं। बाबू महेश नाथ अपने गाँव के ज़मींदार ज़रूर थे तालीम याफ़्ता भी थे। ज़च्चा-ख़ाना की इस्लाह की ज़रूरत को भी तस्लीम करते थे लेकिन अमली मुश्किलात को क्या करते। देहात में जाने को कोई नर्स राज़ी भी हुई तो ऐसा मुआवज़ा तलब किया कि बाबू साहब को सर झुका कर चले आने के सिवा कोई तदबीर ना सूझी।

लेडी डाक्टर के पास जाने की हिम्मत ही क्यों कर हो सकती उनका हक़-उल-ख़िदमत तो ग़ालिबन बाबू साहब की निसबत मिल्कियत बैअ होने पर भी पूरा होता आख़िर जब तीन लड़कियों के बाद ये चौथा लड़का पैदा हुआ तो फिर वही गोडर की बहू। बच्चे बेश्तर रात ही को पैदा होते हैं। चुनाँचे आधी रात को बाबू साहब के चपरासी ने गोडर गोडर की हाँक लगाई। चमारों की टोली जाग उठी।

गोडर के घर में उस रोज़-ए-सईद की महीनों से तैयारी थी ख़दशा था तो यही कि कहीं बेटी न हो जाए। नहीं तो फिर वो ही बँधा हुआ रुपया और वही एक साड़ी मिलकर रह जाएगी। इस मसले पर मियाँ-बीवी में बार-बार तबादला-ए-ख़यालात हो चुका था। शर्तें लग चुकी थीं। गोडर की बहू कहती थी कि अगर अब के बेटा न हुआ तो मुँह न दिखाऊँ। हाँ-हाँ, मुँह न दिखाऊँ और गोडर कहता था कि देखो बेटी होगी और बीच खेत बेटी पैदा होगी। बेटा पैदा होगा तो मूँछें मुंडवा लूँगा। शायद गोडर समझता था कि इस तरह भंगन में मुख़ालिफ़ाना जोश पैदा कर के वो बेटे की आमद के लिए रास्ता तैयार कर रहा है।

भंगन बोली, “अब मुंडवाले मूँछें डाढ़ी जा। कहती थी बेटा होगा पर सुनते ही नहीं अपनी रट लगाए। खुद तेरी मूँछें मूंडूँगी। खूँटी तक तो रखूँ नहीं।”
गोडर ने कहा, “अच्छा मूँड लेना भली मानस, मूँछें फिर निकलें ही नहीं। तीसरे दिन फिर जूँ की तूँ हैं। मगर जो कुछ मिलेगा उसमें से आधा। रख लूँगा। कहे देता हूँ।”
भंगन ने अँगूठा दिखाया और अपने तीन महीने के बच्चे को गोडर के सपुर्द कर, सिपाही के साथ चल दी।
गोडर ने पुकारा, “अरी सुन तो कहाँ भागी जाती है मुझे भी तो रौशन चौकी बजाने जाना पड़ेगा।”
भंगन ने दूर से ही कहा, “तो कौन बड़ी मुश्किल है वहीं धरती पर लिटा देना और रौशन चौकी बजाना। मैं आकर दूध पिला दिया करूँगी।”

महेश नाथ के यहाँ अब के भंगन की ख़ूब ख़ातिर की गई। सुब्ह को हरीरा मिलता, दोपहर को पूरियाँ और हलवा। तीसरे पहर को फिर और रात को फिर और गोडर को भी भरपूर परसा मिलता था। भंगन अपने बच्चे को दिन-भर में दोबार से ज़्यादा दूध ना पिला सकती। उसके लिए ऊपर का दूध मुहय्या कर दिया जाता। भंगन का दूध बाबू साहब का बच्चा पीता था और ये सिलसिला बारहवें दिन भी बंद न हुआ मालकिन मोटी ताज़ी औरत थी। मगर अब की कुछ ऐसा इत्तिफ़ाक़ कि दूध ही नहीं। तीनों लड़कियों की बार इतने इफ़रात से दूध होता था कि लड़कियों को बदहज़मी हो जाती थी। अब की एक बूँद नहीं भंगन जनाई भी थी और दूध पिलाई भी।

मालकिन ने कहा, “भंगन हमारे बच्चे को पाल दे फिर जब तक जिए बैठी खाती रहना पाँच बीघे माफ़ी दिलवा दूँगी तेरे पोते तक खाएँगे।” और भंगन का लाडला ऊपर का दूध हज़म न कर सकने के बाइस बार-बार क़ै करता और रोज़ बरोज़ लाग़र होता जाता था। भंगन कहती, “और मूँडन में चूड़े लूँगी बहू जी कहे देती हूँ।

बहू जी: “हाँ-हाँ जोड़े लेना भई धमकाती क्यूँ है। चांदी के लेगी या सोने के।”
“वाह बहू जी वाह चाँदी के चूड़े पहन के किसे मुँह दिखाऊँगी।”
“अच्छा सोने के लेना भई कहती तो हूँ।”
और ब्याह में कंठा लूँगी और चौधरी (गोडर) के लिए हाथों के तोड़े।
बहू जी, “वो भी लेना। वो दिन तो भगवान अब दिखाएंगे।”
घर में मालकिन के बाद भंगन की हुकूमत थी। मोहरियाँ, मेहराजन, मज़दूरनें सब उसका रौब मानती थीं। यहाँ तक कि ख़ुद बहूजी उससे दब जाती थी। एक-बार तो उसने महेश नाथ को भी डाँटा था। हंस कर टाल गए। बात चली थी भंगियों की। महेश नाथ ने कहा था दुनिया में और चाहे कुछ हो जाये भंगी-भंगी रहेंगे उन्हें आदमी बनाना मुश्किल है। इस पर भंगन ने कहा था, “मालिक भंगी तो बड़े-बड़ों को आदमी बनाते हैं उन्हें क्या कोई आदमी बनाएगा।” ये गुस्ताख़ी कर के किसी दूसरे मौक़े पर भला भंगन सलामत रहती। सर के बाल उखाड़ लिए जाते लेकिन आज बाबू साहब हँसे और क़हक़हा मार कर बोले, “भंगन बात बड़े पते की कहती है।”

भंगन की हुकूमत साल भर तक क़ायम रही। फिर छिन गई। बच्चे का दूध छुड़ा दिया गया। अब ब्राह्मणों ने भंगी का दूध पीने पर एतराज़ किया। मोटे राम शास्त्री तो प्राश्चित की तजवीज़ कर बैठे। लेकिन महेश नाथ अहमक़ न थे। फटकार बताई… “प्राश्चित की ख़ूब कही आपने शास्त्री जी कल तक इसी भंगन का ख़ून पी कर पला। अब प्राश्चित करना चाहिए, वाह।”

शास्त्री जी बोले बे-शक कल तक भंगन का ख़ून पी कर पला। गोश्त खाकर पला ये भी कह सकते हो। लेकिन कल की बात कल थी आज की बात आज है। जगन्नाथ पुर में छूत अछूत सब एक साथ खाते हैं। मगर यहाँ तो नहीं खा सकते। खिचड़ी तक खा लेते हैं बाबू जी और क्या कहें पूरी तक नहीं रह जाते, लेकिन अच्छे हो जाने पर तो नहीं खा सकते। “तो उसके मअनी ये हैं कि धर्म बदलता रहता है कभी कुछ कभी कुछ।“

और क्या राजा का धर्म अलग, प्रजा का धर्म अलग, अमीर का धर्म अलग, ग़रीब का धर्म अलग, राजा महाराजे जो चाहें खाएँ। जिसके साथ चाहें खाएँ जिसके साथ चाहें शादी ब्याह करें। उनके लिए कोई क़ैद नहीं। राजा हैं मगर हमारे और तुम्हारे लिए तो क़दम-क़दम पर बंदिशें हैं। इसका धर्म है प्राश्चित तो न हुआ। लेकिन भंगन से उसकी सलतनत छीन ली गई। बर्तन कपड़े अनाज इतनी कसरत से मिले कि वो अकेली न ले जा सकी और सोने के चूड़े भी मिले। और एक के बदले दो नई ख़ूबसूरत साड़ियाँ। मामूली नैन-सुख की नहीं। जैसी लड़कियों की बार मिली थीं।

उस साल चेचक का ज़ोर हुआ। गोडर पहले ही ज़द में आ गया। भंगन अकेली ही रह गई। मगर काम जूँ का तूँ चलता रहा। भंगन के लिए गोडर उतना ज़रूरी न था जितना गोडर के लिए भंगन। लोग मुंतज़िर थे कि भंगन अब गई। अब गई फ़ुलाँ भंगी से बातचीत हुई। फ़ुलाँ चौधरी आए लेकिन भंगन कहीं न गई। यहाँ तक कि पाँच साल गुज़र गए और मंगल दुबला, कमज़ोर और दाइम-उल-मर्ज़ रहने पर दौड़ने लगा। माँ का दूध नसीब ही न हुआ… दाइम-उल-मर्ज़ क्यों न होता।

एक दिन भंगन महेश नाथ के मकान का परनाला साफ़ कर रही थी। महीनों से ग़लाज़त जमा हो गई थी। आँगन में पानी भराने लगा था। परनाले में एक लँबा बाँस डाल कर ज़ोर से हिला रही थी। पूरा दाहिना हाथ परनाले के अंदर था कि यकायक उसने चिल्ला कर हाथ बाहर निकाल लिया और उसी वक़्त एक लंबा सा काला साँप परनाले से निकल कर भागा। लोगों ने दौड़ कर उसे तो मार डाला। लेकिन भंगन को न बचा सके। ख़याल था कि पानी का साँप है। ज़्यादा ज़हरीला न होगा। इसलिए पहले कुछ ग़फ़लत की गई। जब ज़हर जिस्म में पैवस्त हुआ और लहरें आने लगीं। तब पता चला कि पानी का साँप नहीं काला साँप था।

मंगल अब यतीम था। दिन-भर महेश बाबू के दरवाज़े पर मंडलाया करता घर में इतना जूठा बचता था कि ऐसे-ऐसे दस-पाँच बच्चे सेर हो सकते थे। मंगल को कोई तक्लीफ़ न थी हाँ दूर ही से उसे मिट्टी के एक सकोरे में खाना डाल दिया जाता और गाँव के लड़के उससे दूर-दूर रहते थे। ये बात उसे अच्छी न लगती थी सब लोग अच्छे अच्छे बर्तनों में खाते हैं उसके लिए मिट्टी के सकोरे। यूँ उसे इस तफ़रीक़ का मुतलक़ एहसास न होता लेकिन लड़के उसे चिढ़ा-चिढ़ा कर इस ज़िल्लत के एहसास को सान पर चढ़ाते रहते थे।

मकान के सामने एक नीम का दरख़्त था। उसी के नीचे मंगल का डेरा था। एक फटा-फटा सा टाट का टुकड़ा, दो सकोरे और धोती जो महेश बाबू के ख़ुश-नसीब फ़र्ज़न्द सुरेश के उतारे कपड़ों में से एक थी जाड़ा गर्मी बरसात हर मौसम के लिए वो एक सी आरामदेह थी। यही उसकी ख़ुसूसियत थी और सख़्त-जान मंगल झुलसती हुई लू और कड़ाके के जाड़े और मूसला धार बारिश में ज़िंदा था और तंदुरुस्त था।

बस उसका कोई रफ़ीक़ था तो गाँव का एक कुत्ता जो अपने हम-चश्मों की बदमिज़ाजियों और तंग ज़र्फ़ियों से तंग आकर मंगल के ज़ेर-ए-साया आ पड़ा था। खाना दोनों का एक था कुछ तबीय्यत भी यकसाँ थी और ग़ालिबन दोनों एक दूसरे के मिज़ाज से वाक़िफ़ हो गए थे, मंगल ने उसका नाम रखा था टॉमी मगर टॉमी महेश नाथ के अंग्रेज़ी कुत्ते का नाम था। इसलिए उसका इस्तेमाल वो उसी वक़्त करता जब दोनों रात को सोने लगते।

ज़रा और खिसक कर सोओ, आख़िर मैं कहाँ लेटूँ, सारा टाट तो तुमने घेर लिया। टॉमी कूँ-कूँ करता और दुम हिलाता। बजाय उसके कि खिसक जाये और ऊपर चढ़ आता और मंगल का मुँह चाटने लगता।

शाम को वो एक-बार रोज़ अपना घर देखने और थोड़ी देर रोने जाता पहले साल फूस का छप्पर गिरा। दूसरे साल एक दीवार गिरी और अब सिर्फ आधी दीवारें खड़ी थीं। जिसका ऊपर का हिस्सा नोकदार हो गया था। यहीं उसे मुहब्बत की दौलत मिली थी वही मज़ा वही याद। वही कशिश उसे एक-बार हर-रोज़ उस वीराने में खींच ले जाती और टॉमी हमेशा उसके साथ होता था। वो खन्डर की मख़रूती दीवार पर बैठ जाता और ज़िंदगी के आने वाले और गुज़िश्ता ख़्वाब देखने लगता और टॉमी दीवार पर कूद जाने की बार-बार नाकाम कोशिश करता।

एक दिन कई लड़के खेल रहे थे। मंगल भी पहुँच कर दूर खड़ा हो गया सुरेश को उस पर रहम आया या खेलने वालों की जोड़ी पूरी न पड़ती थी। कुछ ही हो उसने तजवीज़ की कि आज मंगल को भी खेल में शरीक कर लिया जाये। यहाँ कौन देखने आता है।
सुरेश ने मंगल से पूछा। “क्यों रे खेलेगा?”
मंगल बोला “खिलाओगे तो क्यों न खेलूँगा?”
सुरेश ने कहा “अच्छा तो हम तीनों सवार बनते हैं और तुम टट्टू बन जाओ हम लोग तुम्हारे ऊपर सवार हो कर घोड़ा दौड़ायेंगे।”
मंगल ने पूछा। “मैं बराबर घोड़ा ही रहूँगा कि सवारी भी करूँगा।”
ये मसला टेढ़ा था, सुरेश ने एक लम्हा ग़ौर कर के कहा “तुझे कौन अपनी पीठ पर बिठाएगा सोच आख़िर तू भंगी है कि नहीं।”
मंगल ने किसी क़दर दिलेर हो कर कहा “मैं कब कहता हूँ कि मैं भंगी नहीं हूँ लेकिन जब तक मुझे भी सवारी करने को न मिलेगी मैं घोड़ा न बनूँगा। तुम लोग सवार बनो और मैं घोड़ा ही बना रहूँगा।”

सुरेश ने तहक्कुमाना लहजे में कहा। “तुझे घोड़ा बनना पड़ेगा उसने मंगल को पकड़ना चाहा मंगल भागा सुरेश भी दौड़ा, मंगल ने क़दम और तेज़ किया। सुरेश ने भी ज़ोर लगाया मगर बिसयार ख़ोरी ने उसे थुलथुल बना दिया था। और दौड़ने से उसका साँस फूलने लगता था। आख़िर सुरेश ने रुक कर कहा “आकर घोड़ा बनो वर्ना कभी पाऊंगा तो बुरी तरह पीटूँगा।”

“तुम्हें भी घोड़ा बनना पड़ेगा।”
“अच्छा हम भी बन जाएँगे।”
तुम बाद में भाग जाओगे इसलिए पहले तुम बन जाओ। मैं सवारी कर लूँ फिर मैं बनूँगा।”
सुरेश ने चकमा दिया। मंगल ने उसके मतलब को बरहम कर दिया। साथियों से बोला। देखो इसकी बदमाशी, भंगी है। तीनों ने अब के मंगल को घेर लिया और ज़बरदस्ती घोड़ा बना दिया। सुरेश अपना वज़नी जिस्म लेकर उसकी पीठ पर बैठ गया और टुक-टुक कर के बोला। “चल घोड़े चल” मगर उसके बोझ के नीचे ग़रीब मंगल के लिए हिलना भी मुश्किल था दौड़ना तो दूर की बात थी। एक लम्हा तो वो ज़ब्त किए चौपाया बना खड़ा रहा लेकिन ऐसा मालूम होने लगा कि रीढ़ की हड्डी टूटी जाती है उसने आहिस्ता से पीठ सिकोड़ी और सुरेश की रान के नीचे से सरक गया सुरेश गदसे से गिर पड़े और भोंपू बजाने लगे। माँ ने सुना “सुरेश क्यों रो रहा है।” गाँव में कहीं सुरेश रोये उनके ज़की-उल-हिस कानों में ज़रूर आवाज़ आ जाती थी और उसका रोना था भी दूसरे लड़कों से बिलकुल निराला जैसे छोटी लाईन के इंजन की आवाज़।

एक मिनट में सुरेश आँखें मलता हुआ घर में आया। आपको जब कभी रोने का इत्तिफ़ाक़ होता था तो घर में फ़र्याद लेकर ज़रूर आते थे। माँ चुप कराने के लिए कुछ न कुछ दे देती थी। आप थे तो आठ साल के मगर बहुत बेवक़ूफ़ हद से ज़्यादा प्यारे। माँ ने पूछा। “क्यों रो रहा है सुरेश? किस ने मारा? सुरेश ने रोते हुए कहा मंगल ने छू दिया।” पहले तो माँ को यक़ीन न आया। लेकिन जब सुरेश क़समें खाने लगा तो यक़ीन लाना लाज़िम हो गया। उसने मंगल को बुलवाया और डाँट कर बोली, “क्यों रे मंगलू अब तुझे बदमाशी सूझने लगी मैंने तुझसे कहा था कि सुरेश को छूना नहीं। याद है कि नहीं। बोल”, मंगल ने दबी आवाज़ से कहा, “याद है”

“तो फिर तूने उसे क्यों छुआ? तूने नहीं छुआ तो ये रोता क्यूँ था।?”
“ये गिर पड़े इसलिए रोने लगे।”
चोरी और सीना ज़ोरी देवी दाँत पीस कर रह गईं। मारें तो उसी वक़्त अश्नान करना पड़ता क़मची तो हाथ में लेना ही पड़ती और छूत की बर्क़ी रौ क़मची के रास्ते उनके जिस्म में सरायत कर जाती इसलिए जहाँ तक गालियाँ दे सकीं दीं और हुक्म दिया कि इसी वक़्त यहाँ से निकल जा। फिर जो तेरी सूरत नज़र आई तो ख़ून ही पी जाऊँगी। मुफ़्त की रोटियाँ खा-खा कर शरारत सूझती है।

मंगल में ग़ैरत तो क्या होगी ख़ौफ़ था। चुपके से अपने सकोरे उठाए टाट का टुकड़ा बग़ल में दबाया धोती कंधे पर रखी और रोता हुआ वहाँ से चल पड़ा। अब वो यहाँ कभी नहीं आएगा। यही तो होगा कि भूकों मर जाऊँगा क्या हर्ज है इस तरह जीने से फ़ायदा ही क्या। गाँव में और कहाँ जाता। भंगी को कौन पनाह देता वही अपने बे दर-ओ-दीवार की आड़ थी। जहाँ पिछले दिनों की यादें उसके आँसू पोंछ सकती थीं। वहीं जा कर पड़ रहा। और ख़ूब फूट-फूट कर रोया। अभी आधा घंटा भी न गुज़रा होगा कि टॉमी भी उसे ढूँढता हुआ आ पहुँचा।

लेकिन जूँ-जूँ शाम होती गई उसका एहसास-ए-ज़िल्लत भी ग़ायब होता गया। बचपन की बे-ताब करने वाली भूक जिस्म का ख़ून पी-पी कर और भी बेपनाह होती जाती थी। आँखें बार-बार सकोरों की तरफ़ उठ जातीं। उसने मश्वरता टॉमी से कहा “खाओगे क्या? मैं तो भूका ही लेट रहूँगा।” टॉमी ने कूँ-कूँ करके शायद कहा इस तरह की ज़िल्लतें तो सारी ज़िंदगी सहनी हैं फिर ज़रा देर में दुम हिला होता हुआ उसके पास जा पहुँचा हमारी ज़िंदगी इसलिए है भाई।

मंगल बोला। “तुम जाओ जो कुछ मिल जाये खा लो। मेरी परवाह न करो।” टॉमी ने फिर अपनी सगसतानी बोली में कहा अकेला नहीं जाता तुम्हें साथ ले चलूँगा। एक लम्हा बाद फिर भूक ने तालीफ़ का एक नया पहलू इख़्तियार किया मालकिन तलाश कर रही होगी। क्यों टॉमी और क्या बाबूजी और सुरेश खा चुके होंगे कहार ने उनकी थाली का जूठा निकाल लिया होगा और हमें पुकार रहा होगा।… बाबू जी और सुरेश दोनों की थालियों में घी और मीठी मीठी चीज़ हाँ मलाई हमारी। आवाज़ ना सुनाई देगी। तो सब का सब घूरे पर डाल देंगे। ज़रा देख लें कि हमें पूछने आता है। यहाँ कौन पूछने आएगा। कोई ब्रहमन हो।

“अच्छा चलो तो वहीं चलें मगर छिपे हुए रहेंगे अगर किसी ने न पुकारा तो मैं लौट आउँगा। ये समझ लो।”
दोनों वहाँ से निकले और आकर महेश नाथ के दरवाज़े पर एक कोने में दुबक कर खड़े हो गए। टॉमी शायद इधर-उधर ख़बर लाने चला गया, महेश बाबू थाली पर बैठ गए थे नौकर आपस में बातचीत कर रहे थे। एक ने कहा। आज मंगलू नहीं दिखाई देता। भूका होगा बेचारा। मालकिन ने डाँटा था। इसी लिए भागा था शायद। मंगल के जी में आया चल कर इस आदमी के क़दमों पर गिर पड़े। दूसरे ने जवाब दिया। अच्छा हुआ निकाला गया। नहीं तो सबेरे-सबेरे भंगी का मुँह देखना पड़ता था। मंगल और अंधेरे में खिसक गया। अब क्या उम्मीद की जा सकती थी।

