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रामधारी सिंह दिनकर की जीवनी
हिंदी साहित्य के महान कवि माने जाने वाले रामधारी सिंह दिनकर हिन्दी के प्रमुख लेखक, कवि व निबन्धकार और चिकित्सक थे. आपको बता दें कि दिनकर राष्ट्रवादी कवियों में राष्ट्रवादी कविता के साथ एक विद्रोही कवि के रूप में उभरे. उनकी कविता ने वीर रस को उकसाया, और राष्ट्रवाद की भावना को बढाने वाली प्रेरणादायक देशभक्तिपूर्ण रचना के कारण उन्हें राष्ट्रकवि (राष्ट्रीय कवि) के रूप में सम्मान दिया गया. वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे. एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है. इन्हीं दो प्रवृत्तियों का चरम उत्कर्ष हमें उनकी कुरुक्षेत्र और उर्वशी नामक कृतियों में मिलता है.

पूरा नाम: – रामधारी सिंह दिनकर
जन्म: – 23 सितंबर, 1908
जन्म स्थान: – सिमरिया, मुंगेर, बिहार
मृत्यु: – 24 अप्रैल, 1974
मृत्यु स्थान: – चेन्नई, तमिलनाडु
पद/कार्य: – कवि, लेखक

रामधारी सिंह दिनकर का जन्म
दिनकर जी का जन्म 24 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गाँव में एक सामान्य किसान रवि सिंह तथा उनकी पत्नी मनरूप देवी के पुत्र के रूप में हुआ था. दिनकर दो वर्ष के थे, जब उनके पिता का देहावसान हो गया. परिणामत: दिनकर और उनके भाई-बहनों का पालन-पोषण उनकी विधवा माता ने किया. दिनकर का बचपन और कैशोर्य देहात में बीता, जहाँ दूर तक फैले खेतों की हरियाली, बांसों के झुरमुट, आमों के बग़ीचे और कांस के विस्तार थे. प्रकृति की इस सुषमा का प्रभाव दिनकर के मन में बस गया, पर शायद इसीलिए वास्तविक जीवन की कठोरताओं का भी अधिक गहरा प्रभाव पड़ा.

रामधारी सिंह दिनकर की शिक्षा
संस्कृत के एक पंडित के पास अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्रारंभ करते हुए दिनकर जी ने गाँव के प्राथमिक विद्यालय से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की एवं निकटवर्ती बोरो नामक ग्राम में राष्ट्रीय मिडिल स्कूल जो सरकारी शिक्षा व्यवस्था के विरोध में खोला गया था, में प्रवेश प्राप्त किया. यहीं से इनके मनोमस्तिष्क में राष्ट्रीयता की भावना का विकास होने लगा था. हाई स्कूल की शिक्षा इन्होंने मोकामाघाट हाई स्कूल से प्राप्त की. इसी बीच इनका विवाह भी हो चुका था तथा ये एक पुत्र के पिता भी बन चुके थे. 1928 में मैट्रिक के बाद दिनकर ने पटना विश्वविद्यालय से 1932 में इतिहास में बी. ए. ऑनर्स किया. उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था.

रामधारी सिंह दिनकर का पद
बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक विद्यालय में अध्यापक हो गये. 1934 से 1947 तक बिहार सरकार की सेवा में सब-रजिस्टार और प्रचार विभाग के उपनिदेशक पदों पर कार्य किया. रेणुका और हुंकार की कुछ रचनाऐं यहाँ-वहाँ प्रकाश में आईं और अंग्रेज़ प्रशासकों को समझते देर न लगी कि वे एक ग़लत आदमी को अपने तंत्र का अंग बना बैठे हैं और दिनकर की फ़ाइल तैयार होने लगी, बात-बात पर क़ैफ़ियत तलब होती और चेतावनियाँ मिला करतीं. 4 वर्ष में 22 बार उनका तबादला किया गया. 1947 में देश स्वाधीन हुआ और वह बिहार विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रध्यापक व विभागाध्यक्ष नियुक्त होकर मुज़फ़्फ़रपुर पहुँचे. 1952 में जब भारत की प्रथम संसद का निर्माण हुआ, तो उन्हें राज्यसभा का सदस्य चुना गया और वह दिल्ली आ गए. दिनकर 12 वर्ष तक संसद-सदस्य रहे, बाद में उन्हें सन 1964 से 1965 ई. तक भागलपुर विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया. लेकिन अगले ही वर्ष भारत सरकार ने उन्हें 1965 से 1971 ई. तक अपना हिन्दी सलाहकार नियुक्त किया और वह फिर दिल्ली लौट आए.

