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प्यार की परिभाषा, Pyar Ki Paribhasha
प्रेम का अर्थ –  प्यार वो भावना है जो किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, जीवों और अपने ईश्वर के लिए निःस्वार्थ पैदा होती है। इसीलिए हम कह सकते हैं कि प्यार एक भावना या इमोशन है। आज के समय में ज्यादातर प्यार शब्द को स्त्री-पुरूष के प्रेम प्रसंग से जोड़ कर देखा जाता है। लेकिन असल बात तो ये है कि प्यार कभी भी और इस दुनियां में पाई जाने वाली किसी भी चीज़ के साथ हो सकता है फिर चाहे वो चीज़ जीव हो या निर्जीव!

प्रेम वह शब्द है जिसकी व्याख्या असंभव है पर इसमे जीवन छुपा है . जीने की चाह छुपी है , कभी डर तो कभी निडरता क्षुपी है कभी बहुत प्रेम तो कभी घृणा छुपी है और प्रेम को समझते समझते जिंदगी को समझने की अपने आप को समझने की कला छुपी है प्रेम वह सत्य है जो सब कुछ असत्य होने का परिचय देता है प्रेम वह है जो अपनी खूबियों पर चहकने का मौका देता है और अपनी कमियों पे रुस्वा भी करवाता है प्रेम वह सत्य है जो कंही न कंही ईश्वर से हमारा परिचय करवाता है इसलिए प्रेम बिना जीना बेकार है .

प्यार की परिभाषा 
प्रेम एक शाश्वत भाव, कल भी था आज भी है और कल भी रहेगा. प्रकृति के कण-कण में प्रेम समाया है. प्रेम की ऊर्जा से ही प्रकृति निरंतर पल्लवित, पुष्पित और फलित होती है. युगों से चली आ रही प्रेम कहानियाँ आज भी बदस्तूर जारी हैं. प्रेम की अनुभूति अपने आपमें बिरली, अद्वितीय और बेजोड़ है. किसी से प्यार करना या प्यार में होना दुनिया का सबसे खूबसूरत अहसास है.

उन लेखकों, कवियों के बारे में सोचो जिन लोगों ने प्रेम के बारे में लिखा है. जिन लोगों ने प्रेम की परिभाषा की है, जिन लोगों ने प्रेम को नाम दिया है उनकी लेखनी ने बहुत थोड़ा समय दिया है प्रेम के लिए, जो व्यावहारिक नहीं है. दुनिया के जितने भी कलाकार हैं उनसे पूछो वे सब के सब अधिक समय प्रेम के लिए नहीं दे पाते. क्योंकि यह उनकी कला के अपमान का कारण होगा. यह उनके पेशे की तौहीन होगी. यही तुम एक नेता से पूछो, एक मंत्री से पूछो, एक व्यवसायी से पूछो-क्या वे प्रेम कर पाते हैं? एक संगीतकार से पूछो तो वह प्रेम के बदले अपने संगीत को ज्यादा महत्व देगा. एक पेंटर से पूछो तो वह अपनी कला का अपमान समझेगा.

प्रेम का अर्थ यह नहीं है. प्रेम तो हृदय का विषय है जितना प्रेम चाहो तुम कर सकते हो-अगर तुमने दिल से प्रेम किया है तब. प्रेम कोई समझौता नहीं है, प्रेम कोई प्रतिबंध नहीं है, प्रेम तो एक बहाव है जो दिल से निकल कर बहता है. प्रेम एक ऐसी नदी है जो कभी समाप्त नहीं होती. और इसमें लाखों लोग अपने रास्ते को तलाश करते हैं. मोक्ष, मुक्ति को प्राप्त करते हैं और यह कभी थकती नहीं. तुम्हारा मन थक जाता है. तुम्हारा तन थक जाता है. तुम प्रेम को दोष नहीं दे सकते. प्रेम की व्याख्या करने वालों ने गलती की है, प्रेम तो सच्चा है. प्रेम तो थोडे़ समय में आनंद को छू लेता है. और वर्षो प्रेम भी सफल नहीं होता. यह सारी व्यवस्था गलत हो गई है. यह जरूरी नहीं है कि प्रेम क्षणिक नहीं हो सकता. यह भी निश्चित नहीं है कि तुम एक बार जिससे प्रेम करते हो उसी से जीवन भर करना-सच्चा प्रेम है. यदि सुबह का खिला हुआ पुष्प शाम को सूख जाता है तो वह सच्चा पुष्प नहीं है? प्रेम तो परमात्मा की समीपता का आभास कराता है. प्रेम की डोर पकड़कर हम ईश्वर तक पहुंच सकते हैं. जिसने प्रेम का मर्म जान लिया फिर उसे और कुछ जानने की आवश्यकता नहीं.