महेश और सुरेश थाली से उठ गए नौकर हाथ मुँह धुला रहा है। अब बाबूजी हुक़्क़ा पियेंगे। सुरेश सोएगा। ग़रीब मंगल की किसे फ़िक्र है इतनी देर हो गई किसी ने नहीं पुकारा कौन पुकारेगा। मंगल आध घंटे तक वहाँ दुबका रहा। किसी ने उसका नाम न लिया। उसने एक लंबी साँस ली और जानना चाहता था कि उसने उसी कहार को एक थाल में जूठा खाना ले जाते देखा। शायद घूरे पर डालने जा रहा था। मंगल अंधेरे से निकल कर रौशनी में आ गया। अब सब्र न हो सकता था।
कहार ने कहा, “अरे तू यहाँ था… हमने कहा कहीं चला गया। ले खाले मैं फेंकने ले जा रहा था।”
मंगल ने कहा, “मैं तो बड़ी देर से यहाँ खड़ा था।”
कहार ने कहा, “तो बोला क्यों नहीं।”
मंगल बोला, “डर लगता था।”

मंगल ने कहार के हाथ से थाल ले लिया और उसे ऐसी नज़र से देखा जिसमें शुक्र और एहसानमंदी की एक दुनिया छिपी हुई थी। फिर वो दोनों नीम के दरख़्त के नीचे हस्ब-ए-मामूल खाने लगे। मंगल ने एक हाथ से टॉमी का सर सहला कर कहा। “देखा पेट की आग ऐसी होती है लात की मारी हुई रोटियाँ भी न मिलतीं तो क्या करते?”
टॉमी ने दुम हिलाई। “सुरेश को अम्माँ ही ने पाला है टॉमी।”
टॉमी ने फिर दुम हिला दी। लोग कहते हैं दूध का दाम कोई नहीं चुका सकता। टॉमी ने दुम हिला दी। और मुझे दूध का ये दाम मिल रहा है। टॉमी ने फिर दुम हिला दी।

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Kafan - Munshi Premchand

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कफन कहानी का प्रकाशन वर्ष
मुंशी प्रेमचंद ने कफ़न कहानी को पहले उर्दू में लिखा था और ये उर्दू पत्रिका जामियां के दिसम्बर, 1935 के अंक में छपी थी। इसका हिंदी संस्करण चांद पत्रिका के अप्रैल 1936 के अंक में प्रकाशित हुआ था।

मुंशी प्रेमचंद की कहानी कफन, Kaphan Hindi Kahani
झोंपड़े के दरवाज़े पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने ख़ामोश बैठे हुए थे और अन्दर बेटे की नौजवान बीवी बुधिया दर्द-ए-ज़ह से पछाड़ें खा रही थी और रह-रह कर उसके मुँह से ऐसी दिल-ख़राश सदा निकलती थी कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, फ़ज़ा सन्नाटे में ग़र्क़, सारा गाँव तारीकी में जज़्ब हो गया था। घीसू ने कहा, “मालूम होता है बचेगी नहीं। सारा दिन तड़पते हो गया, जा देख तो आ।” माधव दर्दनाक लहजे में बोला, “मरना ही है तो जल्दी मर क्यूँ नहीं जाती। देख कर क्या आऊँ।” “तू बड़ा बे-दर्द है बे! साल भर जिसके सा जिंदगानी का सुख भोगा उसी के साथ इतनी बेवफाई।”  “तो मुझ से तो उसका तड़पना और हाथ पाँव पटकना नहीं देखा जाता।”

चमारों का कुम्बा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम, माधव इतना काम चोर था कि घंटे भर काम करता तो घंटे भर चिलम पीता। इसलिए उसे कोई रखता ही न था। घर में मुट्ठी भर अनाज भी मौजूद हो तो उनके लिए काम करने की क़सम थी। जब दो एक फ़ाक़े हो जाते तो घीसू दरख़्तों पर चढ़ कर लकड़ी तोड़ लाता और माधव बाज़ार से बेच लाता और जब तक वो पैसे रहते, दोनों इधर-उधर मारे-मारे फिरते। जब फ़ाक़े की नौबत आ जाती तो फिर लकड़ियाँ तोड़ते या कोई मज़दूरी तलाश करते। गाँव में काम की कमी न थी। काश्तकारों का गाँव था। मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे मगर उन दोनों को लोग उसी वक़्त बुलाते जब दो आदमियों से एक का काम पा कर भी क़नाअत कर लेने के सिवा और कोई चारा न होता। काश दोनों साधू होते तो उन्हें क़नाअत और तवक्कुल के लिए ज़ब्त-ए-नफ़्स की मुतलक़ ज़रूरत न होती। ये उनकी ख़ल्क़ी सिफ़त थी।

अजीब ज़िंदगी थी उनकी। घर में मिट्टी के दो चार बर्तनों के सिवा कोई असासा नहीं। फटे चीथड़ों से अपनी उर्यानी को ढाँके हुए दुनिया की फ़िक़्रों से आज़ाद। क़र्ज़ से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भी खाते मगर कोई ग़म नहीं। मिस्कीन इतने कि वसूली की मुतलक़ उम्मीद न होने पर लोग उन्हें कुछ न कुछ क़र्ज़ दे देते थे। मटर या आलू की फ़सल में खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भून कर खाते या दिन में दस-पाँच ईख तोड़ लाते और रात को चूसते। घीसू ने इसी ज़ाहिदाना अंदाज़ में साठ साल की उम्र काट दी और माधव भी सआदतमंद बेटे की तरह बाप के नक़्श-ए-क़दम पर चल रहा था बल्कि उसका नाम और भी रौशन कर रहा था।

उस वक़्त भी दोनों अलाव के सामने बैठे हुए आलू भून रहे थे जो किसी के खेत से खोद लाए थे। घीसू की बीवी का तो मुद्दत हुई इंतिक़ाल हो गया था। माधव की शादी पिछले साल हुई थी। जब से ये औरत आई थी उसने इस ख़ानदान में तमद्दुन की बुनियाद डाली थी। पिसाई कर के घास छील कर वो सेर भर आटे का इंतिज़ाम कर लेती थी और इन दोनों बे-ग़ैरतों का दोज़ख़ भर्ती रहती थी। जब से वो आई ये दोनों और भी आराम तलब और आलसी हो गए थे बल्कि कुछ अकड़ने भी लगे थे। कोई काम करने को बुलाता तो बेनियाज़ी की शान में दोगुनी मज़दूरी माँगते। वही औरत आज सुब्ह से दर्द-ए-ज़ह में मर रही थी और ये दोनों शायद इसी इंतिज़ार में थे कि वो मर जाए तो आराम से सोएँ।

घीसू ने आलू निकाल कर छीलते हुए कहा, “जा देख तो क्या हालत है, उसकी चुड़ैल का फंसाव होगा और क्या। यहाँ तो ओझा भी एक रुपये मांगता है। किस के घर से आए।”
माधव को अंदेशा था कि वो कोठरी में गया तो घीसू आलुओं का बड़ा हिस्सा साफ़ कर देगा। बोला,
“मुझे वहाँ डर लगता है।”
“डर किस बात का है? मैं तो यहाँ हूँ ही।”
“तो तुम्हीं जा कर देखो न।”

“मेरी औरत जब मरी थी तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला भी नहीं और फिर मुझ से लजाएगी कि नहीं, कभी उसका मुँह नहीं देखा, आज उसका उधड़ा हुआ बदन देखूँ। उसे तन की सुद्ध भी तो न होगी। मुझे देख लेगी तो खुल कर हाथ पाँव भी न पटक सकेगी।” “मैं सोचता हूँ कि कोई बाल बच्चा हो गया तो क्या होगा। सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नहीं है घर में।” “सब कुछ आ जाएगा। भगवान बच्चा दें तो, जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे हैं, वही तब बुला कर देंगे। मेरे तो लड़के हुए, घर में कुछ भी न था, मगर इस तरह हर बार काम चल गया।” स समाज में रात दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी और किसानों के मुक़ाबले में वो लोग जो किसानों की कमज़ोरियों से फ़ायदा उठाना जानते थे कहीं ज़्यादा फ़ारिग़-उल-बाल थे, वहाँ इस क़िस्म की ज़हनियत का पैदा हो जाना कोई तअज्जुब की बात नहीं थी।

हम तो कहेंगे घीसू किसानों के मुक़ाबले में ज़्यादा बारीक-बीन था और किसानों की तही-दिमाग़ जमइयत में शामिल होने के बदले शातिरों की फ़ितना-परदाज़ जमात में शामिल हो गया था। हाँ उसमें ये सलाहियत न थी कि शातिरों के आइन-ओ-आदाब की पाबंदी भी करता। इसलिए ये जहाँ उसकी जमात के और लोग गाँव के सरग़ना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाँव अंगुश्त-नुमाई कर रहा था फिर भी उसे ये तस्कीन तो थी ही कि अगर वो ख़स्ताहाल है तो कम से कम उसे किसानों की सी जिगर तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती और उसकी सादगी और बे-ज़बानी से दूसरे बेजा फ़ायदा तो नहीं उठाते।

दोनों आलू निकाल-निकाल कर जलते-जलते खाने लगे। कल से कुछ भी नहीं खाया था। इतना सब्र न था कि उन्हें ठंडा हो जाने दें। कई बार दोनों की ज़बानें जल गईं। छिल जाने पर आलू का बैरूनी हिस्सा तो ज़्यादा गर्म न मालूम होता था लेकिन दाँतों के तले पड़ते ही अंदर का हिस्सा ज़बान और हल्क़ और तालू को जला देता था और इस अंगारे को मुँह में रखने से ज़्यादा ख़ैरियत इसी में थी कि वो अंदर पहुँच जाए। वहाँ उसे ठंडा करने के लिए काफ़ी सामान थे। इसलिए दोनों जल्द-जल्द निगल जाते थे हालाँकि इस कोशिश में उनकी आँखों से आँसू निकल आते।

घीसू को उस वक़्त ठाकुर की बरात याद आई जिसमें बीस साल पहले वो गया था। उस दावत में उसे जो सेरी नसीब हुई थी, वो उसकी ज़िंदगी में एक यादगार वाक़िया थी और आज भी उसकी याद ताज़ा थी। वो बोला, “वो भोज नहीं भूलता। तब से फिर इस तरह का खाना और भर पेट नहीं मिला। लड़की वालों ने सब को पूड़ियाँ खिलाई थीं, सब को। छोटे बड़े सब ने पूड़ियाँ खाईं और असली घी की चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई अब क्या बताऊँ कि उस भोज में कितना स्वाद मिला।

कोई रोक नहीं थी जो चीज़ चाहो माँगो और जितना चाहो खाओ। लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया कि किसी से पानी न पिया गया, मगर परोसने वाले हैं कि सामने गर्म गोल गोल महकती हुई कचौरियाँ डाल देते हैं। मना करते हैं, नहीं चाहिए मगर वो हैं कि दिए जाते हैं और जब सब ने मुँह धो लिया तो एक-एक बीड़ा पान भी मिला मगर मुझे पान लेने की कहाँ सुद्ध थी। खड़ा न हुआ जाता था। झटपट जा कर अपने कम्बल पर लेट गया। ऐसा दरिया दिल था वो ठाकुर।”

माधव ने उन तकल्लुफ़ात का मज़ा लेते हुए कहा, “अब हमें कोई ऐसा भोज खिलाता।” “अब कोई क्या खिलाएगा? वो जमाना दूसरा था। अब तो सब को किफायत सूझती है। सादी ब्याह में मत खर्च करो, क्रिया कर्म में मत खर्च करो। पूछो गरीबों का माल बटोर-बटोर कर कहाँ रक्खोगे। मगर बटोरने में तो कमी नहीं है। हाँ खर्च में किफायत सूझती है।”

“तुमने एक बीस पूड़ियाँ खाई होंगी।”
“बीस से ज्यादा खाई थीं।”
“मैं पचास खा जाता।”
“पचास से कम मैंने भी न खाई होंगी, अच्छा पट्ठा था। तू उसका आधा भी नहीं है।” आलू खा कर दोनों ने पानी पिया और वहीं अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़ कर पाँव पेट में डाल कर सो रहे जैसे दो बड़े-बड़े अज़दहे कुंडलियाँ मारे पड़े हों और बुधिया अभी तक कराह रही थी।

सुब्ह को माधव ने कोठरी में जा कर देखा तो उसकी बीवी ठंडी हो गई थी। उसके मुँह पर मक्खियाँ भिनक रही थीं। पथराई हुई आँखें ऊपर टँगी हुई थीं। सारा जिस्म ख़ाक में लतपत हो रहा था। उसके पेट में बच्चा मर गया था। माधव भागा हुआ घीसू के पास आया और फिर दोनों ज़ोर-ज़ोर से हाय-हाय करने और छाती पीटने लगे। पड़ोस वालों ने ये आह-ओ-ज़ारी सुनी तो दौड़ते हुए आए और रस्म-ए-क़दीम के मुताबिक़ ग़मज़दों की तशफ़्फ़ी करने लगे। मगर ज़्यादा रोने-धोने का मौक़ा न था, कफ़न की और लकड़ी की फ़िक्र करनी थी। घर में तो पैसा इस तरह ग़ायब था जैसे चील के घोंसले में माँस।

बाप-बेटे रोते हुए गाँव के ज़मींदारों के पास गए। वो उन दोनों की सूरत से नफ़रत करते थे। कई बार उन्हें अपने हाथों पीट चुके थे। चोरी की इल्लत में, वादे पर काम न करने की इल्लत में। पूछा, “क्या है बे घिसुवा, रोता क्यूँ है, अब तो तेरी सूरत ही नज़र नहीं आती, अब मालूम होता है तुम इस गाँव में नहीं रहना चाहते।” घीसू ने ज़मीन पर सर रख कर आँखों में आँसू भरते हुए कहा, “सरकार बड़ी बिपता में हूँ। माधव की घर वाली रात गुजर गई। दिन भर तड़पती रही सरकार। आधी रात तक हम दोनों उसके सिरहाने बैठे रहे। दवा दारू जो कुछ हो सका सब किया मगर वो हमें दगा दे गई, अब कोई एक रोटी देने वाला नहीं रहा मालिक, तबाह हो गए। घर उजड़ गया, आप का गुलाम हूँ, अब आपके सिवा उसकी मिट्टी कौन पार लगाएगा, हमारे हाथ में जो कुछ था, वो सब दवा दारू में उठ गया, सरकार ही की दया होगी तो उसकी मिट्टी उठेगी, आप के सिवा और किस के द्वार पर जाऊँ।”

ज़मींदार साहब रहम-दिल आदमी थे मगर घीसू पर रहम करना काले कम्बल पर रंग चढ़ाना था। जी में तो आया कह दें, “चल दूर हो यहाँ से लाश घर में रख कर सड़ा। यूँ तो बुलाने से भी नहीं आता। आज जब ग़र्ज़ पड़ी तो आ कर ख़ुशामद कर रहा है हराम-ख़ोर कहीं का बदमाश।” मगर ये ग़ुस्से या इंतिक़ाम का मौक़ा नहीं था। तौअन-ओ-करहन दो रुपये निकाल कर फेंक दिए मगर तशफ्फ़ी का एक कलमा भी मुँह से न निकाला। उसकी तरफ़ ताका तक नहीं। गोया सर का बोझ उतारा हो। जब ज़मींदार साहब ने दो रुपये दिए तो गाँव के बनिए महाजनों को इनकार की जुर्रत क्यूँ कर होती। घीसू ज़मींदार के नाम का ढिंडोरा पीटना जानता था। किसी ने दो आने दिए किसी ने चार आने। एक घंटे में घीसू के पास पाँच रुपये की माक़ूल रक़म जमा हो गई। किसी ने ग़ल्ला दे दिया, किसी ने लकड़ी और दोपहर को घीसू और माधव बाज़ार से कफ़न लाने चले और लोग बाँस-वाँस काटने लगे।

गाँव की रक़ीक़-उल-क़ल्ब औरतें आ-आ कर लाश को देखती थीं और उसकी बे-बसी पर दो बूँद आँसू गिरा कर चली जाती थीं। बाज़ार में पहुँच कर घीसू बोला, “लकड़ी तो उसे जलाने भर की मिल गई है क्यूँ माधव।” माधव बोला, “हाँ लकड़ी तो बहुत है अब कफ़न चाहिए।”

“तो कोई हल्का सा कफ़न ले-लें।”
“हाँ और क्या! लाश उठते-उठते रात हो जाएगी रात को कफ़न कौन देखता है।”
“कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने को चीथड़ा न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए।”
“और क्या रखा रहता है। यही पाँच रुपये पहले मिलते तो कुछ दवा दारू करते।”
दोनों एक दूसरे के दिल का माजरा मअनवी तौर पर समझ रहे थे। बाज़ार में इधर-उधर घूमते रहे। यहाँ तक कि शाम हो गई। दोनों इत्तेफ़ाक़ से या अमदन एक शराब ख़ाने के सामने आ पहुँचे और गोया किसी तय-शुदा फ़ैसले के मुताबिक़ अंदर गए। वहाँ ज़रा देर तक दोनों तज़बज़ुब की हालत में खड़े रहे। फिर घीसू ने एक बोतल शराब ली। कुछ गजक ली और दोनों बरामदे में बैठ कर पीने लगे। कई कचनाँ पैहम पीने के बाद दोनों सुरूर में आ गए।

घीसू बोला, “कफ़न लगाने से क्या मिलता। आखिर जल ही तो जाता। कुछ बहू के साथ तो न जाता।”
माधव आसमान की तरफ़ देख कर बोला, गोया फ़रिश्तों को अपनी मासूमियत का यक़ीन दिला रहा हो। “दुनिया का दस्तूर है। यही लोग बामनों को हजारों रुपये क्यूँ देते हैं। कौन देखता है। परलोक में मिलता है या नहीं।”
“बड़े आदमियों के पास धन है फूंकें, हमारे पास फूँकने को क्या है।”
“लेकिन लोगों को क्या जवाब दोगे? लोग पूछेंगे कि कफ़न कहाँ है?”
घीसू हंसा, “कह देंगे कि रुपये कमर से खिसक गए बहुत ढ़ूँडा, मिले नहीं।”
माधव भी हंसा, इस ग़ैर मुतवक़्क़े ख़ुशनसीबी पर क़ुदरत को इस तरह शिकस्त देने पर बोला, “बड़ी अच्छी थी बेचारी मरी भी तो ख़ूब खिला-पिला कर।”
आधी बोतल से ज़्यादा ख़त्म हो गई। घीसू ने दो सेर पूरियाँ मंगवाईं, गोश्त और सालन और चटपटी कलेजियाँ और तली हुई मछलियाँ।
शराब ख़ाने के सामने दुकान थी, माधव लपक कर दो पत्तलों में सारी चीज़ें ले आया। पूरे डेढ़ रुपये ख़र्च हो गए, सिर्फ़ थोड़े से पैसे बच रहे।”

दोनों उस वक़्त इस शान से बैठे हुए पूरियाँ खा रहे थे जैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ा रहा हो। न जवाब-देही का ख़ौफ़ था न बदनामी की फ़िक्र। ज़ोफ़ के इन मराहिल को उन्होंने बहुत पहले तय कर लिया था। घीसू फ़लसफ़ियाना अंदाज़ से बोला, ”हमारी आत्मा परसन हो रही है तो क्या उसे पुन्य न होगा।” माधव ने सर-ए-अक़ीदत झुका कर तसदीक़ की, “जरूर से जरूर होगा। भगवान तुम अंतर यामी (अलीम) हो। उसे बैकुंठ ले जाना। हम दोनों हृदय से उसे दुआ दे रहे हैं। आज जो भोजन मिला वो कभी उम्र भर न मिला था।” एक लम्हे के बाद माधव के दिल में एक तशवीश पैदा हुई। बोला, “क्यूँ दादा हम लोग भी तो वहाँ एक न एक दिन जाएँगे ही” घीसू ने इस तिफ़लाना सवाल का कोई जवाब न दिया। माधव की तरफ़ पुर-मलामत अंदाज़ से देखा।

“जो वहाँ हम लोगों से पूछेगी कि तुमने हमें कफ़न क्यूँ न दिया, तो क्या कहेंगे?”
“कहेंगे तुम्हारा सर।”
“पूछेगी तो जरूर।”
“तू कैसे जानता है उसे कफ़न न मिलेगा? मुझे अब गधा समझता है। मैं साठ साल दुनिया में क्या घास खोदता रहा हूँ। उसको कफ़न मिलेगा और इससे बहुत अच्छा मिलेगा, जो हम देंगे।”
माधव को यक़ीन न आया। बोला, “कौन देगा? रुपये तो तुमने चट कर दिए।”
घीसू तेज़ हो गया, “मैं कहता हूँ उसे कफ़न मिलेगा तो मानता क्यूँ नहीं?”
“कौन देगा, बताते क्यूँ नहीं?”
“वही लोग देंगे जिन्होंने अब के दिया। हाँ वो रुपये हमारे हाथ न आएँगे और अगर किसी तरह आ जाएं तो फिर हम इस तरह बैठे पिएँगे और कफ़न तीसरी बार लेगा।”

जूँ-जूँ अंधेरा बढ़ता था और सितारों की चमक तेज़ होती थी, मय-ख़ाने की रौनक़ भी बढ़ती जाती थी। कोई गाता था, कोई बहकता था, कोई अपने रफ़ीक़ के गले लिपटा जाता था, कोई अपने दोस्त के मुँह से साग़र लगाए देता था। वहाँ की फ़िज़ा में सुरूर था, हवा में नशा। कितने तो चुल्लू में ही उल्लू हो जाते हैं। यहाँ आते थे तो सिर्फ़ ख़ुद-फ़रामोशी का मज़ा लेने के लिए। शराब से ज़्यादा यहाँ की हवा से मसरूर होते थे। ज़ीस्त की बला यहाँ खींच लाती थी और कुछ देर के लिए वो भूल जाते थे कि वो ज़िंदा हैं या मुर्दा हैं या ज़िंदा दर-गोर हैं।