रामधारी सिंह दिनकर की कृतियाँ
उन्होंने सामाजिक और आर्थिक समानता और शोषण के खिलाफ कविताओं की रचना की. एक प्रगतिवादी और मानववादी कवि के रूप में उन्होंने ऐतिहासिक पात्रों और घटनाओं को ओजस्वी और प्रखर शब्दों का तानाबाना दिया. उनकी महान रचनाओं में रश्मिरथी और परशुराम की प्रतीक्षा शामिल है. उर्वशी को छोड़कर दिनकर की अधिकतर रचनाएँ वीर रस से ओतप्रोत है. भूषण के बाद उन्हें वीर रस का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है.

ज्ञानपीठ से सम्मानित उनकी रचना उर्वशी की कहानी मानवीय प्रेम, वासना और सम्बन्धों के इर्द-गिर्द घूमती है. उर्वशी स्वर्ग परित्यक्ता एक अप्सरा की कहानी है. वहीं, कुरुक्षेत्र, महाभारत के शान्ति-पर्व का कवितारूप है. यह दूसरे विश्वयुद्ध के बाद लिखी गयी रचना है. वहीं सामधेनी की रचना कवि के सामाजिक चिन्तन के अनुरुप हुई है. संस्कृति के चार अध्याय में दिनकरजी ने कहा कि सांस्कृतिक, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद भारत एक देश है. क्योंकि सारी विविधताओं के बाद भी, हमारी सोच एक जैसी है.

रामधारी सिंह दिनकर की काव्य कृतियाँ
बारदोली-विजय संदेश (1928), प्रणभंग (1929), रेणुका (1935), हुंकार (1938), रसवन्ती (1939), द्वंद्वगीत (1940), कुरूक्षेत्र (1946), धूप-छाँह (1947), सामधेनी (1947), बापू (1947), इतिहास के आँसू (1951), धूप और धुआँ (1951), मिर्च का मजा (1951), रश्मिरथी (1952), दिल्ली (1954), नीम के पत्ते (1954), नील कुसुम (1955), सूरज का ब्याह (1955), चक्रवाल (1956), कवि-श्री (1957), सीपी और शंख (1957), नये सुभाषित (1957), लोकप्रिय कवि दिनकर (1960), उर्वशी (1961), परशुराम की प्रतीक्षा (1963), आत्मा की आँखें (1964), कोयला और कवित्व (1964), मृत्ति-तिलक (1964), दिनकर की सूक्तियाँ (1964), हारे को हरिनाम (1970), संचियता (1973), दिनकर के गीत (1973), रश्मिलोक (1974), उर्वशी तथा अन्य शृंगारिक कविताएँ (1974) .

रामधारी सिंह दिनकर की गद्य कृतियाँ
मिट्टी की ओर 1946, चित्तौड़ का साका 1948, अर्धनारीश्वर 1952, रेती के फूल 1954, हमारी सांस्कृतिक एकता 1955, भारत की सांस्कृतिक कहानी 1955, संस्कृति के चार अध्याय 1956, उजली आग 1956, देश-विदेश 1957, राष्ट्र-भाषा और राष्ट्रीय एकता 1955, काव्य की भूमिका 1958, पन्त-प्रसाद और मैथिलीशरण 1958, वेणुवन 1958, धर्म, नैतिकता और विज्ञान 1969, वट-पीपल 1961, लोकदेव नेहरू 1965, शुद्ध कविता की खोज 1966, साहित्य-मुखी 1968, राष्ट्रभाषा आंदोलन और गांधीजी 1968, हे राम! 1968, संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ 1970, भारतीय एकता 1971, मेरी यात्राएँ 1971, दिनकर की डायरी 1973, चेतना की शिला 1973, विवाह की मुसीबतें 1973, आधुनिक बोध 1973 .

