कुंभ संक्रांति पूजा विधि, कुंभ संक्रांति का इतिहास, कुंभ संक्रांति पर क्या करें दान, कुंभ संक्रांति का महत्व, क्यों होता है कुंभ मेला?, कुंभ संक्रांति कथा, कुंभ संक्रांति पूजा के लाभ, Kumbh Sankranti Puja Vidhi, Kumbh Sankranti History In Hindi, Kumbha Sankranti Ka Mahatva, Kyo Hota Hai Kumbh mela, Kumbha Sankranti Katha, Kumbha Sankranti ke Laabh

कुंभ संक्रांति पूजा, Kumbh Sankranti Puja
सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण करने को संक्रांति कहते हैं. ज्योतिष विज्ञान के मुताबिक हर माह सूर्य अपनी राशि बदलते हैं. सभी राशियों में भ्रमण करने का चक्र सूर्य एक वर्ष में पूरा करते हैं. वर्ष में 12 संक्रांतियां होती है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कुंभ संक्रांति पर्व (Kumbha Sankrant) तब आता है, जब सूर्य भगवान कुंभ राशि में प्रवेश करते हैं. फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को कुंभ संक्रांति मनाई जाती है. पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक हिंदू धर्म के सभी देवी देवता पवित्र नदियों में स्नान करते हैं. ऐसे में इस दिन पवित्र नदी में स्नान करना बेहद विशेष माना जाता है. प्रत्येक 12 साल में कुंभ संक्रांति के अवसर पर ही विश्व के सबसे बड़े मेले कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है. महान प्रतापी राजा हर्षवर्धन के शासन काल में कुंभ संक्रांति का उल्लेख मिलता है. इस दिन ब्राह्मणों को भोजन और दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है. इस दिन लोग गोमाता को चारा खिलाकर भी पुण्‍य अर्जित करते हैं. इस दिन सूर्यदेव की आराधना करने से घर-परिवार में किसी भी सदस्य के ऊपर कोई मुसीबत या रोग नहीं आता है. यहां जानिए कुंभ संक्रांति पूजा विधि, कुंभ संक्रांति पर क्या दान करें, कुंभ संक्रांति का महत्व, क्यों होता है कुंभ का आयोजन?, कुंभ संक्रांति कथा और अनुष्ठान आदि के बारे में जानकारी विस्तार से-

कुंभ संक्रांति पूजा विधि , Kumbh Sankranti Puja Vidhi
1. इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र नदियों में स्नान करें. मान्‍यता है कि इस दिन गंगा स्‍नान करने से मोक्ष की प्राप्‍ति होती है. इसके अलावा यमुना, गोदावरी या अन्‍य किसी भी पवित्र नदी में स्‍नान किया जा सकता है.
2. स्नान के बाद सूर्य देव की अराधना करें, उन्‍हें जल अर्पित करें और आदित्‍य ह्रदय स्रोत का पाठ करें. यह पाठ करने से जीवन के हर क्षेत्र में सफलता की प्राप्ति होगी और सुख बना रहेगा.
3. कुंभ संक्रांति के शुभ दिन सूर्य कवच, सूर्य चालीसा, सूर्य आरती, सूर्य स्तोत्र, आदित्य ह्दय स्तोत्र, सूर्य मंत्र, सूर्य नामावली वादि का विधि विधान से जाप करना चाहिए.
4. इस शुभ दिन पर सूर्य देव की विधिवत पूजा करें, इससे मनुष्य के सभी दुखों का अंत होता है.
5. इस दिन खाने पीने की वस्‍तुओं और वस्‍त्रों को गरीबों में दान करने से दोगुना पुण्‍य मिलता है.

