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सुभाष चन्द्र बोस के जीवन से सम्बन्धित प्रमुख तथ्य
नाम– सुभाष चन्द्र बोस
जन्म– 23 जनवरी 1897
जन्म स्थान– कटक, उड़ीसा
माता का नाम- प्रभावती,
पिता का नाम– जानकीनाथ बोस (प्रसिद्ध वकील)
पत्नी– ऐमिली शिंकल
बच्चे– इकलौती पुत्री अनीता बोस
शिक्षा– मैट्रिक (1912-13), इंटरमिडिएट (1915), बी. ए. आनर्स (1919), भारतीय प्रशासनिक सेवा (1920-21)
विद्यालय– रेवेंशॉव कॉलेजिएट (1909-13), प्रेजिडेंसी कॉलेज (1915), स्कॉटिश चर्च कॉलेज (1919), केंब्रिज विश्वविद्यालय (1920-21)
संगठन– आजाद हिन्द फौज, आल इंडिया नेशनल ब्लाक फॉर्वड, स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार
उपलब्धी– आई.सी.एस. बनने वाले प्रथम भारतीय, दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष, भारत को स्वतंत्र कराने के संघर्ष में 11 बार जेल की एतिहासिक यात्रा, भारतीय स्वतंत्रता के लिये अन्तिम सांस तक प्रयास करते हुये शहीद हुये।
मृत्यु– 18 अगस्त 1945 (विवादित)
मृत्यु का कारण– विमान दुर्घटना
मृत्यु स्थान– ताइहोकू, ताइवान

जन्म एंव बाल्यकाल
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का जन्म उड़ीसा राज्य के कटक स्थान पर 23 जनवरी 1897 को हुआ था. इनका परिवार बंगाल का एक सम्पन्न परिवार था. इनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस था, जो बंगाल के एक प्रसिद्ध वकील थे. इनकी माता का नाम प्रभावती था. प्रभावती और जानकी नाथ की 14 सांतान थी, जिसमें उनकी 6 बेटियां और 8 बेटे थे. सुभाष चन्द्र बोस उनके नौवे संतान थे. सुभाष चन्द्र बोस का बाल्यकाल बड़ी सम्पन्नता में व्यतीत हुआ. इन्होंने कभी भी किसी भी वस्तु का अभाव नहीं रहा. सुभाष चंद्र बोस बाल्यकाल से ही गम्भीर स्वभाव के थे.

प्रारंभिक शिक्षा से लेकर ICS तक का सफर
सुभाष चन्द्र बोस ने कटक के प्रोटेस्टेण्ट स्कूल से प्राइमरी शिक्षा पूर्ण कर 1909 में रेवेनशा कॉलेजियेट स्कूल में दाखिला लिया. सुभाष पढ़ाई में बेहद होनहार थे. कॉलेज के प्रिन्सिपल बेनीमाधव दास के व्यक्तित्व का सुभाष के मन पर अच्छा प्रभाव पड़ा और मात्र पन्द्रह वर्ष की आयु में उन्होंने विवेकानन्द साहित्य का पूर्ण अध्ययन कर लिया था. 1912-13 में इन्होंने मैट्रिक की परीक्षा में विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान प्राप्त किया और बीमार होने के बावजूद उन्होंने 1915 में इण्टरमीडियेट की परीक्षा द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की. 1916 में जब वे दर्शनशास्त्र (ऑनर्स) में बीए के छात्र थे किसी बात पर प्रेसीडेंसी कॉलेज के अध्यापकों और छात्रों के बीच झगड़ा हो गया सुभाष ने छात्रों का नेतृत्व सम्हाला जिसके कारण उन्हें प्रेसीडेंसी कॉलेज से एक साल के लिये निकाल दिया गया और परीक्षा देने पर प्रतिबन्ध भी लगा दिया.

सुभाष सेना मे भर्ती होना चाहते थे, जिसकी वजह से उन्होंने 49वीं बंगाल रेजीमेण्ट में भर्ती के लिये परीक्षा दी किन्तु आँखें खराब होने के कारण उन्हें सेना के लिये अयोग्य घोषित कर दिया गया. 1919 में कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से बी०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे आई०सी०एस० की परीक्षा में सम्मिलित होने इंग्लैण्ड चले गये. भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए उन्होंने 1920 में आवेदन किया और इस परीक्षा में उनको न सिर्फ सफलता मिली बल्कि उन्होंने चौथा स्थान भी हासिल किया.