रामधारी सिंह दिनकर के सम्मान
दिनकरजी को उनकी रचना कुरुक्षेत्र के लिये काशी नागरी प्रचारिणी सभा, उत्तरप्रदेश सरकार और भारत सरकार से सम्मान मिला. संस्कृति के चार अध्याय के लिये उन्हें 1959 में साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया. भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें 1959 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया. भागलपुर विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलाधिपति और बिहार के राज्यपाल जाकिर हुसैन, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने, ने उन्हें डॉक्ट्रेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया. गुरू महाविद्यालय ने उन्हें विद्या वाचस्पति के लिये चुना. 1968 में राजस्थान विद्यापीठ ने उन्हें साहित्य-चूड़ामणि से सम्मानित किया. वर्ष 1972 में काव्य रचना उर्वशी के लिये उन्हें ज्ञानपीठ से सम्मानित किया गया. 1952 में वे राज्यसभा के लिए चुने गये और लगातार तीन बार राज्यसभा के सदस्य रहे.

30 सितम्बर 1987 को उनकी 13वीं पुण्यतिथि पर तत्कालीन राष्ट्रपति जैल सिंह ने उन्हें श्रद्धांजलि दी. 1999 में भारत सरकार ने उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया. केंद्रीय सूचना और प्रसारण मन्त्री प्रियरंजन दास मुंशी ने उनकी जन्म शताब्दी के अवसर पर रामधारी सिंह दिनकर- व्यक्तित्व और कृतित्व पुस्तक का विमोचन किया. उनकी जन्म शताब्दी के अवसर पर बिहार के मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ने उनकी भव्य प्रतिमा का अनावरण किया. कालीकट विश्वविद्यालय में भी इस अवसर को दो दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया गया.

द्विवेदी युगीन स्पष्टता
कविता के भाव छायावाद के उत्तरकाल के निष्प्रभ शोभादीपों से सजे-सजाये कक्ष से ऊब चुके थे, बाहर की मुक्त वायु और प्राकृतिक प्रकाश और चाहतेताप का संस्पर्श थे. वे छायावाद के कल्पनाजन्य निर्विकार मानव के खोखलेपन से परिचित हो चुके थे, उस पार की दुनिया के अलभ्य सौन्दर्य का यथेष्ट स्वप्न दर्शन कर चुके थे, चमचमाते प्रदेश में संवेदना की मरीचिका के पीछे दौड़ते थक चुके थे, उस लाक्षणिक और अस्वाभिक भाषा शैली से उनका जी भर चुका था, जो उन्हें बार-बार अर्थ की गहराइयों की झलक सी दिखाकर छल चुकी थी. उन्हें अपेक्षा थी भाषा में द्विवेदी युगीन स्पष्टता की, पर उसकी शुष्कता की नहीं, व्यक्ति और परिवेश के वास्तविक संस्पर्श की, सहजता और शक्ति की. बच्चन की कविता में उन्हें व्यक्ति का संस्पर्श मिला, दिनकर के काव्य में उन्हें जीवन समाज और परिचित परिवेश का संस्पर्श मिला. दिनकर का समाज व्यक्तियों का समूह था, केवल एक राजनीतिक तथ्य नहीं था.

द्विवेदी युग और छायावाद
आरम्भ में दिनकर ने छायावादी रंग में कुछ कविताएँ लिखीं, पर जैसे-जैसे वे अपने स्वर से स्वयं परिचित होते गये, अपनी काव्यानुभूति पर ही अपनी कविता को आधारित करने का आत्म विश्वास उनमें बढ़ता गया, वैसे ही वैसे उनकी कविता छायावाद के प्रभाव से मुक्ति पाती गयी पर छायावाद से उन्हें जो कुछ विरासत में मिला था, जिसे वे मनोनुकूल पाकर अपना चुके थे, वह तो उनका हो ही गया.