और ये दोनों बाप-बेटे अब भी मज़े ले ले के चुसकियाँ ले रहे थे। सब की निगाहें उनकी तरफ़ जमी हुई थीं। कितने ख़ुश-नसीब हैं दोनों, पूरी बोतल बीच में है। खाने से फ़ारिग़ हो कर माधव ने बची हुई पूरियों का पत्तल उठा कर एक भिकारी को दे दिया, जो खड़ा उनकी तरफ़ गुरसना निगाहों से देख रहा था और “पीने” के ग़ुरूर और मसर्रत और वलवले का, अपनी ज़िंदगी में पहली बार एहसास किया। घीसू ने कहा, “ले जा खूब खा और असीरबाद दे, जिसकी कमाई थी वो तो मर गई मगर तेरा असीरबाद उसे जरूर पहुँच जाएगा, रोएँ रोएँ से असीरबाद दे बड़ी गाढ़ी कमाई के पैसे हैं।”

माधव ने फिर आसमान की तरफ़ देख कर कहा, “वो बैकुंठ में जाएगी। दादा बैकुंठ की रानी बनेगी।” घीसू खड़ा हो गया और जैसे मसर्रत की लहरों में तैरता हुआ बोला, “हाँ बेटा बैकुंठ में न जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएँगे, जो गरीबों को दोनों हाथ से लूटते हैं और अपने पाप के धोने के लिए गंगा में जाते हैं और मंदिरों में जल चढ़ाते हैं।” ये ख़ुश-एतिक़ादी का रंग भी बदला नीम की ख़ासियत से यास और ग़म का दौरा हुआ। माधव बोला, “मगर दादा बेचारी ने जिंदगी में बड़ा दुख भोगा। मरी भी कितनी दुख झेल कर।” वो अपनी आँखों पर हाथ रख कर रोने लगा। घीसू ने समझाया, “क्यूँ रोता है बेटा! खुस हो कि वो माया जाल से मुक्त हो गई। जंजाल से छूट गई। बड़ी भागवान थी जो इतनी जल्द माया के मोह के बंधन तोड़ दिए।” और दोनों वहीं खड़े हो कर गाने लगे; ठगनी क्यूँ नैनाँ झुमका दे ठगनी सारा मय-ख़ाना मह्व-ए-तमाशा था और ये दोनों मैकश मख़मूर मह्वियत के आलम में गाए जाते थे। फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी, गिरे भी, मटके भी, भाव भी बताए और आख़िर नशे से बदमस्त हो कर वहीं गिर पड़े।

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हज-ए-अक्बर हिंदी कहानी,  Munshi Premchand Ki Kahani Haj-E-Akbar
मुंशी साबिर हुसैन की आमदनी कम थी और ख़र्च ज़्यादा। अपने बच्चे के लिए दाया रखना गवारा नहीं कर सकते थे। लेकिन एक तो बच्चे की सेहत की फ़िक्र और दूसरे अपने बराबर वालों से हेटे बन कर रहने की ज़िल्लत इस ख़र्च को बर्दाश्त करने पर मजबूर करती थी। बच्चा दाया को बहुत चाहता था। हर दम उसके गले का हार बना रहता। इस वजह से दाया और भी ज़रूरी मालूम होती थी। मगर शायद सबसे बड़ा सबब ये था कि वो मुरव्वत के बाइस दाया को जवाब देने की जुर्अत न कर सकते थे। बुढ़िया उनके यहाँ तीन साल से नौकर थी। उसने उनके इकलौते बच्चे की परवरिश की थी। अपना काम दिल-ओ-जान से करती थी। उसे निकालने का कोई हीला न था और ख़्वाह मख़्वाह खच्चड़ निकालना साबिर जैसे हलीम शख़्स के लिए ग़ैर मुम्किन था। मगर शाकिरा इस मुआ’मले में अपने शौहर से मुत्तफ़िक़ न थी उसे शक था कि दाया हमको लूटे लेती है। जब दाया बाज़ार से लौटती तो वह दहलीज़ में छुपी रहती कि देखूँ आटा छुपा कर तो नहीं रख देती। लकड़ी तो नहीं छुपा देती। उसकी लाई हुई चीज़ को घंटों देखती, पछताती, बार-बार पूछती इतना ही क्यूँ? क्या भाव है? क्या इतना महंगा हो गया? दाया कभी तो उन बद-गुमानियों का जवाब मुलाइमत से देती। लेकिन जब बेगम ज़्यादा तेज़ हो जातीं, तो वह भी कड़ी पड़ जाती थी। क़समें खाती। सफ़ाई की शहादतें पेश करती। तर्दीद और हुज्जत में घंटों लग जाते। क़रीब क़रीब रोज़ाना यही कैफ़ियत रहती थी और रोज़ ये ड्रामा दाया की ख़फ़ीफ़ सी अश्क रेज़ी के बाद ख़त्म हो जाता था। दाया का इतनी सख़्तियाँ झेल कर पड़े रहना शाकिरा के शुकूक की आब रेज़ी करता था। उसे कभी यक़ीन न आता था कि ये बुढ़िया महज़ बच्चे की मोहब्बत से पड़ी हुई है। वो दाया को ऐसे लतीफ़ जज़्बे का अह्ल नहीं समझती थी।

2
इत्तिफ़ाक़ से एक रोज़ दाया को बाज़ार से लौटने में ज़रा देर हो गई। वहाँ दो कुंजड़िनों में बड़े जोश-ओ-ख़रोश से मुनाज़िरा था। उनका मुसव्विर तर्ज़-ए-अदा। उनका इश्तिआ’ल अंगेज़ इस्तिदलाल। उनकी मुतशक्किल तज़हीक। उनकी रौशन शहादतें और मुनव्वर रिवायतें उनकी तअ’रीज़ और तर्दीद सब बेमिसाल थीं। ज़हर के दो दरिया थे। या दो शो’ले जो दोनों तरफ़ से उमड कर बाहम गुथ गए थे। क्या रवानी थी। गोया कूज़े में दरिया भरा हुआ। उनका जोश-ए-इज़हार एक दूसरे के बयानात को सुनने की इजाज़त न देता था। उनके अलफ़ाज़ की ऐसी रंगीनी तख़य्युल की ऐसी नौइयत। उस्लूब की ऐसी जिद्दत। मज़ामीन की ऐसी आमद। तशबीहात की ऐसी मौज़ूनियत। और फ़िक्र की ऐसी परवाज़ पर ऐसा कौन सा शायर है जो रश्क न करता। सिफ़त ये थी कि इस मुबाहिसे में तल्ख़ी या दिल आज़ारी का शाइबा भी न था। दोनों बुलबुलें अपने अपने तरानों में मह्व थीं। उनकी मतानत, उनका ज़ब्त, उनका इत्मिनान-ए-क़ल्ब हैरत-अंगेज़ था उनके ज़र्फ़-ए-दिल में इससे कहीं ज़्यादा कहने की और ब-दरजहा ज़्यादा सुनने की गुंजाइश मालूम होती थी। अल-ग़रज़ ये ख़ालिस दिमाग़ी, ज़ेह्नी मुनाज़िरा था। अपने अपने कमालात के इज़हार के लिए, एक ख़ालिस ज़ोर आज़माई थी अपने अपने करतब और फ़न के जौहर दिखाने के लिए।

तमाशाइयों का हुजूम था। वो मुब्ताज़िल किनायात-ओ-इशारे जिन पर बेशर्मी को शर्म आती। वो कलिमात रकीक जिनसे अ’फ़ूनत भी दूर भागती। हज़ारों रंगीन मिज़ाजों के लिए महज़ बाइस-ए-तफ़रीह थे। दाया भी खड़ी हो गई कि देखूँ क्या माजरा है। पर तमाशा इतना दिल आवेज़ था कि उसे वक़्त का मुतलक़ एहसास न हुआ। यका य़क नौ बजने की आवाज़ कान में आई तो सहर टूटा। वो लपकी हुई घर की तरफ़ चली। शाकिरा भरी बैठी थी। दाया को देखते ही तेवर बदल कर बोली, क्या बाज़ार में खो गई थीं? दाया ने ख़ता-वाराना अंदाज़ से सर झुका लिया। और बोली, “बीवी एक जान पहनचान की मामा से मुलाक़ात हो गई। और बातें करने लगी।”

शाकिरा जवाब से और भी बरहम हुई। यहाँ दफ़्तर जाने को देर हो रही है तुम्हें सैर सपाटे की सूझी है। मगर दाया ने इस वक़्त दबने में ख़ैरियत समझी। बच्चे को गोद में लेने चली पर शाकिरा ने झिड़क कर कहा, “रहने दो। तुम्हारे बग़ैर बेहाल नहीं हुआ जाता।” दाया ने इस हुक्म की तामील ज़रूरी न समझी। बेगम साहिबा का ग़ुस्सा फ़िरौ करने की इससे ज़्यादा कारगर कोई तदबीर ज़ेह्न में न आई। उसने नसीर को इशारे से अपनी तरफ़ बुलाया। वो दोनों हाथ फैलाए लड़खड़ाता हुआ उसकी तरफ़ चला। दाया ने उसे गोद में उठा लिया। और दरवाज़े की तरफ़ चली। लेकिन शाकिरा बाज़ की तरह झपटी और नसीर को उस की गोद से छीन कर बोली, “तुम्हारा ये मकर बहुत दिनों से देख रही हूँ। ये तमाशे किसी और को दिखाइए। यहाँ तबीअ’त सैर हो गई।”

दाया नसीर पर जान देती और समझती थी कि शाकिरा उससे बे-ख़बर नहीं है उसकी समझ में शाकिरा और उसके दरमियान ये ऐसा मज़बूत तअ’ल्लुक़ था जिसे मा’मूली तुर्शियाँ कमज़ोर न कर सकती थीं। इसी वजह से बावजूद शाकिरा की सख़्त ज़बानियों के उसे यक़ीन न आता था कि वो वाक़ई मुझे निकालने पर आमादा है। पर शाकिरा ने ये बातें कुछ इस बेरुख़ी से कीं और बिलख़ुसूस नसीर को इस बेदर्दी से छीन लिया कि दाया से ज़ब्त न हो सका। बोली, “बीवी मुझसे कोई ऐसी बड़ी ख़ता तो नहीं हुई। बहुत होगा तो पाव घंटे की देर हुई होगी। इस पर आप इतना झल्ला रही हैं। साफ़-साफ़ क्यूँ नहीं कह देतीं कि दूसरा दरवाज़ा देखो। अल्लाह ने पैदा किया है तो रिज़्क़ भी देगा। मज़दूरी का काल थोड़ा ही है।”

शाकिरा: “तो यहाँ तुम्हारी कौन परवा करता है। तुम्हारी जैसी मामाएँ गली गली ठोकरें खाती फिरती हैं।”
दाया: “हाँ ख़ुदा आपको सलामत रखे। मामाएं दाइयाँ बहुत मिलेंगी। जो कुछ ख़ता हुई हो। माफ़ कीजिएगा। मैं जाती हूँ।”
शाकिरा: “जा कर मरदाने में अपनी तनख़्वाह का हिसाब करलो।”
दाया: “मेरी तरफ़ से नसीर मियाँ को उसकी मिठाइयाँ मंगवा दीजिएगा।”
इतने में साबिर हुसैन भी बाहर से आ गए, “पूछा क्या है?”
दाया: “कुछ नहीं। बीवी ने जवाब दे दिया है। घर जाती हूँ।”

साबिर हुसैन ख़ानगी तरद्दुदात से यूँ बचते थे। जैसे कोई बरहना-पा कांटों से बचे। उन्हें सारे दिन एक ही जगह खड़े रहना मंज़ूर था। पर कांटों में पैर रखने की जुर्रत न थी। चीं ब जबीं हो कर बोले, “बात क्या हुई?”
शाकिरा: “कुछ नहीं। अपनी तबीअ’त। नहीं जी चाहता नहीं रखते। किसी के हाथों बिक तो नहीं गए।”
साबिर: “तुम्हें बैठे बिठाए एक न एक न एक खिचड़ी सूझती रहती है।”
शाकिरा: “हाँ, मुझे तो इस बात का जुनून है। क्या करूँ ख़सलत ही ऐसी है, तुम्हें ये बहुत प्यारी है तो ले जा कर गले बाँधो! मेरे यहाँ ज़रूरत नहीं है।”
दाया घर से निकली। तो उस की आँखें लबरेज़ थीं। दिल नसीर के लिए तड़प रहा था कि एक बार बच्चे को गोद में लेकर प्यार करलूँ। पर ये हसरत लिए उसे घर से निकलना पड़ा।

3
नसीर दाया के पीछे पीछे दरवाज़े तक आया। लेकिन जब दाया ने दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया तो मचल कर ज़मीन पर लेट गया। और अन्ना अन्ना कह कर रोने लगा। शाकिरा ने चुमकारा। प्यार किया, गोद में लेने की कोशिश की। मिठाई का लालच दिया। मेला दिखाने का वअ’दा किया। उससे काम न चला तो बंदर और सिपाही और लोलो और हवा की धमकी दी। पर नसीर पर मुतलक़ असर न हुआ। यहाँ तक की शाकिरा को गुस्सा आगया। उसने बच्चे को वहीँ छोड़ दिया और घर आ कर घर के धंदों में मस्रूफ़ हो गई नसीर का मुँह और गाल लाल हो गए। आँखें सूज गईं। आख़िर वो वहीं ज़मीन पर सिसकते सिसकते सो गया।

शाकिरा ने समझा था थोड़ी देर में बच्चा रो-धो कर चुप हो जाएगा। पर नसीर ने जागते ही फिर अन्ना की रट लगाई। तीन बजे साबिर हुसैन दफ़्तर से आए और बच्चे की ये हालत देखी तो बीवी की तरफ़ क़हर की निगाहों से देखकर उसे गोद में उठा लिया और बहलाने लगे। आख़िर नसीर को जब यक़ीन हो गया कि दाया मिठाई लेने गई है तो उसे तस्कीन हुई। मगर शाम होते ही उसने फिर चीख़ना शुरू किया। “अन्ना मिठाई लाई?”

इस तरह दो तीन दिन गुज़र गए। नसीर को अन्ना की रट लगाने और रोने के सिवा और कोई काम न था। वो बे-ज़रर कुत्ता जो एक लम्हे के लिए उसकी गोद से जुदा न होता था। वो बेज़बान बिल्ली जिसे ताक़ पर बैठे देखकर वो ख़ुशी से फूले न समाता था। वो ताइर-ए-बे-परवाज़ जिस पर वो जान देता था। सब उस की नज़रों से गिर गए। वो उनकी तरफ़ आँख उठा कर भी न देखता। अन्ना जैसी जीती जागती प्यार करने वाली, गोद में लेकर घुमाने वाली, थपक-थपक कर सुलाने वाली, गा-गा कर ख़ुश करने वाली चीज़ की जगह उन बे-जान, बे-ज़ुबान चीज़ों से पुर न हो सकती थी। वो अक्सर सोते-सोते चौंक पड़ता। और अन्ना अन्ना पुकार कर रोने लगता। कभी दरवाज़े पर जाता और अन्ना अन्ना पुकार कर हाथों से इशारा करता। गोया उसे बुला रहा है। अन्ना की ख़ाली कोठरी में जा कर घंटो बैठा रहता। उसे उम्मीद होती थी कि अन्ना यहाँ आती होगी। उस कोठरी का दरवाज़ा बंद पाता तो जा कर किवाड़ खटखटाता कि शायद अन्ना अंदर छुपी बैठी हो। सदर दरवाज़ा खुलते सुनता तो अन्ना अन्ना कह कर दौड़ता। समझता कि अन्ना आ गई। उसका गदराया हुआ बदन घुल गया। गुलाब के से रुख़्सार सूख गए।

माँ और बाप दोनों उसकी मोहिनी हंसी के लिए तरस तरस कर रह जाते। अगर बहुत गुदगुदाने और छेड़ने से हँसता भी तो ऐसा मालूम होता दिल से नहीं महज़ दिल रखने के लिए हंस रहा है। उसे अब दूध से रग़्बत थी न मिस्री से। न मेवे से न मीठे बिस्कुट से। न ताज़ी इमर्तियों से, उनमें मज़ा था जब अन्ना अपने हाथों से खिलाती थी। अब उनमें मज़ा न था। दो साल का होनहार लहलहाता हुआ शादाब पौदा मुरझा कर रह गया। वो लड़का जिसे गोद में उठाते ही नर्मी गर्मी और ज़बान का एहसास होता था। अब इस्तिख़्वाँ एक पुतला रह गया था। शाकिरा बच्चे की ये हालत देख देखकर अंदर ही अंदर कुढ़ती और अपनी हिमाक़त पर पछताती। साबिर हुसैन जो फ़ित्रतन ख़लवत पसंद आदमी थे अब नसीर को गोद से जुदा न करते थे। उसे रोज़ हवा खिलाने जाते। नित-नए खिलौने लाते। पर मुरझाया हुआ पौदा किसी तरह न पनपता था। दाया उसकी दुनिया का आफ़ताब थी। उस क़ुदरती हरारत और रौशनी से महरूम हो कर सब्ज़ी की बहार क्यूँ कर दिखाता? दाया के बग़ैर चारों तरफ़ अंधेरा सन्नाटा नज़र आता, दूसरी अन्ना तीसरे ही दिन रख ली थी। पर नसीर उसकी सूरत देखते ही मुँह छुपा लेता था। गोया वो कोई देवनी या भूतनी है।

आ’लम-ए-वुजूद में दाया को न देखकर नसीर अब ज़्यादा-तर आ’लम-ए-ख़याल में रहता। वहाँ उसकी अपनी अन्ना चलती फिरती नज़र आती थी। उसकी वही गोद थी। वही मोहब्बत। वही प्यारी बातें। वही प्यारे प्यारे गीत। वही मज़ेदार मिठाइयाँ। वही सुहाना संसार, वही दिलकश लैल-ओ-नहार। अकेले बैठे अन्ना से बातें करता। अन्ना कुत्ता भौंके, अन्ना गाय दूध देती। अन्ना उजला उजला घोड़ा दौड़ता। सवेरा होते ही लोटा लेकर दाया की कोठड़ी में जाता, और कहता, “अन्ना पानी पी” दूध का गिलास लेकर उसकी कोठड़ी में रख आता और कहता, “अन्ना दूध पिला।” अपनी चारपाई पर तकिया रखकर चादर से ढांक देता और कहता, “अन्ना सोती।” शाकिरा खाने बैठती तो रिकाबियाँ उठा उठा अन्ना की कोठड़ी में ले जाता और कहता, “अन्ना खाना खाएगी।” अन्ना उसके लिए अब एक आसमानी वुजूद थी जिसकी वापसी की उसे मुतलक़ उम्मीद न थी। वो महज़ गुज़श्ता ख़ुशियों की दिलकश यादगार थी। जिसकी याद ही उसका सब कुछ थी। नसीर के अंदाज़ में रफ़्ता रफ़्ता तिफ़्लाना शोख़ी और बे-ताबी की जगह एक हसरतनाक तवक्कल, एक मायूसाना ख़ुशी नज़र आने लगी। इस तरह तीन हफ़्ते गुज़र गए। बरसात का मौसम था। कभी शिद्दत की गर्मी, कभी हवा के ठंडे झोंके। बुख़ार और ज़ुकाम का ज़ोर था। नसीर की नहाफ़त इन मौसमी तग़य्युरात को बर्दाश्त न कर सकी। शाकिरा, एहतियातन उसे फ़लालैन का कुर्ता पहनाए रखती। उसे पानी के क़रीब न जाने देती, नंगे पाँव एक क़दम न चलने देती। मगर रुतूबत का असर हो ही गया। नसीर खांसी में मुब्तिला हो गया।

4
सुब्ह का वक़्त था। नसीर चारपाई पर आँखें बंद किए पड़ा होता। डाक्टरों का इलाज बेसूद रहा था। शाकिरा चारपाई पर बैठी उसके सीने पर तेल की मालीश कर रही थी। और साबिर हुसैन सूरत-ए-ग़म बने हुए बच्चे को पुरदर्द निगाहों से देख रहे थे। इस तरफ़ वो शाकिरा से बहुत कम बोलते थे। उन्हें उससे एक नफ़रत सी होती थी। वो नसीर की इस बीमारी का सारा इल्ज़ाम उसी के सर रखते थे। वो उनकी निगाहों में निहायत कमज़र्फ़ सुफ़्ला मिज़ाज बेहिस औरत थी।

शाकिरा ने डरते-डरते कहा, “आज बड़े हकीम साहब को बुला लेते। शायद उन्हीं की दवा से फ़ायदा हो।”
साबिर हुसैन ने काली घटाओं की तरफ़ देखकर तुर्शी से जवाब दिया, “बड़े हकीम नहीं। लुक़्मान भी आएँ तो इसे कोई फ़ायदा न हो।”
शकिरा: “तो क्या अब किसी की दवा ही न होगी?”
साबिर: “बस उसकी एक ही दवा है और वो नायाब है।”
शाकिरा: “तुम्हें तो वही धुन सवार है। क्या अब्बासी अमृत पिला देगी?”
साबिर: “हाँ वो तुम्हारे लिए तो चाहे ज़हर हो लेकिन बच्चे के लिए अमृत ही होगी।”
शाकिरा: “मैं नहीं समझती कि अल्लाह की मर्ज़ी में उसे इतना दख़ल है।”
साबिर: “अगर नहीं समझती हो और अब तक नहीं समझा तो रोओगी। बच्चे से हाथ धोना पड़ेगा।”
शाकिरा: “चुप भी रहो। कैसा शगुन ज़बान से निकालते हो। अगर ऐसी जली-कटी सुनानी हैं तो यहाँ से चले जाओ।”
साबिर: “हाँ तो मैं जाता हूँ। मगर याद रक्खो ये ख़ून तुम्हारी गर्दन पर होगा। अगर लड़के को फिर तंदुरुस्त देखना चाहती हो तो उसी अब्बासी के पास जाओ। उसकी मिन्नत करो। इल्तिजा करो। तुम्हारे बच्चे की जान उसी के रहम पर मुनहसिर है।”
शाकिरा ने कुछ जवाब न दिया। उसकी आँखों से आँसू जारी थे।
साबिर हुसैन ने पूछा, “क्या मर्ज़ी है। जाऊँ उसे तलाश करूँ?”
शाकिरा: “तुम क्यूँ जाओगे। मैं ख़ुद चली जाऊँगी।”
साबिर: “नहीं, माफ़ करो। मुझे तुम्हारे ऊपर ए’तिबार नहीं है। न जाने तुम्हारे मुँह से क्या निकल जाए कि वो आती भी हो तो न आए।”

