रामायण बालकाण्ड : राम का जन्म , भगवान राम का जन्म कब हुआ , श्री राम जी का जन्म कब हुआ था, राम जी का जन्म कहाँ हुआ था, राम के जन्म की क्या कथा है, श्रीराम के जन्म की पौराणिक कथा, रामायण में राम का जन्म, राम का जन्म स्थान, राम जन्म कथा, संपूर्ण रामायण राम जन्म , Ramayana Balakanda : Ram janam, Ram Janam Katha in Hindi, Ram Janam Date, Ramayan Me Ram Ka Janam, Ram Ka Janam Kab Hua, Ram Ka Janam Kaha hua राम किसके पुत्र थे? लक्ष्मण किसके पुत्र थे? भरत और शत्रुघ्न किसके पुत्र थे.

आदिकवि वाल्मीकि ने रामायण और तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना की है. दोनों ही पवित्र ग्रंथ हैं। तुलसीदास जी ने श्री राम को ईश्वर मान कर रामचरितमानस की रचना की जबकि वाल्मीकि ने श्री राम को मनुष्य ही मानकर रामायण लिखा। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस को राम के राज्यभिषेक के बाद समाप्त कर दिया है वहीं आदिकवि श्री वाल्मीकि ने अपने रामायण में कथा को आगे श्री राम के महाप्रयाण तक वर्णित किया है।

कई शोधो का आधार पर माना जाता है कि श्री राम का जन्म 5114 ईसा पूर्व 10 जनवरी को सुबह के 12.05 बजे हुआ था हालांकि कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि भगवान राम का जन्म 7323 ईसा पूर्व हुआ था। जबकि सैंकड़ों वर्षों से चैत्र मास (मार्च) की नवमी को रामनवमी के रूप में मनाया जाता रहा है। आइए आज हम आपको राम जन्म की कथा सुनाते हैं।

भगवान राम का जन्म कब हुआ , राम का जन्म 

5114 ईसा पूर्व 10 जनवरी को दिन के 12.05 पर भगवान राम का जन्म हुआ था जबकि सैंकड़ों वर्षों से चैत्र मास (मार्च) की नवमी को रामनवमी के रूप में मनाया जाता रहा है। राम एक ऐतिहासिक महापुरुष थे और इसके पर्याप्त प्रमाण हैं। हालांकि कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि भगवान राम का जन्म 7323 ईसा पूर्व हुआ था।

मन्त्रीगणों तथा सेवकों ने महाराज की आज्ञानुसार श्यामकर्ण घोड़ा चतुरंगिनी सेना के साथ छुड़वा दिया। महाराज दशरथ ने देश देशान्तर के मनस्वी, तपस्वी, विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ प्रकाण्ड पण्डितों को यज्ञ सम्पन्न कराने के लिये बुलावा भेज दिया। निश्चित समय आने पर समस्त अभ्यागतों के साथ महाराज दशरथ अपने गुरु वशिष्ठ जी तथा अपने परम मित्र अंग देश के अधिपति लोभपाद के जामाता ऋंग ऋषि को लेकर यज्ञ मण्डप में पधारे। इस प्रकार महान यज्ञ का विधिवत शुभारम्भ किया गया। सम्पूर्ण वातावरण वेदों की ऋचाओं के उच्च स्वर में पाठ से गूँजने तथा समिधा की सुगन्ध से महकने लगा।

समस्त पण्डितों, ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट कर के सादर विदा करने के साथ यज्ञ की समाप्ति हुई। राजा दशरथ ने यज्ञ के प्रसाद चरा को अपने महल में ले जाकर अपनी तीनों रानियों में वितरित कर दिया। प्रसाद ग्रहण करने के परिणामस्वरूप परमपिता परमात्मा की कृपा से तीनों रानियों ने गर्भधारण किया।