प्रेम के प्रकार – प्रेम के तीन प्रकार होते है।

  • प्रेम जो आकर्षण से मिलता है।
  • प्रेम जो सुख सुविधा से मिलता है।
  • दिव्य प्रेम।

प्रेम जो आकर्षण से मिलता हैं वह क्षणिक होता हैं क्युकी वह अनभिज्ञ या सम्मोहन की वजय से होता है. इसमें आपका आकर्षण से जल्दी ही मोह भंग हो जाता हैं और आप ऊब जाते है. यह प्रेम धीरे धीरे कम होने लगता हैं और भय, अनिश्चिता, असुरक्षा और उदासी लाता है.

जो प्रेम सुख सुविधा से मिलता हैं वह घनिष्टता लाता हैं परन्तु उसमे कोई जोश, उत्साह , या आनंद नहीं होता है. उदहारण के लिए आप एक नवीन मित्र की तुलना में अपने पुराने मित्र के साथ अधिक सुविधापूर्ण महसूस करते है क्युकी वह आपसे परिचित है. उपरोक्त दोनों को दिव्य प्रेम पीछे छोड़ देता है. यह सदाबहार नवीनतम रहता है. आप जितना इसके निकट जाएँगे उतना ही इसमें अधिक आकर्षण और गहनता आती है. इसमें कभी भी उबासी नहीं आती हैं और यह हर किसी को उत्साहित रखता है.

सांसारिक प्रेम सागर के जैसा हैं, परन्तु सागर की भी सतह होती है. दिव्य प्रेम आकाश के जैसा हैं जिसकी कोई सीमा नहीं है. सागर की सतह से आकाश के ओर की ऊँची उड़ान को भरे. प्राचीन प्रेम इन सभी संबंधो से परे हैं और इसमें सभी सम्बन्ध सम्मलित होते है.

भारतीय समाज में राधा, मीरा और सीता ने प्यार शब्द को नए आयाम दिए , भौतिक सुख से हट कर इसकी एक नई परिभाषा गढ़ी. उन बुलंदियों पर प्यार को स्थापित किया की, जनमानस में स्नेह का पात्र बन गई.

माता सीता और भगवान राम की कहानी तो जग जाहिर है, मगर धार्मिक ग्रंथो में सिर्फ उनके त्याग की ही चर्चा होती है. मेरे लिए तो वे निस्वार्थ प्यार की प्रतिमूर्ति है . सीता के मन में कभी कोई शिकायत या राम को लेकर कोई उलझन नहीं थी. जीवन ने जो भी दिया, सीता ने उसे सहर्ष स्वीकार किया. निश्चित रूप से इस ज़माने में राम की इसीलिए आलोचना होती है की उन्होंने सीता के साथ न्याय नहीं किया, मगर जहाँ तक सीता का सवाल है उनके प्यार में किसी तरह की कोई आशा या शिकायत नहीं और न ही कोई शर्त.

फिर राधा ने इसे और एक अलग अर्थ दिया , समाज के बंधन तोड़े, उम्र के बंधन तोड़े और प्यार को न सिर्फ शारीरिक सुख से अलग किया वरन प्यार की एक नई परिभाषा लिखी, हर हालत में प्रियतम का कल्याण .

मीरा का प्यार तो और भी अदभुत था न शरीर की चाह, न मिलन की आस , न ही किसी सुख की लालसा. बस सब कुछ छोड़ कर निकल पड़ी, ऐसे प्रियतम को खोजने के लिए जिसकी उन्होंने सिर्फ किवदंतियां ही सुनी थी , मूर्ति और किताबो में ही जो मिलता है.