शाकिरा ने शौहर की तरफ़ निगाह-ए-मलामत से देखकर कहा, “हाँ और क्या। मुझे अपने बच्चे की बीमारी का क़लक़ थोड़े ही है। मैं ने शर्म के मारे तुमसे कहा नहीं लेकिन मेरे दिल में बार-बार ये ख़याल पैदा हुआ है अगर मुझे दाया के मकान का पता मा’लूम होता तो मैं उसे कब की मना लाई होती। वो मुझ से कितनी ही नाराज़ हो लेकिन नसीर से उसे मोहब्बत थी। मैं आज ही उसके पास जाऊँगी। उसके क़दमों को आँसुओं से तर कर दूँगी और वो जिस तरह राज़ी होगी उसे राज़ी करूँगी।”
शाकिरा ने बहुत ज़ब्त कर के ये बातें कहीं। मगर उमड़े हुए आँसू अब न रुक सके। साबिर हुसैन ने बीवी की तरफ़ हमदर्दाना निगाह से देखा और नादिम हो कर बोले, “मैं तुम्हारा जाना मुनासिब नहीं समझता। मैं ख़ुद ही जाता हूँ।”

5
अब्बासी दुनिया में अकेली थी। किसी ज़माने में उसका ख़ानदान गुलाब का सर सब्ज़-शादाब दरख़्त था। मगर रफ़्ता-रफ़्ता ख़िज़ाँ ने सब पत्तियाँ गिरा दीं। बाद-ए-हवादिस ने दरख़्त को पामाल कर दिया। और अब यही सूखी टहनी हरे भरे दरख़्त की यादगार बाक़ी थी।

मगर नसीर को पा कर उसकी सूखी टहनी में जान सी पड़ गई थी। उस में हरी पत्तियाँ निकल आई थीं। वो ज़िंदगी जो अब तक ख़ुश्क और पामाल थी उसमें फिर रंग-ओ-बू के आसार पैदा हो गए थे। अंधेरे बयाबान में भटके हुए मुसाफ़िर को शम्मा की झलक नज़र आने लगी थी। अब उसका जू-ए-हयात संग रेज़ों से न टकराता था, वो अब एक गुलज़ार की आबयारी करता था। अब उसकी ज़िंदगी मोहमल नहीं थी। उसमें मअ’नी पैदा हो गए थे।

अब्बासी नसीर की भोली बातों पर निसार हो गई। मगर वो अपनी मोहब्बत को शाकिरा से छुपाती थी। इसलिए कि माँ के दिल में रश्क न हो। वो नसीर के लिए माँ से छुपकर मिठाइयाँ लाती और उसे खिला कर ख़ुश होती। वो दिन में दो-दो तीन-तीन बार उसे उबटन मलती कि बच्चा ख़ूब परवान चढ़े। वो उसे दूसरों के सामने कोई चीज़ न खिलाती कि बच्चे को नज़र न लग जाए। हमेशा दूसरों से बच्चे की कमख़ोरी का रोना रोया करती। उसे नज़र बद से बचाने के लिए ता’वीज़ और गंडे लाती रहती ये उसकी ख़ालिस मादराना मोहब्बत थी। जिसमें अपने रुहानी एहतिज़ाज़ के सिवा और कोई ग़रज़ न थी।

उस घर से निकल कर आज अब्बासी की वो हालत हो गई जो थिएटर में यका य़क बिजलियों के गुल हो जाने से होती है। उसकी आँखों के सामने वही सूरत नाच रही थी। कानों में वही प्यारी प्यारी बातें गूंज रही थीं। उसे अपना घर फाड़े खाता था। उस काल कोठड़ी में दम घुटा जाता था।

रात जूँ तूँ कर के कटी। सुब्ह को वो मकान में झाड़ू दे रही थी। यका यक ताज़े हलवे की सदा सुनकर बे-इख़्तियार बाहर निकल आई। मअ’न याद आ गया। आज हलवा कौन खाएगा? आज गोद में बैठकर कौन चहकेगा? वो नग़्मा-ए-मसर्रत सुनने के लिए जो हलवा खाते वक़्त नसीर की आँखों से, होंटों से और जिस्म के एक एक अ’ज़ू से बरसता था। अब्बासी की रूह तड़प उठी। वो बेक़रारी के आ’लम में घर से निकली कि चलूँ नसीर को देख आऊँ। पर आधे रास्ता से लौट गई।

नसीर अब्बासी के ध्यान से एक लम्हा के लिए भी नहीं उतरता था। वो सोते सोते चौंक पड़ती। मा’लूम होता, नसीर डंडे का घोड़ा दबाए चला आता है। पड़ोसनों के पास जाती तो नसीर ही का चर्चा करती। उसके घर कोई आता तो नसीर ही का ज़िक्र करती। नसीर उसके दिल और जान में बसा हुआ था। शाकिरा की बेरुख़ी और बदसुलूकी के मलाल के लिए उसमें जगह न थी।

वो रोज़ इरादा करती कि आज नसीर को देखने जाऊँगी। उसके लिए बाज़ार से खिलौने और मिठाइयाँ लाती। घर से चलती लेकिन कभी आधे रास्ते से लौट आती। कभी दो चार क़दम से आगे न बढ़ा जाता। कौन मुँह लेकर जाऊँ? जो मोहब्बत को फ़रेब समझता हो। उसे कौन मुँह दिखाऊँ। कभी सोचती कहीं नसीर मुझे न पहचाने तो बच्चों की मोहब्बत का एतिबार? नई दाया से परिच गया हो। ये ख़याल उसके पैरों पर ज़ंजीर का काम कर जाता था।

इस तरह दो हफ़्ते गुज़र गए। अब्बासी का दिल हर दम उचाट रहता। जैसे उसे कोई लंबा सफ़र दरपेश हो। घर की चीज़ें जहाँ की तहाँ पड़ी रहतीं। न खाने की फ़िक्र न कपड़े की। बदनी ज़रूरियात भी ख़ला दिल को पुर करने में लगी हुई थीं। अब्बासी की हालत उस वक़्त पालतू चिड़िया की सी थी जो क़फ़स से निकल कर फिर किसी गोशे की तलाश में हो। उसे अपने तईं भुला देने का ये एक बहाना मिल गया। आमादा सफ़र हो गई।

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आसमान पर काली घटाएँ छाई हुई थीं और हल्की हल्की फुवारें पड़ रही थीं। दिल्ली स्टेशन पर ज़ाइरीन का हुजूम था। कुछ गाड़ियों में बैठे थे। कुछ अपने घर वालों से रुख़्सत हो रहे थे। चारों तरफ़ एक कोहराम सा मचा हुआ था। दुनिया उस वक़्त भी जाने वालों के दामन पकड़े हुए थी। कोई बीवी से ताकीद कर रहा था। धान कट जाए तो तालाब वाले खेत में मटर बो देना और बाग़ के पास गेहूँ। कोई अपने जवान लड़के को समझा रहा था। असामियों पर बक़ाया लगान की नालिश करने में देर न करना और दो रुपये सैकड़ा सूद ज़रूर मुजरा कर लेना। एक बूढ़े ताजिर साहब अपने मुनीम से कह रहे थे। माल आने में देर हो तो ख़ुद चले जाइएगा। और चलतू माल लीजिएगा वर्ना रुपया फंस जाएगा। मगर ख़ाल ख़ाल ऐसी सूरतें भी नज़र आती थीं जिन पर मज़हबी इरादात का जलवा था। वो या तो ख़ामोशी से आसमान की तरफ़ ताकती थीं या मह्व-ए-तस्बीह-ख़्वानी थीं। अब्बासी भी एक गाड़ी में बैठी सोच रही थी। इन भले आदमियों को अब भी दुनिया की फ़िक्र नहीं छोड़ती। वही ख़रीद-ओ-फ़रोख़्त लेन-देन के चर्चे नसीर इस वक़्त यहाँ होता तो बहुत रोता। मेरी गोद से किसी तरह न उतरता। लौट कर ज़रूर उसे देखने जाऊँगी। या अल्लाह किसी तरह गाड़ी चले। गर्मी के मारे कलेजा भुना जाता है। इतनी घटा उमड़ी हुई है। बरसने का नाम ही नहीं लेती। मा’लूम नहीं ये रेल वाले क्यूँ देर कर रहे हैं? झूट मूट इधर-उधर दौड़ते फिरते हैं ये नहीं कि चट पट गाड़ी खोल दें। मुसाफ़िरों की जान में जान आए। यका य़क उसने साबिर हुसैन को बाइसकिल लिए प्लेटफार्म पर आते देखा। उनका चेहरा उतरा हुआ था और कपड़े तर थे। वो गाड़ियों में झाँकने लगे। अब्बासी महज़ ये दिखाने के लिए कि मैं भी हज करने जा रही हूँ। गाड़ी से बाहर निकल आई। साबिर हुसैन उसे देखते ही लपक कर क़रीब आए और बोले, “क्यूँ अब्बासी तुम भी हज को चलीं?”

अब्बासी ने फ़ख़्रिया इन्किसार से कहा, “हाँ! यहाँ क्या करूँ? ज़िंदगी का कोई ठिकाना नहीं। मा’लूम नहीं कब आँखें बंद हो जाएं। ख़ुदा के यहाँ मुँह दिखाने के लिए भी तो कोई सामान चाहिए। नसीर मियाँ तो अच्छी तरह हैं?”
साबिर: “अब तो तुम जा रही हो। नसीर का हाल पूछ कर क्या करोगी। उसके लिए दुआ करती रहना।”
अब्बासी का सीना उखड़कने लगा। घबरा कर बोली, “क्या दुश्मनों की तबीअ’त अच्छी नहीं है?”
साबिर: “उस की तबीअ’त तो उसी दिन से ख़राब है जिस दिन तुम वहाँ से निकलीं। कोई दो हफ़्ता तक तो शब-ओ-रोज़ अन्ना अन्ना की रट लगाता रहा। और अब एक हफ़्ता से खांसी और बुख़ार में मुब्तिला है। सारी दवाएं कर के हार गया। कोई नफ़ा ही नहीं होता। मैं ने इरादा किया था। चल कर तुम्हारी मिन्नत समाजत कर के ले चलूं क्या जाने तुम्हें देखकर उसकी तबीअ’त कुछ सँभल जाए। लेकिन तुम्हारे घर पर आया। तो मा’लूम हुआ। कि तुम हज करने जा रही हो। अब किस मुँह से चलने को कहूँ। तुम्हारे साथ सुलूक ही कौन सा अच्छा किया था? कि इतनी जुर्रत कर सकूँ और फिर कार-ए-सवाब में रख़्ना डालने का भी ख़याल है। जाओ! उस का ख़ुदा हाफ़िज़ है। हयात बाक़ी है तो सेहत हो ही जाएगी। वर्ना मशीअत एज़दी से क्या चारा?”

अब्बासी की आँखों में अंधेरा छा गया। सामने चीज़ें तैरती हुई मालूम हुईं। दिल पर एक अ’जीब वहशत का ग़िलबा हुआ। दिल से दुआ’ निकली। “अल्लाह मेरी जान के सदक़े। मेरे नसीर का बाल बीका न हो।” रिक़्क़त से गला भर आया। मैं कैसी संग-दिल हूँ। प्यारा बच्चा रो रो कर हलकान हो गया और उसे देखने तक न गई। शाकिरा बदमिज़ाज सही, बदज़बान सही, नसीर ने मेरा क्या बिगाड़ा था? मैंने माँ का बदला नसीर से लिया। या ख़ुदा मेरा गुनाह बख़शियो! प्यारा नसीर मेरे लिए हुड़क रहा है (इस ख़्याल से अब्बासी का कलेजा मसोस उठा और आँखों से आँसू बह निकले) मुझे क्या मालूम था कि उसे मुझसे इतनी मोहब्बत है। वर्ना शाकिरा की जूतियाँ खातीं और घर से क़दम न निकालती। आह! न मालूम बेचारे की क्या हालत है? अंदाज़-ए-वहशत में बोली, “दूध तो पीते हैं ना?”

साबिर: “तुम दूध पीने को कहती हो। उसने दो दिन से आँख तो खोलीं नहीं।”
अब्बासी: “या मेरे अल्लाह! अरे ओ क़ुली क़ुली! बेटा!! आके मेरा अस्बाब गाड़ी से उतार दे। अब मुझे हज-वज की नहीं सूझती। हाँ बेटा! जल्दी कर। मियाँ देखिए कोई यक्का हो तो ठीक कर लीजिए!”
यक्का रवाना हुआ। सामने सड़क पर कई बग्घियाँ खड़ी थीं। घोड़ा आहिस्ता-आहिस्ता चल रहा था। अब्बासी बार-बार झुंजलाती थी और यक्काबान से कहती थी, “बेटा जल्दी कर! मैं तुझे कुछ ज़्यादा दे दूँगी।” रास्ते में मुसाफ़िरों की भीड़ देखकर उसे ग़ुस्सा आता था उसका जी चाहता था घोड़े के पर लग जाते। लेकिन जब साबिर हुसैन का मकान क़रीब आ गया। तो अब्बासी का सीना ज़ोर से उछलने लगा।
बार-बार दिल से दुआ निकलने लगी। ख़ुदा करे। सब ख़ैर-ओ-आ’फ़ियत हो।
यक्का साबिर हुसैन की गली में दाख़िल हुआ। दफ़अन अब्बासी के रोने की आवाज़ आई। उस का कलेजा मुँह को आ गया। सर तेवरा गया। मा’लूम हुआ। दरिया में डूबी जाती हों, जी चाहा यक्का से कूद पड़ूँ। मगर ज़रा देर में मा’लूम हुआ कि औरत मैके से बिदा हो रही है। तस्कीन हुई।

आख़िर साबिर हुसैन का मकान आ पहुँचा। अब्बासी ने डरते डरे दरवाज़े की तरफ़ ताका। जैसे कोई घर से भागा हुआ यतीम लड़का शाम को भूका प्यासा घर आए। और दरवाज़े की तरफ़ सहमी हुई निगाह से देखे कि कोई बैठा तो नहीं है। दरवाज़े पर सन्नाटा छाया हुआ था। बावर्ची बैठा हुक़्क़ा पी रहा था। अब्बासी को ज़रा ढारस हुई घर में दाख़िल हुई तो देखा कि नई दाया बैठी पोलटीस पका रही है। कलेजा मज़बूत हुआ। शाकिरा के कमरे में गई तो उसका दिल गर्मा की दोपहरी धूप की तरह काँप रहा था। शाकिरा नसीर को गोद में लिए दरवाज़े की तरफ़ टकटकी लगाए ताक रही थी। ग़म और यास की ज़िंदा तस्वीर।

अब्बासी ने शाकिरा से कुछ नहीं पूछा। नसीर को उसकी गोद से ले लिया और उसके मुँह की तरफ़ चशम-ए-पुरनम से देखकर कहा, “बेटा! नसीर आँखें खोलो।”
नसीर ने आँखें खोलीं। एक लम्हा तक दाया को ख़ामोश देखता रहा। तब यका य़क दाया के गले से लिपट गया और बोला, “अन्ना आई, अन्ना आई।”
नसीर का ज़र्द मुरझाया हुआ चेहरा रौशन हो गया। जैसे बुझते हुए चराग़ में तेल जाए। ऐसा मालूम हुआ गोया वो कुछ बढ़ गया है।
एक हफ़्ता गुज़र गया। सुब्ह का वक़्त था। नसीर आँगन में खेल रहा था। साबिर हुसैन ने आ कर उसे गोद में उठा लिया और प्यार कर के बोले, “तुम्हारी अन्ना को मार कर भगा दें?”
नसीर ने मुँह बना कर कहा, “नहीं रोएगी।”
अब्बासी बोली, “क्यूँ बेटा! मुझे तो तू ने का’बा शरीफ़ न जाने दिया। मेरे हज का सवाब कौन देगा?”
साबिर हुसैन ने मुस्कुरा कर कहा, “तुम्हें इससे कहीं ज़्यादा सवाब हो गया। इस हज का नाम हज्ज-ए-अकबर है।”

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पूस की रात हिंदी कहानी, मुंशी प्रेमचंद की कहानी पूस की रात
हल्कू ने आकर स्त्री से कहा, ‘सहना आया है, लाओ, जो रुपए रखे हैं, उसे दे दूं, किसी तरह गला तो छूटे.’
मुन्नी झाड़ू लगा रही थी. पीछे फिरकर बोली, ‘तीन ही तो रुपए हैं, दे दोगे तो कम्मल कहां से आवेगा? माघ-पूस की रात हार में कैसे कटेगी? उससे कह दो, फसल पर दे देंगे. अभी नहीं.’ हल्कू एक क्षण अनिश्चित दशा में खड़ा रहा. पूस सिर पर आ गया, कम्मल के बिना हार में रात को वह किसी तरह नहीं जा सकता. मगर सहना मानेगा नहीं, घुड़कियां जमावेगा, गालियां देगा. बला से जाड़ों में मरेंगे, बला तो सिर से टल जाएगी. यह सोचता हुआ वह अपना भारी- भरकम डील लिए हुए (जो उसके नाम को झूठ सिद्ध करता था) स्त्री के समीप आ गया और ख़ुशामद करके बोला, ‘ला दे दे, गला तो छूटे. कम्मल के लिए कोई दूसरा उपाय सोचूंगा.’

मुन्नी उसके पास से दूर हट गई और आंखें तरेरती हुई बोली, ‘कर चुके दूसरा उपाय! जरा सुनूं तो कौन-सा उपाय करोगे? कोई खैरात दे देगा कम्मल? न जाने कितनी बाकी है, जो किसी तरह चुकने ही नहीं आती. मैं कहती हूं, तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते? मर-मर काम करो, उपज हो तो बाकी दे दो, चलो छुट्टी हुई. बाकी चुकाने के लिए ही तो हमारा जनम हुआ है. पेट के लिए मजूरी करो. ऐसी खेती से बाज आए. मैं रुपए न दूंगी, न दूंगी.’ हल्कू उदास होकर बोला, ‘तो क्या गाली खाऊं?’ मुन्नी ने तड़पकर कहा, ‘गाली क्यों देगा, क्या उसका राज है?’ मगर यह कहने के साथ ही उसकी तनी हुई भौहें ढीली पड़ गईं. हल्कू के उस वाक्य में जो कठोर सत्य था, वह मानो एक भीषण जंतु की भांति उसे घूर रहा था.

उसने जाकर आले पर से रुपए निकाले और लाकर हल्कू के हाथ पर रख दिए. फिर बोली, ‘तुम छोड़ दो अबकी से खेती. मजूरी में सुख से एक रोटी तो खाने को मिलेगी. किसी की धौंस तो न रहेगी. अच्छी खेती है! मजूरी करके लाओ, वह भी उसी में झोंक दो, उस पर धौंस.’ हल्कू ने रुपए लिए और इस तरह बाहर चला मानो अपना हृदय निकालकर देने जा रहा हो. उसने मजूरी से एक-एक पैसा काट-कपटकर तीन रुपए कम्मल के लिए जमा किए थे. वह आज निकले जा रहे थे. एक-एक पग के साथ उसका मस्तक अपनी दीनता के भार से दबा जा रहा था.

पूस की अंधेरी रात! आकाश पर तारे भी ठिठुरते हुए मालूम होते थे. हल्कू अपने खेत के किनारे ऊख के पतों की एक छतरी के नीचे बांस के खटोले पर अपनी पुरानी गाढ़े की चादर ओढ़े पड़ा कांप रहा था. खाट के नीचे उसका संगी कुत्ता जबरा पेट मे मुंह डाले सर्दी से कूं-कूं कर रहा था. दो में से एक को भी नींद न आती थी. हल्कू ने घुटनियों कों गरदन में चिपकाते हुए कहा, ‘क्यों जबरा, जाड़ा लगता है? कहता तो था, घर में पुआल पर लेट रह, तो यहां क्या लेने आए थे?

अब खाओ ठंड, मैं क्या करूं? जानते थे, मै यहां हलुवा-पूरी खाने आ रहा हूं, दौड़े-दौड़े आगे-आगे चले आए. अब रोओ नानी के नाम को. जबरा ने पड़े-पड़े दुम हिलाई और अपनी कूं-कूं को दीर्घ बनाता हुआ एक बार जम्हाई लेकर चुप हो गया. उसकी श्वान-बुध्दि ने शायद ताड़ लिया, स्वामी को मेरी कूं-कूं से नींद नहीं आ रही है. हल्कू ने हाथ निकालकर जबरा की ठंडी पीठ सहलाते हुए कहा, ‘कल से मत आना मेरे साथ, नहीं तो ठंडे हो जाओगे. यह रांड पछुआ न जाने कहां से बरफ लिए आ रही है.

