वेद क्या है? वेद के रचयिता कौन हैं?, वेदों का इतिहास, वेद में कुल मंत्र, वेदों की संख्या, वेदों का महत्व, वेद के अंग, वेद की शाखाएं, वेदों के उपवेद, 4 Vedas In Hindi, Rigveda In Hindi, Atharvaveda In Hindi, Samaveda In Hindi, Yajurveda In Hindi, Meaning of Vedas In Hindi, Vedo Ka Mahtva In Hindi

वेद क्या हैं?
वेद भारतीय संस्कृति के वे ग्रन्थ हैं, जिनमे ज्योतिष, गणित, विज्ञान, धर्म, ओषधि, प्रकृति, खगोल शास्त्र आदि लगभग सभी विषयों से सम्बंधित ज्ञान का भंडार भरा पड़ा है. वेद दुनिया के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं. वेद ही हिन्दू धर्म के सर्वोच्च और सर्वोपरि धर्मग्रन्थ हैं. वेदों को इतिहास का ऐसा स्रोत कहा गया है जो पोराणिक ज्ञान-विज्ञान का अथाह भंडार है.वेदों को ईश्‍वर की वाणी समझा जाता है. प्राचीन भारतीय ऋषि जिन्हें मंत्रद्रिष्ट कहा गया है, उन्हें मंत्रो के गूढ़ रहस्यों को ज्ञान कर, समझ कर, मनन कर उनकी अनुभूति कर उस ज्ञान को जिन ग्रंथो में संकलित कर संसार के समक्ष प्रस्तुत किया वो प्राचीन ग्रन्थ “वेद” कहलाये. अर्थात् वेद भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान का मूल स्रोत हैं, इनकी संख्‍या चार है. इनमें ऋगवेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद शामिल हैं.

वेद हमारी भारतीय संस्कृति की रीढ़ हैं. इनमे अनिष्ट से सम्बंधित उपाय तथा जो इच्छा हो उसके अनुसार उसे प्राप्त करने के उपाय संग्रहीत हैं. लेकिन जिस प्रकार किसी भी कार्य में मेहनत लगती है, उसी प्रकार इन रत्न रूपी वेदों का श्रमपूर्वक अध्ययन करके ही इनमे संकलित ज्ञान को मनुष्य प्राप्त कर सकता है. एक ऐसी भी मान्यता है कि इनके मन्त्रों को परमेश्वर ने प्राचीन ऋषियों को अप्रत्यक्ष रूप से सुनाया था. इसलिए वेदों को श्रुति भी कहा जाता है. वेद में एक ही ईश्वर की उपासना का विधान है और एक ही धर्म – ‘मानव धर्म’ का सन्देश है. वेद मनुष्यों को मानवता, समानता, मित्रता, उदारता, प्रेम, परस्पर-सौहार्द, अहिंसा, सत्य, संतोष, अस्तेय(चोरी ना करना), अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, आचार-विचार-व्यवहार में पवित्रता, खान-पान में शुद्धता और जीवन में तप-त्याग-परिश्रम की व्यापकता का उपदेश देता है. वेद धर्म का मूल है, वेद सर्वज्ञानमय है. इस जगत, इस जीवन एवं परमपिता परमेश्वर; इन सभी का वास्तविक ज्ञान “वेद” है.

पितृदेव मनुष्याणां वेदश्चक्षु: सनातनम.
अशक्यच्च प्रमेयच्च वेदशास्त्रमिति स्थितिः..
‘वेद’ मनुष्यों का शाश्वत यक्षु है – जो शुभ और अशुभ का ज्ञान कराता है.
वेद संसार के सभी रहस्यों की कुंजी है.

‘वेद’ का अर्थ ?
दरअसल ‘वेद’ शब्‍द की उत्‍पत्‍ति संस्‍कृत भाषा के ‘विद्’ धातु से हुई है. इस प्रकार वेद का शाब्‍दिक अर्थ है ‘ज्ञान के ग्रंथ’. इसी ‘विद्’ धातु से ‘विद्वान’ (ज्ञानी), ‘विद्या’ (ज्ञान) और ‘विदित’ (जाना हुआ) शब्‍द की उत्‍पत्‍ति भी हुई है. कुल मिलाकर ‘वेद’ का अर्थ है ‘जानने योग्‍य ज्ञान के ग्रंथ’.