सुभाषचन्द्र बोसजी विलायत में इण्डियन मजलिस के साप्ताहिक अधिवेशन में नियमित जाया करते थे . वहां पर वे भारतीय क्रान्तिकारियों के देशभक्तिपूर्ण विचारों को सुना करते थे . सरोजिनी नायडू लोकमान्य तिलक के क्रान्तिकारी विचारों को सुनने का प्रभाव यह हुआ कि उन्होंने कलेक्टर, कमिश्नर बनने तथा अंग्रेज सरकार की सेवा करने की बजाय मातृभूमि का सेवक बनने का संकल्प लिया . वे जलियावाला बाग के नरसंहार के बहुत व्याकुल हुए और 1921 में प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा दे दिया. सुभाष जून 1921 में मानसिक एवं नैतिक विज्ञान में ट्राइपास (ऑनर्स) की डिग्री के साथ स्वदेश वापस लौट आये।

ऑस्ट्रिया में प्रेम विवाह
सन् 1934 में जब सुभाष ऑस्ट्रिया में अपना इलाज कराने हेतु ठहरे हुए थे उस समय उन्हें अपनी पुस्तक लिखने हेतु एक अंग्रेजी जानने वाले टाइपिस्ट की आवश्यकता हुई. उनके एक मित्र ने एमिली शेंकल (Emilie Schenkl) नाम की एक ऑस्ट्रियन महिला से उनकी मुलाकात करा दी. एमिली के पिता एक प्रसिद्ध पशु चिकित्सक थे. सुभाष एमिली की ओर आकर्षित हुए और उन दोनों में स्वाभाविक प्रेम हो गया. नाजी जर्मनी के सख्त कानूनों को देखते हुए उन दोनों ने सन् 1942 में बाड गास्टिन नामक स्थान पर हिन्दू पद्धति से विवाह रचा लिया. वियेना में एमिली ने एक पुत्री को जन्म दिया. सुभाष ने उसे पहली बार तब देखा जब वह मुश्किल से चार सप्ताह की थी. उन्होंने उसका नाम अनिता बोस रखा था.

राजनीतिक जीवन
भारत वापस आने के बाद नेता जी गांधीजी के संपर्क में आए और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए. गांधी जी के निर्देशानुसार उन्होंने देशबंधु चितरंजन दास के साथ काम करना शुरू किया. उन्होंने बाद में चितरंजन दास को अपना राजनैतिक गुरु बताया था. अपनी सूझ-बूझ और मेहनत से सुभाष बहुत जल्द ही कांग्रेस के मुख्य नेताओं में शामिल हो गए. 1928 में जब साइमन कमीशन आया तब कांग्रेस ने इसका विरोध किया और काले झंडे दिखाए. 1928 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कोलकाता में हुआ. इस अधिवेशन में अंग्रेज सरकार को डोमिनियन स्टेटस देने के लिए एक साल का वक्त दिया गया. उस दौरान गांधी जी पूर्ण स्वराज की मांग से सहमत नहीं थे. वहीं सुभाष को और जवाहर लाल नेहरू को पूर्ण स्वराज की मांग से पीछे हटना मंजूर नहीं था. 1930 में उन्होंने इंडीपेंडेंस लीग का गठन किया. सन 1930 के सिविल डिसओबिडेंस आन्दोलन के दौरान सुभाष को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. गांधी जी-इरविन पैक्ट के बाद 1931 में उनकी रिहाई हुई. सुभाष ने गाँधी-इरविन पैक्ट का विरोध किया और  सिविल डिसओबिडेंस आन्दोलन को रोकने के फैसले से भी वह खुश नहीं थे.