उठूं, फिर एक चिलम भरूं. किसी तरह रात तो कटे! आठ चिलम तो पी चुका. यह खेती का मजा है! और एक-एक भगवान ऐसे पड़े हैं, जिनके पास जाड़ा जाए तो गरमी से घबड़ाकर भागे. मोटे-मोटे गद्दे, लिहाफ- कम्मल. मजाल है, जाड़े का गुजर हो जाय. तकदीर की खूबी! मजूरी हम करें, मजा दूसरे लूटें!’ हल्कू उठा, गड्ढे में से ज़रा-सी आग निकालकर चिलम भरी. जबरा भी उठ बैठा. हल्कू ने चिलम पीते हुए कहा, ‘पिएगा चिलम, जाड़ा तो क्या जाता है, जरा मन बदल जाता है.’ जबरा ने उसके मुंह की ओर प्रेम से छलकती हुई आंखों से देखा. हल्कू, ‘आज और जाड़ा खा ले. कल से मैं यहां पुआल बिछा दूंगा. उसी में घुसकर बैठना, तब जाड़ा न लगेगा.’

जबरा ने अपने पंजे उसकी घुटनियों पर रख दिए और उसके मुंह के पास अपना मुंह ले गया. हल्कू को उसकी गर्म सांस लगी. चिलम पीकर हल्कू फिर लेटा और निश्चय करके लेटा कि चाहे कुछ हो अबकी सो जाऊंगा, पर एक ही क्षण में उसके हृदय में कम्पन होने लगा. कभी इस करवट लेटता, कभी उस करवट, पर जाड़ा किसी पिशाच की भांति उसकी छाती को दबाए हुए था. जब किसी तरह न रहा गया तो उसने जबरा को धीरे से उठाया और उसक सिर को थपथपाकर उसे अपनी गोद में सुला लिया. कुत्ते की देह से जाने कैसी दुर्गंध आ रही थी, पर वह उसे अपनी गोद मे चिपटाए हुए ऐसे सुख का अनुभव कर रहा था, जो इधर महीनों से उसे न मिला था. जबरा शायद यह समझ रहा था कि स्वर्ग यहीं है, और हल्कू की पवित्र आत्मा में तो उस कुत्ते के प्रति घृणा की गंध तक न थी.

अपने किसी अभिन्न मित्र या भाई को भी वह इतनी ही तत्परता से गले लगाता. वह अपनी दीनता से आहत न था, जिसने आज उसे इस दशा को पहुंचा दिया. नहीं, इस अनोखी मैत्री ने जैसे उसकी आत्मा के सब द्वार खोल दिए थे और उनका एक-एक अणु प्रकाश से चमक रहा था. सहसा जबरा ने किसी जानवर की आहट पाई. इस विशेष आत्मीयता ने उसमे एक नई स्फूर्ति पैदा कर दी थी, जो हवा के ठंडे झोकों को तुच्छ समझती थी. वह झपटकर उठा और छपरी से बाहर आकर भूंकने लगा. हल्कू ने उसे कई बार चुमकारकर बुलाया, पर वह उसके पास न आया. हार में चारों तरफ दौड़-दौड़कर भूंकता रहा. एक क्षण के लिए आ भी जाता, तो तुरंत ही फिर दौड़ता. कर्तव्य उसके हृदय में अरमान की भांति ही उछल रहा था.

एक घंटा और गुजर गया. रात ने शीत को हवा से धधकाना शुरू किया. हल्कू उठ बैठा और दोनों घुटनों को छाती से मिलाकर सिर को उसमें छिपा लिया, फिर भी ठंड कम न हुई. ऐसा जान पड़ता था, सारा रक्त जम गया है, धमनियों में रक्त की जगह हिम बह रहा है. उसने झुककर आकाश की ओर देखा, अभी कितनी रात बाक़ी है! सप्तर्षि अभी आकाश में आधे भी नहीं चढ़े. ऊपर आ जाएंगे तब कहीं सबेरा होगा. अभी पहर से ऊपर रात है.

हल्कू के खेत से कोई एक गोली के टप्पे पर आमों का एक बाग़ था. पतझड़ शुरू हो गई थी. बाग़ में पत्तियों को ढेर लगा हुआ था. हल्कू ने सोचा, ‘चलकर पत्तियां बटोरूं और उन्हें जलाकर ख़ूब तापूं. रात को कोई मुझे पत्तियां बटोरते देख तो समझे कोई भूत है. कौन जाने, कोई जानवर ही छिपा बैठा हो, मगर अब तो बैठे नहीं रहा जाता.’ उसने पास के अरहर के खेत में जाकर कई पौधे उखाड़ लिए और उनका एक झाड़ू बनाकर हाथ में सुलगता हुआ उपला लिए बगीचे की तरफ़ चला. जबरा ने उसे आते देखा तो पास आया और दुम हिलाने लगा.

हल्कू ने कहा, ‘अब तो नहीं रहा जाता जबरू. चलो बगीचे में पत्तियां बटोरकर तापें. टांठे हो जाएंगे, तो फिर आकर सोएंगें. अभी तो बहुत रात है.’ जबरा ने कूं-कूं करके सहमति प्रकट की और आगे-आगे बगीचे की ओर चला. बगीचे में ख़ूब अंधेरा छाया हुआ था और अंधकार में निर्दय पवन पत्तियों को कुचलता हुआ चला जाता था. वृक्षों से ओस की बूंदे टप-टप नीचे टपक रही थीं. एकाएक एक झोंका मेहंदी के फूलों की ख़ुशबू लिए हुए आया. हल्कू ने कहा, ‘कैसी अच्छी महक आई जबरू! तुम्हारी नाक में भी तो सुगंध आ रही है?’
जबरा को कहीं ज़मीन पर एक हड्डी पड़ी मिल गई थी. उसे चिंचोड़ रहा था.

हल्कू ने आग ज़मीन पर रख दी और पत्तियां बटोरने लगा. ज़रा देर में पत्तियों का ढेर लग गया. हाथ ठिठुरे जाते थे. नंगे पांव गले जाते थे. और वह पत्तियों का पहाड़ खड़ा कर रहा था. इसी अलाव में वह ठंड को जलाकर भस्म कर देगा. थोड़ी देर में अलाव जल उठा. उसकी लौ ऊपर वाले वृक्ष की पत्तियों को छू-छूकर भागने लगी. उस अस्थिर प्रकाश में बगीचे के विशाल वृक्ष ऐसे मालूम होते थे, मानो उस अथाह अंधकार को अपने सिरों पर संभाले हुए हों अंधकार के उस अनंत सागर मे यह प्रकाश एक नौका के समान हिलता, मचलता हुआ जान पड़ता था.

हल्कू अलाव के सामने बैठा आग ताप रहा था. एक क्षण में उसने दोहर उताकर बगल में दबा ली, दोनों पांव फैला दिए, मानो ठंड को ललकार रहा हो, तेरे जी में जो आए सो कर. ठंड की असीम शक्ति पर विजय पाकर वह विजय-गर्व को हृदय में छिपा न सकता था. उसने जबरा से कहा, ‘क्यों जब्बर, अब ठंड नहीं लग रही है?’ जब्बर ने कूं-कूं करके मानो कहा अब क्या ठंड लगती ही रहेगी? ‘पहले से यह उपाय न सूझा, नहीं इतनी ठंड क्यों खाते.’ जब्बर ने पूंछ हिलाई. ‘अच्छा आओ, इस अलाव को कूदकर पार करें. देखें, कौन निकल जाता है. अगर जल गए बच्चा, तो मैं दवा न करूंगा.’ जब्बर ने उस अग्निराशि की ओर कातर नेत्रों से देखा! मुन्नी से कल न कह देना, नहीं तो लड़ाई करेगी.

यह कहता हुआ वह उछला और उस अलाव के ऊपर से साफ़ निकल गया. पैरों में ज़रा लपट लगी, पर वह कोई बात न थी. जबरा आग के गिर्द घूमकर उसके पास आ खड़ा हुआ. हल्कू ने कहा, ‘चलो-चलो इसकी सही नहीं! ऊपर से कूदकर आओ.’ वह फिर कूदा और अलाव के इस पार आ गया.

पत्तियां जल चुकी थीं. बगीचे में फिर अंधेरा छा गया था. राख के नीचे कुछ-कुछ आग बाक़ी थी, जो हवा का झोंका आ जाने पर ज़रा जाग उठती थी, पर एक क्षण में फिर आंखें बंद कर लेती थी. हल्कू ने फिर चादर ओढ़ ली और गर्म राख के पास बैठा हुआ एक गीत गुनगुनाने लगा. उसके बदन में गर्मी आ गई थी, पर ज्यों-ज्यों शीत बढ़ती जाती थी, उसे आलस्य दबाए लेता था. जबरा जोर से भूंककर खेत की ओर भागा. हल्कू को ऐसा मालूम हुआ कि जानवरों का एक झुंड खेत में आया है. शायद नीलगायों का झुंड था. उनके कूदने-दौड़ने की आवाज़ें साफ़ कान में आ रही थीं. फिर ऐसा मालूम हुआ कि खेत में चर रही हैं. उनके चबाने की आवाज़ चर-चर सुनाई देने लगी.

उसने दिल में कहा, ‘नहीं, जबरा के होते कोई जानवर खेत में नहीं आ सकता. नोच ही डाले. मुझे भ्रम हो रहा है. कहां! अब तो कुछ नहीं सुनाई देता. मुझे भी कैसा धोखा हुआ!’ उसने ज़ोर से आवाज़ लगाई, ‘जबरा, जबरा.’ जबरा भूंकता रहा. उसके पास न आया. फिर खेत के चरे जाने की आहट मिली. अब वह अपने को धोखा न दे सका. उसे अपनी जगह से हिलना ज़हर लग रहा था. कैसा दंदाया हुआ था. इस जाड़े-पाले में खेत में जाना, जानवरों के पीछे दौड़ना असह्य जान पड़ा. वह अपनी जगह से न हिला. उसने ज़ोर से आवाज़ लगाई, ‘लिहो-लिहो! लिहो!’

जबरा फिर भूंक उठा. जानवर खेत चर रहे थे. फसल तैयार है. कैसी अच्छी खेती थी, पर ये दुष्ट जानवर उसका सर्वनाश किए डालते हैं. हल्कू पक्का इरादा करके उठा और दो-तीन क़दम चला, पर एकाएक हवा का ऐसा ठंडा, चुभने वाला, बिच्छू के डंक का-सा झोंका लगा कि वह फिर बुझते हुए अलाव के पास आ बैठा और राख को कुरेदकर अपनी ठंडी देह को गर्माने लगा. जबरा अपना गला फाड़ डालता था, नीलगायें खेत का सफाया किए डालती थीं और हल्कू गर्म राख के पास शांत बैठा हुआ था. अकर्मण्यता ने रस्सियों की भांति उसे चारों तरफ़ से जकड़ रखा था. उसी राख के पास गर्म ज़मीन पर वह चादर ओढ़ कर सो गया.
सबेरे जब उसकी नींद खुली, तब चारों तरफ़ धूप फैल गई थी और मुन्नी कह रही थी, ‘क्या आज सोते ही रहोगे? तुम यहां आकर रम गए और उधर सारा खेत चौपट हो गया.’

हल्कू ने उठकर कहा, ‘क्या तू खेत से होकर आ रही है?’ मुन्नी बोली, ‘हां, सारे खेत का सत्यानाश हो गया. भला, ऐसा भी कोई सोता है. तुम्हारे यहां मड़ैया डालने से क्या हुआ?’ हल्कू ने बहाना किया, ‘मैं मरते-मरते बचा, तुझे अपने खेत की पड़ी है. पेट में ऐसा दरद हुआ कि मैं ही जानता हूं!’ दोनों फिर खेत के डांड़ पर आए. देखा, सारा खेत रौंदा पड़ा हुआ है और जबरा मड़ैया के नीचे चित लेटा है, मानो प्राण ही न हों. दोनों खेत की दशा देख रहे थे. मुन्नी के मुख पर उदासी छाई थी, पर हल्कू प्रसन्न था. मुन्नी ने चिंतित होकर कहा, ‘अब मजूरी करके मालगुजारी भरनी पड़ेगी.’ हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा, ‘रात को ठंड में यहां सोना तो न पड़ेगा.’

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Story of Premchandra Narak ka Marg

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नरक का मार्ग हिंदी कहानी, Narak Ka Marg Hindi Kahani By Premchand
रात “भक्तमाल” पढ़ते-पढ़ते न जाने कब नींद आ गयी। कैसे-कैसे महात्मा थे जिनके लिए भगवत्-प्रेम ही सब कुछ था, इसी में मग्न रहते थे। ऐसी भक्ति बड़ी तपस्या से मिलती है। क्या मैं वह तपस्या नहीं कर सकती? इस जीवन में और कौन-सा सुख रखा है? आभूषणों से जिसे प्रेम हो जाने , यहां तो इनको देखकर आंखे फूटती है;धन-दौलत पर जो प्राण देता हो वह जाने, यहां तो इसका नाम सुनकर ज्वर-सा चढ़ आता हैं। कल पगली सुशीला ने कितनी उमंगों से मेरा श्रृंगार किया था, कितने प्रेम से बालों में फूल गूंथे। कितना मना करती रही, न मानी। आखिर वही हुआ जिसका मुझे भय था। जितनी देर उसके साथ हंसी थी, उससे कहीं ज्यादा रोयी। संसार में ऐसी भी कोई स्त्री है, जिसका पति उसका श्रृंगार देखकर सिर से पांव तक जल उठे?  कौन ऐसी स्त्री है जो अपने पति के मुंह से ये शब्द सुने—तुम मेरा परलोग बिगाड़ोगी, और कुछ नहीं, तुम्हारे रंग-ढंग कहे देते हैं—और मनुष्य उसका दिल विष खा लेने को चाहे। भगवान्! संसार में ऐसे भी मनुष्य हैं। आखिर मैं नीचे चली गयी और ‘भक्तिमाल’ पढ़ने लगी। अब वृंदावन बिहारी ही की सेवा करुंगी उन्हीं को अपना श्रृंगार दिखाऊंगी, वह तो देखकर न जलेगे। वह तो हमारे मन का हाल जानते हैं।

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भगवान! मैं अपने मन को कैसे समझाऊं!  तुम अंतर्यामी हो, तुम मेरे रोम-रोम का हाल जानते हो। मैं चाहती  हुं कि उन्हें अपना इष्ट समझूं, उनके चरणों की सेवा करुं, उनके इशारे पर चलूं, उन्हें मेरी किसी बात से, किसी व्यवहार से नाममात्र, भी दु:ख न हो। वह निर्दोष हैं, जो कुछ मेरे भाग्य में था वह हुआ, न उनका दोष है, न माता-पिता का, सारा दोष मेरे नसीबों ही का है। लेकिन यह सब जानते हुए भी जब उन्हें आते देखती हूं, तो मेरा  दिल बैठ जाता है, मुह पर मुरदनी सी-छा जाती है, सिर भारी हो जाता है, जी चाहता है इनकी सूरत न देखूं, बात तक करने को जी नही चाहता;कदाचित् शत्रु को भी देखकर किसी का मन इतना क्लांत नहीं होता होगा। उनके आने के समय दिल में धड़कन सी होने लगती है। दो-एक दिन के लिए कहीं चले जाते हैं तो दिल पर से बोझ उठ जाता है। हंसती भी हूं, बोलती भी हूं, जीवन में कुछ आनंद आने लगता है लेकिन उनके आने का समाचार पाते ही फिर चारों ओर अंधकार! चित्त की ऐसी दशा क्यों है, यह मैं नहीं कह सकती। मुझे तो ऐसा जान  पड़ता है कि पूर्वजन्म में हम दोनों में बैर था, उसी बैर का बदला लेने के लिए उन्होंने मुझेसे विवाह किया है, वही पुराने संस्कार हमारे मन में बने हुए हैं। नहीं तो वह मुझे देख-देख कर क्यों जलते और मैं उनकी सूरत से क्यों घृणा करती? विवाह करने का तो यह मतलब नहीं हुआ करता! मैं अपने घर कहीं इससे सुखी थी। कदाचित् मैं जीवन-पर्यन्त अपने घर आनंद से रह सकती थी। लेकिन इस लोक-प्रथा का बुरा हो, जो अभागिन कनयाओं को किसी-न-किसी पुरुष के गलें में बांध देना अनिवार्य समझती है। वह क्या जानता है कि कितनी युवतियां उसके नाम को रो रही है, कितने अभिलाषाओं से लहराते हुए, कोमल हृदय उसके पैरो तल रौंदे जा रहे है? युवति के लिए पति कैसी-कैसी मधुर कल्पनाओं का स्रोत्र होता है, पुरुष में जो उत्तम है, श्रेष्ठ है, दर्शनीय है, उसकी सजीव मूर्ति इस शब्द के ध्यान में आते ही उसकी नजरों के सामने आकर खड़ी हो जाती है।लेकिन मेरे लिए यह शब्द क्या है। हृदय में उठने वाला शूल, कलेजे में खटकनेवाला कांटा, आंखो में गड़ने वाली किरकिरी, अंत:करण को बेधने वाला व्यंग बाण! सुशीला को हमेशा हंसते देखती हूं। वह कभी अपनी दरिद्रता का गिला नहीं करती; गहने नहीं हैं, कपड़े नहीं हैं, भाड़े के नन्हेंसे मकान में रहती है, अपने हाथों  घर का सारा काम-काज करती है , फिर भी उसे रोतेनहीे देखती अगर अपने बस की बात होती तो आज अपने धन को उसकी दरिद्रता से बदल लेती। अपने पतिदेव को मुस्कराते हुए घर में आते देखकर उसका सारा दु:ख दारिद्रय छूमंतर हो जाता है, छाती गज-भर की हो जाती है। उसके प्रेमालिंगन में वह सुख है, जिस पर तीनों लोक का धन न्योछावर कर दूं।

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आज मुझसे जब्त न हो सका। मैंने पूछा—तुमने मुझसे किसलिए विवाह किया था? यह प्रश्न महीनों से मेरे मन में उठता था,  पर मन को रोकती चली आती थी। आज प्याला छलक पड़ा। यह प्रश्न सुनकर कुछ बौखला-से गये, बगलें झाकने लगे, खीसें निकालकर बोले—घर संभालने के लिए, गृहस्थी का भार उठाने के लिए, और नहीं क्या भोग-विलास के लिए? घरनी के बिना यह आपको भूत का डेरा-सा मालूम होता था। नौकर-चाकर घर की सम्पति उडाये देते थे। जो चीज जहां पड़ी रहती थी, कोई उसको देखने वाला न था। तो अब मालूम हुआ कि मैं  इस घर की चौकसी के लिए लाई गई हूं। मुझे इस घर की रक्षा करनी चाहिए और अपने को धन्य समझना चाहिए कि यह सारी सम्पति मेरी है। मुख्य वस्तु सम्पत्ति है, मै तो केवल चौकी दारिन हूं। ऐसे घर में आज ही आग लग जाये! अब तक तो मैं अनजान में घर की चौकसी करती थी, जितना वह चाहते हैं उतना न सही, पर अपनी बुद्धि के अनुसार अवश्य करती थी। आज से किसी चीज को भूलकर भी छूने की कसम खाती हूं। यह मैं जानती हूं। कोई पुरुष घर की चौकसी के लिए विवाह नहीं करता और इन महाशय ने चिढ़ कर यह बात मुझसे कही। लेकिन सुशीला ठीक कहती है, इन्हें स्त्री के बिना घर सुना लगता होगा, उसी तरह जैसे पिंजरे में चिड़िया को न देखकर पिंजरा सूना लगता है। यह हम स्त्रियों का भाग्य!

