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सूर्य नमस्कार
सूर्य नमस्कार योगा आसनों में सब में अच्छा माना जाता है, इसे सर्वांग व्यायाम भी कहा जाता है. सिर्फ इसका ही प्रतिदिन अभ्यास व्यक्ति को सम्पूर्ण योग व्यायाम का लाभ पहुंचाने में समर्थ है. इस एक व्यायाम के अभ्यास से व्यक्ति का शरीर निरोग और स्वस्थ होकर तेजस्वी हो जाता है. सूर्य नमस्कार सभी के लिए बहुत उपयोगी है स्त्री, पुरुष, बाल, युवा तथा वृद्धों के लिए भी उपयोगी बताया गया है.

सूर्य नमस्कार कब करना चाहिए?
सारी यौगिक क्रियाओं की तरह ही सूर्य-नमस्कार के लिए भी प्रातः काल यानी सूर्योदय का समय सबसे अच्छा माना गया है. सूर्य नमस्कार सदैव खुली हवादार जगह पर कम्बल का आसन बिछाकर खाली पेट अभ्यास करना चाहिये. इस आसन को करते समय मन शान्त और प्रसन्न हो तो ही योग का सम्पूर्ण प्रभाव मिलता है.

सूर्यनमस्कार क्यों करना चाहिए?
सूर्य-नमस्कार के लगातार अभ्यास से शारीरिक और मानसिक स्फूर्ति में बढ़ोत्तरी होती है साथ ही सोचने और समझने की भी गति तीव्र होती है. इसके अलावा और भी कई लाभ हैं जो निम्नलिखित हैं :

1. सभी जरूरी अवयवों में रक्तसंचार बढता है.
2. सूर्य नमस्का‍र करने से विटामिन-डी मिलता है 3. जिससे हड्डियां मजबूत होती हैं.
4. इस आसन से आँखों की रोशनी बढती है.
5. सूर्य नमस्कार से शरीर में खून का प्रवाह तेज होता है जिससे ब्लड प्रेशर की बीमारी में आराम मिलता है.
6. सूर्य नमस्कार के आसन का असर दिमाग पर पडता है और दिमाग ठंडा रहता है.
7. इस आसन को करने से पेट के पास की वसा (चरबी) घटकर भार मात्रा (वजन) कम होती है जिससे मोटे लोगों के वजन को कम करने में यह बहुत ही मददगार साबित होता है.
8. यह आसन बालों को सफेद होने और झड़ने व रूसी से बचाता है.
9. ज्यादा गुस्सा करने वाले लोगों को इस आसन के करने के बाद क्रोध पर काबू रखने में सहायता मिलती है.
10. सूर्य नमस्कार से कमर लचीली होती है और रीढ की हडडी मजबूत होती है.
11. इस आसन को करने से त्वचा रोग होने की संभावना समाप्त हो जाती है.
12. सूर्य नमस्कार से हृदय व फेफडोंकी कार्यक्षमता बढती है.
13. इस आसन से बाहें व कमर के स्नायु बलवान हो जाते हैं .
14. यह आसन कशेरुक व कमर को लचीला बनता है.
15. इस आसन को करने से पचन क्रिया में सुधार होता है.
16. इस आसन से मन की एकाग्रता बढती है.
17. यह शरीर के सभी अंगों, मांसपेशियों व नसों को क्रियाशील करता है.
18. सूर्य नमस्कार के अभ्यास से शरीर की लोच शक्ति में आश्चर्यजनक वृद्धि होती है. प्रौढ़ तथा बूढे़ लोग भी इसका नियमित अभ्यास करते हैं तो उनके शरीर की लोच बच्चों जैसी हो जाती है.
19. इस आसन से शरीर की सभी महत्वपूर्ण ग्रंथियों, जैसे पिट्यूटरी, थायरॉइड, पैराथायरॉइड, एड्रिनल, लीवर, पैंक्रियाज, ओवरी आदि ग्रंथियों के स्रव को संतुलित करने में मदद करता है.
20. इस आसन को करने से शरीर के सभी संस्थान, रक्त संचरण, श्वास, पाचन, उत्सर्जन, नाड़ी तथा ग्रंथियों को क्रियाशील एवं मजबूत बनाता है.
21. सूर्य नमस्कार का अभ्यास करने से पाचन सम्बन्धी समस्याओं, अपच, कब्ज, बदहजमी, गैस, अफारे तथा भूख न लगने जैसी समस्याओं के समाधान में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
22. इस आसन को करने से वात, पित्त तथा कफ को संतुलित करने में मदद करता है. त्रिदोष निवारण में मदद करता है.
23. सूर्य नमस्कार के अभ्यास से रक्त संचालन तीव्र होता है तथा चयापचय की गति बढ़ जाती है, जिससे शरीर के सभी अंग सशक्त तथा क्रियाशील होते हैं.
24. सूर्य नमस्कार के नियमित अभ्यास से मोटापे को दूर किया जा सकता है और इससे दूर रहा भी जा सकता है.
25. इसका लगातार अभ्यास करने वाले व्यक्ति को हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, निम्न रक्तचाप, मधुमेह, गठिया, कब्ज जैसी परेशानियों के होने की आशंका बेहद कम हो जाती है.
26. इसका नियमित अभ्यास से मानसिक तनाव, अवसाद, एंग्जायटी आदि के निदान के साथ क्रोध, चिड़चिड़ापन तथा भय का भी निवारण करता है.
27. इस आसन को करने से रीढ़ की सभी वर्टिब्रा को लचीला, स्वस्थ एवं पुष्ट करता है.
28. यह आसन पैरों एवं भुजाओं की मांसपेशियों को सशक्त करता है. और सीने को विकसित करता है.
29. ये आसन शरीर की अतिरिक्त चर्बी को घटाता है.
30. सूर्य नमस्कार से स्मरणशक्ति तथा आत्मशक्ति में वृद्धि होती है.