सुभाष को जल्द ही बंगाल अधिनियम के अंतर्गत दोबारा ल भेज दिया गया. बाद में बीमारी की वजह से उनको जेल से रिहाई मिली. उनको भारत से यूरोप भेज दिया गया. वहां उन्होंने, भारत और यूरोप के मध्य राजनैतिक और सांकृतिक संबंधों को बढ़ाने के लिए कई शहरों में केंद्र स्थापित किये. उनके भारत आने पर पाबंदी होने बावजूद वो भारत आए और परिणामतः उन्हें 1 साल के लिए जेल जाना पड़ा . 1937 के चुनावों के बाद कांग्रेस पार्टी 7 राज्यों में सत्ता में आई और इसके बाद सुभाष को रिहा किया गया. इसके कुछ समय बाद सुभाष कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन (1938) में अध्यक्ष चुने गए. अपने कार्यकाल के दौरान सुभाष ने राष्ट्रीय योजना समिति का गठन किया. 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन में सुभाष को दोबारा अध्यक्ष चुन लिया गया. इस बार सुभाष का मुकाबला पट्टाभि सीतारमैया से था. सीतारमैया को गांधीजी का पूर्ण समर्थन प्राप्त था फिर भी 203 मतों से सुभाष चुनाव जीत गए. इस दौरान द्वितीय विश्वयुध्द के बादल भी मडराने लगे थे और सुभाष ने अंग्रेजों को 6 महीने में देश छोड़ने का अल्टीमेटम दे दिया. सुभाष के इस रवैय्ये का विरोध गांधीजी समेत कांग्रेस के अन्य लोगों ने भी किया जिसके कारण उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और फॉरवर्ड ब्लाक की स्थापना की.

आजाद हिंद फौज का गठन
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, सितम्बर 1939, में सुभाष चन्द्र बोस ने एक जन आंदोलन आरंभ करने की योजना बनाई. उन्होंने पुरे भारत के लोगों को इस आन्दोलन के लिए प्रोत्साहित किया और लोगों को इस आंदोलन से जोड़ना भी शुरू कर दिया. इस आन्दोलन की शुरुवात की भनक लगते ही ब्रिटिश सरकार ने सुभाष चन्द्र बोस को जेल में डाल दिया. उन्होंने जेल में 2 हफ़्तों तक खाना तक नहीं खाया. खाना ना खाने के कारण जब उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा तो हंगामे के डर से उन्हें घर में नज़रबंद कर के रखा गया.

साल 1941 में हाउस अरेस्ट (House-arrest) के दौरान सुभाष ने जेल से भागने की एक योजना बनाई. सन् 1940 की मध्य रात्रि में वे मौलाना का वेश बनाकर वहां से भाग निकले. वे जेल से भागकर पेशावर पहुंचे और सुनियोजित योजना के तहत अपने क्रान्तिकारी साथियों से मिले. उसके बाद वो जर्मनी चले गए और वहां हिटलर(Hitler) से मिले. सुभाष चन्द्र बोस बर्लिन में अपनी पत्नी एमिली शेंकल Emilie Schenkl के साथ रहते थे. 1943 में बोस ने दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी आर्मी को तैयार किया जिसका नाम उन्होंने आजाद हिंद फौज  (इंडियन नेशनल आर्मी Indian National Army) रखा. नेताजी आज़ाद हिन्द फौज के प्रधान सेनापति भी बन गये. आज़ाद हिन्द फौज में जापानी सेना ने अंग्रेजों की फौज से पकड़े हुए भारतीय युद्धबन्दियों को भर्ती किया था. आज़ाद हिन्द फ़ौज में औरतों के लिये झाँसी की रानी रेजिमेंट भी बनायी गयी. पूर्वी एशिया में नेताजी ने अनेक भाषण देकर वहाँ के स्थायी भारतीय लोगों से आज़ाद हिन्द फौज में भर्ती होने और उसे आर्थिक मदद देने का आवाहन किया. उन्होंने अपने आवाहन में यह सन्देश भी दिया – तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा.

21 अक्टूबर 1943 के दिन नेताजी ने सिंगापुर में आर्जी-हुकूमते-आज़ाद-हिन्द (स्वाधीन भारत की अन्तरिम सरकार) की स्थापना की. वे खुद इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री और युद्धमन्त्री बने. इस सरकार को कुल नौ देशों ने मान्यता दी.

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आज़ाद हिन्द फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत पर आक्रमण किया. अपनी फौज को प्रेरित करने के लिये नेताजी ने दिल्ली चलो का नारा दिया. दोनों फौजों ने अंग्रेजों से अंदमान और निकोबार द्वीप जीत लिये. यह द्वीप आर्जी-हुकूमते-आज़ाद-हिन्द के अनुशासन में रहे. नेताजी ने इन द्वीपों को शहीद द्वीप और स्वराज द्वीप का नया नाम दिया. दोनों फौजों ने मिलकर इंफाल और कोहिमा पर आक्रमण किया. लेकिन बाद में अंग्रेजों का पलड़ा भारी पड़ा और दोनों फौजों को पीछे हटना पड़ा.