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मालूम नहीं, इन्हें मुझ पर इतना संदेह क्यो होता है। जब से नसीब इस घर में लाया  हैं, इन्हें बराबर संदेह-मूलक कटाक्ष करते देखती हूं। क्या कारण है? जरा बाल गुथवाकर बैठी और यह होठ चबाने लगे। कहीं जाती नहीं, कहीं आती नहीं, किसी से बोलती नहीं, फिर भी इतना संदेह! यह अपमान असह्य है। क्या मुझे अपनी आबरु प्यारी नहीं? यह मुझे इतनी छिछोरी क्यों समझते हैं, इन्हें मुझपर संदेह करते लज्जा भी नहीं आती? काना आदमी किसी को हंसते देखता है तो समझता है लोग मुझी पर हंस रहे है। शायद इन्हें भी यही बहम हो गया है कि मैं इन्हें चिढ़ाती हूं। अपने  अधिकार के बाहर से बाहर कोई काम कर बैठने से कदाचित् हमारे चित्त की यही वृत्ति हो जाती है। भिक्षुक राजा  की गद्दी पर बैठकर चैन की नींद नहीं सो सकता। उसे अपने चारों तरफ शुत्र दिखायी देंगें। मै समझती  हूं, सभी शादी करने वाले बुड्ढ़ो का यही हाल है।
आज सुशीला के कहने से मैं ठाकुर जी की झांकी देखने जा रही थी। अब यह साधारण बुद्धि का आदमी भी समझ सकता हैकि फूहड़ बहू बनकर बाहर निकलना अपनी हंसी उड़ाना है, लेकिन आप उसी वक्त न जाने किधर से टपक पड़े और मेरी ओर तिरस्कापूर्ण नेत्रों से देखकर बोले—कहां की तैयारी है?
मैंने कह दिया, जरा ठाकुर जी की झांकी देखने जाती हूं।इतना सुनते ही त्योरियां चढ़ाकर बोले—तुम्हारे जाने की कुछ जरुरत नहीं। जो अपने पति की सेवा नहीं कर सकती, उसे देवताओं के दर्शन से पुण्य के बदले पाप होता।  मुझसे उड़ने चली हो । मैं औरतों की नस-नस पहचानता हूं।
ऐसा क्रोध आया कि बस अब क्या कहूं। उसी दम कपड़े बदल डाले और प्रण कर लिया कि अब कभ दर्शन करने जाऊंगी। इस अविश्वास का भी कुछ ठिकाना है! न जाने क्या सोचकर रुक गयी। उनकी बात का जवाब तो यही था कि उसी क्षण घरसे चल खड़ी हुई होती, फिर देखती मेरा क्या कर लेते।
इन्हें मेरा उदास और विमन रहने पर आश्चर्य होता है। मुझे मन-में कृतघ्न समझते है। अपनी समणमें इन्होने मरे से विवाह करके शायद मुझ पर एहसान किया है। इतनी बड़ी जायदाद और विशाल सम्पत्ति की स्वामिनी होकर मुझे फूले न समाना चाहिए था, आठो पहरइनका यशगान करते रहना चाहिये था। मैं यह सब कुछ न करके उलटे और मुंह लटकाए रहती हूं। कभी-कभी बेचारे पर दया आती है। यह नहीं समझते कि नारी-जीवन में कोई ऐसी वस्तु भी है जिसे देखकर उसकी आंखों में स्वर्ग भी नरकतुल्य हो जाता है।

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तीन दिन से बीमान हैं। डाक्टर कहते हैं, बचने की कोई आशा नहीं, निमोनिया हो गया है। पर मुझे न जाने क्यों इनका गम नहीं है। मैं इनती वज्र-हृदय कभी न थी।न जाने वह मेरी कोमलता कहां चली गयी। किसी बीमार की सूरत देखकर मेरा हृदय करुणा से चंचल हो जाता था, मैं किसी का रोना नहीं सुन सकती थी। वही मैं हूं कि आज तीन दिन से उन्हें बगल के कमरे में पड़े कराहते सुनती हूं और एक बार भी उन्हें देखने न गयी, आंखो में आंसू का जिक्र ही क्या। मुझे ऐसा मालूम होता है, इनसे मेरा कोई नाता ही नहीं मुझे चाहे कोई पिशाचनी कहे, चाहे कुलटा, पर मुझे तो यह कहने में  लेशमात्र भी संकोच नहीं है कि इनकी बीमारी से मुझे एक प्रकार का ईर्ष्यामय आनंद आ रहा है। इन्होने मुझे यहां कारावास दे रखा था—मैं इसे विवाह का पवित्र नाम नहींदेना चाहती—यह कारावास ही है। मैं इतनी उदार नहीं हूं कि जिसने मुझे कैद मे डाल रखा हो उसकी पूजा करुं, जो मुझे लात से मारे उसक पैरो  का चूंमू। मुझे तो मालूम हो रहा था। ईश्वर इन्हें इस पाप का दण्ड दे रहे है। मै निस्सकोंच होकर कहती हूं कि मेरा इनसे विवाह नहीं हुआ है। स्त्री किसी के गले बांध दिये जाने से ही उसकी विवाहिता नहीं हो जाती। वही संयोग विवाह का पद पा सकता है। जिंसमे कम-से-कम एक बार तो हृदय प्रेम से पुलकित हो जाय! सुनती हूं, महाशय अपने कमरे में पड़े-पड़े मुझे कोसा करते हैं, अपनी बीमारी का सारा बुखार मुझ पर निकालते हैं, लेकिन यहां इसकी परवाह नहीं। जिसकाह जी चाहे जायदाद ले, धन ले, मुझे इसकी जरुरत नहीं!

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आज तीन दिन हुए, मैं विधवा हो गयी, कम-से-कम लोग यही कहते हैं। जिसका जो जी चाहे कहे, पर मैं अपने को जो कुछ समझती हूं वह समझती हूं। मैंने चूड़िया नहीं तोड़ी, क्यों तोड़ू? क्यों तोड़ू? मांग में सेंदुर पहले भी न डालती थी, अब भी नहीं डालती। बूढ़े बाबा का क्रिया-कर्म उनके सुपुत्र ने किया, मैं पास न फटकी। घर में मुझ पर मनमानी आलोचनाएं होती हैं, कोई मेरे गुंथे हुए बालों को देखकर नाक सिंकोड़ता हैं, कोई मेरे आभूषणों पर आंख मटकाता है, यहां इसकी चिंता नहीं। उन्हें चिढ़ाने को मैं भी रंग=-बिरंगी साड़िया पहनती हूं, और भी बनती-संवरती हूं, मुझे जरा भी दु:ख नहीं हैं। मैं तो कैद से छूट गयी। इधर कई दिन सुशीला के घर गयी। छोटा-सा मकान है, कोई सजावट न सामान, चारपाइयां तक नहीं, पर सुशीला कितने आनंद से रहती है। उसका उल्लास देखकर मेरे मन में भी भांति-भांति  की कल्पनाएं उठने लगती हैं—उन्हें कुत्सित क्यों कहुं, जब मेरा मन उन्हें कुत्सित नहीं समझता ।इनके जीवन में कितना उत्साह है।आंखे मुस्कराती रहती हैं, ओठों पर मधुर हास्य खेलता रहता है, बातों में प्रेम का स्रोत बहताहुआजान पड़ता है। इस आनंद से, चाहे वह कितना ही क्षणिक हो, जीवन सफल हो जाता है, फिर उसे कोई भूल नहीं सकता, उसी स्मृति अंत तक के लिए काफी हो जाती है, इस मिजराब की चोट हृदय के तारों को अंतकाल तक मधुर स्वरों में कंपित रखसकती है।
एक दिन मैने सुशीला से कहा—अगर तेरे पतिदेव कहीं परदेश चले जाए तो रोत-रोते मर जाएगी!
सुशीला गंभीर भाव से बोली—नहीं बहन, मरुगीं नहीं , उनकी याद सदैव प्रफुल्लित करती रहेगी, चाहे उन्हें परदेश में बरसों लग जाएं।
मैं यही प्रेम चाहती हूं, इसी चोट के लिए मेरा मन तड़पता रहता है, मै भी ऐसी ही स्मृति चाहती हूं जिससे दिल के तार सदैव बजते रहें, जिसका नशा नित्य छाया रहे।

7
रात रोते-रोते हिचकियां बंध गयी। न-जाने क्यो दिल भर आता था। अपना जीवन सामने एक बीहड़ मैदान की भांति फैला हुआ  मालूम होता था, जहां बगूलों के सिवा हरियाली का नाम नहीं। घर फाड़े खाता था, चित्त ऐसा चंचल हो रहा था कि कहीं उड़ जाऊं। आजकल भक्ति के ग्रंथो की ओर ताकने को जी नहीं चाहता, कही सैर करने जाने की भी इच्छा नहीं होती, क्या  चाहती हूं वह मैं स्वयं भी नहीं जानती। लेकिन मै जो जानती वह मेरा एक-एक रोम-रोम जानता है, मैं अपनी भावनाओं को संजीव मूर्ति हैं, मेरा एक-एक अंग मेरी आंतरिक वेदना का आर्तनाद हो रहा है।
मेरे चित्त की चंचलता उस अंतिम दशा को पहंच गयी है, जब मनुष्य को निंदा की न लज्जा रहती है और न भय। जिन लोभी, स्वार्थी माता-पिता ने मुझे कुएं में ढकेला, जिस पाषाण-हृदय प्राणी ने मेरी मांग में सेंदुर डालने का स्वांग किया, उनके प्रति मेरे मन में बार-बार दुष्कामनाएं उठती हैं। मैं उन्हे लज्जित करना चाहती हूं। मैं अपने मुंह में कालिख लगा कर उनके मुख में कालिख लगाना चाहती हूं मैअपने प्राणदेकर उन्हे प्राणदण्ड दिलाना चाहती हूं।मेरा नारीत्व लुप्त हो गया है,। मेरे हृदय में प्रचंड ज्वाला उठी हुई है।
घर के सारे आदमी सो रहे है थे। मैं चुपके से नीचे उतरी , द्वार खोला और घर से निकली, जैसे कोई प्राणी गर्मी से व्याकुल होकर घर से निकले और किसी खुली हुई जगह की ओर दौड़े।उस मकान में मेरा दम घुट रहा था।
सड़क पर सन्नाटा था, दुकानें बंद हो चुकी थी। सहसा एक बुढियां आती हुई दिखायी दी। मैं डरी कहीं यह चुड़ैल न हो। बुढिया ने मेरे समीप आकर मुझे सिर से पांव तक देखा और बोली —किसकी राह देखरही हो
मैंने चिढ़ कर कहा—मौत की!
बुढ़िया—तुम्हारे नसीबों में तो अभी जिन्दगी के बड़े-बड़े सुख भोगने लिखे हैं। अंधेरी रात गुजर गयी, आसमान पर सुबह की रोशनी नजर आ रही हैं।
मैने हंसकर कहा—अंधेरे में भी तुम्हारी आंखे इतनी तेज हैंकि नसीबों की लिखावट पढ़ लेती हैं?
बुढ़िया—आंखो से नहीं पढती बेटी, अक्ल से पढ़ती हूं, धूप में चूड़े नही सुफेद किये हैं।। तुम्हारे दिन गये और अच्छे दिन आ रहे है। हंसो मत बेटी, यही काम करते इतनी उम्र गुजर गयी। इसी बुढ़िया की बदौलत जो नदी  में कूदने जा रही थीं, वे आज फूलों की सेज पर सो रही है, जो जहर का प्याल पीने को तैयार थीं, वे आज दूध की कुल्लियां कर रही हैं। इसीलिए इतनी रात गये निकलती हू कि अपने हाथों किसी अभागिन का उद्धार हो सके तो करुं। किसी से कुछ नहीं मांगती, भगवान् का दिया सब कुछ घर में है, केवल यही इच्छा है उन्हे धन, जिन्हे संतान की इच्छा है उन्हें संतान, बस औरक्या कहूं, वह मंत्र बता देती हूं कि जिसकी जो इच्छा जो वह पूरी हो जाये।
मैंने कहा—मुझे न धन चाहिए न संतान। मेरी मनोकामना तुम्हारे बस की बात नहीं है।
बुढ़िया हंसी—बेटी, जो तुम चाहती हो वह मै जानती हूं; तुम वह चीज चाहती हो जो संसार में होते हुए स्वर्ग की है, जो देवताओं के वरदान से भी ज्यादा आनंदप्रद है, जो आकाश कुसुम है,गुलर का फूल है और अमावसा का चांद है। लेकिन मेरे मंत्र में वह शंक्ति है जो भाग्य को भी संवार सकती है। तुम प्रेम की प्यासी हो, मैं तुम्हे उस नाव पर बैठा सकती हूं जो प्रेम के सागर में, प्रेम की तंरगों पर क्रीड़ा करती हुई तुम्हे पार उतार दे।
मैने उत्कंठित होकर पूछा—माता, तुम्हारा घर कहां है।
बुढिया—बहुत नजदीक है बेटी, तुम चलों तो मैं अपनी आंखो पर बैठा कर ले चलूं।
मुझे ऐसा मालूम हुआ कि यह कोई आकाश की देवी है। उसेक पीछ-पीछे चल पड़ी।

8
आह! वह बुढिया, जिसे मैं आकाश की देवी समझती थी, नरक की डाइन निकली। मेरा सर्वनाश हो गया। मैं अमृत खोजती थी, विष मिला, निर्मल स्वच्छ प्रेम की प्यासी थी, गंदे विषाक्त नाले में गिर पड़ी वह वस्तु न मिलनी थी, न मिली। मैं सुशीला का –सा सुख चाहती थी, कुलटाओं की विषय-वासना नहीं। लेकिन जीवन-पथ में एक बार उलटी राह चलकर फिर सीधे मार्ग पर आना कठिन है?
लेकिन मेरे अध:पतन का अपराध मेरे सिर नहीं, मेरे माता-पिता और उस बूढ़े पर है जो मेरा स्वामी बनना चाहता था। मैं यह पंक्तियां न लिखतीं, लेकिन इस विचार से लिख रही हूं कि मेरी आत्म-कथा पढ़कर लोगों की आंखे खुलें; मैं फिर कहती हूं कि अब भी अपनी बालिकाओ के लिए मत देखों धन, मत देखों जायदाद, मत देखों कुलीनता, केवल वर देखों। अगर उसके लिए जोड़ा का वर नहीं पा सकते तो लड़की को क्वारी रख छोड़ो, जहर दे कर मार डालो, गला घोंट डालो, पर किसी बूढ़े खूसट से मत ब्याहो। स्त्री सब-कुछ सह सकती है। दारुण से दारुण दु:ख, बड़े से बड़ा संकट, अगर नहीं सह सकती तो अपने यौवन-काल की उंमगो का कुचला जाना।
रही मैं, मेरे लिए अब इस जीवन में कोई आशा नहीं । इस  अधम दशा को भी उस दशा से न बदलूंगी, जिससे निकल कर आयी हूं।

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भाग्य की बात ! शादी विवाह में आदमी का क्या अख्तियार । जिससे ईश्वर ने, या उनके नायबों –ब्रह्मण—ने तय कर दी, उससे हो गयी। बाबू भारतदास ने लीला के लिए सुयोग्य वर खोजने में कोई बात उठा नही रखी। लेकिन जैसा घर-घर चाहते थे, वैसा न पा सके। वह लडकी को सुखी देखना चाहते थे, जैसा हर एक पिता का धर्म है ; किंतु इसके लिए उनकी समझ में सम्पत्ति ही सबसे जरूरी चीज थी। चरित्र या शिक्षा का स्थान गौण था। चरित्र तो किसी के माथे पर लिखा नही रहता और शिक्षा का आजकल के जमाने में मूल्य ही क्या ? हां, सम्पत्ति के साथ शिक्षा भी हो तो क्या पूछना ! ऐसा घर बहुत ढढा पर न मिला तो अपनी विरादरी के न थे। बिरादरी भी मिली, तो जायजा न मिला!; जायजा भी मिला तो शर्ते तय न हो सकी। इस तरह मजबूर होकर भारतदास को लीला का विवाह लाला सन्तसरन के लडके सीतासरन से करना पडा। अपने बाप का इकलौता बेटा था, थोडी बहुत शिक्षा भी पायी थी, बातचीत सलीके से करता था, मामले-मुकदमें समझता था और जरा दिल का रंगीला भी था । सबसे बड़ी बात यह थी कि रूपवान, बलिष्ठ, प्रसन्न मुख, साहसी आदमी था ; मगर विचार वही बाबा आदम के जमाने के थे। पुरानी जितनी बाते है, सब अच्छी ; नयी जितनी बातें है, सब खराब है। जायदाद के विषय में जमींदार साहब नये-नये दफों का व्यवहार करते थे, वहां अपना कोई अख्तियार न था ; लेकिन सामाजिक प्रथाओं के कटटर पक्षपाती थे। सीतासरन अपने बाप को जो करते या कहते वही खुद भी कहता था। उसमें खुद सोचने की शक्ति ही न थी। बुद्वि की मंदता बहुधा सामाजिक अनुदारता के रूप में प्रकट होती है।

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लीला ने जिस दिन घर में वॉँव रखा उसी दिन उसकी परीक्षा शुरू हुई। वे सभी काम, जिनकी उसके घर में तारीफ होती थी यहां वर्जित थे। उसे बचपन से ताजी हवा पर जान देना सिखाया गया था, यहां उसके सामने मुंह खोलना भी पाप था। बचपन से सिखाया गया था रोशनी ही जीवन है, यहां रोशनी के दर्शन दुर्भभ थे। घर पर अहिंसा, क्षमा और दया ईश्वरीय गुण बताये गये थे, यहां इनका नाम लेने की भी स्वाधीनता थी। संतसरन बडे तीखे, गुस्सेवर आदमी थे, नाक पर मक्खी न बैठने देते। धूर्तता और छल-कपट से ही उन्होने जायदाद पैदा की थी। और उसी को सफल जीवन का मंत्र समझते थे। उनकी पत्नी उनसे भी दो अंगुल ऊंची थीं। मजाल क्या है कि बहू अपनी अंधेरी कोठरी के द्वार पर खडी हो जाय, या कभी छत पर टहल सकें । प्रलय आ जाता, आसमान सिर पर उठा लेती। उन्हें बकने का मर्ज था। दाल में नमक का जरा तेज हो जाना उन्हें दिन भर बकने के लिए काफी बहाना था । मोटी-ताजी महिला थी, छींट का घाघरेदार लंहगा पहने, पानदान बगल में रखे, गहनो से लदी हुई, सारे दिन बरोठे में माची पर बैठीे रहती थी। क्या मजाल कि घर में उनकी इच्छा के विरूद्व एक पत्ता भी हिल जाय ! बहू की नयी-नयी आदतें देख देख जला करती थी। अब काहे की आबरू होगी। मुंडेर पर खडी हो कर झांकती है। मेरी लडकी ऐसी दीदा-दिलेर होती तो गला घोंट देती। न जाने इसके देश में कौन लोग बसते है ! गहनें नही पहनती। जब देखो नंगी – बुच्ची बनी बैठी रहती है। यह भी कोई अच्छे लच्छन है। लीला के पीछे सीतासरन पर भी फटकार पडती। तुझे भी चॉँदनी में सोना अच्छा लगता है, क्यों ? तू भी अपने को मर्द कहता कहेगा ? यह मर्द कैसा कि औरत उसके कहने में न रहे। दिन-भर घर में घुसा रहता है। मुंह में जबान नही है ? समझता क्यों नही ?
सीतासरन कहता—अम्मां, जब कोई मेरे समझाने से माने तब तो?
मां—मानेगी क्यो नही, तू मर्द है कि नही ? मर्द वह चाहिए कि कडी निगाह से देखे तो औरत कांप उठे।
सीतासरन —–तुम तो समझाती ही रहती हो ।
मां —मेरी उसे क्या परवाह ? समझती होगी, बुढिया चार दिन में मर जायगी तब मैं मालकिन हो ही जाउँगी
सीतासरन — तो मैं भी तो उसकी बातों का जबाब नही दे पाता। देखती नही हो कितनी दुर्बल हो गयी है। वह रंग ही नही रहा। उस कोठरी में पडे-पडे उसकी दशा बिगडती जाती है।
बेटे के मुंह से ऐसी बातें सुन माता आग हो जाती और सारे दिन जलती ; कभी भाग्य को कोसती, कभी समय को ।
सीतासरन माता के सामने तो ऐसी बातें करता ; लेकिन लीला के सामने जाते ही उसकी मति बदल जाती थी। वह वही बातें करता था जो लीला को अच्छी लगती। यहां तक कि दोनों वृद्वा की हंसी उडातें। लीला को इस में ओर कोई सुख न था । वह सारे दिन कुढती रहती। कभी चूल्हे के सामने न बैठी थी ; पर यहां पसेरियों आटा थेपना पडता, मजूरों और टहलुओं के लिए रोटी पकानी पडती। कभी-कभी वह चूल्हे के सामने बैठी घंटो रोती। यह बात न थी कि यह लोग कोई महाराज-रसोइया न रख सकते हो; पर घर की पुरानी प्रथा यही थी कि बहू खाना पकाये और उस प्रथा का निभाना जरूरी था। सीतासरन को देखकर लीला का संतप्त ह्रदय एक क्षण के लिए शान्त हो जाता था।
गर्मी के दिन थे और सन्ध्या का समय था। बाहर हवा चलती, भीतर देह फुकती थी। लीला कोठरी में बैठी एक किताब देख रही थी कि सीतासरन ने आकर कहा— यहां तो बडी गर्मी है, बाहर बैठो।
लीला—यह गर्मी तो उन तानो से अच्छी है जो अभी सुनने पडेगे।
सीतासरन—आज अगर बोली तो मैं भी बिगड जाऊंगा।
लीला—तब तो मेरा घर में रहना भी मुश्किल हो जायेगा।
सीतासरन—बला से अलग ही रहेंगे !
लीला—मैं मर भी लाऊं तो भी अलग रहूं । वह जो कुछ कहती सुनती है, अपनी समझ से मेरे भले ही के लिए कहती-सुनती है। उन्हें मुझसे कोई दुश्मनी थोडे ही है। हां, हमें उनकी बातें अच्छी न लगें, यह दूसरी बात है।उन्होंने खुद वह सब कष्ट झेले है, जो वह मुझे झेलवाना चाहती है। उनके स्वास्थ्य पर उन कष्टो का जरा भी असर नही पडा। वह इस ६५ वर्ष की उम्र में मुझसे कहीं टांठी है। फिर उन्हें कैसे मालूम हो कि इन कष्टों से स्वास्थ्य बिगड सकता है।
सीतासरन ने उसके मुरझाये हुए मुख की ओर करुणा नेत्रों से देख कर कहा—तुम्हें इस घर में आकर बहुत दु:ख सहना पडा। यह घर तुम्हारे योग्य न था। तुमने पूर्व जन्म में जरूर कोई पाप किया होगा।
लीला ने पति के हाथो से खेलते हुए कहा—यहां न आती तो तुम्हारा प्रेम कैसे पाती ?