कुंभ संक्रांति पर क्या करें दान , Kumbh Sankranti ke Din Kya Daan Karen
कुंभ संक्रांति के दिन दान करने से बहुत ही फल प्राप्त होता है. खाद्य वस्तुओं, वस्त्रों और गरीबों को दान अत्यंत ही फलदायी माना जाता है. इस दिन घी का दान सर्वश्रेष्ठ माना गया है. इसके अलावा संतरा फल गरीब बच्चों में बांटने चाहिए. स्वर्ण, स्टील, पीतल, तांबे, कांसे या चांदी के छोटे कलश मंदिर में दान करना चाहिए. इसके अलावा कुंभ संक्रांति के दिन गोदान करना भी बेहद शुभ माना जाता है.
मान्यताएं
हिंदू धर्म के अनुसार मान्यता है कि किसी भी कुंभ मेले में पवित्र नदी में स्नान या तीन डुबकी लगाने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और मानव को जन्म-पुनर्जन्म तथा मृत्यु मोक्ष की प्राप्ति होती है. धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक कुंभ संक्रांति पर्व पर अगर स्नान किया जाए तो व्यक्ति को ब्रह्म लोक की प्राप्ति होती है. इस दिन गंगा नदी में स्नान करने से बुरे काम और पापों से मुक्ति मिल जाती हैं. देवी पुराण के मुताबिक अगर संक्रांति के दिन कोई स्नान नहीं करता है तो वो कईं जन्मों तक दरिद्र रहता है.

कुंभ संक्रांति का महत्व , Kumbh Sankranti Ka Mahatva , Kumbha Sankranti Significance In Hindi
कुंभ संक्रांति का महत्व उतना ही है, जितना पूर्णिमा, अमावस्या और एकादशी तिथि का होता है. कुंभ संक्रांति पर्व के दिन स्नान-दान का अत्याधिक महत्व होता है. इस दिन वंचितों और गरीबों को विशेष रूप से दान देना चाहिए.इस दिन से दुनिया के सबसे बड़े मेला यानी कुम्भ मेले की शुरुआत हो जाती हैं. जिसे देखने और पवित्र स्नान करने के लिए लाखों श्रद्धालु नदी के किनारे पहुँचते हैं. कुम्भ संक्राति का पर्व सबसे ज्यादा इसे पूर्वी भारत के इलाकों में मनाया जाता हैं. पश्चिम बंगाल में लोग इसे शुभ फाल्गुन मास की शुरुआत के रूप में मानते हैं. मलयालम कैलेंडर के अनुसार, यह त्यौहार मासी मासम के रूप में जाना जाता है. इस दिन सभी भक्त पवित्र स्नान करने और दर्शन करने के लिए इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक जैसे शहरों की और अपना रुख करते हैं.

इतिहास (History)
कुम्भ संक्राति को मनाने की परंपरा हिन्दू रीति-रिवाजों में शताब्दीयों पुरानी हैं. भारत के प्रतापी राजा हर्षवर्धन के समय (629 CE) के इतिहास में पहली कुम्भ मेले और कुम्भ संक्राति का उल्लेख मिलता हैं. इतिहासकारों के अनुसार हर्षवर्धन के शासनकाल से ही कुम्भ मेलों का आयोजन होना शुरू हुआ था. कुम्भ मेला प्रत्येक तीन वर्षो में हरिद्वार में में गंगा, इलाहाबाद में यमुना, उज्जयिनी(उज्जैन) में शिप्रा, नासिक में गोदावरी जैसी नदियों के किनारे आयोजित किया जाता हैं. हिन्दू पुराणों जैसे भागवत पुराण में कुम्भ संक्राति का जिक्र हुआ हैं.

क्यों होता है कुंभ का आयोजन?
कुंभ को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं जिनमें प्रमुख कथा समुद्र मंथन के दौरान निकलने वाले अमृत कलश से जुड़ी है. महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण जब देवता कमजोर हो गए तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया. तब भगवान विष्णु ने उन्हें दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी. क्षीरसागर मंथन के बाद अमृत कुंभ के निकलते ही इंद्र के पुत्र ‘जयंत’ अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गए. उसके बाद दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेश पर दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा कर उसे पकड़ लिया. अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक लगातार युद्ध होता रहा. इस युद्ध के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक में कलश से अमृत बूंदें गिरी थीं. शांति के लिए भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर सबको अमृत बांटकर देव-दानव युद्ध का अंत किया. तब से जिस-जिस स्थान पर अमृत की बूंदें गिरीं थीं, वहां कुंभ मेले का आयोजन होता है. कुंभ के महत्व को ब्रह्म पुराण एवं स्कंध पुराण के 2 श्लोकों के माध्यम समझा जा सकता है.
विन्ध्यस्य दक्षिणे गंगा गौतमी सा निगद्यते उत्त्रे सापि विन्ध्यस्य भगीरत्यभिधीयते
एव मुक्त्वाद गता गंगा कलया वन संस्थिता, गंगेश्वेरं तु यः पश्येत स्नात्वा शिप्राम्भासि प्रिये