आज ‘चतुर्वेद’ के रूप में ज्ञात इन ग्रंथों का विवरण इस प्रकार है –
ऋग्वेद – सबसे प्राचीन तथा प्रथम वेद जिसमें मन्त्रों की संख्या 10627 है. ऐसा भी माना जाता है कि इस वेद में सभी मंत्रों के अक्षरों की संख्या 432000 है. इसका मूल विषय ज्ञान है. विभिन्न देवताओं का वर्णन है तथा ईश्वर की स्तुति आदि.
यजुर्वेद – इसमें कार्य (क्रिया) व यज्ञ (समर्पण) की प्रक्रिया के लिये 1975 गद्यात्मक मन्त्र हैं.
सामवेद – इस वेद का प्रमुख विषय उपासना है. संगीत में गाने के लिये 1875 संगीतमय मंत्र.
अथर्ववेद – इसमें गुण, धर्म, आरोग्य, एवं यज्ञ के लिये 5977 कवितामयी मन्त्र हैं.

वेद के रचयिता कौन हैं?
वेदों को अपौरुषेय भी कहा जाता है. ‘अपौरुषेय’ का अर्थ यह हुआ कि वो कार्य जिसे कोई व्‍यक्‍ति ना कर सकता हो, यानी ईश्‍वर द्वारा किया हुआ. अत: परब्रह्म को ही वेदों का रचयिता माना जाता है. कई लोग का मानना है कि वेदव्यास जी ने वेद लिखा है. परन्तु यह ध्यान रहे कि वेदव्यास जी ने वेदों को लिपिबद्ध किया था. अर्थात् वेद तो अनादि है जो वेदव्यास जी के अवतार लेने के पहले भी थे. वेद तो भगवान के श्रीमुख से प्रकट हुए थे. भगवान से मनुष्यों तक वेद सुनते हुए आए (गुरु शिष्य परंपरा अनुसार) इसलिए वेद को श्रुति भी कहते हैं, ‘श्रुति’ अर्थात् सुना हुआ.

वेदों का इतिहास
वेद मानव सभ्यता के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं. वेदों की 28 हजार पांडुलिपियाँ भारत में पुणे के ‘भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट’ में रखी हुई हैं. इनमें से ऋग्वेद की 30 पांडुलिपियाँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं जिन्हें यूनेस्को ने विरासत सूची में शामिल किया है. यूनेस्को ने ऋग्वेद की 1800 से 1500 ई.पू. की 30 पांडुलिपियों को सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में शामिल किया है. उल्लेखनीय है कि यूनेस्को की 158 सूची में भारत की महत्वपूर्ण पांडुलिपियों की सूची 38 है.

वेद में कुल मंत्र
वेद में कुल मिलाकर एक लाख मंत्र हैं, जिसमें 80,000 कर्मकांड हैं, 16000 भक्तिकांड है और 4000 ज्ञानकांड की ऋचाएं हैं.

वेद मंत्रो का संकलन और वेदों की संख्या
ऐसी मान्यता है की वेद प्रारंभ में एक ही था और उसे पढ़ने के लिए सुविधानुसार चार भागों में विभग्त कर दिया गया- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद. (ऋग-स्थिति), (यजु-रूपांतरण), (साम-गति‍शील) और (अथर्व-जड़). ऋक को धर्म, यजुः को मोक्ष, साम को काम, अथर्व को अर्थ भी कहा जाता है. इन्ही के आधार पर धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना हुई. इन वेदों में हजारों मन्त्र और रचनाएँ हैं जो एक ही समय में संभवत: नहीं रची गयी होंगी और न ही एक ऋषि द्वारा. इनकी रचना समय-समय पर ऋषियों द्वारा होती रही और वे एकत्रित होते गए.