3
पांच साल गुजर गये। लीला दो बच्चों की मां हो गयी। एक लडका था, दूसरी लडकी । लडके का नाम जानकीसरन रखा गया और लडकी का नाम कामिनी। दोनो बच्चे घर को गुलजार किये रहते थे। लडकी लडकी दादा से हिली थी, लडका दादी से । दोनों शोख और शरीर थें। गाली दे बैठना, मुंह चिढा देना तो उनके लिए मामूली बात थी। दिन-भर खाते और आये दिन बीमार पडे रहते। लीला ने खुद सभी कष्ट सह लिये थे पर बच्चों में बुरी आदतों का पडना उसे बहुत बुरा मालूम होता था; किन्तु उसकी कौन सुनता था। बच्चों की माता होकर उसकी अब गणना ही न रही थी। जो कुछ थे बच्चे थे, वह कुछ न थी। उसे किसी बच्चे को डाटने का भी अधिकार न था, सांस फाड खाती थी।

सबसे बडी आपत्ति यह थी कि उसका स्वास्थ्य अब और भी खराब हो गया था। प्रसब काल में उसे वे भी अत्याचार सहने पडे जो अज्ञान, मूर्खता और अंध विश्वास ने सौर की रक्षा के लिए गढ रखे है। उस काल-कोठरी में, जहॉँ न हवा का गुजर था, न प्रकाश का, न सफाई का, चारों और दुर्गन्ध, और सील और गन्दगी भरी हुई थी, उसका कोमल शरीर सूख गया। एक बार जो कसर रह गयी वह दूसरी बार पूरी हो गयी। चेहरा पीला पड गया, आंखे घंस गयीं। ऐसा मालूम होता, बदन में खून ही नही रहा। सूरत ही बदल गयी।
गर्मियों के दिन थे। एक तरफ आम पके, दूसरी तरफ खरबूजे । इन दोनो फलो की ऐसी अच्छी फसल कभी न हुई थी अबकी इनमें इतनी मिठास न जाने कहा से आयी थी कि कितना ही खाओ मन न भरे। संतसरन के इलाके से आम औरी खरबूजे के टोकरे भरे चले आते थे। सारा घर खूब उछल-उछल खाता था। बाबू साहब पुरानी हड्डी के आदमी थे। सबेरे एक सैकडे आमों का नाश्ता करते, फिर पसेरी-भर खरबूज चट कर जाते। मालकिन उनसे पीछे रहने वाली न थी। उन्होने तो एक वक्त का भोजन ही बन्द कर दिया। अनाज सडने वाली चीज नही। आज नही कल खर्च हो जायेगा। आम और खरबूजे तो एक दिन भी नही ठहर सकते। शुदनी थी और क्या। यों ही हर साल दोनों चीजों की रेल-पेल होती थी; पर किसी को कभी कोई शिकायत न होती थी। कभी पेट में गिरानी मालूम हुई तो हड की फंकी मार ली। एक दिन बाबू संतसरन के पेट में मीठा-मीठा दर्द होने लगा। आपने उसकी परवाह न की । आम खाने बैठ गये। सैकड़ा पूरा करके उठे ही थे कि कै हुई । गिर पडे फिर तो तिल-तिल करके पर कै और दस्त होने लगे। हैजा हो गया। शहर के डाक्टर बुलाये गये, लेकिन आने के पहले ही बाबू साहब चल बसे थे। रोना-पीटना मच गया। संध्या होते-होते लाश घर से निकली। लोग दाह-क्रिया करके आधी रात को लौटे तो मालकिन को भी कै दस्त हो रहे थे। फिर दौड धूप शुरू हुई; लेकिन सूर्य निकलते-निकलते वह भी सिधार गयी। स्त्री-पुरूष जीवनपर्यंत एक दिन के लिए भी अलग न हुए थे। संसार से भी साथ ही साथ गये, सूर्यास्त के समय पति ने प्रस्थान किया, सूर्योदय के समय पत्नी ने ।
लेकिन मुशीबत का अभी अंत न हुआ था। लीला तो संस्कार की तैयारियों मे लगी थी; मकान की सफाई की तरफ किसी ने ध्यान न दिया। तीसरे दिन दोनो बच्चे दादा-दादी के लिए रोत-रोते बैठक में जा पंहुचे। वहां एक आले का खरबूजज कटा हुआ पडा था; दो-तीन कलमी आम भी रखे थे। इन पर मक्खियां भिनक रही थीं। जानकी ने एक तिपाई पर चढ कर दोनों चीजें उतार लीं और दोंनों ने मिलकर खाई। शाम होत-होते दोनों को हैजा हो गया और दोंनो मां-बाप को रोता छोड चल बसे। घर में अंधेरा हो गया। तीन दिन पहले जहां चारों तरफ चहल-पहल थी, वहां अब सन्नाटा छाया हुआ था, किसी के रोने की आवाज भी सुनायी न देती थी। रोता ही कौन ? ले-दे के कुल दो प्राणी रह गये थे। और उन्हें रोने की सुधि न थी।

4
लीला का स्वास्थ्य पहले भी कुछ अच्छा न था, अब तो वह और भी बेजान हो गयी। उठने-बैठने की शक्ति भी न रही। हरदम खोयी सी रहती, न कपडे-लत्ते की सुधि थी, न खाने-पीने की । उसे न घर से वास्ता था, न बाहर से । जहां बैठती, वही बैठी रह जाती। महीनों कपडे न बदलती, सिर में तेल न डालती बच्चे ही उसके प्राणो के आधार थे। जब वही न रहे तो मरना और जीना बराबर था। रात-दिन यही मनाया करती कि भगवान् यहां से ले चलो । सुख-दु:ख सब भुगत चुकी। अब सुख की लालसा नही है; लेकिन बुलाने से मौत किसी को आयी है ?
सीतासरन भी पहले तो बहुत रोया-धोया; यहां तक कि घर छोडकर भागा जाता था; लेकिन ज्यों-ज्यो दिन गुजरते थे बच्चों का शोक उसके दिल से मिटता था; संतान का दु:ख तो कुछ माता ही को होता है। धीरे-धीरे उसका जी संभल गया। पहले की भॉँति मित्रों के साथ हंसी-दिल्लगी होने लगी। यारों ने और भी चंग पर चढाया । अब घर का मालिक था, जो चाहे कर सकता था, कोई उसका हाथ रोकने वाला नही था। सैर’-सपाटे करने लगा। तो लीला को रोते देख उसकी आंखे सजग हो जाती थीं, कहां अब उसे उदास और शोक-मग्न देखकर झुंझला उठता। जिंदगी रोने ही के लिए तो नही है। ईश्वर ने लडके दिये थे, ईश्वर ने ही छीन लिये। क्या लडको के पीछे प्राण दे देना होगा ? लीला यह बातें सुनकर भौंचक रह जाती। पिता के मुंह से ऐसे शब्द निकल सकते है। संसार में ऐसे प्राणी भी है।
होली के दिन थे। मर्दाना में गाना-बजाना हो रहा था। मित्रों की दावत का भी सामान किया गया था । अंदर लीला जमींन पर पडी हुई रो रही थी त्याहोर के दिन उसे रोते ही कटते थें आज बच्चे बच्चे होते तो अच्छे- अच्छे कपडे पहने कैसे उछलते फिरते! वही न रहे तो कहां की तीज और कहां के त्योहार।
सहसा सीतासरन ने आकर कहा – क्या दिन भर रोती ही रहोगी ? जरा कपडे तो बदल डालो , आदमी बन जाओ । यह क्या तुमने अपनी गत बना रखी है ?
लीला—तुम जाओ अपनी महफिल मे बैठो, तुम्हे मेरी क्या फिक्र पडी है।
सीतासरन—क्या दुनिया में और किसी के लडके नही मरते ? तुम्हारे ही सिर पर मुसीबत आयी है ?
लीला—यह बात कौन नही जानता। अपना-अपना दिल ही तो है। उस पर किसी का बस है ?
सीतासरन मेरे साथ भी तो तुम्हारा कुछ कर्तव्य है ?
लीला ने कुतूहल से पति को देखा, मानो उसका आशय नही समझी। फिर मुंह फेर कर रोने लगी।
सीतासरन – मै अब इस मनहूसत का अन्त कर देना चाहता हूं। अगर तुम्हारा अपने दिल पर काबू नही है तो मेरा भी अपने दिल पर काबू नही है। मैं अब जिंदगी – भर मातम नही मना सकता।
लीला—तुम रंग-राग मनाते हो, मैं तुम्हें मना तो नही करती ! मैं रोती हूं तो क्यूं नही रोने देते।
सीतासरन—मेरा घर रोने के लिए नही है ?
लीला—अच्छी बात है, तुम्हारे घर में न रोउंगी।

5
लीला ने देखा, मेरे स्वामी मेरे हाथ से निकले जा रहे है। उन पर विषय का भूत सवार हो गया है और कोई समझाने वाला नहीं। वह अपने होश मे नही है। मैं क्या करुं, अगर मैं चली जाती हूं तो थोडे ही दिनो में सारा ही घर मिट्टी में मिल जाएगा और इनका वही हाल होगा जो स्वार्थी मित्रो के चुंगल में फंसे हुए नौजवान रईसों का होता है। कोई कुलटा घर में आ जाएगी और इनका सर्वनाश कर देगी। ईश्वा ! मैं क्या करूं ? अगर इन्हें कोई बीमारी हो जाती तो क्या मैं उस दशा मे इन्हें छोडकर चली जाती ? कभी नही। मैं तन मन से इनकी सेवा-सुश्रूषा करती, ईश्वर से प्रार्थना करती, देवताओं की मनौतियां करती। माना इन्हें शारीरिक रोग नही है, लेकिन मानसिक रोग अवश्य है। आदमी रोने की जगह हंसे और हंसने की जगह रोये, उसके दीवाने होने में क्या संदेह है ! मेरे चले जाने से इनका सर्वनाश हो जायेगा। इन्हें बचाना मेरा धर्म है।
हां, मुझें अपना शोक भूल जाना होगा। रोऊंगी, रोना तो तकदीर में लिखा ही है—रोऊंगी, लेकिन हंस-हंस कर । अपने भाग्य से लडूंगी। जो जाते रहे उनके नाम के सिवा और कर ही क्या सकती हूं, लेकिन जो है उसे न जाने दूंगी। आ, ऐ टूटे हुए ह्रदय ! आज तेरे टुकडों को जमा करके एक समाधि बनाऊं और अपने शोक को उसके हवाले कर दूं। ओ रोने वाली आंखों, आओ, मेरे आसुंओं को अपनी विहंसित छटा में छिपा लो। आओ, मेरे आभूषणों, मैंने बहुत दिनों तक तुम्हारा अपमान किया है, मेरा अपराध क्षमा करो। तुम मेरे भले दिनो के साक्षी हो, तुमने मेरे साथ बहुत विहार किए है, अब इस संकट में मेरा साथ दो ; मगर देखो दगा न करना ; मेरे भेदों को छिपाए रखना।
पिछले पहर को पहफिल में सन्नाटा हो गया। हू-हा की आवाजें बंद हो गयी। लीला ने सोचा क्या लोग कही चले गये, या सो गये ? एकाएक सन्नाटा क्यों छा गया। जाकर दहलीज में खडी हो गयी और बैठक में झांककर देखा, सारी देह में एक ज्वाला-सी दौड गयी। मित्र लोग विदा हो गये थे। समाजियो का पता न था। केवल एक रमणी मसनद पर लेटी हुई थी और सीतासरन सामने झुका हुआ उससे बहुत धीरे-धीरे बातें कर रहा था। दोनों के चेहरों और आंखो से उनके मन के भाव साफ झलक रहे थे। एक की आंखों में अनुराग था, दूसरी की आंखो में कटाक्ष ! एक भोला-भोला ह्रदय एक मायाविनी रमणी के हाथों लुटा जाता था। लीला की सम्पत्ति को उसकी आंखों के सामने एक छलिनी चुराये जाती थी। लीला को ऐसा क्रोध आया कि इसी समय चलकर इस कुल्टा को आडे हाथों लूं, ऐसा दुत्कारूं वह भी याद करें, खडे-,खडे निकाल दूं। वह पत्नी भाव जो बहुत दिनो से सो रहा था, जाग उठा और विकल करने लगा। पर उसने जब्त किया। वेग में दौडती हुई तृष्णाएं अक्समात् न रोकी जा सकती थी। वह उलटे पांव भीतर लौट आयी और मन को शांत करके सोचने लगी—वह रूप रंग में, हाव-भाव में, नखरे-तिल्ले में उस दुष्टा की बराबरी नही कर सकती। बिलकुल चांद का टुकडा है, अंग-अंग में स्फूर्ति भरी हुई है, पोर-पोर में मद छलक रहा है। उसकी आंखों में कितनी तृष्णा है। तृष्णा नही, बल्कि ज्वाला ! लीला उसी वक्त आइने के सामने गयी । आज कई महीनो के बाद उसने आइने में अपनी सूरत देखी। उस मुख से एक आह निकल गयी। शोक न उसकी कायापलट कर दी थी। उस रमणी के सामने वह ऐसी लगती थी जैसे गुलाब के सामने जूही का फूल.

6
सीतासरन का खुमार शाम को टूटा । आखें खुलीं तो सामने लीला को खडे मुस्करातेदेखा।उसकी अनोखी छवि आंखों में समा गई। ऐसे खुश हुए मानो बहुत दिनो के वियोग के बाद उससे भेंट हुई हो। उसे क्या मालूम था कि यह रुप भरने के लिए कितने आंसू बहाये है; कैशों मे यह फूल गूंथने के पहले आंखों में कितने मोती पिरोये है। उन्होनें एक नवीन प्रेमोत्साह से उठकर उसे गले लगा लिया और मुस्कराकर बोले—आज तो तुमने बडे-बडे शास्त्र सजा रखे है, कहां भागूं ?
लीला ने अपने ह्रदय की ओर उंगली दिखकर कहा –-यहा आ बैठो बहुत भागे फिरते हो, अब तुम्हें बांधकर रखूगीं । बाग की बहार का आनंद तो उठा चुके, अब इस अंधेरी कोठरी को भी देख लो।
सीतासरन ने जज्जित होकर कहा—उसे अंधेरी कोठरी मत कहो लीला वह प्रेम का मानसरोवर है !
इतने मे बाहर से किसी मित्र के आने की खबर आयी। सीताराम चलने लगे तो लीला ने हाथ उनका पकडकर हाथ कहा—मैं न जाने दूंगी।
सीतासरन– अभी आता हूं।
लीला—मुझे डर है कहीं तुम चले न जाओ।
सीतासरन बाहर आये तो मित्र महाशय बोले –आज दिन भर सोते हो क्या ? बहुत खुश नजर आते हो। इस वक्त तो वहां चलने की ठहरी थी न ? तुम्हारी राह देख रही है।
सीतासरन—चलने को तैयार हूं, लेकिन लीला जाने नहीं देगीं।
मित्र—निरे गाउदी ही रहे। आ गए फिर बीवी के पंजे में ! फिर किस बिरते पर गरमाये थे ?
सीतासरन—लीला ने घर से निकाल दिया था, तब आश्रय ढूढता – फिरता था। अब उसने द्वार खोल दिये है और खडी बुला रही है।
मित्र—आज वह आनंद कहां ? घर को लाख सजाओ तो क्या बाग हो जायेगा ?
सीतासरन—भई, घर बाग नही हो सकता, पर स्वर्ग हो सकता है। मुझे इस वक्त अपनी क्षद्रता पर जितनी लज्जा आ रही है, वह मैं ही जानता हूं। जिस संतान शोक में उसने अपने शरीर को घुला डाला और अपने रूप-लावण्य को मिटा दिया उसी शोक को केवल मेरा एक इशारा पाकर उसने भुला दिया। ऐसा भुला दिया मानो कभी शोक हुआ ही नही ! मैं जानता हूं वह बडे से बडे कष्ट सह सकती है। मेरी रक्षा उसके लिए आवश्यक है। जब अपनी उदासीनता के कारण उसने मेरी दशा बिगडते देखी तो अपना सारा शोक भूल गयी। आज मैंने उसे अपने आभूषण पहनकर मुस्कराते हुंए देखा तो मेरी आत्मा पुलकित हो उठी । मुझे ऐसा मालूम हो रहा है कि वह स्वर्ग की देवी है और केवल मुझ जैसे दुर्बल प्राणी की रक्षा करने भेजी गयी है। मैने उसे कठोर शब्द कहे, वे अगर अपनी सारी सम्पत्ति बेचकर भी मिल सकते, तो लौटा लेता। लीला वास्तव में स्वर्ग की देवी है!

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Duniya Ka Sabse Anmol Ratan by Premchand

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मुंशी प्रेमचंद की कहानी दुनिया का सब से अनमोल रतन
Hindi Short Story, Duniya Ka Sabse Anmol Ratan by Premchand- दिलफ़िगार एक पुर ख़ार दरख़्त के नीचे दामन चाक किये बैठा हुआ ख़ून के आँसू बहा रहा था। वो हुस्न की देवी यानी मलिका दिलफ़रेब का सच्चा और जाँबाज़ आशिक़ था। उन उश्शाक में नहीं जो इत्र-फुलेल में बस कर और लिबास फ़ाखिरा सज कर आशिक़ के भेस में माशूक़ियत का दम भरते हैं, बल्कि उन सीधे सादे भोले भाले फ़िदाइयों में जो कोह और ब्याबां में सर टकराते और नाला-व-फ़र्याद मचाते फिरते हैं। दिलफ़रेब ने उससे कहा था कि अगर तू मेरा सच्चा आशिक़ है तो जा और दुनिया की सबसे बेशबहा शय लेकर मेरे दरबार में आ तब में तुझे अपनी गु़लामी में क़बूल करूंगी। अगर तुझे वो चीज़ न मिले तो ख़बरदार! इधर का रुख़ न करना वर्ना दार पर खींचवा दूंगी। दिलफ़िगार को अपने जज़्बे के इज़हार का शिकवा शिकायत और जमाल-ए-यार के दीदार का मुतलक़ मौक़ा न दिया गया। दिलफ़रेब ने जूं ही ये फ़ैसला सुनाया। उसके चोबदारों ने ग़रीब दिलफ़िगार को धक्के दे कर बाहर निकाल दिया और आज तीन दिन से ये सितम रसीदा शख़्स उसी पुर ख़ार दरख़्त के नीचे इसी वहशतनाक मैदान में बैठा हुआ सोच रहा है कि क्या करूं? दुनिया की सब से बेश-बहा शय! नामुमकिन! और वो है क्या? क़ारून का ख़ज़ाना? आब-ए-हयात? ताज ए ख़ुसरो? जाम ए जम? तख़्त-ए-ताऊस? ज़र परवेज़? नहीं ये चीज़ें हरगिज़ नहीं दुनिया में ज़रूर उनसे गिरां तर, उनसे भी बेशबहा चीज़ें मौजूद हैं। मगर वो क्या हैं? कहाँ हैं? कैसे मिलेंगी? या ख़ुदा मेरी मुश्किल क्यों कर आसान होगी!

दिलफ़िगार उन्ही ख़्यालात में चक्कर खा रहा था और अक़ल कुछ काम न करती थी मुनीर ए शामी को हातिम सा मदद गार मिल गया। ए काश कोई मेरा भी मददगार हो जाता। ए काश मुझे भी उस चीज़ का जो दुनिया की सब से बेशबहा है, नाम बतला दिया जाता बला से वो शैय दस्तयाब न होती मगर मुझे इतना मालूम हो जाता कि वो किस किस्म की चीज़ है। मै घड़े बराबर मोती की खोज में जा सकता हूँ। में समुंद्र का नग़मा, पत्थर का दिल, क़ज़ा की आवाज़, और उनसे भी ज़्यादा ने निशान चीज़ों की तलाश में कमर हिम्मत बांध सकता हूँ।मगर दुनिया की सब से बेशबहा शैय ये मेरे पर परवाज़ से बाला-ए-तर है।

आसमान पर तारे निकल आए थे। दिलफ़िगार यकायक ख़ुदा का नाम लेकर उठा और एक तरफ़ को चल खड़ा हुआ भूका प्यासा। ब्रहना तन ख़स्ता-व-ज़ार वो बरसों वीरानों और आबादीयों की ख़ाक छानता फिरा। तलवे कांटों से छलनी हो गए। जिस्म में तार सतर की तरह हड्डियां ही हड्डियां नज़र आने लगीं। मगर वो चीज़ जो दुनिया की सब से बेशबहा शैय थी। मयस्सर न हुई। और न इस का कुछ निशान मिला।

एक रोज़ भूलता भटकता एक मैदान में निकला। जहां हज़ारों आदमी हलक़ा बांधे खड़े थे। बीच में अमामे और अबा वाले रीशाईल क़ाज़ी शान तहक्कुम से बैठे हुए बाहम कुछ ग़रफ़श कर रहे थे और उस जमात से ज़रा दूर पर एक सूली खड़ी थी। दिलफ़िगार कुछ नातवानी के ग़लबे से। और कुछ यहां की कैफ़ीयत देखने के इरादे से ठटक गया। क्या देखता है कि कई बरकनदार एक दस्त-व-पा बज़नजीर क़ैदी के ले चले आ रहे हैं। सूली के क़रीब पहूंच कर सब सिपाही रुक गए। और क़ैदी की हथकड़ीयां बेड़ियां सब उतार ली गईं। उस बदक़िस्मत शख़्स का दामन सदहा बेगुनाहों के ख़ून के छींटों से रंगीन हो रहा था। और उसका दिल नेकी के ख़्याल और रहम की आवाज़ से मुतलक़ मानूस न था। उसे काला चोर कहते थे। सिपाहीयों ने उसे सूली के तख़्ते पर खड़ा कर दिया। मौत की फांसी उसकी गर्दन मं डाल दी। और जल्लादों ने तख़्ता खींच का इरादा किया। कि बदक़िस्मत मुजरिम चीख़ कर बोला लिल्ला मुझे एक दम के लिए फांसी से उतार दो। ताकि अपने दिल की आख़िरी आरज़ू निकाल लूं। ये सुनते ये चारों तरफ़ सन्नाटा छा गया। लोग हैरत में आकर ताकने लगे। क़ाज़ीयों ने एक मरने वाले शख़्स की आख़िरी इस्तिदा को रद्द करना मुनासिब ना समझा। और बदनसीब सिहा कार काला चोर ज़रा देर के लिए फांसी से उतार लिया गया।

इस मजमा में एक ख़ूबसूरत भोला भाला लड़का एक छड़ी पर सवार हो कर अपने पैसे पर उछल उछल कर फ़र्ज़ी घोड़ा दौड़ा रहा था। और अपने आलिम सादगी में मगन था गोया वो उस वक़्त वाक़ई किसी अरबी रहवार का शहसवार है उसका चेहरा इस सच्ची मुसर्रत से कंवल की तरह खिला हुआ था जो चंद दिनों के लिए बचपन ही में हासिल होती है। और जिस की याद हम को मरते दम नहीं भूलती। इस का सीना अभी तक मासीयत के गर्द-एव-गुबार से बेलौस था। और मासूमियत उसे अपनी गोद में खेला रही थी।