उनकी काव्यधारा जिन दो कुलों के बीच में प्रवाहित हुई, उनमें से एक छायावाद था. भूमि का ढलान दूसरे कुल की ओर था, पर धारा को आगे बढ़ाने में दोनों का अस्तित्व अपेक्षित और अनिवार्य था. दिनकर अपने को द्विवेदी युगीन और छायावादी काव्य पद्धतियों का वारिस मानते थे. उन्हीं के शब्दों में पन्त के सपने हमारे हाथ में आकर उतने वायवीय नहीं रहे, जितने कि वे छायावाद काल में थे, किन्तु द्विवेदी युगीन अभिव्यक्ति की शुभ्रता हम लोगों के पास आते-जाते कुछ रंगीन अवश्य हो गयी. अभिव्यक्ति की स्वच्छन्दता की नयी विरासत हमें आप से आप प्राप्त हो गयी.

रामधारी सिंह दिनकर का आत्म परीक्षण
दिनकर ने अपने कृतित्व के विषय में एकाधिक स्थानों पर विचार किया है. सम्भवत: हिन्दी का कोई कवि अपने ही कवि कर्म के विषय में दिनकर से अधिक चिन्तन व आलोचना न करता होगा. वह दिनकर की आत्मरति का नहीं, अपने कवि कर्म के प्रति उनके दायित्व के बोध का प्रमाण है कि वे समय-समय पर इस प्रकार आत्म परीक्षण करते रहे. इसी कारण अधिकतर अपने बारे में जो कहते थे, वह सही होता था. उनकी कविता प्राय: छायावाद की अपेक्षा द्विवेदी युगीन स्पष्टता, प्रसाद गुण के प्रति आस्था और मोह, अतीत के प्रति आदर प्रदर्शन की प्रवृत्ति, अनेक बिन्दुओं पर दिनकर की कविता द्विवेदी युगीन काव्यधारा का आधुनिक ओजस्वी, प्रगतिशील संस्करण जान पड़ती है. उनका स्वर भले ही सर्वदा, सर्वथा हुंकार न बन पाता हो, गुंजन तो कभी भी नहीं बनता.

सामाजिक चेतना के चारण
हज़ारी प्रसाद द्विवेदी: वे अहिन्दीभाषी जनता में भी बहुत लोकप्रिय थे क्योंकि उनका हिन्दी प्रेम दूसरों की अपनी मातृभाषा के प्रति श्रद्धा और प्रेम का विरोधी नहीं, बल्कि प्रेरक था.

हरिवंशराय बच्चन: दिनकर जी ने श्रमसाध्य जीवन जिया. उनकी साहित्य साधना अपूर्व थी. कुछ समय पहले मुझे एक सज्जन ने कलकत्ता से पत्र लिखा कि दिनकर को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलना कितना उपयुक्त है ? मैंने उन्हें उत्तर में लिखा था कि यदि चार ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हें मिलते, तो उनका सम्मान होता- गद्य, पद्य, भाषणों और हिन्दी प्रचार के लिए.

अज्ञेय: उनकी राष्ट्रीयता चेतना और व्यापकता सांस्कृतिक दृष्टि, उनकी वाणी का ओज और काव्यभाषा के तत्त्वों पर बल, उनका सात्त्विक मूल्यों का आग्रह उन्हें पारम्परिक रीति से जोड़े रखता है.

रामवृक्ष बेनीपुरी: हमारे क्रान्ति-युग का सम्पूर्ण प्रतिनिधित्व कविता में इस समय दिनकर कर रहा है. क्रान्तिवादी को जिन-जिन हृदय-मंथनों से गुजरना होता है, दिनकर की कविता उनकी सच्ची तस्वीर रखती है.