जब आज़ाद हिन्द फौज पीछे हट रही थी तब जापानी सेना ने नेताजी के भाग जाने की व्यवस्था की. परन्तु नेताजी ने झाँसी की रानी रेजिमेंट की लड़कियों के साथ सैकड़ों मील चलते रहना पसन्द किया. इस प्रकार नेताजी ने सच्चे नेतृत्व का एक आदर्श प्रस्तुत किया.

6 जुलाई 1944 को आज़ाद हिन्द रेडियो पर अपने भाषण के माध्यम से गान्धीजी को सम्बोधित करते हुए नेताजी ने जापान से सहायता लेने का अपना कारण और आर्जी-हुकूमते-आज़ाद-हिन्द तथा आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना के उद्देश्य के बारे में बताया. इस भाषण के दौरान नेताजी ने गान्धीजी को राष्ट्रपिता कहा तभी गांधीजी ने भी उन्हे नेताजी कहा.

दुर्घटना और मृत्यु की खबर
द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद, नेताजी को नया रास्ता ढूँढना जरूरी था. उन्होने रूस से सहायता माँगने का निश्चय किया था. 18 अगस्त 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मंचूरिया की तरफ जा रहे थे. इस सफर के दौरान वे लापता हो गये. इस दिन के बाद वे कभी किसी को दिखायी नहीं दिये.

23 अगस्त 1945 को टोकियो रेडियो ने बताया कि सैगोन में नेताजी एक बड़े बमवर्षक विमान से आ रहे थे कि 18 अगस्त को ताइहोकू (Taihoku Teikoku Daigaku) हवाई अड्डे के पास उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया. विमान में उनके साथ सवार जापानी जनरल शोदेई, पाइलेट तथा कुछ अन्य लोग मारे गये. नेताजी गम्भीर रूप से जल गये थे. उन्हें ताइहोकू सैनिक अस्पताल ले जाया गया जहाँ उन्होंने दम तोड़ दिया. कर्नल हबीबुर्रहमान के अनुसार उनका अन्तिम संस्कार ताइहोकू में ही कर दिया गया.

नेताजी की मृत्यु पर विवाद
इस प्रकार नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की रहस्यमयी मृत्यु पर बहुत से विवाद खड़े हो गये. किसी को भी इस बात पर विश्वास नहीं हो पा रहा था कि जो व्यक्ति लोगों के हृदय में स्वतंत्रता की चिंगारी को जलाता रहा वो अब नहीं रहा. बंगाल प्रान्त के उनके समर्थकों ने उनकी विमान दुर्घटना में मृत्यु को सच नहीं माना. जिसके बाद 1947 को देश आजाद होने के बाद भारत की नयी निर्वाचित सरकार ने इनकी मृत्यु की जाँच के लिये तीन जाँच कमीशन नियुक्त किये. जिसमें से दो ने उनकी विमान दुर्घटना में मृत्यु को सही मान लिया जबकि एक कमीशन ने अपनी रिपार्ट में नेताजी की विमान दुर्घटना में मृत्यु की कहानी को कोरा झूठ बताया. भारत सरकार ने इस रिपोर्ट को बिना कोई ठोस कारण दिये रद्द कर दिया और बाकि दो कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की विमान दुर्घटना में मृत्यु की पुष्टि कर उन रिपोर्टों को सार्वजनिक कर दिया.

सुभाष चन्द्र बोस द्वारा लिखी गयी पुस्तकें

  • भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष.
  • आजाद हिन्द.
  • तरुनेर सपना.
  • अल्टरनेटिव लीडरशिप.
  • जरुरी कीचू लेखा.
  • द एसेंशशियल राइटिंग्स ऑफ सुभाष चन्द्र बोस.
  • 5th सुभाष चन्द्र बोस समग्र.
  • संग्राम रंचनाबली.
  • चलो दिल्ली: राइटिंग्स़ एंड स्पीच, 1943 -1945.
  • आइडियाज़ ऑफ ए नेशन: सुभाष चन्द्र बोस.
  • नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, द लास्ट फेस इन हिस ओन वर्ल्डस.
  • इंडियाज़ स्पोक मैन अब्रॉड: लेटर्स, आर्टिकल्स, स्पीचस़ एंड सेटलमेंट.
  • लाइफ एंड टाइम्स ऑफ सुभाष चन्द्र बोस, एज़ टोल्ड इन हिज़ ओन वर्ड्स.
  • सेलेक्टेड स्पीचस़.
  • सुभाष चन्द्र बोस एजेंडा फॉर आजाद हिन्द.
  • स्वतंत्रता के बाद भारत: सुभाष चन्द्र बोस के चुनिंदा भाषण.
  • तरुणाई के सपने.
  • एट द क्रॉस रोड़स़ ऑफ चेंज़.