बदक़िस्मत काला चोर फांसी से उतरा। हज़ारों आँखें उसी पर गढ़ी हुई थीं। वो उस लड़के के पास आया और उसे गोद में उठा कर प्यार करने लगा। उसे उस वक़्त वो ज़माना याद आया जब वो खो ऐसा ही भोला भाला ऐसा ही ख़ुश-व-ख़ुर्रम और आलाइशात दुनयवी से ऐसा ही पाक-व-साफ़ था। माँ गोदीयों में खेलाती थी। बाप बलाऐं लेता था और सारा कुम्बा जानें वारा करता था। आह! काले चोर के दिल पर इस वक़्त अय्याम-ए-गुज़श्ता की याद का इतना असर हुआ कि उसकी आँखों से जिन्होंने नीम बिस्मिल लाशों को तड़पते देखा न और न झपकी थीं। आँसू का एक क़तरा टपक पड़ा। दिलफ़िगार लपक कर इस दरीकता को हाथ में ले लिया। और उसके दल ने कहा बेशक ये शैय दुनिया की सब से अनमोल चीज़ है जिस पर तख़त-व-ताऊस और जाम-ए-जम और आब-ए-हयात और ज़र परवेज़ सब तसद्दुक़ हैं।

इसी ख़्याल से ख़ुश होता, कामयाबी की उम्मीद से सरमस्त, दिलफ़िगार अपनी माशूक़ा अलफ़रेब के शहर मीनू स्वाद को चला। मगर जूं मंज़िलें तै होती जाती थीं। उसका दिल बैठा जाता था। कि कहीं उस चीज़ की जिसे में दुनिया की सब से बेशबहा चीज़ समझता हूँ,दिलफ़रेब की निगाहों में क़दर न हुई मै दार पर खींच दिया जाऊंगा। और उद दुनिया से ना-मुराद जाऊंगा पर हर चेह बादा बाद। अब तो क़िसमत आज़माई है। आख़िर कोह-व-दरिया तै करके शहर मीनू सवाद में आ पहूँचा और दिलफ़रेब के दर-ए-दौलत पर जा कर इलतिमास की कि ख़स्ता-व-ज़ार दिलफ़िगार ब-फ़ज़ल ख़ुदा तामील-ए-इरशाद कर के आया है और शरफ़ क़दम बोसी चाहता है। दिलफ़रेब ने फ़िलफ़ौर हुज़ूर में बूला भेजा। और एक ज़रनिगार पर वो की ओट से फ़र्माइश की कि वो हदया बेशबहा पेश करो। दिलफ़िगार ने एक अजब उम्मीद बीम के आलम में वो क़तरा पेश किया और उसकी सारी कैफ़ीयत निहायत ही मूसिर लहजे में बयान की। दिलफ़रेब ने कुल रूदाद बग़ौर सुनी। और तोहफ़ा हाथ में लेकर ज़रा देर तक ग़ौर कर के बोली। दिलफ़िगार बेशक तूने दुनिया की एक बेश क़ीमत चीज़ ढूंढ निकाली। तेरी हिम्मत को आफ़रीं और तेरी फ़िरासत को मर्हबा! मगर ये दुनिया की सब से बेश कमीत चीज़ नहीं। इसलिए तू यहां से जा और फिर कोशिश कर। शायद अब की तेरे हाथ दर मक़दूर लगे और तेरी क़िस्मत में मेरी गु़लामी लिखी हो। अपने अह्द के मुताबिक़ मै तुझे दार पर खींचवा सकती हूँ। मगर मै तेरी जान बख़शी करती हूँ। इसलिए कि तुझ में वो औसाफ़ मौजूद हैं जो मै अपने आशिक़ में देखना चाहती हूँ और मुझे यक़ीन है कि तू ज़रूर कभी सुर्ख़रु होगा। नाकाम-व-नामुराद दिलफ़िगार इस इनायत माशूक़ाना से ज़रा दिलेर हो कर बोला। ए महबूब दिलनशीं बाद मद तहाए दराज़ के तेरे आस्तां की जब रसाई नसीब हुई है। फिर ख़ुदा जाने ऐसे दिन कब आयेंगे। किया तो अपने आशिक़ जाँबाज़ के हाल-ए-ज़ार पर तरस न खाएगी और अपने जमाल-ए-जहां आरा का जलवा दिखा कर इस सख़्त तन दिलफ़िगार को आने वाली सख़्तियों के छीलने के लिए मुस्तइद न बनाएगी। तेरी एक निगाह-ए-मस्त के निशा से बेख़ूद हो कर मै वो कर सकता हूँ जो आज तक किसी से न हुआ हो। दिलफ़रेब आशिक के ये इश्तियाक़ आमेज़ कलिमात को सन कर बड़ा फ़रोख़्ता होगी और हुक्म दिया कि इस दीवाने खड़े दरबार से निकाल दो। चोबदार ने फ़ौरन ग़रीब दिलफ़िगार को धक्के दे कर कूचा-ए-यार से बाहर निकाल दिया।

कुछ देर तक तो दिलफ़िगार माशूक़ाना सितम कैश की इस तुंद खोई पर आँसू बहाता रहा।बाद-ए-अज़ां सोचने लगा कि अब कहाँ जाऊं। मुद्दतों की रह नुर्दी-व-बादियापैमाई के बाद ये क़तरा-ए-अशक मिला था।अब ऐसी कौन सी चीज़ है जिस की क़ीमत इस दर आबदार से ज़ाइद हो। हज़रत ख़िज़र! तुम ने सिकन्दर को जाह-व-ज़ुलमात का रास्ता दिखाया था। क्या मेरी दस्त गिरी न करोगे? सिकन्दर शाह हफ़तकिशवर था। मै तो याक ख़ानमाँ बर्बाद मुसाफ़िर हूँ। तुम ने कितनी ही डूबती कश्तियां किनारे लगाई हैं। मुझ ग़ीरब का बेड़ा भी पार करो ए जिब्रईल आली मक़ाम! कुछ तुम्हें इस आशिक़ निम जान-व-असीर रंज-व-मुहँ पर तरस खाओ। तुम मुक़र बान बारगाह से हो। क्या मेरी मुश्किल आसान न करोगे? अल-ग़र्ज़ दिलफ़िगार बेज़ार ने बहुत फ़रियाद मचाई। मगर कोई उसकी दस्तगीर के लिए नमूदार न हुआ। आख़िर मायूस हो कर वो मजनूं सिफ़त दुबारा एक तरफ़ को चल खड़ा हुआ।
दिलफ़िगार ने पूरब से पच्छिम तक और उतरे दक्खिन तक कितने ही दियारों की ख़ाक छानी। कभी बरफ़शानी चोटियों पर सोया। कभी होलनाक वादीयों में भटकता फिरा। मगर जिस चीज़ की धून थी वो ना मिली। यहां तक कि उसका जिस्म एक तोदा इस्तिख़्वां हो गया।

एक रोज़ वो शाम के वक़्त किसी दरिया के किनारे ख़सताहाल पड़ा था। नशा बेखु़दी से चौंका देखता है कि संदल की चिता बनी हुई है और उस पर एक नाज़नीन शुहाने जोड़े पहने, सोलहों सिंगार किए बैठी हुई है। उसके ज़ानू पर उसके प्यारे शौहर की लाश है। हज़ारों आदमी हलक़ा बांधे खड़े हैं। और फूलों की बरखा कर रहे हैं। यकायक चिता में से ख़ुदबख़ुद एक शोला उठा। सती का चेहरा उस वक़्त एक पाक जज़बे से मुनव्वर हो रहा था। मुबारक शोले उसके गले लिपट गए। और दमज़दन में वो फूल सा जिस्म तोदा-ए-ख़ाकतर हो गया।माशूक़ ने अपने तईं आशिक़ पर निसार कर दिया। और दो फ़दईओं की सच्ची, लाफ़ानी और पाक मुहब्बत का आख़िरी जलवा निकाह-ए-ज़ाहिर से पिनहां हो गया। जब सब लोग अपने घरों को लौटे तो दिलफ़िगार चुपके से उठा और अपने गिरेबान चाक-दामन में ये तोदा-ए-ख़ाक समेट लिया। और इस मश्त-ए-ख़ाक दुनिया की सब से गिरां-बहा चीज़ समझता हुआ कामरानी के नशा में मख़मूर कूचा-ए-यार की तरफ़ चला। अब की जूं जूं वो मंज़िल-ए-मक़्सूद के क़रीब आता था, उसकी हिम्मतें बढ़ती जाती थीं।कोई उसके दिल में बैठा हुआ कह रहा था अब की तिरी फ़तह और इस ख़्याल ने उसके दिल को जो ख़ाब दिखाए। उसका ज़िक्र फ़ुज़ूलहै। आख़िर वो शहर मीनू सवाद में दाख़िल हुआ।और दिलफ़रेब के आस्ताँ रिफ़अत निशान पर जाकर ख़बर दी कि दिलफ़िगार सुर्ख़रु और बा-वक़ार लौटा है और हुज़ूरी में बारयाब हुआ चाहता है। दिलफ़रेब के आशिक़ जाँबाज़ को फ़ौरन दरबार में बुलाया और उस चीज़ के लिए जो दुनिया की सब से बेशबहा जिन्स थी, हाथ फैला दिया। दिलफ़िगार ने जुर्रत कर के इस साअद सीमीं का बोसा ले लिया और वो मश्त ख़ाक इस में रख कर इस सारी कैफ़ीयत निहायत दिलसोज़ अंदाज़ में कह सुनाई और माशूक़ा दिलपज़ीर के नाज़ुक लबों से अपनी क़िस्मत का मुबारक और जांफ़ज़ा फ़ैसला सुनने के लिए मुंतज़िर हो बैठा। दिलफ़रेब ने इस मुश्त-ए-ख़ाक को आँखों से लगा लिया और कुछ देर तक दरयाए तफ़क्कुर में ग़र्क़ रहने के बाद बोली। ए आशिक़ ए जांनिसार दिलफ़िगार! बेशक ये ख़ाक कीमयाऐ सिफ़त जो तू लाया है दुनिया की निहायत बेशक़ीमत चीज़ है। और मै तेरी सिदक़ दिल से ममनून हूँ कि तू ने ऐसा बेशबहा तोहफ़ा मुझे पेशकश किया। मगर दुनिया में इस से भी ज़्यादा गिरां क़दर कोई चीज़ है। जा उसे तलाश कर और तब मेरे पास आ। में तह दिल से दुआ करती हूँ कि ख़ुदा तुझे कामयाब करे। ये कह कर वो पर्दा-ए-ज़रनिगार से बाहर आई। और माशूक़ाना अदा से अपने जमाल जांसोज़ का नज़ारा दिखा कर फिर नज़रों से ओझल हो गई। एक बर्क़ थी कि कोनदी और और फिर पर्दा-ए-अब्र में छुप गई। अभी दिलफ़िगार के हवास बजा न होने पाए थे कि चोबदार ने मुलाइमत से उसका हाथ पकड़ कर कूचा-ए-यार से निकाल दिया। और फिर तीसरी बार वो बंदा-ए-मुहब्बत। वो ज़ावीया नशीन गंज नाकामी यास के अथाह समुंद्र में ग़ोता खाने लगा।

दिलफ़िगार का हबाओ छूट गया। उसे यक़ीन हो गया कि में दुनिया में नाशाद-व-नामुराद मर जाने के लिए पैदा किया गया था और अब महज़ इस के कोई चारा नहीँ कि किसी पहाड़ पर चढ़ कर अपने तईं गरा दूं। ताकि माशूक़ की जफ़ा कारीयों के लिए एक रेज़ा इस्तिख़्वां भी बाक़ी ना रहे। वो दीवाना वार उठा और अफ़्शां-व-ख़ीज़ां एक सर बफ़लक कोह की चोटी पर जा पहुंचा। किसी और वक़्त वो एसे ऊंचे पहाड़ पर चढ़ने की जुर्रत न कर सकता था मगर इस वक़्त जान देने के जोश में उसे वो पहाड़ एक मामूली टुकरे से ज़्यादा ऊंचा न नज़र आया। क़रीब था कि वो नीचे कूद पड़े कि एक सबज़ पोश पिसर मर्द सबज़ इमामा बांधे एक हाथ में तस्बीह और दूसरे हाथ में असा लिए बरामद हुए। और हिम्मत अफ़्ज़ा लहजे में बोले।
दिलफ़िगार! नादान दिलफ़िगार! ये क्या बुज़दिलाना हरकत है? इस्तिक़लाल राह-ए-इशक़ की पहली मंज़िल है। बाअएनहमा अदाए आशिक़ी तुझे इतनी भी ख़बर नहीं। मर्द बन और यूं हिम्मत न हार। मशरिक़ की तरफ़ एक मुलक है जिस का नाम हिंदूस्तान है। वहां जा और तेरी आरज़ू पूरी होगी। “ये कह कर हज़रत ग़ायब होगए। दिलफ़िगार ने शुक्रिया की नमाज़ अदा की। और ताज़ा हौसले, ताज़ा जोश, और ग़ैबी इमदाद का सहारा पाकर ख़ुश ख़ुश पहाड़ से उतरा और जानिब-ए-हिंद मुराजअत की।

मुद्दतों तक पुर ख़ार जंगलों , शरर बार रेगिस्तानों , दुशवार गुज़ार वादीयों और नाक़ाबिल उबूर पहाड़ों को तै करने के बाद दिलफ़िगार हिंद की पाक सरज़मीन में दाख़िल हुआ। और एक ख़ुशगवार चशमा में सफ़र की कुलफ़तें धोकर ग़लबा-ए-मांदगी से लब जोइबार लिपट गया। शाम होते वो एक कफ़-ए-दस्त मैदान में पहूँचा जहां बेशुमार निम कुशता और बेजान लाशें बे-गोर-व-गफ़न पड़ी हुई थीं। ज़ाग़-व-ज़ग़न और वहशी दरिंदों की गर्म बाज़ारी थी। और सारा मैदान ख़ून से श्ंग्र्फ़ हो रहा था। ये हैबत नाक नज़ारा देखते ही दिलफ़िगार का जी दहल गया ख़ुदाया! किसी अज़ाब में जान फंसी। मरने वालों का कराहना सिसकना और एड़ीयां रगड़ कर जान देना। दरिंदों का हड्डियों को नोचना और गोश्त के लोथड़ों के लेकर भागना। ऐसा होलनाक सीन दिलफ़िगार ने कभी न देखा था। यकायक उसे ख़्याल आया। मैदान का राज़ आ रहे है और यह लाशें सो रहा सिपाइयों की हैं। इतने में क़रीब से कराहने की आवाज़ आई।दिलफ़िगार उस तरफ़ फिरा तो देखा कि एक क़ौमी हैकल शख़्स, जिस का मर्दाना चेहरा ज़ाउफ़ जान कुनदनी से ज़र्द हो गया है ज़मीन पर सर नगों पड़ा है सीने से ख़ून का फ़व्वारा जारी है।मगर शमशीर आबदार का क़बज़ा पंजे से अलग नहीं हुआ। दिलफ़िगार ने एक चीथड़ा लेकर दहान ज़ख़म पर रख दिया ताकि ख़ून रुक जाये और बोला। “ए जवान मर्द तू कौन है?” जवान मर्द ने ये सुन कर आँखें खोलीं और दिलेराना लहजा में बोला। “क्या तू नहीं जानता कि मै कौन हूँ। क्या तू ने आज इस तलवार की काट नहीं देखी? मै अपनी माँ का बेटा और भारत का लख़त-ए-जिगर हूँ। ये कहते कहते उसके तेवरों पर बल पड़ गए। ज़र्द चेहरा ख़शमगीं हो गया और शमशीर आबदार फिर अपना जौहर दिखाने के लिए चमक उठी।दिलफ़िगार समझ गया कि ये इस वक़्त मुझे दुश्मन ख़्याल कर रहा है। मुलाइमत से बोला। “ए जवान मर्द! मै तेरा दुश्मन नहीं हूँ। एक आवाराह वतन ग़ुर्बत ज़दा मुसाफ़िर हूँ। इधर भूलता भटकता आ निकला । बराह-ए-करम मुझ से यहां की मुफ़स्सिल कैफ़ीयत बयान कर। “ये सुनते ही ज़ख़मी सिपाही निहायत शीरीं लहजा में बोला।” अगर तू मुसाफ़िर है तो आ और मेरे ख़ून से तर पहलू में बैठ जा क्योंकि यही दो उंगल ज़मीन है जो मेरे पास बाक़ी रह गई है और जो सिवाए मौत के कोई नहीं छीन सकता। अफ़सोस है कि तू यहां ऐसे वक़्त में आया। जब हम तेरी मेहमान नवाज़ी करने के क़ाबिल नहीं। हमारे बाप दादा का देस आज हमारे हाथ से निकल गया। और इस वक़्त हम बेवतन हैं। मगर (पहलू बदल) हम ने हमला आवर ग़नीम को बता दिया कि राजपूत अपने देस के लिए कैसी बेजिगरी से जान देता है। ये आस पास जो लाशें तू देख रहा है। ये उन लोगों की हैं जो इस तलवार के घाट उतरे हैं (मुस्करा कर) और गो कि मै बेवतन हूँ। मगर ग़नीमत है कि हरीफ़ के हल्का में मर रहा हूँ। (सीने के ज़ख़म से चीथड़ा निकाल कर) क्या तू ने ये मरहम रख दिया। ख़ून निकलने दे। इसे रोकने से किया फ़ायदा? क्या में अपने ही वतन में गु़लामी करने के लिए ज़िंदा हूँ? नहीं ऐसी ज़िंदगी से मरना अच्छा। इस से बेहतर मौत मुम्किन नहीं।

जवान मर्द की आवाज़ मध्म हो गई। अज़ा ढीले हो गए। ख़ून इस कसरत से बहा कि अब ख़ुद-बख़ुद बंद हो गया। रह रह कर एक आध क़तरा टपक पड़ता था। आख़िर कार सारा जिस्म बेदम हो गया। क़लब की हरकत बंद हो गई। और आँखें मुंद गईं। दिलफ़िगार ने समझा अब काम तमाम हो गया कि मरने वाले ने आहिस्ता से कहा। “भारत माता की जय और उसके सीना से आख़िरी क़तरा ख़ून निकल पड़ा। एक सच्चे मुहबे-ए-वतन और देस भगत ने हुब्ब-उल-वतनी का हक़ अदा कर दिया। दिलफ़िगार इस नज़ारा से बेहद मुतास्सिर हुआ। और उसके दल ने कहा बेशक दुनिया में इस क़तरा का ख़ून से बेशक़ीमत शैय नहीं हो सकती। उसने फ़ौरन उस रशक लाल रत्तानी को हाथ में ले लिया।और उस दिलेर राजपूत की बिसालत पर अश अश करता हुआ आज़िम-ए-वतन हुआ।और वही सख़्तियां झेलता हुआ बिल आख़िर एक मुद्दत दराज़ में मलिका इक़लीम ख़ूबी और दर सदफ़ महबूबी के दर-ए-दौलत पर जा पहुंचा। और पैग़ाम दिया कि दिलफ़िगार सुर्ख़रु व-कामगार लौटा है और दरबार गहर बार में हाज़िर होना चाहता है। दिलफ़रेब ने उसे फ़ौरन हाज़िर होने का हुक्म दिया। ख़ुद हसब-ए-मामूली पर्दा-ए-ज़र निगार के पसे पुश्त बैठी और बोली। “दिलफ़िगार! अब की तू बहुत दिनों के बाद वापिस आया है। ला दुनिया की सब से बेश कमीत चीज़ कहाँ है? दिलफ़िगार ने पंजा-ए-हिनाई का बोसा लेकर दह क़तरा ख़ून उस पर रख दिया। और उसकी मुशर्रहा कैफ़ीयत पुरजोश लहजे में कह सुनाई। वो ख़ामोश भी ना होने पाया था कि यकायक वो पर्दा-ए-ज़रनिगार हट गया और दिलफ़िगार के रूबरू एक दरबार हुस्न ए आरास्ता नज़र आया। जिस में एक नानीन रशक- ए-ज़ुलेखा थी , दिलफ़रेब ब-सद शान रानाई मस्नद ज़रीं कार पर जलवा अफ़रोज़ थी। दिलफ़िगार ये तिलसम-ए-हुस्न देख कर मुतहय्यर हो गया। और नक़श-ए-दीवार की तरह सकते में आ गया। कि दिलफ़रेब मस्नद से उठी और कई क़दम आगे बढ़ कर उसके हम आग़ोश हो गई। रुका सान दिलनवाज़ ने शादियाने गाने शुरू किए। हाशिया नशनियान दरबार ने दिलफ़िगार को नज़रें गुज़ारें। और माह-व-ख़ुरशीद को ब-इज़्ज़त तमाम मस्नद पर बैठा दिया।जब नग़मा-ए-दिल पसंद बंद हुआ तो दिलफ़रेब खड़ी हो गई।और दस्त बस्ता हो कर दिलफ़िगार से बोली। “ए आशिक़-ए- जान निसार दिलफ़िगार! मेरी दुआएं तीर ब-हदफ़ हुईं और ख़ुदा ने मेरी सून ली और तुझे कामयाब-व-सुर्ख़रु किया। आज से तू मेरा आक़ा है और मै तेरी कनीज़ नाचीज़।”

ये कह कर उसने एक मुरस्सा सन्दूकचा मंगाया और उसमें से एक लौह निकाला जिस पर आब-ए-ज़र से लिखा हुआ था।
“वो आख़िरी क़तरा ख़ून वतन की हिफ़ाज़त में गिरे, दुनिया की सब से बेशक़ीमत है।”

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