जब चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य, मंगल शनि, वृहस्पति तथा शुक्र अपने-अपने उच्च स्थानों में विराजमान थे, कर्क लग्न का उदय होते ही महाराज दशरथ की बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ से एक शिशु का जन्म हुआ जो कि श्यामवर्ण, अत्यन्त तेजोमय, परम कान्तिवान तथा अद्भुत सौन्दर्यशाली था। उस शिशु को देखने वाले ठगे से रह जाते थे। इसके पश्चात् शुभ नक्षत्रों और शुभ घड़ी में महारानी कैकेयी के एक तथा तीसरी रानी सुमित्रा के दो तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ।

सम्पूर्ण राज्य में आनन्द मनाया जाने लगा। महाराज के चार पुत्रों के जन्म के उल्लास में गन्धर्व गान करने लगे और अप्सरायें नृत्य करने लगीं। देवता अपने विमानों में बैठ कर पुष्प वर्षा करने लगे। महाराज ने उन्मुक्त हस्त से राजद्वार पर आये हुये भाट, चारण तथा आशीर्वाद देने वाले ब्राह्मणों और याचकों को दान दक्षिणा दी। पुरस्कार में प्रजा-जनों को धन-धान्य तथा दरबारियों को रत्न, आभूषण तथा उपाधियाँ प्रदान किया गया। चारों पुत्रों का नामकरण संस्कार महर्षि वशिष्ठ के द्वारा कराया गया तथा उनके नाम रामचन्द्र, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखे गये। राम – दशरथ तथा कौशल्या के पुत्र थे, लक्ष्मण और शत्रुघ्न – दशरथ तथा सुमित्रा के पुत्र थे और भरत – दशरथ तथा कैकयी के पुत्र थे।

आयु बढ़ने के साथ ही साथ रामचन्द्र गुणों में भी अपने भाइयों से आगे बढ़ने तथा प्रजा में अत्यंत लोकप्रिय होने लगे। उनमें अत्यन्त विलक्षण प्रतिभा थी जिसके परिणामस्वरू अल्प काल में ही वे समस्त विषयों में पारंगत हो गये। उन्हें सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को चलाने तथा हाथी, घोड़े एवं सभी प्रकार के वाहनों की सवारी में उन्हें असाधारण निपुणता प्राप्त हो गई। वे निरन्तर माता-पिता और गुरुजनों की सेवा में लगे रहते थे। उनका अनुसरण शेष तीन भाई भी करते थे। गुरुजनों के प्रति जितनी श्रद्धा भक्ति इन चारों भाइयों में थी उतना ही उनमें परस्पर प्रेम और सौहार्द भी था। महाराज दशरथ का हृदय अपने चारों पुत्रों को देख कर गर्व और आनन्द से भर उठता था।

महाभारत कथा: जयद्रथ घटोत्कच तथा गुरु द्रोण का वध, जयद्रथ घटोत्कच और गुरु द्रोण के वध की कथा, आचार्य द्रोण वध कथा , दुर्योधन का वध , गुरु द्रोणाचार्य युद्ध महाभारत , Mahabharat Katha in Hindi , Jayadrath Ghatotkach Aur Guru Dron ka vadh , Dronacharya ka vadh , guru dronacharya ka vadh kisne kiya

महाभारत युद्ध का आरम्भ, महाभारत युद्ध के नियम, कौरवों की ओर से युद्ध करने वाले महारथी,  पाण्डवों की ओर से लड़ने वाले योद्धा , महा युद्ध का आरंभ महाभारत , महाभारत का युद्ध आरंभ , Mahabharat yuddh ka aarambh , The beginning of Mahabharata

महाभारत कथा: पांडवों का अज्ञातवास, पांडवों का अज्ञातवास क्यों हुआ, पांडवों का अज्ञातवास कितने वर्ष का था, पांडवों का वनवास , महाभारत पांडवों का अज्ञातवास , Mahabharat Katha , Pandavon Ka Agyaatavaas , agyaat vaas of pandavas , why pandavas went to vanvas

द्रौपदी चीरहरण महाभारत , द्रौपदी वस्त्र हरण, द्रौपदी का चीरहरण क्यों हुआ? ,  द्रौपदी वस्त्र हरण , द्रोपदी चीर हरण , Draupadi Cheer Haran Mahabharat , who did draupadi cheer haran, mahabharat draupadi vastraharan story in hindi