सुभाष चन्द्र बोस के कथन या नारे –

  • तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा.
  • राष्ट्रवाद, मानव जाति के उच्चतम आदर्श सत्यम्, शिवम् और सुन्दरम् से प्रेरित है.
  • मेरे मन में कोई संदेह नहीं है कि हमारे देश की प्रमुख समस्याओं जैसे गरीबी, अशिक्षा, बीमारी, कुशल उत्पादन एवं वितरण का समाधान सिर्फ समाजवादी तरीके से ही किया जा सकता है.
  • ये हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी स्वतंत्रता का मोल अपने खून से चुकाएं. हमें अपने बलिदान और परिश्रम से जो आज़ादी मिलेगी, हमारे अन्दर उसकी रक्षा करने की ताकत होनी चाहिए.
  • मध्या भावो गुडं दद्यात – अर्थात् जहाँ शहद का अभाव हो वहां गुड़ से ही शहद का कार्य निकालना चाहिए.
  • भारत में राष्ट्रवाद ने एक ऐसी सृजनात्मक शक्ति का संचार किया है जो सदियों से लोगों के अन्दर से सुसुप्त पड़ी थी.
  • आज हमारे अन्दर बस एक ही इच्छा होनी चाहिए, मरने की इच्छा ताकि भारत जी सके! एक शहीद की मौत मरने की इच्छा ताकि स्वतंत्रता का मार्ग शहीदों के खून से प्रशस्त हो सके.
  • यदि आपको अस्थायी रूप से झुकना पड़े तब वीरों की भाँति झुकना.
  • मुझे ये नहीं मालूम की स्वतंत्रता के इस युद्ध में हम में से कौन-कौन जीवित बचेंगा! परन्तु मैं ये जानता हूँ, अंत में विजय हमारी ही होगी.
  • असफलताएँ कभी-कभी सफलता की स्तम्भ होती हैं.
  • समझौतापरस्ती बहुत अपवित्र वस्तु है.
  • कष्टों का निसंदेह एक आंतरिक नैतिक मूल्य होता है.
  • मैंने जीवन में कभी भी खुशामद नहीं की है! दूसरों को अच्छी लगने वाली बातें करना मुझे नहीं आता.
  • संघर्ष ने मुझे मनुष्य बनाया! मुझमें आत्मविश्वास उत्पन्न हुआ, जो पहले नहीं था.
  • समय से पूर्व की परिपक्वता अच्छी नहीं होती, चाहे वह किसी वृक्ष की हो, या व्यक्ति की और उसकी हानि आगे चल कर भुगतनी ही होती है.
  • मैं जीवन की अनिश्चितता से जरा भी नहीं घबराता.
  • मुझमें जन्मजात प्रतिभा तो नहीं थी, परन्तु कठोर परिश्रम से बचने की प्रवृति मुझमे कभी नहीं रही.
  • अपने कॉलेज जीवन की दहलीज़ पर खड़े होकर मुझे अनुभव हुआ, जीवन का अर्थ भी है और उद्देश्य भी.
  • भविष्य अब भी मेरे हाथ में है.
  • चरित्र निर्माण ही छात्रों का मुख्य कर्तव्य है.
  • कर्म के बंधन को तोड़ना बहुत कठिन कार्य है.
  • माँ का प्यार सबसे गहरा और स्वार्थ रहित होता है! इसको किसी भी प्रकार नापा नहीं जा सकता.
  • याद रखिये अन्याय सहना और गलत के साथ समझौता करना सबसे बड़ा अपराध है.
  • एक सच्चे सैनिक को सैन्य और आध्यात्मिक दोनों ही प्रशिक्षण की ज़रुरत होती है.
  • इतिहास साक्षी है कि केवल विचार-विमर्श से कोई ठोस परिवर्तन नहीं हासिल किया गया है.

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