नामवर सिंह: दिनकर जी सचमुच ही अपने समय के सूर्य की तरह तपे. मैंने स्वयं उस सूर्य का मध्याह्न भी देखा है और अस्ताचल भी. वे सौन्दर्य के उपासक और प्रेम के पुजारी भी थे. उन्होंने संस्कृति के चार अध्याय नामक विशाल ग्रन्थ लिखा है, जिसे पं. जवाहर लाल नेहरू ने उसकी भूमिका लिखकर गौरवन्वित किया था. दिनकर बीसवीं शताब्दी के मध्य की एक तेजस्वी विभूति थे.

राजेन्द्र यादव: दिनकरजी की रचनाओं ने मुझे बहुत प्रेरित किया.
काशीनाथ सिंह: दिनकरजी राष्ट्रवादी और साम्राज्य-विरोधी कवि थे.

दिनकर का नाम प्रगतिवादी कवियों में लिया जाता था, पर अब शायद साम्यवादी विचारक उन्हें उस विशिष्ट पंक्ति में स्थान देने के लिए तैयार न हों, क्योंकि आज का दिनकर अरुण विश्व की काली जय हो! लाल सितारों वाली जय हो? के लेखक से बहुत दूर जान पड़ता है. जो भी हो, साम्यवादी विचारक आज के दिनकर को किसी भी पंक्ति में क्यों न स्थान देना चाहे, इससे इंकार किया ही नहीं जा सकता कि जैसे बच्चन मूलत: एकांत व्यक्तिवादी कवि हैं, वैसे ही दिनकर मूलत: सामाजिक चेतना के चारण हैं.

रामधारी सिंह दिनकर की शैली
दिनकर आधुनिक कवियों की प्रथम पंक्ति में बैठने के अधिकारी हैं, इस पर दो राय नहीं हो सकती. उनकी कविता में विचार तत्त्व की कमी नहीं है, यदि अभाव है तो विचार तत्त्व के प्राचुर्य के अनुरूप गहराई का. उनके व्यक्तित्व की छाप उनकी प्रत्येक पंक्ति पर है, पर कहीं-कहीं भावक को व्यक्तित्व की जगह वक्तृत्व ही मिल पाता है. दिनकर की शैली में प्रसादगुण यथेष्ट हैं, प्रवाह है, ओज है, अनुभूति की तीव्रता है, सच्ची संवेदना है. यदि कमी खटकती है तो तरलता की, घुलावट की. पर यह कमी कम ही खटकती है, क्योंकि दिनकर ने प्रगीत कम लिखे हैं. इनकी अधिकांश रचनाओं में काव्य की शैली रचना के विषय और मूड के अनुरूप हैं. उनके चिन्तन में विस्तार अधिक और गहराई कम है, पर उनके विचार उनके अपने ही विचार हैं. उनकी काव्यनुभूति के अविच्छेद्य अंग हैं, यह स्पष्ट है. यह दिनकर की कविता का विशिष्ट गुण है कि जहाँ उसमें अभिव्यक्ति की तीव्रता है, वहीं उसके साथ ही चिन्तन-मनन की प्रवृत्ति भी स्पष्ट दिखती है.

रामधारी सिंह दिनकर के विशिष्ट महत्त्व
दिनकर जी की प्राय: 50 कृतियाँ प्रकाशित हुई हैं. हिन्दी काव्य छायावाद का प्रतिलोम है, यह कहना तो शायद उचित नहीं होगा पर इसमें सन्देह नहीं कि हिन्दी काव्य जगत पर छाये छायावादी कुहासे को काटने वाली शक्तियों में दिनकर की प्रवाहमयी, ओजस्विनी कविता के स्थान का विशिष्ट महत्त्व है. दिनकर छायावादोत्तर काल के कवि हैं, अत: छायावाद की उपलब्धियाँ उन्हें विरासत में मिलीं पर उनके काव्योत्कर्ष का काल छायावाद की रंगभरी सन्ध्या का समय था.