कुंभ संक्रांति कथा Kumbha Sankranti Katha In Hindi
एक बार, देवताओं और राक्षसों ने मिलकर मंथन की पहाड़ी का उपयोग करते हुए दूध के सागर को मंथन रॉड के रूप में और वासुकी को रस्सी के रूप में मंथन करने का फैसला किया. भगवान विष्णु ने एक विशाल कछुए (कूर्मावतार) का रूप धारण किया और अपनी मजबूत पीठ पर मंथन की छड़ी का समर्थन किया. समुद्र से कई चीजें निकलीं और आखिर में अमृत का बर्तन निकला.
अमृत के पात्र को शातिर राक्षसों से बचाने के लिए, देवताओं ने बर्तन को प्रयाग (इलाहाबाद) हरद्वार, उज्जैन, और नासिक सहित चार स्थानों पर छिपा दिया. इन चारों स्थानों में, कुंभ मेले के दिन अमरता का अमृत नीचे गिरा और उन सबसे पवित्र स्थानों को जन्म दिया, जहां मनुष्यों के पापों को दूर करने की सबसे बड़ी शक्ति है. इसलिए इन चार स्थलों में से एक में एक पवित्र डुबकी पुरुषों को पापों से मुक्त करने और इस जीवन के दौरान समृद्धि और इस जीवन के बाद अमरता के लिए नेतृत्व करने के लिए कहा जाता है.

कुंभ संक्रांति अनुष्ठान , Kumbha Sankranti Anusthaan
कुंभ संक्रांति के दिन सबसे शुभ गतिविधि कुंभ मेला स्थलों में से किसी एक में एक पवित्र डुबकी है. हालांकि, यदि यह संभव नहीं है, तो भक्त एक्का पत्तियों के साथ स्नान कर सकते हैं और सूर्य भगवान की पूजा कर सकते हैं. इस दिन सूर्य भगवान को अर्पित किया जाने वाला मीठा चावल पकाया जाता है. इस दिन आदित्य हृदय का पाठ करना और सूर्य नमस्कार करना अत्यधिक शुभ होता है. इस दिन ब्राह्मणों और गरीब लोगों को दान में खाद्य कद्दू दिया जाता है. इस अधिनियम को व्यक्तियों को आध्यात्मिक लाभ के साथ-साथ सर्वोत्तम सामग्री भी कहा जाता है. इस दिन गाय का दान और पूजा करना बहुत ही शुभ अनुष्ठान है.

कुंभ संक्रांति पूजा के लाभ , Kumbha Sankranti ke Laabh
1. कुंभ संक्रांति के दिन दान करने से व्यक्ति को मृत्यु के उपरांत उत्तम धाम की प्राप्‍ति होती है.
2. कुंभ संक्रांति के दिन शुभ मुहूर्त में यदि बीज मंत्र का जाप किया जाए तो मनुष्‍य को दुखों से शीघ्र छुटकारा मिल जाता है.
3. कुंभ संक्रांति पर आदित्‍य ह्रदय स्रोत का पाठ करना भी शुभ फलदायक होता है.
4. आदित्‍य ह्रदय स्रोत के पाठ से भगवान सूर्यदेव प्रसन्‍न होते हैं.
5. कुंभ संक्रांति के दिन शुभ मुहूर्त में विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने पर घर-परिवार में सभी लोगों के ऊपर कोई मुसीबत या रोग नहीं आता है.
6. कुंभ संक्रांति के दिन सूर्यदेव की पूजा करने से भगवान आदित्‍य का आशीर्वाद मिलता है जिससे जीवन के अनेक दोष भी दूर हो जाते हैं.
7. कुंभ संक्रांति के दिन सूर्यदेव की पूजा करने से प्रतिष्‍ठा और मान-सम्‍मान में भी वृद्धि होती है.

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