देवदास की चंद्रमुखी से तो शायद हम सब परिचित होंगे, चंद्रमुखी का देवदास से ऐसा लगाव तब भी रहता है जब वह बेहोशी में पारो को याद कर रहा होता है और तब भी जब वह बहुत बीमार होता है. कोई आशा नहीं, कोई उम्मीद नहीं सिर्फ देवदास का कल्याण चाहती है. शरतचंद्र के अन्य उपन्यासों में भी आपको ऐसे कई पात्र मिल जायेंगे जो एक सच्चे प्यार को दर्शाते है. निस्वार्थ प्रेम. प्यार किसी से कुछ नहीं मांगता , सिर्फ प्रियतम से दर्शन की इच्छा रखता है.

कागा सब् तन खाइयो, चुन चुन खाइयो मांस।
दो नैना मत खाइयो, पिया मिलन कि आस।।
अर्थ – मिलन का कोई आग्रह भी नहीं, बस प्रियतम की एक झलक की आस है ।

प्यार बस एक अगाध स्नेह का नाम है, जिसके भी जीवन में आये उसे महका दे. ऐसा नहीं है की शारीरिक प्यार में कोई कमी रहती है या गलत होता है , सिर्फ अस्थायी होता है . फिर भी प्यार चाहे क्षणिक हो हमेशा सच्चा ही रहता है . अगर सच्चा नहीं है तो फिर सिर्फ दिखावा है .सिर्फ लेन-देन का सौदा है जिसमे सुविधाओं का , साधनो का आदान प्रदान हो .

प्रेम के रूप
बच्चा जब अपनी मां के गर्भ से बाहर आता है तो उस के लिए प्रेम का अर्थ मां होता है. एक प्रेमी के लिए उस का प्रेम उस की प्रेमिका होती है जिस की मिसाल हमें लैलामजनूं, हीररांझा या शीरींफरहाद से मिलती है.

किसी से प्रेम का अर्थ है कि वह आप के लिए आप से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया है. यह दुखदायी भी हो सकता है क्योंकि उस के लिए आप को कुछ खोना पड़ता है. बदले में बिना कुछ पाए कुछ खोने में अगर आप को कष्ट नहीं होता है तो इस का मतलब आप का उस के प्रति सच्चा प्यार है. निश्छल, निष्कपट त्याग के बिना आप प्रेम को नहीं जान सकते हैं.

प्रेम अनमोल है, पर इसे मुफ्त में पा सकते हैं. आप तय नहीं कर सकते कि प्यार कब, कितना और कहां हो. प्यार को न तो खरीद सकते हैं न बेच सकते हैं. आप प्यार करने के लिए किसी को बाध्य नहीं कर सकते हैं. आप सैक्स या अपना जीवनसाथी खरीद सकते हैं. शादी का दायरा भी कोर्ट या अन्य नियमों से बंधा होता है. पर शादी अरैंज्ड हो या प्रेमविवाह, उस का प्यार से बहुत ज्यादा लेनादेना नहीं है. प्रेम एक सर्वशक्तिशाली अनुभूति है जिसे सब मानते हैं, पर कुछ ही जानते हैं. अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिए इस का उपयोग या दुरुपयोग भी हम कर सकते हैं.

प्राचीन ग्रीकवासी प्रेम को 7 शब्दों में परिभाषित करते थे-

स्टोगे : प्राकृतिक स्नेह जो प्यार हम अपने परिवार को देते हैं.
इरोज : यौन या कामुक इच्छा. यह सकारात्मक या नकारात्मक भी हो सकती है.
अगप : बिना शर्त का स्वाभाविक प्रेम.
ल्यूडस : क्रीड़ात्मक प्रेम, बच्चे का, छेड़खानी या फ्लर्टिंग.
प्राग्मा : दीर्घकाल तक प्यार जो विवाहित जोड़े में होता है.
फिलिया: मानसिक प्रेम
फिलौटिया : स्वयं से प्रेम.

दोस्तों प्यार के मामले में एक लाइन हमेशा याद रखना कि प्यार हमेशा किसी स्त्री या पुरुष के बीच का प्रेम संबंध नहीं है प्यार एक भावना है जो किसी के भी लिए कभी भी पैदा हो सकती है, एक जानवर को भी अपने मालिक से प्यार हो जाता है। अगर आप सच्चे प्यार को समझते हैं प्यार की भावनाओं को समझते हैं तो आपने इस तरह की भावनाओं को कई बार महसूस किया होगा.

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