रामधारी सिंह दिनकर का जीवन-दर्शन
उनका जीवन-दर्शन उनका अपना जीवन-दर्शन है, उनकी अपनी अनुभूति से अनुप्राणित, उनके अपने विवेक से अनुमोदित परिणामत: निरन्तर परिवर्तनशील है. दिनकर प्रगतिवादी, जनवादी, मानववादी आदि रहे हैं और आज भी हैं, पर रसवन्ती की भूमिका में यह कहने में उन्हें संकोच नहीं हुआ कि प्रगति शब्द में जो नया अर्थ ठूँसा गया है, उसके फलस्वरूप हल और फावड़े कविता का सर्वोच्च विषय सिद्ध किये जा रहे हैं और वातावरण ऐसा बनता जा रहा है कि जीवन की गहराइयों में उतरने वाले कवि सिर उठाकर नहीं चल सकें.

गांधीवादी और अहिंसा के हामी होते हुए भी कुरुक्षेत्र में वह कहते नहीं हिचके कि कौन केवल आत्मबल से जूझकर, जीत सकता देह का संग्राम है, पाशविकता खड्ग जो लेती उठा, आत्मबल का एक वश चलता नहीं. योगियों की शक्ति से संसार में, हारता लेकिन नहीं समुदाय है.

रामधारी सिंह दिनकर का बाल-साहित्य
जो कवि सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति सचेत हैं तथा जो अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित हैं, प्रतिबद्ध हैं, वे बाल-साहित्य लिखने के लिए भी अवकाश निकाल लेते हैं. विश्व-कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे अतल-स्पर्शी रहस्यवादी महाकवि ने कितना बाल-साहित्य लिखा है, यह सर्वविदित है. अतः दिनकर जी की लेखनी ने यदि बाल-साहित्य लिखा है तो वह उनके महत्त्व को बढ़ाता ही है. बाल-काव्य विषयक उनकी दो पुस्तिकाएँ प्रकाशित हुई हैं —मिर्च का मजा और सूरज का ब्याह. मिर्च का मजा में सात कविताएँ और सूरज का ब्याह में नौ कविताएँ संकलित हैं. मिर्च का मजा में एक मूर्ख क़ाबुलीवाले का वर्णन है, जो अपने जीवन में पहली बार मिर्च देखता है. मिर्च को वह कोई फल समझ जाता है-
सोचा, क्या अच्छे दाने हैं, खाने से बल होगा,
यह ज़रूर इस मौसम का कोई मीठा फल होगा.

सूरज का ब्याह में एक वृद्ध मछली का कथन पर्याप्त तर्क-संगत है.

सामाजिक चेतना
दिनकर की प्रगतिशीलता साम्यवादी लीग पर चलने की प्रक्रिया का साहित्यिक नाम नहीं है, एक ऐसी सामाजिक चेतना का परिणाम है, जो मूलत: भारतीय है और राष्ट्रीय भावना से परिचालित है. उन्होंने राजनीतिक मान्यताओं को राजनीतिक मान्यताएँ होने के कारण अपने काव्य का विषय नहीं बनाया, न कभी राजनीतिक लक्ष्य सिद्धि को काव्य का उद्देश्य माना, पर उन्होंने नि:संकोच राजनीतिक विषयों को उठाया है और उनका प्रतिपादन किया है, क्योंकि वे काव्यानुभूति की व्यापकता स्वीकार करते हैं. राजनीतिक दायित्वों, मान्यताओं और नीतियों का बोध सहज ही उनकी काव्यानुभूति के भीतर समा जाता है.

ओजस्वी-तेजस्वी स्वरूप
अलाउद्दीन ख़िलज़ी ने जब चित्तौड़ पर कब्ज़ा कर लिया, तब राणा अजय सिंह अपने भतीजे हम्मीर और बेटों को लेकर अरावली पहाड़ पर कैलवारा के क़िले में रहने लगे. राजा मुंज ने वहीं उनका अपमान किया था, जिसका बदला हम्मीर ने चुकाया. उस समय हम्मीर की उम्र सिर्फ़ ग्यारह साल की थी. आगे चलकर हम्मीर बहुत बड़ा योद्धा निकला और उसके हठ के बारे में यह कहावत चल पड़ी कि तिरिया तेल हमीर हठ चढ़ै न दूजी बार. इस रचना में दिनकर जी का ओजस्वी-तेजस्वी स्वरूप झलका है. क्योंकि इस कविता की विषय-सामग्री उनकी रुचि के अनुरूप थी. बालक हम्मीर कविता राष्ट्रीय गौरव से परिपूर्ण रचना है. इस कविता की निम्नलिखित पंक्तियाँ पाठक के मन में गूँजती रहती हैं-
धन है तन का मैल, पसीने का जैसे हो पानी,
एक आन को ही जीते हैं इज्जत के अभिमानी.