शतपथ ब्राह्मण के श्लोक के अनुसार अग्नि, वायु और सूर्य ने तपस्या की और ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को प्राप्त किया. प्रथम तीन वेदों को अग्नि, वायु और सूर्य से जोड़ा गया है. इन तीनो नामों के ऋषियों से इनका सम्बन्ध बताया गया है, क्योंकि इसका कारण यह है की अग्नि उस अंधकार को समाप्त करती है जो अज्ञान का अँधेरा है. इस कारण यह ज्ञान का प्रतीक बन गया है. वायु प्राय: चलायमान है, उसका काम चलना (बहना) है. इसका तात्पर्य है की कर्म अथवा कार्य करते रहना. इसलिए यह कर्म से सम्बंधित है. सूर्य सबसे तेजयुक्त है जिसे सभी प्रणाम करते हैं, नतमस्तक होकर उसे पूजते हैं. इसलिए कहा गया है की वह पूजनीय अर्थात उपासना के योग्य है. एक ग्रन्थ के अनुसार ब्रम्हाजी के चार मुखो से चारो वेदों की उत्पत्ति हुई. यहां पढ़िए वेदों के बारे में-

1. ऋग्वेद (Rigved)  
सबसे प्राचीन तथा प्रथम वेद ऋग्वेद है. ऋक अर्थात् स्थिति और ज्ञान ऋग्वेद सबसे पहला वेद है जो पद्यात्मक है. इसके 10 मंडल (अध्याय) में 1028 सूक्त है जिसमें 11 हजार मंत्र हैं. इस वेद की 5 शाखाएं हैं – शाकल्प, वास्कल, अश्वलायन, शांखायन, मंडूकायन. इसमें भौगोलिक स्थिति और देवताओं के आवाहन के मंत्रों के साथ बहुत कुछ है. ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है. इसमें जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा का आदि की भी जानकारी मिलती है. ऋग्वेद के दसवें मंडल में औषधि सूक्त यानी दवाओं का जिक्र मिलता है. इसमें औषधियों की संख्या 125 के लगभग बताई गई है, जो कि 107 स्थानों पर पाई जाती है. औषधि में सोम का विशेष वर्णन है. ऋग्वेद में च्यवनऋषि को पुनः युवा करने की कथा भी मिलती है.

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2. यजुर्वेद (Yajurved)
यजुर्वेद का अर्थ : यत् + जु = यजु. यत् का अर्थ होता है गतिशील तथा जु का अर्थ होता है आकाश. इसके अलावा कर्म. श्रेष्ठतम कर्म की प्रेरणा. यजुर्वेद में यज्ञ की विधियां और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र हैं. यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है. यह वेद गद्य मय है. इसमें यज्ञ की असल प्रक्रिया के लिए गद्य मंत्र हैं. इस वेद की दो शाखाएं हैं शुक्ल और कृष्ण.
कृष्ण :वैशम्पायन ऋषि का सम्बन्ध कृष्ण से है. कृष्ण की चार शाखाएं हैं.
शुक्ल : याज्ञवल्क्य ऋषि का सम्बन्ध शुक्ल से है. शुक्ल की दो शाखाएं हैं. इसमें 40 अध्याय हैं. यजुर्वेद के एक मंत्र में च्ब्रीहिधान्यों का वर्णन प्राप्त होता है. इसके अलावा, दिव्य वैद्य और कृषि विज्ञान का भी विषय इसमें मौजूद है.

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3. सामवेद (SomVed)
साम का अर्थ रूपांतरण और संगीत. सौम्यता और उपासना. इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं का संगीतमय रूप है. सामवेद गीतात्मक यानी गीत के रूप में है. इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है. 1824 मंत्रों के इस वेद में 75 मंत्रों को छोड़कर शेष सब मंत्र ऋग्वेद से ही लिए गए हैं.इसमें सविता, अग्नि और इंद्र देवताओं के बारे में जिक्र मिलता है. इसमें मुख्य रूप से 3 शाखाएं हैं, 75 ऋचाएं हैं.

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4. अथर्वदेव (ArthvVed)
अथर्व का अर्थ है कंपन और अथर्व का अर्थ अकंपन. ज्ञान से श्रेष्ठ कर्म करते हुए जो परमात्मा की उपासना में लीन रहता है वही अकंप बुद्धि को प्राप्त होकर मोक्ष धारण करता है. इस वेद में रहस्यमयी विद्याओं, जड़ी बूटियों, चमत्कार और आयुर्देद आदि का जिक्र है. इसके 20 अध्यायों में 5687 मंत्र है. इसके आठ खण्ड हैं जिनमें भेषज वेद और धातु वेद ये दो नाम मिलते हैं.