सूर्य नमस्कार के कितने आसन होते हैं?
1- प्रणामासन
2- हस्त उत्तानासन
3- उत्तानासन
4- अश्व संचालनासन
5- चतुरंग दंडासन
6- अष्टांग नमस्कार
7- भुजंगासन
8- अधोमुक्त श्वानासन/पर्वतासन
9- अश्व संचालनासन
10- उत्तानासन
11- हस्त उत्तानासन
12- प्रणामासन

सूर्य-नमस्कार कैसे करना चाहिए?
सूर्य नमस्कार का अभ्यास बारह स्थितियों में किया जाता है, जो निम्नलिखित है-
(1) पहला आसन करने के लिए दोनों हाथों को जोड़कर सीधे खड़े हों. नेत्र बंद करें. ध्यान ‘आज्ञा चक्र’ पर केंद्रित करके ‘सूर्य’ का आह्वान ‘ॐ मित्राय नमः’ मंत्र के द्वारा करें.
(2) दूसरे आसन में सांस भरते हुए दोनों हाथों को कानों से सटाते हुए ऊपर की ओर तानें तथा भुजाओं और गर्दन को पीछे की ओर झुकाएं. ध्यान को गर्दन के पीछे ‘विशुद्धि चक्र’ पर केन्द्रित करें.
(3) तीसरे आसन की स्थिति में सांस को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए आगे की ओर झुकाएं. हाथ गर्दन के साथ, कानों से सटे हुए नीचे जाकर पैरों के दाएं-बाएं जमीन को छुएं. घुटने सीधे रहें. माथा घुटनों का स्पर्श करता हुआ ध्यान नाभि के पीछे ‘मणिपूरक चक्र’ पर केन्द्रित करते हुए कुछ क्षण इसी स्थिति में रुकें. कमर एवं रीढ़ के दोष वाले साधक न करें.
(4) चौथे आसन को करने के लिए इसी स्थिति में सांस को भरते हुए बाएं पैर को पीछे की ओर ले जाएं. छाती को खींचकर आगे की ओर तानें. गर्दन को अधिक पीछे की ओर झुकाएं. टांग तनी हुई सीधी पीछे की ओर खिंचाव और पैर का पंजा खड़ा हुआ. इस स्थिति में कुछ समय रुकें. ध्यान को ‘स्वाधिष्ठान’ अथवा ‘विशुद्धि चक्र’ पर ले जाएँ. मुखाकृति सामान्य रखें.
(5) पांचवे आसन में सांस को धीरे-धीरे बाहर छोड़ते हुए दाएं पैर को भी पीछे ले जाएं. ध्यान रहें कि दोनों पैरों की एड़ियां बराबर मिली हुई हों. पीछे की ओर शरीर को खिंचाव दें और एड़ियों को पृथ्वी पर मिलाने की कोशिश करें. नितम्बों को अधिक से अधिक ऊपर उठाएं. गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कण्ठकूप में लगाएं. ध्यान ‘सहस्रार चक्र’ पर केन्द्रित करने का अभ्यास करें.