रामधारी दिनकर के प्रमुख काव्यात्मक कार्य
रामधारी दिनकर का पहला प्रकाशित कवितात्मक कार्य विजय संदेश (1928) था
उनके दूसरे काम हैं
1- प्रणभंग (1929)
2- रेणुका (1935)
3- हुनकर (महाकाव्य कविता) (1938)
4- रसवंती (1939)
5- द्वन्दगीत (1940)
6- कुरुक्षेत्र (1946)
7- धूप छांव (1946)
8- सामधेनी (1947)
9- बापू (1947)
10- इतिहास के आँसू (1951)
11- धूप और धुन (1951)
12- मिर्च का मज़ा (1951)
13- रश्मिरथी (1952)
14- दील्ली (1954)
15- नीम के पत्ते (1954)
16- सूरज का बियाह (1955)
17- नील कुसुम (1954)
18- चक्रवाल (1956)
19- सीपी और शंख (1957)
20- नाय सुभाषिता (1957)
21- उर्वशी (1961)
22- परशुराम की प्रतिक्षा (1963)
23- कोयला और कवितवा (1964)
24- मृति तिलक (1964)
25- आत्मा की आँखे (1964)
26- हारे को हरिनाम (1970)

रामधारी दिनकर के कविता का संकलन
1- लोकप्रिया कवि दिनकर (1960)
2- दिनार की सूक्तियां (1964)
3- दिनकर के गीत (1973)
4- संचयिता(1973)
5- रश्मिलोक (1974)
6- उर्वशी तथा अन्य श्रंगारिक कवितायें (1974)
7- अमृत ​​मंथन, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008
8- भाजन विना, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008
9- सपनों का धुन, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008
10- समानांतर लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008
11- रश्मिमाला, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008

रामधारी दिनकर के प्रमुख गद्य कार्य
दिनकर के प्रमुख विश्लेषणात्मक और अन्य गद्य कार्य हैं
1- मिट्टी की ओर (1946)
2- चित्तौर का साका (1948)
3- अर्धनारीश्वर (1952)
4- रेती की फूल (1954)
5- हमारी सांस्कृतिक एकता (1954)
6- भारत की सांस्कृतिक कहानी (1955)
7- राज्यभाषा और राष्ट्रीय एकता (1955)
8- उजली आग (1956)
9- संस्कृति के चार अध्याय (1956)
10- काव्य की भूमिका (1958)
11- पंत, प्रसाद और मैथिलीशरण (1958)
12- वेणु वान (1958)
13- धर्म, नैतिकता और विज्ञान (1959)
14- वट-पीपल (1961)
15- लोकदेव नेहरू (1965)
16- शुद्ध कविता की खोज (1966)
17- साहित्यमुखी (1968)
18- हे राम! (1968)
19- संस्मरण और श्रद्धांजलियन (1970)
20- मेरी यत्रायें (1971)
21- भारतीय एकता (1971)
22- दिनकर की डायरी (1973)
23- चेतना की शिला (1973)
24- विवाह की मुसीबतें (1973) और
25- आधुनिक बोध (1973)
26- साहित्यिक आलोचना
27- साहित्य और समाज, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008
28- चिंतन के आयाम, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008
29- कवि और कविता, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008
30- संस्कृति भाषा और राष्ट्र, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008
31- कविता और शुद्ध कविता, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008

रामधारी दिनकर की आत्मकथाएं
1- श्री अरबिंदो: मेरी दृष्टी में , लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008
2- पंडित नेहरू और और अन्य महापुरुष, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008
3- समरांजलि, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008

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