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वेदों का महत्व
प्राचीन काल से भारत में वेदों के अध्ययन और व्याख्या की परम्परा रही है. वैदिक सनातन वर्णाश्रम (हिन्दू) धर्म के अनुसार वैदिक काल में ब्रह्मा से लेकर वेदव्यास तथा जैमिनि तक के ऋषि-मुनियों और दार्शनिकों ने शब्द, प्रमाण के रूप में इन्हीं को माना है और इनके आधार पर अपने ग्रन्थों का निर्माण भी किया है. पराशर, कात्यायन, याज्ञवल्क्य, व्यास, पाणिनी आदि को प्राचीन काल के वेदवेत्ता कहते हैं. वेदों के विदित होने यानि चार ऋषियों के ध्यान में आने के बाद इनकी व्याख्या करने की परम्परा रही है. अतः फलस्वरूप एक ही वेद का स्वरुप भी मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् के रुप में चार ही माना गया है. इतिहास (महाभारत), पुराण आदि महान् ग्रन्थ वेदों का व्याख्यान के स्वरूप में रचे गए. प्राचीन काल और मध्ययुग में शास्त्रार्थ इसी व्याख्या और अर्थांतर के कारण हुए हैं. मुख्य विषय – देव, अग्नि, रूद्र, विष्णु, मरुत, सरस्वती इत्यादि जैसे शब्दों को लेकर हुए. वेदवेत्ता महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती के विचार में ज्ञान, कर्म, उपासना और विज्ञान वेदों के विषय हैं. जीव, ईश्वर, प्रकृति इन तीन अनादि नित्य सत्ताओं का निज स्वरूप का ज्ञान केवल वेद से ही उपलब्ध होता है. वेद में मूर्ति पूजा को अमान्य कहा गया है.

कणाद ने “तद्वचनादाम्नायस्य प्राणाण्यम्” और “बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे” कहकर वेद को दर्शन और विज्ञान का भी स्रोत माना है. हिन्दू धर्म अनुसार सबसे प्राचीन नियम विधाता महर्षि मनु ने कहा वेदोऽखिलो धर्ममूलम् – खिलरहित वेद अर्थात् समग्र संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद के रूप में वेद ही धर्म व धर्मशास्त्र का मूल आधार है. न केवल धार्मिक किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से भी वेदों का असाधारण महत्त्व है. वैदिक युग के आर्यों की संस्कृति और सभ्यता को जानने का वेद ही तो एकमात्र साधन है. मानव-जाति और विशेषतः वैदिकों ने अपने शैशव में धर्म और समाज का किस प्रकार विकास किया इसका ज्ञान केवल वेदों से मिलता है. विश्व के वाङ्मय में इनको प्राचीनतम ग्रन्थ (पुस्तक) माना जाता है. भारतीय भाषाओं का मूलस्वरूप निर्धारित करने में वैदिक भाषा अत्यधिक सहायक सिद्ध हुई है.

वेद के अंग
वेदों के सर्वांगीण अनुशीलन के लिये शिक्षा (वेदांग), निरुक्त, व्याकरण, छन्द, और कल्प (वेदांग), ज्योतिष के ग्रन्थ हैं जिन्हें ६ अंग कहते हैं. अंग के विषय इस प्रकार हैं –
शिक्षा – ध्वनियों का उच्चारण.
निरुक्त – शब्दों का मूल भाव. इनसे वस्तुओं का ऐसा नाम किस लिये आया इसका विवरण है. शब्द-मूल, शब्दावली, और शब्द निरुक्त के विषय हैं.
व्याकरण – संधि, समास, उपमा, विभक्ति आदि का विवरण. वाक्य निर्माण को समझने के लिए आवश्यक.
छन्द – गायन या मंत्रोच्चारण के लिए आघात और लय के लिए निर्देश.
कल्प – यज्ञ के लिए विधिसूत्र. इसके अन्तर्गत श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र और शुल्बसूत्र .वेदोक्त कार्य सम्पन्न करना और समर्पण करनेमे इनका महत्व है.
ज्योतिष – समय का ज्ञान और उपयोगिता. आकाशीय पिंडों (सूर्य, पृथ्वी, नक्षत्रों) की गति और स्थिति से . इसमें वेदांगज्योतिष नामक ग्रन्थ प्रत्येक वेदके अलग अलग थे . अब लगधमुनि प्रोक्त चारों वेदों के वेदांगज्योतिषों मे दो ग्रन्थ ही पाए जारे हैं -एक आर्च पाठ और दुसरा याजुस् पाठ . इस ग्रन्थ में सोमाकर नामक विद्वानके प्राचीन भाष्य मीलता है साथ ही कौण्डिन्न्यायन संस्कृत व्याख्या भी मीलता है.