(6) छठे आसन में सांस भरते हुए शरीर को जमीन के समानांतर, सीधा साष्टांग दण्डवत करें और पहले घुटने, छाती और माथा पृथ्वी पर लगा दें. नितम्बों को थोड़ा ऊपर उठा दें. सांस छोड़ दें. ध्यान को ‘अनाहत चक्र’ पर टिका दें. श्वास की गति सामान्य करें.
(7) सातवें आसन की स्थिति में धीरे-धीरे सांस को भरते हुए छाती को आगे की ओर खींचते हुए हाथों को सीधे कर दें. गर्दन को पीछे की ओर ले जाएं. घुटने पृथ्वी का स्पर्श करते हुए तथा पैरों के पंजे खड़े रहें. मूलाधार को खींचकर वहीं ध्यान को टिका दें.
(8) आठवें आसन में सांस को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए दाएं पैर को भी पीछे ले जाएं. दोनों पैरों की एड़ियां बराबर मिली हुई हों. पीछे की ओर शरीर को खिंचाव दें और एड़ियों को पृथ्वी पर मिलाने का प्रयास करें. नितम्बों को अधिक से अधिक ऊपर उठाएं. गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कण्ठकूप में लगाएं. ध्यान ‘सहस्रार चक्र’ पर केन्द्रित करने का अभ्यास करें.
(9) नवें आसन की स्थिति में सांस को भरते हुए बाएं पैर को पीछे की ओर ले जाएं. छाती को खींचकर आगे की ओर तानें. गर्दन को अधिक पीछे की ओर झुकाएं. टांग तनी हुई सीधी पीछे की ओर खिंचाव और पैर का पंजा खड़ा हुआ. इस स्थिति में कुछ समय रुकें. ध्यान को ‘स्वाधिष्ठान’ अथवा ‘विशुद्धि चक्र’ पर ले जाएँ. मुखाकृति सामान्य रखें.
(10) दसवें आसन की तीसरी स्थिति में सांस को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए आगे की ओर झुकाएं. हाथ गर्दन के साथ, कानों से सटे हुए नीचे जाकर पैरों के दाएं-बाएं पृथ्वी का स्पर्श करें. घुटने सीधे रहें. माथा घुटनों का स्पर्श करता हुआ ध्यान नाभि के पीछे ‘मणिपूरक चक्र’ पर ध्यान लगाते हुए कुछ क्षण इसी स्थिति में रुकें. कमर एवं रीढ़ के दोष वाले साधक न करें.
(11) ग्यारवें आसन की स्थिति में सांस भरते हुए दोनों हाथों को कानों से सटाते हुए ऊपर की ओर तानें तथा भुजाओं और गर्दन को पीछे की ओर झुकाएं. ध्यान को गर्दन के पीछे ‘विशुद्धि चक्र’ पर केन्द्रित करें.
(12) बारहवें आसन की स्थिति – पहली स्थिति की तरह रहेगी.

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