वेद की शाखाएँ
इसके अनुसार वेदोक्त यज्ञों का अनुष्ठान ही वेद के शब्दों का मुख्य उपयोग माना गया है. सृष्टि के आरम्भ से ही यज्ञ करने में साधारणतया मन्त्रोच्चारण की शैली, मन्त्राक्षर एवं कर्म-विधि में विविधता रही है. इस विविधता के कारण ही वेदों की शाखाओं का विस्तार हुआ है. यथा-ऋग्वेद की २१ शाखा, यजुर्वेद की १०१ शाखा, सामवेद की १००० शाखा और अथर्ववेद की ९ शाखा- इस प्रकार कुल १,१३१ शाखाएँ हैं. इस संख्या का उल्लेख महर्षि पतंजलि ने अपने महाभाष्य में भी किया है. उपर्युक्त १,१३१ शाखाओं में से वर्तमान में केवल १२ शाखाएँ ही मूल ग्रन्थों में उपलब्ध हैः-
ऋग्वेद की २१ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त हैं- शाकल-शाखा और शांखायन शाखा.
यजुर्वेद में कृष्णयजुर्वेद की ८६ शाखाओं में से केवल ४ शाखाओं के ग्रन्थ ही प्राप्त है- तैत्तिरीय-शाखा, मैत्रायणीय शाखा, कठ-शाखा और कपिष्ठल-शाखा
शुक्लयजुर्वेद की १५ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ग्रन्थ ही प्राप्त है- माध्यन्दिनीय-शाखा और काण्व-शाखा.
सामवेद की १,००० शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त है- कौथुम-शाखा और जैमिनीय-शाखा.
अथर्ववेद की ९ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त हैं- शौनक-शाखा और पैप्पलाद-शाखा.
उपर्युक्त १२ शाखाओं में से केवल ६ शाखाओं की अध्ययन-शैली प्राप्त है-शाकल, तैत्तरीय, माध्यन्दिनी, काण्व, कौथुम तथा शौनक शाखा. यह कहना भी अनुपयुक्त नहीं होगा कि अन्य शाखाओं के कुछ और भी ग्रन्थ उपलब्ध हैं, किन्तु उनसे शाखा का पूरा परिचय नहीं मिल सकता एवं बहुत-सी शाखाओं के तो नाम भी उपलब्ध नहीं हैं.

वेदों के उपवेद
ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्यवेद ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद बतलाए गए हैं. वेद के विभाग चार है: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद. ऋग-स्थिति, यजु-रूपांतरण, साम-गति‍शील और अथर्व-जड़. ऋक को धर्म, यजुः को मोक्ष, साम को काम, अथर्व को अर्थ भी कहा जाता है. इन्ही के आधार पर धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना हुई.

नोट
7 नवम्बर 2003 को यूनेस्‍को यानी युनाइटेड नेशन्‍स एजुकेशनल, साइंटिफिक एंड कल्‍चरल ऑर्गनाइजेशन द्वारा वेदपाठ को ”मानवता के मौखिक एवं अमूर्त विरासत की श्रेष्ठ कृति” घोषित किया जा चुका है. हाल ही में भारत सरकार द्वारा सीबीएसई के तर्ज पर ही वैदिक शिक्षा बोर्ड बनाने की पहल भी शुरू कर दी गई है.

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